भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
आदिपुराण पर्व 6 – श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 वज्रजंघ का रूप वर्णन (भाग 1)
वज्रजंघ के काले, कुटिल बाल कामदेव के सर्प समान थे। उसका मुख नेत्रों और हास्य से कमल समान था। नेत्र कानों के समीप शास्त्रज्ञान लेते प्रतीत होते थे। कंठ का हार तारों समान, वक्ष पर चंदन मेरु समान था। मस्तक मुकुट से, भुजाएँ नील-निषध समान, नाभि भँवर समान, कटि सुवर्ण वेदिका समान, और जांघें स्तंभ समान थीं।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
शिरस्यस्य बभुनीला मूर्ध्दजाः कृञ्चितायताः । कामकृष्णभुजङ्गस्य शिशवो नु विजृम्भिताः ॥ ३२
उसके शिर पर काले कुटिल और लंबे बाल ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो कामदेवरूपी काले सर्प के बढ़े हुए बच्चे ही हों ।।32।।
“On his head, dark, twisted, and long hair adorned him in such a way that it seemed as if the young offspring of the black serpent, symbolizing Kamadeva, were growing there.”
श्लोक ( Shlok ) 33
नेत्रभृङ्गे मुखाम्जे ‘स स्मितांशस्करकेसरे ।धत्ते स्म मधुरां वाणी मकरन्दरसोपमाम् ॥ ३३॥
वह वज्रजंघ, नेत्ररूपी भ्रमर और हास्य की किरणरूपी केशर से सहित अपने मुखकमल में मकरंदरस के समान मनोहर वाणी को धारण करता था ।।33।।
“Vajrajangha, with eyes resembling bees and a smile like rays of sunlight, carried a delightful voice in his lotus-like face, akin to the nectar of a flower.”
श्लोक ( Shlok ) 34
नेत्रयोद्वितयं रेजे संसक्तं तस्य कर्णयोः । सश्रुती ताविवाश्रित्य ‘शिक्षितुं सूक्ष्मदर्शिताम् ॥३४
कानों से मिले हुए उसके दोनों नेत्र ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो वे अनेक शास्त्रों का श्रवण करने वाले कानों के समीप जाकर उनसे सूक्ष्मदर्शिता (पांडित्य और बारीक पदार्थ को देखने की शक्ति) का अम्यास ही कर रहे हों ।।34।।
“His two eyes, aligned with his ears, were so radiant that it seemed as though they were approaching the ears, which listened to many scriptures, to engage in the practice of subtle vision (the power to perceive minute details and wisdom).”
श्लोक ( Shlok ) 35
“उपकण्ठमसौ दध्रे हारं नीहारसच्छबिम् । तारानिकरमास्येन्दोरिव सेवार्थमागतम् ॥३५॥
वह वज्रजंघ अपने कंठ के समीप जिस हार को धारण किये हुए था वह नीहार―बरफ के समान स्वच्छ कांति का धारक था तथा ऐसा मालूम होता था मानो मुखरूपी चंद्रमा की सेवा के लिए तारों का समूह ही आया हो ।।35।।
“Vajrajangha wore a necklace near his neck that bore a pure radiance, like dew or snow. It seemed as if a group of stars had gathered to serve the moon-like beauty of his face.”
श्लोक ( Shlok ) 36
वक्षःस्थलेन पृथुना सोऽधाचन्दनचर्चिकाम् । मेरुर्निजतटीलग्नां शारदोमिव चन्द्रिकाम् ॥३६
वह अपने विशाल वक्षस्थल पर चंदन का विलेपन धारण कर रहा था जिससे ऐसा मालूम होता था मानो अपने तट पर शरद् ऋतु की चाँदनी धारण किये हुए मेरु पर्वत ही हो ।।36।।
“He wore a mixture of sandalwood paste on his broad chest, which made it seem as though the Meru Mountain itself, adorned with the autumn moonlight on its shores, stood before him.”
श्लोक ( Shlok ) 37
मुकुटोद्भासिनो ‘मेरुम्मन्यस्य शिरसोऽन्तिके । बाहु तस्यायत्तौ नीलनिषधाविव रेजतुः ॥३७॥
मुकुट से शोभायमान उसका मस्तक ठीक मेरु पर्वत के समान मालूम होता था और उसके समीप लंबी भुजाएँ नील तथा निषध गिरि के समान शोभायमान होती थीं ।।37।।
“His head, adorned with a crown, resembled the Meru Mountain, and his long arms, near him, appeared as radiant as the Nilgiri and Nishadha mountains.”
श्लोक ( Shlok ) 38
सरिदावर्तगम्भीरा नाभिर्मध्येऽस्य निर्वभौ । नारीदृकरिणीरोधे वारीखातेव हृभ्दुवा ॥३८॥
उसके मध्य भाग में नदी की भँवर के समान गंभीर नाभि ऐसी जान पड़ती थी मानो स्त्रियों की दृष्टिरूपी हथिनियों को रोकने के लिए कामदेव के द्वारा खोदा हुआ एक गड्ढा ही हो ।।38।।
“His navel, deep like the whirlpool of a river, seemed as though it was a pit dug by Kamadeva to restrain the elephants of women’s gazes.”
श्लोक ( Shlok ) 39
रसनावेष्टितं तस्य कटीमण्डलमाबभो । हेमवेदी परिक्षिप्तमिव जम्बूद्रु मस्थलम् ।।३९।।
करधनी से घिरा हुआ उसका कटिभाग ऐसा शोभायमान था मानो सुवर्ण की वेदिका से घिरा हुआ जंबूवृक्ष के रहने का स्थान ही हो ।।39।।
“His waist, surrounded by a girdle, was so radiant that it seemed like the dwelling place of the Jambū tree, encircled by a golden altar.”
श्लोक ( Shlok ) 40
ऊरुद्वयमभाप्तस्य स्थिरं वृत्तं सुसंहतम् । रामामनोगजालानस्तम्भलीला समुद्वहत् ॥४०॥
स्थिर गोल और एक दूसरे से मिली हुई उसकी दोनों जांघें ऐसी जान पड़ती थीं मानो स्त्रियों के मनरूपी हाथी को बाँधने के लिए दो स्तंभ ही हों ।।40।।
“His firm, round thighs, pressed together, appeared as though they were two pillars meant to bind the elephant-like minds of women.”
श्लोक ( Shlok ) 41
जङ्घे वज्रस्थिरे नास्य व्यावण्यते मयाधुना ।तन्नाम्नैव गतार्थत्वात् पौनरुक्त्यविशङ्कया ।।४१।
उसकी वज्र के समान स्थिर जंघाओं (पिंडरियों) का तो मैं वर्णन ही नहीं करता क्योंकि वह उसके वज्रजंघ नाम से ही गतार्थ हो जाता है । इतना होने पर भी यदि वर्णन करूँ तो मुझे पुनरुक्ति दोष की आशंका है ।।41।।
“I do not describe his firm, diamond-like thighs (legs), for they are already implied by his name, ‘Vajrajangha.’ Even if I were to describe them, I fear I would fall into the fault of repetition.”
श्लोक 42 से 51
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
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