भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण षोडशं पर्व – श्लोक 1 से 275 Ādi purāṇa by Acharya Jinasena parv 16 – Shlok 1 to 275
श्लोक 12 से 21 बाहुबली का शारीरिक वर्णन (ऊपरी भाग)
बाहुबली के शारीरिक सौंदर्य का विस्तृत वर्णन। उनके मस्तक, कंधे, भुजाएँ, नाभि, कटि, ऊरु, जंघाएँ आदि अंगों की तुलना प्राकृतिक तत्वों (जैसे पर्वत, सरोवर, सर्प) से की गई। उनकी शोभा को अतुलनीय बताया गया, जो उनके बल और तेज से परिपूर्ण थी।
श्लोक 22 से 31 बाहुबली का अधोभाग और प्रभाव
बाहुबली के चरणों की कोमलता और शोभा का वर्णन, जो लाल कमलों से तुलनीय थे। उनके विशाल शरीर के बावजूद वे स्त्रियों के हृदय में प्रवेश कर गए, जो आश्चर्यजनक था। उनकी सुंदरता ऐसी थी कि स्त्रियाँ उन्हें स्वप्न में भी देखती थीं। सभी पुत्रों का यौवन वसंत ऋतु की तरह मनोहर था।
श्लोक 32 से 41 राजकुमारों की शारीरिक शोभा
भगवान ऋषभदेव के पुत्रों की शारीरिक सुंदरता और आभूषणों का वर्णन। उनके कान, नेत्र, भौंहें, ललाट, ओठ, कंठ आदि अंगों की शोभा को काव्यात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया। वे आभूषणों से सुशोभित थे, जैसे फूलों से वन।
श्लोक 42 से 51 राजकुमारों का अधोभाग और आभूषण
पुत्रों के अंगों की शोभा का और विस्तार। उनके ऊरु, जंघाएँ, चरण आदि की तुलना कमलों और प्राकृतिक तत्वों से की गई। उनके आभूषणों (यष्टि, हार, रत्नावली) के प्रकार और भेदों (शीर्षक, उपशीर्षक, अवघाटक आदि) का वर्णन शुरू हुआ।
श्लोक 52 से 61 हारों के प्रकार
आभूषणों के प्रकारों का विस्तृत वर्णन। हार के भेद जैसे इंद्रच्छंद (1008 लड़ियाँ), विजयच्छंद (504 लड़ियाँ), नक्षत्रमाला (27 लड़ियाँ) आदि का उल्लेख। ये आभूषण पुत्रों की शोभा बढ़ाते थे।
श्लोक 62 से 71 आभूषणों की विविधता
हार के और भेदों (फलकहार, सोपान, मणिसोपान) का वर्णन। भगवान ऋषभदेव के पुत्र-पुत्रियाँ इन आभूषणों से सुशोभित थे। भरत सूर्य, बाहुबली चंद्रमा, और अन्य पुत्र नक्षत्रों की तरह शोभायमान थे। भगवान स्वयं मेरु पर्वत की तरह विराजते थे।
श्लोक 72 से 81 ब्राह्मी और सुंदरी का आगमन
भगवान ऋषभदेव ने ब्राह्मी और सुंदरी को विद्या प्रदान करने का निर्णय लिया। दोनों पुत्रियों की सुंदरता और शील का वर्णन। उनके चरण, ऊरु, जंघाएँ, नाभि आदि की शोभा को काव्यात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया।
श्लोक 82 से 93 ब्राह्मी और सुंदरी की शोभा
ब्राह्मी और सुंदरी के अंगों (स्तन, कंठ, मुख, नेत्र, केश आदि) की शोभा का वर्णन। उनकी सुंदरता ऐसी थी कि लोग उन्हें दिव्य कन्याएँ, लक्ष्मी, या सरस्वती मानते थे। दोनों ने भगवान को प्रणाम किया।
श्लोक 94 से 101 भगवान का संबोधन
भगवान ने दोनों पुत्रियों को गोद में बिठाकर प्रेम से विद्या की महत्ता बताई। विद्या को यश, कल्याण, और मनोरथ पूर्ण करने वाली बताया।
श्लोक 102 से 111 विद्या का उपदेश
भगवान ने ब्राह्मी को लिपि और वाङ्मय (व्याकरण, छंद, अलंकार) का ज्ञान दिया, और सुंदरी को गणित शास्त्र सिखाया। दोनों ने इसे पूर्ण रूप से ग्रहण किया।
श्लोक 112 से 121 शास्त्रों का विस्तार
