आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 182 नगरों और कर्मों की व्यवस्था
नगर-ग्रामों की संख्या और प्रकार। भगवान ने प्रजा को छह कर्म (असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य, शिल्प) सिखाए।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 172 to 182
श्लोक ( Shlok ) 172
मडम्बमामनन्ति ज्ञाः पञ्चग्रामशतीवृत्तम् । पत्तनं तत्समुद्रान्ते यन्नौभिरवतीर्यते ॥१७२॥
जो पाँच सौ गाँवों से घिरा हो उसे पंडितजन मडंब मानते हैं और जो समुद्र के किनारे हो तथा जहाँ पर लोग नावों के द्वारा उतरते हैं― (आते-जाते हैं) उसे पत्तन कहते हैं ।।172।।
“A place surrounded by five hundred villages is considered ‘Madamba’ by scholars, and a location situated on the seashore, where people arrive and depart using boats, is called a ‘Pattana’ (port).”
श्लोक ( Shlok ) 173
भवेद् द्रोणसुखं नाम्ना निम्नगातटमाश्रितम् । संवाहस्तु शिरोव्यूडधान्यसंचय इप्यते ॥१७३॥
जो किसी नदी के किनारे पर हो उसे द्रोणमुख कहते हैं और जहाँ मस्तक पर्यंत ऊँचे-ऊँचे धान्य के ढेर लगे हो वह संवाह कहलाता है ।।173।।
“A place situated on the bank of a river is called ‘Dronamukha’, and a location where heaps of grain are stacked as high as the head is known as ‘Sanvaha’.”
श्लोक ( Shlok ) 174
पुटभेदनभेदानाममीषां च क्वचित्कचित्। संनिवेशो ऽभवत् पृथ्व्यां यथोद्देशमितोऽमुतः ॥१७४॥
इस प्रकार पृथिवी पर जहाँ-तहाँ अपने-अपने योग्य स्थानों के अनुसार कहीं-कहीं पर ऊपर कहे हुए गाँव नगर आदि की रचना हुई थी ।।174।।
“In this way, various villages, towns, and other settlements were established across the earth in suitable locations according to their respective characteristics.”
श्लोक ( Shlok ) 175 –176
शतान्यष्टौ व चत्वारि द्वे च स्युर्ग्रामसंख्यया। राजधान्यास्तथा द्रोणमुखखर्वटयोः क्रमात् ॥ १७५॥
दशग्राम्यास्तु मध्ये यो महान् ग्रामः स संग्रहः । तथा घोषकरादीनामपि लक्ष्म विकल्प्यताम् ।।१७६॥
एक राजधानी में आठ सौ गांव होते हैं, एक द्रोणमुख में चार सौ गाँव होते हैं और एक खर्वट में दो सौ गाँव होते हैं । दश गाँवों के बीच जो एक बड़ा भारी गाँव होता है उसे संग्रह (जहाँ पर हर एक वस्तुओं का संग्रह रखा जाता हो) कहते हैं । इसी प्रकार घोष तथा आकर आदि के लक्षणों की भी कल्पना कर लेनी चाहिए अर्थात् वहाँ पर बहुत घोष (अहीर) रहते हैं उसे घोष कहते हैं और जहाँ पर सोने चाँदी आदि की खान हुआ करती है उसे आकर कहते हैं ।।175-176।।
“A capital city consists of eight hundred villages, a Dronamukha comprises four hundred villages, and a Kharvata includes two hundred villages.
Among ten villages, the largest and most significant one, where various goods are stored, is called a Sangraha (a storage or trade center).
Similarly, a Ghosha refers to a settlement where many cowherds (Ahirs) reside, and an Aakara denotes a place where mines of gold, silver, and other valuable minerals are found.”
श्लोक ( Shlok ) 177
पुर्रा विभागमित्युच्चैः कुर्वन् गीर्वाणनायकः । तदा पुरन्दरख्यातिमगादन्वर्थतां गताम् ॥१७७॥
इस प्रकार इंद्र ने बड़े अच्छे ढंग से नगर, गाँवों आदि का विभाग किया था इसलिए वह उसी समय से पुरंदर इस सार्थक नाम को प्राप्त हुआ था ।।177।।
“In this way, Indra systematically organized the divisions of cities, villages, and other settlements in a well-planned manner. Hence, from that very moment, he rightfully earned the meaningful title ‘Purandara’ (the one who establishes or governs cities).”
