भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
श्लोक 202 से 221 महाबल का पूर्वभव और स्वप्न
स्वयंबुद्ध ने मुनि से महाबल के वैभव का वर्णन सुना। जंबूद्वीप के विदेह क्षेत्र में गंधिला देश के सिंहपुर में श्रीषेण राजा था, जिसकी पत्नी सुंदरी थी। उनके दो पुत्र थे: जयवर्मा और श्रीवर्मा। श्रीषेण ने छोटे पुत्र श्रीवर्मा को राजपट्ट दिया, जिससे जयवर्मा को वैराग्य हुआ। उसने दीक्षा ली, पर भोगों की इच्छा करते हुए सर्पदंश से मृत्यु पाई और महाबल बना। स्वयंबुद्ध के वचनों से वह विरक्त होगा। महाबल ने स्वप्न देखा: तीन दुष्ट मंत्रियों ने उसे कीचड़ में फँसाया, स्वयंबुद्ध ने उसे बचाकर अभिषेक किया; दूसरा स्वप्न अग्नि ज्वाला का था। मुनि ने कहा कि पहला स्वप्न भविष्य की विभूति और दूसरा आयुक्षय (एक माह शेष) का सूचक है। स्वयंबुद्ध को शीघ्र प्रयत्न करने को कहा।
English translation of Ādi purāṇa parv 5- Shlok 202 to 221
श्लोक ( Shlok ) 202
इतोऽतीतमयं चास्य वक्ष्ये शृणु समासतः । धर्मबीजमनेनोप्तं यत्र भोगेच्छयान्वितम् ॥ २०२॥
अब में संक्षेप से इसके उस वैभव का वर्णन करता हूँ जहाँ कि इसने भोगों की इच्छा के साथ-साथ धर्म का बीज बोया था । राजन् तुम सुनो ।।202।।
Now, I will briefly describe the splendor where it not only desired indulgence but also sowed the seeds of righteousness. O King, listen!( 202)
श्लोक ( Shlok ) 203 – 204
इहैवापरतो मेरोविंदेहेगन्धिकामिधे । पुरे सिंहपुराभिख्ये पुरन्दरपुरोपमे ।।२०३॥
श्रीषेण इत्यभूद्राजा राजेव प्रियदर्शनः । देवी व सुन्दरी वस्य बभूवात्यन्वसुन्दरी ॥ २०४॥
इसी जंबूद्वीप में मेरुपर्वत से पश्चिम की ओर विदेह क्षेत्र में एक गंधिला-नाम का देश है उसमें सिंहपुर नाम का नगर है जो कि इंद्र के नगर के समान सुंदर है । उस नगर में एक श्रीषेण नाम का राजा हो गया है । वह राजा चंद्रमा के समान सबको प्रिय था । उसकी एक अत्यंत सुंदर सुंदरी नाम की स्त्री थी ।।203-204।।
In this very Jambudweep, to the west of Mount Meru, lies the Videha region, which contains a land named Gandhila. In that land, there is a city called Singhpur, as beautiful as the city of Indra. In that city, there ruled a king named Shrisen, who was as beloved as the moon. He had an extremely beautiful wife named Sundari.( 203-204)
श्लोक ( Shlok ) 205
जयवर्माह्वयः सोऽयं तयोः सूनुरजायत । श्रीवर्मेति च तस्याभूदनुजो जनताप्रियः ॥२०५।।
उन दोनों के पहले जयवर्मा नाम का पुत्र हुआ और उसके बाद उसका छोटा भाई श्रीवर्मा हुआ । वह श्रीवर्मा सब लोगों को अतिशय प्रिय था ।।205।।
First, they had a son named Jayavarma, and after him was born his younger brother, Shrivarma. Shrivarma was exceedingly beloved by everyone.(205)
श्लोक ( Shlok ) 206
‘पित्रोरपि निसर्गेच कनीयानभवत् प्रियः । प्रायः प्रजात्वसाम्येऽपि कचित् प्रीतिः प्रजायते ।।२०६॥
वह छोटा पुत्र माता-पिता के लिए भी स्वभाव से ही प्यारा था सो ठीक ही है संतानपना समान रहने पर भी किसी पर अधिक प्रेम होता ही है ।।206।।
