आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
श्लोक 182 से 191 पर्वत की विविधता
इंद्रधनुष लता बनती थी। देवांगनाओं के नुपूर शब्द गूँजते थे। हाथी क्रीड़ा करते थे। सर्प और सुरागाएँ शब्द करते थे। पर्वत साँस लेता और झूमता था। विद्याधरियाँ विचार करती थीं। भौंरे संगीत करते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 182 to 191
श्लोक ( Shlok ) 182
क्वचिद् विचित्ररत्नांशुरचितेन्द्रधनुर्लताम् । दधानमनिलोद्धतां ततां कल्पलतामिव ॥१८२॥
कहीं चित्र-विचित्र रत्नों की किरणों से इंद्रधनुष की लता बन रही थी और वह ऐसी मालूम होती थी मानो वायु से उड़कर चारों ओर फैली हुई कल्पलता ही हो ।।182।।
In some places, the rays of various dazzling gems formed a vine-like rainbow, which appeared as if a celestial wish-fulfilling vine had been carried by the wind and spread in all directions. ॥182॥
श्लोक ( Shlok ) 183
क्वचिच्च विचरद्दिव्यकामिनीनृपुरारवै । रमणीयसरस्तीरं हंसीविरुतमुर्च्छितैः ॥१८३॥
कहीं देवांगनाएँ विहार कर रही थीं, उनके नुपूरों के शब्द हंसिनियों के शब्दों से मिलकर बुलंद हो रहे थे और उनसे तालाबों के किनारे बड़े ही रमणीय जान पड़ते थे ।।183।।
In some places, celestial maidens were joyfully wandering, and the sound of their anklets blended with the calls of swans, creating a harmonious melody that made the pondside areas appear even more enchanting. ॥183॥
श्लोक ( Shlok ) 184
क्वचिद् विचतुरक्रीडामाचरद्भिरनेकपैः । सलिलान्दोलितालानैरालोलितवनद्रुमम् ।।१८४।।
कहीं लीला मात्र में अपने खूंटों को उखाड़ देने वाले बड़े-बड़े हाथी चतुराई के साथ एक विशेष प्रकार की क्रीड़ा कर रहे थे और उससे उस पर्वत पर के वनों के वृक्ष खूब ही हिल रहे थे ।।184।।
In some places, mighty elephants, capable of uprooting their stakes with ease, were engaging in a unique playful sport. Their movements caused the trees of the mountain’s forests to sway vigorously. ॥184॥
श्लोक ( Shlok ) 185
क्वचित् पुलिनसंसुप्तसारसीरुतमूर्च्छितैः। कळहंसी कलक्वाणैर्वाचालित सरोजलम् ॥१८५॥
कहीं किनारे पर सोती हुई सारसियों के शब्दों में कलहंसिनियों (बतख) के मनोहर शब्द मिल रहे थे और उनसे तालाब का जल शब्दायमान हो रहा था ।।185।।
In some places, the calls of sleeping cranes blended harmoniously with the melodious sounds of swans, filling the pond’s waters with a symphony of sound. ॥185॥
श्लोक ( Shlok ) 186
क्वचित् कुद्धाहि सूत्कारैः श्वसन्तमिव हेलया । क्वचिच्च चमरीयूथैर्हसन्तमिव निर्मलैः ॥१८६।।
कहीं कुपित हुए सर्प श-श शब्द कर रहे थे जिनसे वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो क्रीड़ा करता हुआ श्वास ही ले रहा हो, और कहीं निर्मल सुरागायों के झुंड फिर रहे थे जिनसे वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो हँस ही रहा हो ।।186।।
In some places, enraged serpents hissed with a sh-sh sound, making the mountain appear as if it were breathing while at play. Elsewhere, flocks of pure white celestial swans roamed about, making the mountain seem as if it were laughing. ॥186॥
श्लोक ( Shlok ) 187
गृहानिलैः क्वचिद्वयक्तमुच्छ वसन्तमिवायतम् । क्वचिच्च पवनाधूतैर्घूर्णन्तमिव पादपैः ।।१८७।।