श्लोक ( Shlok ) 178
ततः प्रजा निवेश्यैषु स्थानेषु स्त्रष्टुराज्ञया । जगाम कृतकार्यों गां मघवानुज्ञया प्रभोः ॥१७८॥
तदनंतर इंद्र भगवान की आज्ञा से इन नगर, गाँव आदि स्थानों में प्रजा को बसाकर कृतकृत्य होता हुआ प्रभु की आज्ञा लेकर स्वर्ग को चला गया ।।178।।
“After that, following the command of Bhagwan Indra, the people were settled in these cities, villages, and other places. Having successfully completed his duty, Indra sought the Lord’s permission and returned to heaven.”
श्लोक ( Shlok ) 179 -180
असिर्मषिः कृषिर्विद्या वाणिज्यं शिल्पमेव च । कर्माणीमानि षोढा स्युः प्रजाजीवनहेतवः ॥१७९॥
तत्र वृत्तिं प्रजानां स भगवान् मत्तिकौशलात् । उपादिक्षत् सरागो हि स तदासीज्जगद्गुरुः ॥१८०॥
असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प ये छह कार्य प्रजा की आजीविका के कारण हैं । भगवान् वृषभदेव ने अपनी बुद्धि की कुशलता से प्रजा के लिए इन्हीं छह कर्मों द्वारा वृत्ति (आजीविका) करने का उपदेश दिया था सो ठीक ही है क्योंकि उस समय जगद्गुरु भगवान् सरागी ही थे वीतराग नहीं थे । भावार्थ―सांसारिक कार्यों का उपदेश सराग अवस्था में दिया जा सकता है ।।179-180।।
“The six occupations that serve as means of livelihood for people are warfare (Asi), ink/scripture (Mashi), agriculture (Krishi), education (Vidya), trade (Vanijya), and craftsmanship (Shilpa).
Bhagwan Rishabhdev, using His profound wisdom, rightly instructed people to sustain themselves through these six professions. This was appropriate because, at that time, He was a Saragi (one with attachments) and not Vitaragi (completely detached).
Meaning: Guidance on worldly affairs can be given while one is still in a state of attachment to worldly duties.”
श्लोक ( Shlok ) 181 – 182
तत्रासिकर्म सेवायां मषिलिंपिविधौ स्मृता । कृषिर्भूकर्षणे प्रोक्ता विद्या शास्रोपजीवने ॥१८१॥
वाणिज्यं वणिजां कर्म शिल्पं स्यात् करकौशलम् । तच्च चित्रकलापत्रच्छेदादि बहुधा स्मृतम् ॥१८२॥
उन छह कर्मों में से तलवार आदि शस्त्र धारणकर सेवा करना असिकर्म कहलाता है, लिखकर आजीविका करना मषिकर्म कहलाता है, जमीन को जोतना-बोना कृषिकर्म कहलाता है, शास्त्र अर्थात् पढ़ाकर या नृत्य-गायन आदि के द्वारा आजीविका करना विद्याकर्म है, व्यापार करना वाणिज्य है और हस्त की कुशलता से जीविका करना शिल्पकर्म है । वह शिल्पकर्म चित्र खींचना, फूल-पत्ते काटना आदि की अपेक्षा अनेक प्रकार का माना गया है ।।181-182।।
“Among these six occupations:
- Asi Karma refers to serving by wielding weapons like swords and other arms.
- Mashi Karma is earning a livelihood through writing.
- Krishi Karma involves plowing and sowing the land.
- Vidya Karma means sustaining oneself through scriptures, teaching, or performing arts like dance and music.
- Vanijya is engaging in trade and commerce.
- Shilpa Karma is making a living through skilled craftsmanship.
Shilpa Karma encompasses a wide range of skills beyond just painting or carving floral designs; it includes various forms of artistic and technical expertise.”
श्लोक 183 से 192
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171