The younger son was naturally dear to his parents, which is only natural. Even when all children are equal, a special affection often develops for one.( 206)
was exceedingly beloved by everyone.(205)
श्लोक ( Shlok ) 207
जनानुरागमुत्साहं पिता दृष्ट्रा कनीयसि । राज्यपट्ट बबन्धास्य ज्यायांसमवधीरयन् ॥२०७॥
पिता श्रीषेण ने मनुष्यों का अनुराग तथा उत्साह देखकर छोटे पुत्र श्रीवर्मा के मस्तक पर ही राज्यपट्ट बाँधा और इसके बड़े भाई जयवर्मा की उपेक्षा कर दी ।।207।।
King Shrisen, observing the affection and enthusiasm of the people, placed the royal crown upon the head of his younger son, Shrivarma, thereby neglecting his elder son, Jayavarma.( 207)
श्लोक ( Shlok ) 208
जयवर्माथ निर्वेदं परं प्राप्य तपोऽग्रहीत् । स्वयंप्रमगुरोः पाश्वें “स्वमपुण्यं “विगर्हयन् ॥२०८॥
पिता की इस उपेक्षा से जयवर्मा को बड़ा वैराग्य हुआ जिससे वह अपने पापों की निंदा करता हुआ स्वयंप्रभगुरु से दीक्षा लेकर तपस्या करने लगा ।।208।।
Due to his father’s neglect, Jayavarma developed great detachment. Criticizing his own sins, he took initiation from the revered Guru Svayambhū and began practicing austerities.( 208)
श्लोक ( Shlok ) 209
नवसंयत एवासौ य यान्तवृद्ध्या ‘महीधरम् । खे खेचरेशसुचक्षुर्वीक्ष्यासीत् सनिदानकः ॥२०९॥
महा खेचरभोगा हि भूयासुर्मेऽन्यजन्मनि । इति प्यायश्वसौ दष्टौ वल्मीकाद् मीममोगिना ॥२१०।
मोगं काम्यन् विसृष्टासुरिह भूत्वा महाषकः । सोऽ नाशितम्मवान् भोगान् भुङ्क्तेऽद्य खचरोचितान् २११
ततो भोगेष्वसावेव चिरकालमरम्यत । भवद्वचोऽधुना श्रुत्वा क्षिप्रमेभ्यो विरं स्वति ॥२१२॥
जयवर्मा अभी नवदीक्षित ही था―उसे दीक्षा लिये बहुत समय नहीं हुआ था कि उसने विभूति के साथ आकाश में जाते हुए महीधर नाम के विद्याधर को आँख उठाकर देखा । उस विद्याधर को देखकर जयवर्मा ने निदान किया कि मुझे आगामी भव में बड़े-बड़े विद्याधरों के भोग प्राप्त हों । वह ऐसा विचार ही रहा था कि इतने में एक भयंकर सर्प ने बामी से निकलकर उसे डस लिया । वह भोगों की इच्छा करते हुए ही मरा था इसलिए यहाँ महाबल हुआ है और कभी तृप्त न करने वाले विद्याधरों के उचित भोगों को भोग रहा है । पूर्वभव के संस्कार से ही वह चिरकाल तक भोगों में अनुरक्त रहा है किंतु आपके वचन सुनकर शीघ्र ही इनसे विरक्त होगा ।।209-212।।
Jayavarma had just recently been initiated—he had not been ordained for long—when he lifted his eyes and saw a Vidyadhara named Mahidhara flying through the sky, adorned with great splendor. Upon seeing this Vidyadhara, Jayavarma resolved that in his future life, he would attain the grand enjoyments of the Vidyadharas. While he was harboring this desire, a venomous serpent emerged from its burrow and bit him. He died with a longing for enjoyments, and as a result, he was reborn here as Mahabal and is now indulging in the insatiable pleasures suited to Vidyadharas.
