आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101
श्लोक 102 से 111 दान का उत्सव और भगवान का प्रस्थान
आकाश से देवों ने रत्नों की वर्षा की। फूलों की वर्षा भ्रमरों से व्याप्त थी। देवों के नगाड़े गंभीर शब्द करते थे। शीतल सुगंधित वायु चली। देवों ने ‘धन्य दान, पात्र, दाता’ का शब्द किया। सोमप्रभ और श्रेयान्स ने अपने को कृतकृत्य माना। अनुमोदना से लोग पुण्य प्राप्त करते थे। पुण्य शुभ परिणामों से मिलता है। भगवान ने आहार ग्रहण कर दोनों को हर्षित किया। वे वन को प्रस्थान कर गए।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
रत्नवृष्टिरथापप्तदम्बरा दमरेशिनाम् । करैर्मुक्तामहादानफलस्येव परम्परा ॥१०२॥
तदनंतर आकाश से महादान के फल की परंपरा के समान देवों के हाथ से छोड़ी हुई रत्नों की वर्षा होने लगी ।।102।।
“Then, as a divine acknowledgment of the great act of charity, a shower of precious jewels began to rain down from the hands of the celestial beings in the sky.” ( 102)
श्लोक ( Shlok ) 103
तदापप्तद्दिवो देवकरैर्मुक्तालिसंकुला । वृष्टिः सुमनसां दृष्टिमालेव त्रिदिवौकसाम् ॥१०३॥
उसी समय देवों के हाथों से छोड़ी हुई और भ्रमरों के समूह से व्याप्त फूलों की वर्षा आकाश से होने लगी । वह फूलों की वर्षा ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो देवों के नेत्रों की माला ही हो ।।103।।
“At that very moment, a shower of flowers, released from the hands of celestial beings and swarmed by bees, began to descend from the sky. That shower of flowers appeared so magnificent as if it were a garland of the gods’ very own eyes.” ( 103)
श्लोक ( Shlok ) 104
नेदुः सुरानका मन्द्रं वधिरोकृतविष्टपाः । संचचार मरुच्छीतः सुरभिर्मान्द्यसुन्दरः ॥१०४॥
उसी समय समस्त लोक को बधिर करने वाले देवों के नगाड़े गंभीर शब्द करने लगे और मंद-मंद गमन करने से सुंदर शीतल तथा सुगंधित वायु चलने लगा ।।104।।
“At that very moment, celestial drums resounded with deep reverberations, deafening the entire world, while a gentle, cool, and fragrant breeze began to blow gracefully.” (104)
श्लोक ( Shlok ) 105
प्रोच्चचार महाध्वानो देवानां प्रीतिमीयुषाम् अहो दानमहो पात्रमहो दातेति खाङ्गणे ॥१०५॥
उसी समय प्रीति को प्राप्त हुए देवों का ‘धन्य यह दान, धन्य यह पात्र, और धन्य यह दाता’ इस प्रकार बड़ा भारी शब्द आकाशरूपी आंगन में हो रहा था ।।105।।
“At that very moment, the delighted celestial beings resounded in the vast sky, proclaiming loudly, ‘Blessed is this charity, blessed is this recipient, and blessed is this donor!'” (105)
श्लोक ( Shlok ) 106
कृतार्थतरमात्मानं मेने तद् भ्रातृयुग्मकम् । कृतार्थोऽपि विभुर्यस्माद पुनात् स्व गृहाङ्गणम् ॥१०६॥
उस समय उन दोनों भाइयों ने अपने-आपको बहुत ही कृतकृत्य माना था क्योंकि कृतकृत्य हुए भगवान् वृषभदेव ने स्वयं उनके घर के आंगन को पवित्र किया था ।।106।।
“At that moment, both brothers considered themselves truly blessed, for the fulfilled Lord Rishabhadeva had sanctified the courtyard of their home with His divine presence.” (106)
श्लोक ( Shlok ) 107
दानानुमोदनात् पुण्यं परोऽपि बहवोऽभजन् । यथासाद्य परं रत्नं स्फटिकस्तद्रुचिं भजेत् ॥१०७॥
