आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 |
श्लोक 242 से 251 भगवान के गुण
वे तीन ज्ञानों से कर्म नष्ट करते हैं। भरत ने फल, जल आदि से उनकी पूजा की।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 242 to 251
श्लोक ( Shlok ) 242
नैस्संगीमास्थि तश्चर्यां सुखानुश यमप्यहन्। सुखीति कृतिभिर्देव त्वं तथाप्यभिलप्यसे ॥२४२॥
हे भगवन् यद्यपि आपने निर्ग्रंथ वृत्ति धारण कर सुख प्राप्त करने का अभिप्राय भी नष्ट कर दिया है तथापि कुशल पुरुष आपको ही सुखी कहते हैं ।।242।।
“O Lord, even though you have adopted the path of renunciation and abandoned even the desire for happiness, wise men still call you the truly blissful one.”
श्लोक ( Shlok ) 243
“ज्ञानशक्तित्रयीमुढवा बिभित्सोः कर्मसाधनम् । जिगीषुवृत्त मद्यापि तपोराज्ये तवास्त्यदः ॥२४३॥
हे प्रभो, आप मतिज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञानरूपी तीनों शक्तियों को धारण कर कर्मरूपी शत्रुओं की सेना को खंडित करना चाहते हैं इसलिए इस तपश्चरणरूपी राज्य में आज भी आपका विजिगीषुभाव अर्थात् शत्रुओं को जीतने की इच्छा विद्यमान है ।।243।।
“O Lord, possessing the three great powers of sensory knowledge (mati-jnana), scriptural knowledge (shruta-jnana), and clairvoyant knowledge (avadhi-jnana), you seek to vanquish the army of karmic enemies. Thus, even in this kingdom of asceticism, your desire for victory over adversaries remains ever-present.”
श्लोक ( Shlok ) 244
मोहान्धतमसध्वंसे बोधितां ज्ञानदीपिकाम्। त्वमादायचरो नैव क्लेशापाते ऽवसीदसि ॥२४४॥
हे ईश, आप मोहरूपी गाढ़ अंधकार को नष्ट करने के लिए प्रकाशमान ज्ञानरूपी दीपक को लेकर चलते हैं इसलिए आप क्लेश-रूपी गड᳭ढे में पढ़कर कभी भी दुःखी नहीं होते ।।244।।
“O Lord, you carry the radiant lamp of knowledge to dispel the dense darkness of delusion. Therefore, you never fall into the pit of suffering or experience sorrow.”
श्लोक ( Shlok ) 245
भट्टारकबरीभृष्टिः कर्मणोऽष्टतयस्य या । तां प्रति प्रज्वलत्येषा त्वद्धयानाग्निशिखोच्छिखा ॥ २४५॥
हे भट्टारक, ज्ञानावरणादि आठ कर्मों की जो यह बड़ी भारी भट्टी घनी हुई है उसमें यह आपकी ध्यानरूपी अग्नि की ऊँची शिखा खूब जल रही है ।।245।।
“O Lord, in this vast and dense furnace of the eight karmas, including knowledge-obscuring karma, the towering flame of your meditation burns brightly.”
श्लोक ( Shlok ) 246
दृष्टतत्त्व वरीवृष्टिः कर्माष्टकवनस्य या । तत्रोत्क्षिप्ता कुठारीयं रत्नत्रयमयी त्वया ॥२४६॥
हे समस्त पदार्थ को जानने वाले सर्वज्ञ देव, जो यह हरा-भरा आठों कर्मों का वन है उसे नष्ट करने के लिए आपने यह रत्नत्रयरूपी कुल्हाड़ी उठायी है ।।246।।
“O Omniscient Lord, to destroy this lush and dense forest of the eight karmas, you have wielded the axe of the Three Jewels—right faith, right knowledge, and right conduct.”
श्लोक ( Shlok ) 247
ज्ञानवैराग्यसंपत्तिस्त बैषानन्यगोचरा । विमुक्तिसाधनायालं भक्तानां च भवोच्छिदे ॥२४७॥
हे भगवन्, किसी दूसरी जगह नहीं पायी जाने वाली आपकी यह ज्ञान और वैराग्यरूपी संपत्ति ही आपको मोक्ष प्राप्त कराने के लिए तथा शरण में आयें हुए भक्त पुरुषों का संसार नष्ट करने के लिए समर्थ साधन है ।।247।।
“O Lord, your unique wealth of knowledge and detachment—unmatched anywhere else—is the powerful means for attaining liberation and for destroying the worldly bondage of the devoted seekers who take refuge in you.”
श्लोक ( Shlok ) 248
इति स्वार्था परार्थां च बोधसंपदमूर्जिताम् । दधतेऽपि नमस्तुभ्यं विरागाय गरीयसे ॥ २४८॥
हे प्रभो, इस प्रकार आप निज पर का हित करने वाली उत्कृष्ट ज्ञानरूपी संपत्ति को धारण करने वाले हैं, तो भी परमवीतराग हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ।।248।।
“O Lord, though you possess the supreme wealth of knowledge that benefits both yourself and others, you remain utterly detached. I bow to you in reverence.”
श्लोक ( Shlok ) 249
इत्यभिष्टुत्य नाकीन्द्राः प्रतिजग्भुः स्वमास्पदम् । तद्गुणानुस्मृतिं पूतामादाय स्वेन चेतसा ॥२४९॥
इस प्रकार स्तुति कर इंद्र लोग भगवान के गुणों की पवित्र स्मृति अपने हृदय में धारण कर अपने-अपने स्थानों को चले गये ।।249।।
“After offering this praise and cherishing the sacred remembrance of the Lord’s virtues in their hearts, the Indras returned to their respective abodes.”
श्लोक ( Shlok ) 250
ततो भरतराजोऽपि गुरुं भक्तिभरानतः । पूजयामास लक्ष्मीवान् उच्चावचवचःस्त्रजा ॥२५०॥
तदनंतर लक्ष्मीवान महाराज भरत ने भी भक्ति के भार से अतिशय नम्र होकर अनेक प्रकार के वचनरूपी मालाओं के द्वारा अपने-पिता की पूजा की अर्थात् सुंदर शब्दों द्वारा उनकी स्तुति की ।।250।।
“Then, the prosperous Emperor Bharata, overwhelmed with devotion and deep humility, worshiped his father by offering numerous garlands of words—praising him with beautiful and reverent speech.”
श्लोक ( Shlok ) 251
अथ भरतनरेन्द्रो रुन्द्रभक्त्या मुनीन्द्र “समधिगतसमाधि सावधानं स्वसाध्ये । सुरभिसलिलधारागन्धपुष्पाक्षतायद्यै रयजत जितमोहं सप्रदी पैश्च धूपैः ॥२५१॥
तत्पश्चात् उन्हीं भरत महाराज ने बड़ी भारी भक्ति से सुगंधित जल की धारा, गंध, पुष्प, अक्षत, दीप, धूप और अर्घ्य से समाधि को प्राप्त हुए (आत्मध्यान में लीन) और मोक्षप्राप्तिरूप अपने कार्य में सदा सावधान रहने वाले, मोहनीय कर्म के विजेता मुनिराज भगवान वृषभदेव की पूजा की ।।251।।
“Afterward, Emperor Bharata, with great devotion, worshiped Lord Rishabhadeva—the sage who had attained deep meditation, remained ever-vigilant in his pursuit of liberation, and had conquered deluding karma—by offering a stream of fragrant water, sandalwood paste, flowers, sacred rice, lamps, incense, and arghya.”
श्लोक 252 से 257
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आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 |