आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201
श्लोक 202 से 211 ध्यान तप की महिमा
भगवान का ध्यान तप व्युत्सर्ग से सिद्ध हुआ। ध्यान से वे कृतकृत्य हुए। ध्यान ही उत्तम तप है। मन, इंद्रिय, और काय के निग्रह से तप होता है। वे बारह तपों में प्रयत्नशील थे। संवर के लिए गुप्ति आदि धारण किए। वे एकांत, मनोहर स्थानों में ध्यान करते थे। गुफा, नदी किनारे आदि ध्यान के योग्य थे। वे पहाड़ों पर ध्यान लगाते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 202 to 211
श्लोक ( Shlok ) 202
ततो व्युत्सर्गपूर्वोऽस्य ध्यानयोगोऽभवद् विभोः । मुनिर्व्युत्सृष्टकायो हि स्वामी सद्ध्यानसंपदः ॥२०२॥
तदनंतर स्वामी वृषभदेव के व्युत्सर्गतपश्चरणपूर्वक ध्यान नाम का तप भी हुआ था, सो ठीक ही है शरीर से ममत्व छोड़ देने वाला मुनि ही उत्तम ध्यानरूपी संपदा का स्वामी होता है ।।202।।
“Subsequently, Bhagwan Rishabhdev also engaged in Dhyana Tapasya (meditative austerity) along with Vyutsarga Tapasya. And rightly so—only a monk who has renounced attachment to the body can truly attain the great wealth of supreme meditation. ( 202)”
श्लोक ( Shlok ) 203
ध्यानाभ्यासं ततः कुर्वन् योगी सुनिवृतो भवेत्। शेषः परिकरः सर्वो ध्यानमेवोत्तमं तपः ॥२०३॥
योगिराज वृषभदेव ध्यानाभ्यासरूप तपश्चरण करते हुए ही कृतकृत्य हुए थे क्योंकि ध्यान ही उत्तम तप कहलाता है इसके सिवाय बाकी सब उसी के साधन मात्र कहलाते हैं । भावार्थ―सबसे उत्तम तप ध्यान ही है क्योंकि कर्मों की साक्षात् निर्जरा ध्यान से ही होती है । शेष ग्यारह प्रकार के तप ध्यान के सहायक कारण है ।।203।।
“Yogiraj Rishabhdev attained ultimate fulfillment through meditative austerity (Dhyana Tapasya) alone, as meditation is considered the highest form of penance. All other austerities are merely means to support it.
Explanation: Meditation is the supreme penance, as it directly leads to the shedding of karmas. The remaining eleven types of penance serve only as supporting factors for achieving true meditation. ( 203)”
श्लोक ( Shlok ) 204
मनोऽक्षग्रामकायानां तपनात् सन्रिरोधनात्। तपो निरुच्यते तज्ज्ञैस्तदिदं द्वादशात्मकम् ॥ २०४॥
मन, इंद्रियों का समूह और काय इनके तपन तथा निग्रह करने से ही तप होता है ऐसा तप के जाननेवाले गणधरादि देव कहते हैं और वह तप अनशन आदि के भेद से बारह प्रकार का होता है ।।204।।
“The omniscient Ganadharas declare that true penance (Tapas) is the discipline and restraint of the mind, senses, and body through austerities. This penance is categorized into twelve types, including fasting (Anashan) and others. ( 204)”
श्लोक ( Shlok ) 205
विपुलां निर्जरामिच्छन् महोदकं च संवरम् । यतते स्म तपस्यस्मिन् द्विषड्भेदे विदांवरः ॥२०५॥
विद्वानों में अतिशय श्रेष्ठ वे भगवान् कर्मों की बड़ी भारी निर्जरा, और उत्तम फल देने वाले संवर की इच्छा करते हुए इन बारह प्रकार के तपो में सदा प्रयत्नशील रहते थे ।।205।।
“The supremely wise Lord, always striving for the great annihilation of karma (Nirjara) and desiring the highest fruit of restraint (Samvar), remained ever engaged in the twelve forms of penance (Tapas). ( 205)”
श्लोक ( Shlok ) 206
सगुप्तिसमिती धर्म सानुप्रेक्षं क्षमादिकम् । परीषहांजयन् सम्यञ्चारित्रं चावरच्चिरम् ॥ २०६॥
वे भगवान् परीषहों को जीतते हुए गुप्ति, समिति, अनुप्रेक्षा, क्षमा आदि धर्म और सम्यक् चारित्र का चिरकाल तक पालन करते रहे थे । भावार्थ―गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परीषह जय और चारित्र इन छहों कारणों से नवीन आते हुए कर्मों का आस्रव रुककर संवर होता है । जिनेंद्रदेव ने इन छहों ही कारणों को चिरकाल तक धारण किया था ।।206।।
“The Lord, conquering hardships (Parishahas), upheld restraints (Guptis), careful conduct (Samitis), contemplations (Anuprekshas), forgiveness (Kshama), and right conduct (Samyak Charitra) for a long time.