Because of the impressions from his previous life, he remained deeply attached to these pleasures for a long time. However, upon hearing your words, he will soon become detached from them.( 209-212)
श्लोक ( Shlok ) 213 – 214
सोऽच रात्रौ समैक्षिष्ट स्वप्ने दुर्मन्त्रिमिस्त्रिभिः । निमज्यमानमात्मानं बालात् पङ्क पदुरुत्तरे ॥ २१३॥
तत्तो “निर्मत्स्यें तान् दुष्टान् दुः पङ्कावुद्धतं त्वया । अभिषितं “स्वमैक्षिष्ट निविष्टं हरिविष्टरे ॥२१४॥
आज रात को उसने स्वप्न में देखा है कि तुम्हारे सिवाय अन्य तीन दुष्ट मंत्रियों ने उसे बलात्कार किसी भारी कीचड़ में फँसा दिया है और तुमने उन दुष्टों मंत्रियों की भर्त्सना कर उसे कीचड़ से निकाला है और सिंहासन पर बैठाकर उसका अभिषेक किया है ।।213-214।।
Last night, he dreamed that three wicked ministers, apart from you, forcefully trapped him in a deep mire. However, you rebuked those wicked ministers, rescued him from the mud, and seated him on the throne, performing his coronation.( 213-214)
श्लोक ( Shlok ) 215
दीप्तामेकां च स ज्वाला यमाणामनुक्षणम् । “क्षणप्रभामिवालोक्लामपश्यत् क्षणदाक्षये ॥२१५॥
इसके सिवाय दूसरे स्वप्न में देखा है कि अग्नि की एक प्रदीप्त ज्वाला बिजली के समान चंचल और प्रतिक्षण क्षीण होती जा रही है । उसने ये दोनों स्वप्न आज ही रात्रि के अंतिम समय में देखे हैं ।।215।।
Apart from this, he saw another dream in which a blazing flame of fire, flickering like lightning, was gradually diminishing moment by moment. He saw both these dreams just before dawn today.( 215)
श्लोक ( Shlok ) 216
ष्ष्ट्वा स्वप्नावतिस्पष्टं स्वामेव प्रतिपालयन् । आस्ते तस्मात् स्वमाश्वेव गस्वैनं प्रतिबोधय ॥२१६॥
अत्यंत स्पष्ट रूप से दोनों स्वप्नों को देख वह तुम्हारी प्रतीक्षा करता हुआ ही बैठा है इसलिए तुम शीघ्र ही जाकर उसे समझाओ ।।216।।
Having seen both dreams with great clarity, he sits there waiting for you. Therefore, go quickly and guide him.( 216)
श्लोक ( Shlok ) 217
स्वमद्वयमदः पूर्व त्वचः श्रुत्वातिविस्मितः । प्रीतो मवद्वचःकृत्स्नं स करिष्यस्यसंशयम् ॥२१७॥
वह पूछने के पहले ही आप से इन दोनों स्वप्नों को सुनकर अत्यंत विस्मित होगा और प्रसन्न होकर निःसंदेह आपके समस्त वचनों को स्वीकृत करेगा ।।217।।
Even before he asks, upon hearing about these two dreams from you, he will be greatly astonished. Filled with joy, he will undoubtedly accept all your words.( 217)
श्लोक ( Shlok ) 218 – 219
तृषितः पयसीयाब्दात् पतिते चातकोऽधिकम् । ‘जनुषान्ध इवानन्धंकरणे परमौषधे ॥२१८॥
रुचिमेध्यति सद्धमें त्वत्तः सोऽद्य प्रबुद्धधीः । दूत्येव मुक्तिकामिन्याः काललब्ध्या प्रचोदितः ॥२१९॥
जिस प्रकार प्यासा चातक मेघ में पड़े हुए जल में, और जंमांध पुरुष तिमिर रोग दूर करने वाली श्रेष्ठ ओषधि में अतिशय प्रेम करता है उसी प्रकार मुक्तिरूपी सी की दूत के समान काललब्धि के द्वारा प्रेरित हुआ महाबल आप से प्रबोध पाकर समीचीन धर्म में अतिशय प्रेम करेगा ।।218-219।।
ust as a thirsty Chataka bird deeply longs for the water from the clouds, and a congenitally blind person cherishes a remedy that cures their darkness, in the same way, Mahabal—guided by the messenger of liberation in the form of opportune timing—will, upon receiving enlightenment from you, develop deep devotion toward the true path of righteousness.(218-219)
श्लोक ( Shlok ) 220
विद्धि तद्भाविपुण्यद्धिपिशुनं स्वप्नमादिमम् । द्वितीयं च तदीयायुरतिहास निवेदकम् ॥२२०।।
राजा महाबल ने जो पहला स्वप्न देखा है उसे तुम उसके आगामी भव में प्राप्त होने वाली विभूति का सूचक समझों और द्वितीय स्वप्न को उसकी आयु के अतिशय ह्रास को सूचित करने वाला जानो ।।220।।
The first dream that King Mahabal saw should be understood as an indication of the grandeur he will attain in his future life, while the second dream signifies the significant decline of his current lifespan.
( 220)
श्लोक ( Shlok ) 221
मासमात्रावशिष्टं च जीवितं तस्य निश्विनु । तदस्य श्रेयसे भद्र घटेथास्त्वमशीतकः ॥२२१॥
यह निश्चित है कि अब उसकी आयु एक माह की ही शेष रह गयी है इसलिए हे भद्र, इसके कल्याण के लिए शीघ्र ही प्रयत्न करो, प्रमादी न होओ ।।221।।
It is certain that his lifespan now remains only one month. Therefore, O noble one, make haste for his welfare and do not be negligent.( 221)
श्लोक 222 से 231
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
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