आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |
श्लोक 22 से 31 लोगों की मूर्खता और हस्तिनापुर आगमन
मूर्ख लोग अनुग्रह की प्रार्थना करते थे। कुछ चरण धूलि से पवित्र हो भोजन के लिए कहते थे। वे खाद्य-पेय पदार्थ लाते थे, पर भगवान चुपचाप आगे बढ़ते थे। लोग उनकी चर्या न समझ मूढ़ रहते थे। कुछ रोते हुए विघ्न डालते थे। छह माह और बीते। एक वर्ष पूर्ण होने पर वे हस्तिनापुर पहुँचे। वहाँ राजा सोमप्रभ और श्रेयान्सकुमार थे। श्रेयान्स गुणों और रूप से श्रेष्ठ था।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
एषोऽञ्जलिः कृतोऽस्माभिः प्रसीदानुगृहाण नः । इत्येकेऽध्यैषिषन् मुग्धा विभुमज्ञाततत्क्रमाः ॥२२॥
चर्या की विधि को नहीं जानने वाले कितने ही मूर्ख लोग भगवान् से ऐसी प्रार्थना करते थे कि हे भगवन् हम लोग दोनों हाथ जोड़ते हैं, प्रसन्न होइए और हमें अनुगृहीत कीजिए ।।22।।
“Many ignorant people, unaware of the conduct of ascetics, prayed to the Lord, saying, ‘O Lord, we fold our hands before you. Please be pleased with us and bless us.'” ||22||
श्लोक ( Shlok ) 23
केचित् पादानुपादाय तत्पांशुस्पर्शपावनैः । प्रणतैर्मस्तकैर्नाथमनाथिषत भुक्तये ॥२३॥
कितने ही लोग भगवान् के चरण-कमलों को पाकर और उनकी धूलि के स्पर्श से पवित्र हुए अपने मस्तक झुकाकर भोजन करने के लिए उनसे बार-बार प्रार्थना करते थे ।।23।।
“Many people, after receiving the Lord’s sacred feet and being purified by the touch of their dust, bowed their heads and repeatedly pleaded with him to accept food.” ||23||
श्लोक ( Shlok ) 24 –25
इदं खाद्यमिदं स्वाद्यमिदं भोज्यं पृथग्विधम् । मुहुर्मुहुरिदं पेयं हृद्यमाप्यायनं तनोः ॥२४॥
तैरित्यध्येष्यमाणोऽपि सम्भ्रान्सैरनभिज्ञकैः । ‘न कल्प्यमिति मन्वानास्तूष्णींमेवापसस्त्रिवान् ॥२५॥
और कहते थे कि हे भगवन् यह खाद्य पदार्थ है, यह स्वाद्य पदार्थ है, यह जुदा रखा हुआ भोज्य पदार्थ है, और यह शरीर को संतुष्ट करने वाला, अतिशय मनोहर बार-बार पीने योग्य पेय पदार्थ है इस प्रकार संभ्रांत हुए कितने ही अज्ञानी लोग भगवान् से बार-बार प्रार्थना करते थे परंतु ‘ऐसा करना उचित नहीं है’ यही मानते हुए भगवान् चुपचाप वहाँ से आगे चले जाते थे ।।24-25।।
“And they would say, ‘O Lord, this is nourishing food, this is a delicious dish, this is a separately prepared meal, and this is a most delightful drink, suitable for repeated enjoyment and satisfying the body.’
