आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 संसार का असार स्वरूप
देवयोनि में सुख क्षणिक, पतन दुखदायी है। नीलांजना का नाश भोगों की नश्वरता दिखाता है। इंद्र ने यह बोध के लिए करवाया। भगवान ने भोग, आभूषण, और लक्ष्मी को व्यर्थ माना।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
शरीरशकटं दुःखदुर्भाण्डैः परिपूरितम् । दिनैस्त्रिचतुरैरेव पर्यस्यति न संशयः ॥३२॥
यथार्थ में मनुष्यों का यह शरीर एक गाड़ी के समान है जो कि दुःखरूपी खोटे बरतनों से भरी है इसमें कुछ भी संशय नहीं है कि यह शरीररूपी गाड़ी तीन चार दिन में ही उलट जायेगी―नष्ट हो जायेगी ।।32।।
In reality, the human body is like a cart filled with worthless vessels of suffering. There is no doubt that this body-cart will overturn—be destroyed—within a few days. ||32||
श्लोक ( Shlok ) 33
दिव्यभावे किलैतेषां सुखभाक्त्वं शरीरिणाम् । तत्रापि त्रिदिवाद् वातः परं दुःखं दुरुत्तरम् ॥३३॥
यद्यपि देवपर्याय में जीवों को कुछ सुख प्राप्त होता है तथापि जब स्वर्ग से इसका पतन होता है तब इसे सबसे अधिक दुःख होता है ।।33।।
Although beings experience some happiness in the celestial realm (Deva-paryaya), their greatest suffering occurs when they fall from heaven. ||33||
श्लोक ( Shlok ) 34
तत्रापीष्टवियोगोऽस्ति न्यूनास्तत्रापि कंचन । ततो मानसमेतेषां दुःखं दुःखेन लङ् ध्यते ॥३४॥
उस देवपर्याय में भी इष्ट का वियोग होता है और कितने ही देव अल्प विभूति के धारक होते हैं जो कि अपने से अधिक विभूति वाले को देखकर दुःखी होते रहते हैं इसलिए उनका मानसिक दुःख भी बड़े दुःख से व्यतीत होता है ।।34।।
Even in the celestial realm (Deva-paryaya), there is separation from loved ones, and many deities possess limited grandeur. Seeing those with greater splendor, they experience sorrow, and thus, their mental suffering is also immense. ||34||
श्लोक ( Shlok ) 35
इति संसारचक्रेऽस्मिन् विचित्रैः परिवर्तनैः । दुःखमाप्नोति दुष्कर्मपरिपाकाद् वराककः ॥ ३५॥
इस प्रकार यह बेचारा दीन प्राणी इस संसाररूपी चक्र में अपने खोटे कर्मों के उदय से अनेक परिवर्तन करता हुआ दुःख पाता रहता है ।।35।।
Thus, this helpless and miserable being, caught in the cycle of worldly existence, undergoes numerous transformations due to the rise of its negative karmas and continues to suffer. ||35||
श्लोक ( Shlok ) 36
‘नारीरूपमयं यन्त्रमिदमत्यन्तपेलवम् । पश्यतामेव नः साक्षात् कथमेतद्गाल्लयम् ॥३६॥
देखो, यह अत्यंत मनोहर स्त्रीरूपी यंत्र (नृत्य करने वाली नीलांजना का शरीर) हमारे साक्षात् देखते ही देखते किस प्रकार नाश को प्राप्त हो गया ।।36।।
Look, how this extremely beautiful woman-like device (the body of the dancing Neelanjana) has instantly perished right before our very eyes. ||36||
श्लोक ( Shlok ) 37
रमणीयमिदं मत्वा स्त्रीरूपं बहिरुज्ज्वलम् । पतन्तस्तत्र नश्यन्ति पतङ्ङ्ग इवकामुकाः ॥३७॥
बाहर से उज्ज्वल दिखने वाले स्त्री के रूप को अत्यंत मनोहर मानकर कामीजन उस पर पड़ते हैं और पड़ते ही पतंगों के समान नष्ट हो जाते हैं―अशुभ कर्मों का बंधकर हमेशा के लिए दुःखी हो जाते हैं ।।37।।
Seeing the external appearance of a woman, which appears bright and captivating, those driven by desire fall upon her, and as soon as they do, they are destroyed like moths—bound by inauspicious karmas, they remain forever in suffering. ||37||
श्लोक ( Shlok ) 38
कूटनाटकमेतत्तु प्रयुक्तममरेशिना । नूनमस्मत्प्रबोधाय स्मृतिमाधाय धीमता ॥३८॥
इंद्र ने जो यह कपट नाटक किया है अर्थात् नीलांजना का नृत्य कराया है सो अवश्य ही उस बुद्धिमान् ने सोच-विचारकर केवल हमारे बोध कराने के लिए ही ऐसा किया है ।।38।।
The deception that Indra has played, in other words, making Neelanjana dance, was surely done by that wise being after careful consideration, and was intended solely to make us aware. ||38||
श्लोक ( Shlok ) 39
यथेदमेवमन्यच्च भोगाङ्गं यत् किलाङ्गिनाम् । भङ्गुरं नियतापायं केवलं तत्प्रलभ्य कम् ॥३९॥
जिस प्रकार यह नीलांजना का शरीर भंगुर था―विनाशशील था इसी प्रकार जीवों के अन्य भोगोपभोगों के पदार्थ भी भंगुर हैं, अवश्य नष्ट हो जाने वाले हैं और केवल धोखा देने वाले हैं ।।39।।
Just as the body of Neelanjana was fragile and perishable, in the same way, the objects of enjoyment and pleasure for living beings are also fragile, destined to be destroyed, and are nothing but deceiving illusions. ||39||
श्लोक ( Shlok ) 40
किं किलाभरणैर्भारैः किं मलेरनुलेपनैः । उन्मत्तचेष्टितैनृतैरलं गीतैश्च शोचितैः ॥४०॥
इसलिए भाररूप आभरणों से क्या प्रयोजन है, मैल के समान सुगंधित चंदनादि के लेपन से क्या लाभ है, पागल पुरुष की चेष्टाओं के समान यह नृत्य भी व्यर्थ है और शोक के समान ये गीत भी प्रयोजनरहित हैं ।।40।।
Therefore, what is the use of heavy ornaments? What benefit is there in applying fragrant sandalwood and other perfumes, which are like dust? This dance, like the actions of a madman, is futile, and these songs, like grief, are purposeless. ||40||
श्लोक ( Shlok ) 41
यद्यस्ति स्वगता शोभा किं किलालंकृतैः कृतम्। यदि नास्ति स्वतः शोभा भारेरेभिस्तथापि किम् ॥४१॥
यदि शरीर की निज की शोभा अच्छी है तो फिर अलंकारों से क्या करना है और यदि शरीर में निज की शोभा नहीं है तो फिर भार स्वरूप इन अलंकारों से क्या हो सकता है ? ।।41।।
If the natural beauty of the body is good, then what is the need for adornments? And if the body lacks natural beauty, then what can these heavy adornments do? ||41||
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
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