भगवान ने व्याकरण, छंदशास्त्र, और अलंकार शास्त्र का उपदेश दिया। उनके पुत्रों (भरत, वृषभसेन, अनंतविजय) को अर्थशास्त्र, गंधर्व शास्त्र, चित्रकला आदि सिखाए गए।
श्लोक 122 से 131 पुत्रों को शास्त्र उपदेश
बाहुबली को कामनीति, आयुर्वेद, धनुर्वेद आदि शास्त्र सिखाए गए। भगवान का 20 लाख पूर्व का कुमारकाल पूर्ण हुआ। इस बीच कल्पवृक्ष और औषधियाँ नष्ट हो गईं।
श्लोक 132 से 141 कल्पवृक्षों का नाश और प्रजा की व्यथा
कल्पवृक्षों के नष्ट होने से प्रजा व्याकुल हुई और भगवान से आजीविका के उपाय माँगे। प्रजा ने भूख, शीत, वर्षा आदि से रक्षा की याचना की।
श्लोक 142 से 151 भगवान का चिंतन और समाधान
भगवान ने कर्मभूमि की स्थापना का विचार किया। इंद्र ने अयोध्या में जिनमंदिर बनाए और नगर, ग्राम, देशों की रचना की।
श्लोक 152 से 161 देशों और नगरों की रचना
विभिन्न देशों (कौशल, काशी, मगध आदि) और उनकी प्रकृति (देवमातृक, अदेवमातृक) का वर्णन। इनकी सीमाओं पर रक्षक नियुक्त किए गए।
श्लोक 162 से 171 गाँव और नगरों का वर्णन
नगर, ग्राम, खेट, पत्तन आदि की परिभाषाएँ और विशेषताएँ। ग्रामों की सीमा और संरचना का उल्लेख।
श्लोक 172 से 182 नगरों और कर्मों की व्यवस्था
नगर-ग्रामों की संख्या और प्रकार। भगवान ने प्रजा को छह कर्म (असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य, शिल्प) सिखाए।
श्लोक 183 से 192 वर्ण व्यवस्था और कृतयुग
तीन वर्णों (क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) की स्थापना। भगवान का राज्याभिषेक हुआ और वे प्रजापति कहलाए।
श्लोक 193 से 208 राज्याभिषेक का वर्णन
भगवान के राज्याभिषेक का भव्य वर्णन। देवों ने संगीत, नृत्य, और तीर्थजल से अभिषेक किया।
श्लोक 209 से 221 अभिषेक के जल स्रोत
अभिषेक के लिए गंगा, सिंधु, क्षीरसमुद्र आदि का जल लाया गया। भगवान की शोभा और प्रभाव का वर्णन।
श्लोक 222 से 231 अभिषेक की शोभा
अभिषेक से पृथ्वी पवित्र हुई। भगवान को माला, वस्त्र, आभूषण पहनाए गए।
श्लोक 232 से 241 भगवान का अलंकरण
भगवान को मुकुट और पट्टबंध से अलंकृत किया गया। उन्होंने कर्मभूमि की रचना की और प्रजा का पालन शुरू किया।
श्लोक 242 से 251 वर्ण और कर्म व्यवस्था
भगवान ने क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्ण बनाए। विवाह और दंड व्यवस्था स्थापित की।
श्लोक 252 से 261 राजा और दंड
दंड की आवश्यकता और चार क्षत्रियों (हरि, अकंपन, काश्यप, सोमप्रभ) को मांडलिक राजा बनाया गया।
श्लोक 262 से 271 भगवान के नाम और राज्य
भगवान को इक्ष्वाकु, गौतम, काश्यप आदि नाम मिले। उनका राज्यकाल 63 लाख पूर्व तक रहा। पुण्य की महत्ता बताई गई।
श्लोक 272 से 275 पुण्य और धर्म की महिमा
पुण्य से सुख और मोक्ष की प्राप्ति का उपदेश। भगवान सिंहासन पर विराजमान हो पृथ्वी का शासन करते रहे।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 1 to 11
भगवान वृषभदेव के पुत्र-पुत्रियाँ