Thus, many ignorant yet well-intentioned people repeatedly pleaded with the Lord. However, believing that accepting such offerings was not appropriate, the Lord silently moved forward on his path.” ||24-25||
श्लोक ( Shlok ) 26
विभोर्निगूढचर्यस्य मतं ज्ञातुमनीश्वराः । केचित् कर्तव्यतामूढाः स्थिताश्चित्रेष्विवार्पिताः ॥२६॥
जिनकी चर्या की विधि अतिशय गुप्त है ऐसे भगवान् के अभिप्राय को जानने के लिए असमर्थ हुए कितने ही लोग क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए इस विषय में मूढ़ होकर चित्रलिखित के समान निश्चल ही खड़े रह जाते थे ।।26।।
“Many people, unable to comprehend the intent of the Lord—whose way of conduct was profoundly subtle and hidden—became confused about what should or should not be done. In their bewilderment, they stood motionless like painted figures.” ||26||
श्लोक ( Shlok ) 27
सपुत्रदारैरन्यैश्च पदालग्नैरुदश्रुभिः । क्षणविध्निततच्चर्यो भूयोऽपि विजहार सः ॥२७॥
अन्य कितने ही लोग आँखों से आँसू डालते हुए अपने पुत्र तथा स्त्रियोंसहित भगवान् के चरण में आ लगते थे जिससे क्षण-भर के लिए भगवान् की चर्या में विघ्न पड़ जाता था परंतु विघ्न दूर होते ही वे फिर भी आगे के लिए विहार कर जाते थे ।।27।।
“Many others, with tears in their eyes, along with their wives and children, fell at the Lord’s feet, momentarily interrupting his ascetic practice. However, as soon as the obstruction was removed, he resumed his journey forward.” ||27||
श्लोक ( Shlok ) 28
इत्यस्य परमां चर्या चरतोऽज्ञातचर्यया । जगदाश्चर्यकारिण्या मासाः षडपरे ययुः ॥२८॥
इस प्रकार जगत् को आश्चर्य करने वाली गूढ़ चर्या से उत्कृष्ट चर्या धारण करने वाले भगवान् के छह महीने और भी व्यतीत हो गये ।।28।।
“In this way, six more months passed as the Lord upheld his extraordinary and profound ascetic conduct, which filled the world with wonder.” ||28||
श्लोक ( Shlok ) 29
ततः संवत्सरे पूर्णे पुरं हास्तिनसाह्वयम् । कुरुजाङ्गलदेशस्य ललामे वाससाद सः ॥२९॥
इस तरह एक वर्ष पूर्ण होने पर भगवान् वृषभदेव कुरुजांगल देश के आभूषण के समान सुशोभित हस्तिनापुर नगर में पहुँचे ।।29।।
“Thus, after completing one full year, Lord Rishabhadeva arrived at the splendid city of Hastinapur, which adorned the Kurujangala region like a precious jewel.” ||29||
श्लोक ( Shlok ) 30
तस्य पाता तदासीच्च कुरुवंशशिखामणिः । सोमप्रभः प्रसन्नात्मा सोमसौम्याननो नृपः ॥३०॥
उस समय उस नगर के रक्षक राजा सोमप्रभ थे । राजा सोमप्रभ कुरुवंश के शिखामणि के समान थे, उनका अंतःकरण अतिशय प्रसन्न था और मुख चंद्रमा के समान सौम्य था ।।30।।
“At that time, the ruler of that city was King Somaprabha. He was like a crest jewel of the Kuru dynasty, possessing a heart full of joy and a face as gentle and radiant as the moon.” ||30||
श्लोक ( Shlok ) 31
तस्यानुजः कुमारोऽभूच्छ्रे यान् श्रेयान्गुणोदयैः। रूपेण मन्मथः कान्त्या शशी दीप्त्या स भानुमान् ॥ ३१॥
उनका एक छोटा भाई था जिसका नाम श्रेयान्सकुमार था । वह श्रेयान्सकुमार गुणों की वृद्धि से श्रेष्ठ था, रूप से कामदेव के समान था, कांति से चंद्रमा के समान था और दीप्ति से सूर्य के समान था ।।31।।
“He had a younger brother named Shreyans Kumar. Shreyans Kumar was exceptional in virtues, as handsome as Kamadeva, as radiant as the moon, and as brilliant as the sun.” ||31||
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |