आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101
श्लोक 112 से 121 शास्त्रों का विस्तार
भगवान ने व्याकरण, छंदशास्त्र, और अलंकार शास्त्र का उपदेश दिया। उनके पुत्रों (भरत, वृषभसेन, अनंतविजय) को अर्थशास्त्र, गंधर्व शास्त्र, चित्रकला आदि सिखाए गए।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
तद् विद्याग्रहणं यत्त्रं पुत्रिके कुरुतं युवाम् । सत्संग्रहणकालोऽयं युवयोर्वर्त्ततेऽधुना ॥१०२॥
इसलिए हे पुत्रियों, तुम दोनों विद्या ग्रहण करने में प्रयत्न करो क्योंकि तुम दोनों का विद्या ग्रहण करने का यही काल है ।।102 ।।
“Therefore, O daughters, make efforts to acquire knowledge, for this is the right time for you to do so.”
श्लोक ( Shlok ) 103 –104
इत्युक्त्वा मुहुराशास्य विस्तीर्णे हेम पट्टके । अधिवास्य स्वचित्तस्थां श्रुतदेवीं सपर्यथा ॥१०३॥
विभुः करद्वयेनाभ्यां लिखन्नक्षरमालिकाम् । उपादिशल्लिपिं संख्यास्थानं चाङ्कैरनुक्रमात् ॥१०४॥
भगवान् वृषभदेव ने ऐसा कहकर तथा बार-बार उन्हें आशीर्वाद देकर अपने चित्त में स्थित श्रुत देवता को आदरपूर्वक सुवर्ण के विस्तृत पट्टे पर स्थापित किया, फिर दोनों हाथों से अ आ आदि वर्णमाला लिखकर उन्हें लिपि (लिखने का) उपदेश दिया और अनुक्रम से इकाई दहाई आदि अंकों के द्वारा उन्हें संख्या के ज्ञान का भी उपदेश दिया । भावार्थ―ऐसी प्रसिद्धि है कि भगवान् ने दाहिने हाथ से वर्णमाला और बायें हाथ से संख्या लिखी थी ।।103-104।।
“Lord Rishabhadeva, after saying this and repeatedly blessing them, respectfully placed the deity of sacred knowledge, who resided in his mind, on a broad golden tablet. Then, with both hands, he wrote the letters of the alphabet, beginning with ‘A’ (अ), and instructed them in script (writing). Subsequently, he also taught them numerical knowledge in sequence using units, tens, and so on.
Meaning: It is widely believed that the Lord wrote the alphabet with his right hand and the numbers with his left hand.”
श्लोक ( Shlok ) 105 –108
ततो भगवतो वक्त्रान्निःसृतामक्षरावलीम् । सिद्धं नम इति व्यक्तमङ्गलां सिद्धमातृकाम् ॥१०५॥
अकारादिहकारान्तां शुद्धां मुक्तावलीमिव । स्वरव्यञ्जनभेदेन द्विधा भेदमुपेयुषीम् ॥१०६॥
“अयोगवाहपर्यन्तां सर्वविद्यासु संतताम्। संयोगाक्षरसंभूति नैकबीजाक्षरेश्चिताम् ॥१०७॥
समवादीधरद् ब्राह्मी मेधाविन्यतिसुन्दरी। सुन्दरी गणितं स्थानक्रमैः सम्यगधारयत् ॥१०८ ॥
तदनंतर जो भगवान के मुख से निकली हुई है, जिसमें ‘सिद्ध नमः’ इस प्रकार का मंगलाचरण अत्यंत स्पष्ट है, जिसका नाम सिद्धमातृ का है, जो स्वर और व्यंजन के भेद से दो भेदों को प्राप्त है, जो समस्त विद्याओं में पायी जाती है, जिसमें अनेक संयुक्त अक्षरों की उत्पत्ति है, जो अनेक बीजाक्षरों से व्याप्त है ओर जो शुद्ध मोतियों की माला के समान है ऐसी अकार को आदि लेकर हकार पर्यंत तथा विसर्ग अनुस्वार जिह्वामूलीय और उपध्मानीय इन योगवाह पर्यंत समस्त शुद्ध अक्षरावली को बुद्धिमती ब्राह्मी पुत्री ने धारण किया और अतिशय सुंदरी सुंदरीदेवी ने इकाई दहाई आदि स्थानों के क्रम से गणित शास्त्र को अच्छी तरह धारण किया ।।105-108।।
“Thereafter, the sacred script that emerged from the mouth of the Lord—clearly beginning with the auspicious invocation ‘Siddham Namah’—was received. This script, known as Siddhamatrika, is classified into two categories based on vowels and consonants, is found in all branches of knowledge, generates numerous conjunct letters, is filled with many seed syllables, and resembles a garland of pure pearls.
The wise daughter Brāhmī absorbed the entire pure alphabet, from ‘A’ (अ) to ‘Ha’ (ह), including Visarga (ः), Anusvāra (ं), Jihvāmūlīya, and Upadhmānīya, which are the auxiliary phonetic sounds. Meanwhile, the exceptionally beautiful Sundarīdevī thoroughly grasped the science of mathematics, mastering numerical concepts in sequential order, from units and tens onward.”
श्लोक ( Shlok ) 109
न विना वाङ्मयात् किंचिदस्ति शास्रं कलापि वा। ततो वाङ्मयमेवादौ वेधास्ताभ्यामुपादिशत् ॥ १०९॥
वाङ्मय के बिना न तो कोई शास्त्र है और न कोई कला है इसलिए भगवान् वृषभदेव ने सबसे पहले उन पुत्रियों के लिए वाङ्मय का उपदेश दिया था ।।109।।
“Without language, neither scripture nor any art can exist. Therefore, Lord Rishabhadeva first imparted the knowledge of language to his daughters.”
श्लोक ( Shlok ) 110
सुमेधसावसंमोहादध्येषातां गुरोर्मुखात् । वाग्देव्याविव निश्शशेषं वाङ्मयं ग्रन्थतोऽर्थतः ॥ ११०॥
अत्यंत बुद्धिमती उन कन्याओं ने सरस्वती देवी के समान अपने पिता के मुख से संशय विपर्यय आदि दोषों से रहित शब्द तथा अर्थ रूप समस्त वाङ्मय का अध्ययन किया था ।।110।।
“The highly intelligent daughters, like Goddess Saraswati herself, studied the entire body of language—both words and their meanings—free from doubts, errors, and misconceptions, directly from their father’s teachings.”
श्लोक ( Shlok ) 111
पदविद्यामधिच्छन्दोविचितिं वागलंकृतिम् । त्रयीं समुदितामेतां तद्विदो वाङ्मयं विदुः ॥१११॥
वाङ्मय के जानने वाले गणधरादि देव व्याकरण शास्त्र, छंदशास्त्र और अलंकार शास्त्र इन तीनों के समूह को वाङ्मय कहते हैं ।।111।।
“According to the learned Gandharva deities and scholars of language, Vāṅmaya (the body of literature) consists of three disciplines: Grammar (Vyākaraṇa), Prosody (Chandaśāstra), and Rhetoric (Alaṁkāraśāstra).”
श्लोक 112 से 121
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101