सर्वार्थसिद्धि के अहमिंद्र स्वर्ग से अवतीर्ण होकर भगवान वृषभदेव की यशस्वती देवी से पुत्र उत्पन्न हुए। वज्रनाभि में पीठ नामक भाई अब वृषभसेन, महापीठ अब अनंतविजय, विजय अब अनंतवीर्य, वैजयंत अब अच्युत, जयंत अब वीर, और अपराजित अब वरवीर हुए। यशस्वती से भरत सहित 99 चरमशरीरी और प्रतापी पुत्र हुए। भगवान ने यशस्वती से ब्राह्मी नामक पुत्री उत्पन्न की। आनंद पुरोहित का जीव सुनंदा से बाहुबली और अनुंधरी सुनंदा से सुंदरी नामक पुत्री हुई। सुंदरी और बाहुबली से सुनंदा शोभायमान हुई। बाहुबली 24 कामदेवों में प्रथम था, जिसका रूप अनुपम था। उसके काले केश कामदेव के कवच से शोभायमान थे।
श्लोक ( Shlok ) 1
अथ क्रमाद् यशस्वत्यां जाताः स्रष्टुरिमे सुताः । अवतीर्य दिवो मुर्ध्नंस्तेऽहमिन्द्राः पुरोहिताः ॥१॥
अथानंतर पहले जिनका वर्णन किया जा चुका है ऐसे वे सर्वार्थसिद्धि के अहमिंद्र स्वर्ग से अवतीर्ण होकर क्रम से भगवान् वृषभदेव की यशस्वती देवी में नीचे लिखे हुए पुत्र उत्पन्न हुए ।।1।।
hereafter, those who have already been described descended from the Ahimindra heaven of Sarvārthasiddhi and were born sequentially as the sons of the illustrious Queen Yaśasvatī of Lord Ṛṣabhadeva. ||1||
श्लोक ( Shlok ) 2
पीठो वृषभसेनोऽभूत् कनीयान् भरतेश्वरात्। महापीठोऽभवत्तस्य सोऽनन्तविजयोऽनुजः ॥ २॥
भगवान् वृषभदेव की वज्रनाभि पर्याय में जो पीठ नाम का भाई था वह अब वृषभसेन नाम का भरत का छोटा भाई हुआ । जो राजश्रेष्ठी का जीव महापीठ था वह अनंतविजय नाम का वृषभसेन का छोटा भाई हुआ ।।2।।
In the Vajranābhi incarnation of Lord Ṛṣabhadeva, the one known as Pīṭha became Vṛṣabhasena, the younger brother of Bharata. The soul of Mahāpīṭha, who was a great royal merchant, was reborn as Anantavijaya, the younger brother of Vṛṣabhasena. ||2||
श्लोक ( Shlok ) 3
विजयोऽनन्तवीर्योऽभूद् जयन्तोऽच्युतोऽभवत् । बैजयन्तो वीर इत्यासीद् वरवीरोपराजितः ॥३॥
जो विजय नाम का व्याघ्र का जीव था वह अनंत-विजय से छोटा अनंतवीर्य नाम का पुत्र हुआ, जो वैजयंत नाम का शूकर का जीव था वह अनंतवीर्य का छोटा भाई अच्युत हुआ, जो वानर का जीव जयंत था वह अच्युत से छोटा वीर नाम का भाई हुआ और जो नेवला का जीव अपराजित था, वह वीर से छोटा वरवीर हुआ ।।3।।
The soul of the tiger named Vijaya was reborn as Anantavīrya, the younger brother of Anantavijaya. The soul of the boar named Vaijayanta was reborn as Acyuta, the younger brother of Anantavīrya. The soul of the monkey named Jayanta was reborn as Vīra, the younger brother of Acyuta. The soul of the mongoose named Aparājita was reborn as Varavīra, the younger brother of Vīra. ||3||
श्लोक ( Shlok ) 4
इत्येकान्नशतं पुत्रा बभूवुर्वृषभेशिनः । भरतस्यानुजन्मानश्चरमाङ्गा महौजसः ॥४ ॥
इस प्रकार भगवान् वृषभदेव के यशस्वती महादेवी से भरत के पीछे जन्म लेने वाले निन्यानवे पुत्र हुए, वे सभी पुत्र चरमशरीरी तथा बड़े प्रतापी थे ।।4।।
Thus, from the illustrious Queen Yaśasvatī, Lord Ṛṣabhadeva had ninety-nine sons born after Bharata. All these sons were endowed with their final bodies and possessed great majesty. ||4||