उस दान की अनुमोदना करने से और भी बहुत से लोग परम पुण्य को प्राप्त हुए थे सो ठीक ही है क्योंकि स्फटिक मणि किसी अन्य उत्कृष्ट रत्न को पाकर उसकी कांति को प्राप्त होता ही है ।।107।।।
“By rejoicing in this act of charity, many others also attained immense merit. And rightly so, for just as a crystal attains radiance upon coming into contact with a precious gem, so too does one gain virtue by appreciating noble deeds.” ( 107)
श्लोक ( Shlok ) 108 – 109
कारणं परिणामः स्याद् बन्धने पुण्यपापयोः । बाह्यं तु कारणं प्राहुराप्ताः कारणकारणम् ॥१०८॥
परिणामः प्रधानाङ्गं यतः पुण्यस्य साधने । मतं ततोऽनुमन्तणामा दिष्टस्तत्फलोदयः ॥१०९॥
यदि यहाँ कोई आशंका करे कि अनुमोदना करने से पुण्य की प्राप्ति किस प्रकार होती है तो उसका समाधान यह है कि पुण्य और पाप के बंध होने में केवल जीव के परिणाम ही कारण हैं बाह्य कारणों को तो जिनेंद्र देव ने केवल कारण का कारण अर्थात शुभ अशुभ परिणामों का कारण कहा है । जब कि पुण्य के साधन करने में जीवों के शुभ परिणाम ही प्रधान कारण माने जाते हैं तब शुभ कार्य की अनुमोदना करने वाले जीवों को भी उस शुभ फल की प्राप्ति अवश्य होती है ।।108-109।।
“If anyone questions how merit (punya) is attained through appreciation (anumana), the answer is that in the bondage of merit and sin, it is only the inner disposition of the soul that acts as the primary cause. The external factors have been described by Lord Jina as mere secondary causes—meaning they influence the auspicious or inauspicious states of the soul but are not the main determinants. Since auspicious states of the soul are considered the primary cause in earning merit, those who sincerely rejoice in a virtuous act also certainly attain its beneficial fruits.” (108-109)
श्लोक ( Shlok ) 110
कृत्वा तनुस्थिति धीमान् योगीन्द्रोजातु कौतुकौ । प्रणतावभिनन्द्यैतौ भ्रातरौ प्रस्थितौ वनम् ॥ ११०ll
इस प्रकार महाबुद्धिमान् योगिराज भगवान वृषभदेव शरीर की स्थिति के अर्थ आहार-ग्रहण कर और जिन्हें एक प्रकार का कौतुक उत्पन्न हुआ है तथा जो अतिशय नम्रीभूत हैं ऐसे उन दोनों भाइयों को हर्षित कर पुन: वन की ओर प्रस्थान कर गये ।।110।।
“In this way, the supremely wise Yogi King, Lord Rishabhadeva, accepted food for the sustenance of His body. He gladdened the two brothers, who had developed a sense of wonder and had become extremely humble. Thereafter, He once again set out toward the forest.” (110)
श्लोक ( Shlok ) 111
भगवन्तमनुवज्य व्रजन्तं किंचिदन्तरम् । स श्रेयान् कुरुशार्दूलो न्यवृतन्निभृतं पुनः ॥१११॥
कुरुवंशियों में सिंह के समान पराक्रमी वह राजा सोमप्रभ और श्रेयान्स कुछ दूर तक वन को जाते हुए भगवान् के पीछे-पीछे गये और फिर रुक-रुककर वापिस लौट आये ।।111।।
“Like a lion among the Kuru dynasty, the mighty King Somaprabha and Shreyans followed Lord Rishabhadeva for some distance as He proceeded toward the forest. Then, pausing intermittently, they eventually returned.” ( 111)
श्लोक 112 से 121
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
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