Explanation: These six—Gupti, Samiti, Dharma, Anupreksha, Parishah Jay, and Charitra—prevent the influx of new karma (Asrava) and lead to its stoppage (Samvar). Lord Jineshwar upheld all these causes for an extended period. (206)”
श्लोक ( Shlok ) 207
ततो दिध्यासुनानेन योग्या देशाः सिपेविरे । विविक्ता रमणीया ये विमुक्ता रागकारणैः ॥२०७॥
तदनंतर ध्यान धारण करने की इच्छा करने वाले भगवान ध्यान के योग्य उन-उन प्रदेशों में निवास करते थे जो कि एकांत थे, मनोहर थे और राग-द्वेष उत्पन्न करने वाली सामग्री से रहित थे ।।207।।
“After that, the Lord, desiring to engage in meditation (Dhyana), resided in places suitable for meditation—solitary, serene, and free from objects that could provoke attachment (Raga) or aversion (Dvesha). (207)”
श्लोक ( Shlok ) 208 – 210
गृहा पुलिन गिर्यग्रजीर्णोद्यान वनादयः । नात्युष्णशीतसम्पाता देशाः साधारणाश्च ये ॥२०८॥
गृहा पुलिन गिर्यग्रजीर्णोद्यान वनादयः । नात्युष्णशीतसम्पाता देशाः साधारणाश्च ये ॥२०८॥
कालच नातिशीतोष्ण भूयिष्ठो जनतासुखः । भावश्च ज्ञानवैराग्यष्ट धृतिक्षान्त्यादिलक्षणः ॥२०९॥
दृव्या ण्यप्यनुकूलानि यानि संक्लेशहानयें। प्रभविष्णूनि तानीशः सिषेवे ध्यानसिद्धये ॥२१०॥
जहाँ न अधिक गरमी पड़ती हो और न अधिक शीत ही होता हो जहाँ साधारण गरमी-सर्दी रहती हो अथवा जहाँ समान रूप से सभी आ-जा सकते हों ऐसे गुफा, नदियों के किनारे, पर्वत के शिखर, जीर्ण उद्यान और वन आदि प्रदेश ध्यान के योग्य क्षेत्र कहलाते हैं । इसी प्रकार जिसमें न बहुत गरमी और न बहुत सर्दी पड़ती हो तथा जो प्राणियों को दुःखदायी भी न हो ऐसा काल ध्यान के योग्य काल कहलाता है । ज्ञान, वैराग्य, धैर्य और क्षमा आदि भाव ध्यान के योग्य भाव कहलाते हैं और जो पदार्थ क्षुधा आदि से उत्पन्न हुए संक्लेश को दूर करने में समर्थ हैं ऐसे पदार्थ ध्यान के योग्य द्रव्य कहलाते हैं । स्वामी वृषभदेव ध्यान की सिद्धि के लिए अनुकूल द्रव्य क्षेत्र काल और भाव का ही सेवन करते थे ।।208-210।।
“Places suitable for meditation (Dhyana) include caves, riverbanks, mountain peaks, abandoned gardens, and forests—where neither excessive heat nor extreme cold prevails, where temperatures remain moderate, and where all beings can come and go freely. Similarly, a suitable time (Kala) for meditation is one that is neither too hot nor too cold and does not cause suffering to living beings.
The right mental disposition (Bhava) for meditation includes wisdom (Jnana), detachment (Vairagya), patience (Dhairya), and forgiveness (Kshama). Furthermore, substances (Dravya) that help alleviate distress caused by hunger and other discomforts are considered suitable for meditation.
Lord Rishabhdev always chose favorable Dravya (substances), Kshetra (places), Kala (time), and Bhava (mental states) to achieve perfection in meditation.” (208-210)
श्लोक ( Shlok ) 211
कदाचिद् गिरिकुन्जेषु कदाचिद् गिरिकन्दरे। कदाचिच्चाद्रिश्रृङगेषु दध्यावध्यात्मतत्ववित् ॥ २११॥
अध्यात्म तत्त्व को जानने वाले वे भगवान कभी तो पर्वत पर के लतागृहों में, कभी पर्वत की गुफाओं में और कभी पर्वत के शिखरों पर ध्यान लगाते थे ।।211।।
“Lord Rishabhdev, who possessed deep knowledge of spiritual principles (Adhyatma Tattva), sometimes meditated in leafy retreats (Lata-Grihas) on mountains, sometimes in mountain caves, and at other times on mountain peaks.” (211)
श्लोक 212 से 221
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201