कहीं गुफा से निकलती हुई वायु के द्वारा वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो प्रकट रूप से लंबी साँस ही ले रहा हो और कहीं पवन से हिलते हुए वृक्षों से ऐसा मालूम होता था मानो वह झूम ही रहा हो ।।187।।
In some places, as the wind flowed out of the caves, the mountain seemed to be taking deep, visible breaths. Elsewhere, the swaying trees made it appear as if the mountain itself was gently swaying. ॥187॥
श्लोक ( Shlok ) 188
निभृतं चिन्तयन्तीभिरिष्टकामुकसंगमम् । विजने खचरस्त्रीभिः मूकीभूतमिव क्वचित् ।।१८८।।
कहीं उस पर्वत पर एकांत स्थान में बैठी हुई विद्याधरों की स्त्रियाँ अपने इष्टकामी लोगों के समागम का खूब विचार कर रही थीं जिससे वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो चुप ही हो रहा हो ।।188।।
In some places on that mountain, Vidyadhara women sat in secluded spots, deeply contemplating their desired reunions with their beloved ones. This made the mountain appear as if it had fallen into silent contemplation. ॥188॥
श्लोक ( Shlok ) 189
क्वचिच्च चटुलोदञ्च ञ्चञ्चरीककलस्वनैः । किमप्यारब्धसंगीतमिव व्यायतमूर्च्छनम् ।।१८९।।
और कहीं चंचलतापूर्वक उड़ते हुए भौंरों के मनोहर शब्द हो रहे थे और उनसे वह पर्वत ऐसा मालूम होता था मानो उसने जिसकी आवाज बहुत दूर तक फैल गयी है ऐसे किसी अलौकिक संगीत का ही प्रारंभ किया हो ।।189।।
And in some places, the sweet humming of swiftly flying bees filled the air, making the mountain seem as if it had begun a celestial melody whose sound resonated far and wide. ॥189॥
श्लोक ( Shlok ) 190 –191
कदम्बा मोदसंवादिसुरभिश्वसितैर्मुखैः । तरुणार्ककरस्पर्शाद् विबुधैरिव पङ्कजैः ।।१९०।।
नेत्रैर्मधुमदाताम्र इन्दोवरदलायतः । मदनस्यैव जैत्रास्त्रैः सालसापाङ्गवीक्षितैः ॥१९१॥
उस पर्वत पर के वनों में अनेक तरुण विद्याधरियाँ अपने-अपने तरुण विद्याधरों के साथ विहार कर रही थीं । उन विद्याधरियों के मुख कदंब पुष्प की सुगंधि के समान के सुगंधित श्वास से सहित थे और जिस प्रकार तरुण अर्थात् मध्याह्न के सूर्य की किरणों के स्पर्श से कमल खिल जाते हैं उसी प्रकार अपने तरुण पुरुषरूपी सूर्य के हाथों के स्पर्श से खिले हुए थे―प्रफुल्लित थे । उनके नेत्र मद्य के नशा से कुछ-कुछ लाल हो रहे थे, वे नील कमल के फूल के समान लंबे थे, आलस्य के साथ कटाक्षावलोकन करते थे और ऐसे मालूम होते थे मानो कामदेव के विजयशील अस्त्र ही हों ।।190-191।।
In the forests of that mountain, many young Vidyadhari maidens were joyfully wandering with their beloved Vidyadhara youths. Their faces were adorned with fragrant breaths, as sweet as the scent of Kadamba flowers. Just as lotus blossoms bloom at the touch of the midday sun’s rays, so too were their radiant faces blossoming—enlivened by the tender touch of their beloveds’ hands.
Their eyes, slightly reddened with the intoxication of love, were long and slender like blue lotus petals. They cast sidelong glances with a hint of languor, appearing as if they were the victorious weapons of Kamadeva himself. ॥190-191॥
श्लोक 192 से 202
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181