श्लोक ( Shlok ) 5
ततो ब्राह्मीं यशस्वत्यां ब्रह्मा समुदपादयत् । कलामिवापराशायाँ ज्यौत्स्नपक्षो ऽमलां विधोः॥५॥
तदनंतर जिस प्रकार शुक्लपक्ष पश्चिम दिशा में चंद्रमा की निर्मल कला को उत्पन्न (प्रकट) करता है उसी प्रकार ब्रह्मा―भगवान् आदिनाथ ने यशस्वती नामक महादेवी में ब्राह्मी नाम की पुत्री उत्पन्न की ।।5।।
Thereafter, just as the waxing moon reveals its pure radiance in the western sky, in the same way, Lord Brahmā—Ādinātha—caused the birth of a daughter named Brāhmī from the illustrious Queen Yaśasvatī. ||5||
श्लोक ( Shlok ) 6
सुनन्दायां महाबाहुरहमिन्द्रो दिवोऽग्रतः। च्युत्वा बाहुबलीत्यासीत् कुमारोऽमरसन्नि भः ॥६॥
आनंद पुरोहित का जीव जो पहले महाबाहु था और फिर सर्वार्थसिद्धि में अहमिंद्र हुआ था, वह वहाँ से च्युत होकर भगवान् वृषभदेव की द्वितीय पत्नी सुनंदा के देव के समान बाहुबली नाम का पुत्र हुआ ।।6।।
The soul of Ānanda, the priest, who was previously Mahābāhu and later became an Ahimindra in Sarvārthasiddhi, descended from there and was born as Bāhubali, a son of Lord Ṛṣabhadeva and his second wife, the divine-like Sunandā. ||6||
श्लोक ( Shlok ) 7
वज्रजङ्घभवे यास्य भगिन्यासीदनुन्दरी। सा सुन्दरीत्यभूत् पुत्री वृषभस्यातिसुन्दरी ॥७॥
वज्रजंघ पर्याय में भगवान् वृषभदेव की जो अनुंधरी नाम की बहन थी वह अब इन्हीं वृषभदेव की सुनंदा नामक देवी से अत्यंत सुंदरी सुंदरी नाम की पुत्री हुई ।।7।।
In the Vajrajaṅgha incarnation, Lord Ṛṣabhadeva’s sister, who was previously known as Anundharī, was now reborn as Sundarī, an exceptionally beautiful daughter of Devi Sunandā and Lord Ṛṣabhadeva. ||7||
श्लोक ( Shlok ) 8
सुनन्दा सुन्दरीं पुत्री पुत्रं बाहुबलीशिनम्। लब्ध्वा रुचि परां भेजे प्राचीवार्क सहत्विषा ॥८॥
सुंदरी पुत्री और बाहुबली पुत्र को पाकर सुनंदा महारानी ऐसी सुशोभित हुई थी जिस प्रकार कि पूर्वदिशा प्रभा के साथ-साथ सूर्य को पाकर सुशोभित होती है ।।8।।
Having given birth to her daughter Sundarī and son Bāhubali, Queen Sunandā shone brilliantly, just as the eastern horizon becomes radiant with the presence of the sun along with its glowing aura. ||8||
श्लोक ( Shlok ) 9
तत्काळ कामदेषोऽभूद् युवा बाहुबली बली। रूपसंपदमुत्तुङ्गां दधानोऽसुमतां मताम् ॥९॥
समस्त जीवों को मान्य तथा सर्वश्रेष्ठ रूपसंपदा को धारण करने वाला बलवान् युवा बाहुबली उस काल के चौबीस कामदेवों में से पहला कामदेव हुआ था ।।9।।
The mighty and youthful Bāhubali, who possessed supreme beauty and was revered by all beings, became the first of the twenty-four Kāmadevas of that era. ||9||
श्लोक ( Shlok ) 10
तस्य तद्रूपमन्यत्र समदृश्यत न क्वचित्। कल्पद्रुमात् किमन्यत्र दृश्यते हारिभूषणम् ॥१०॥
उस बाहुबली का जैसा रूप था वैसा अन्य कहीं नहीं दिखाई देता था, सो ठीक ही है उत्तम आभूषण कल्पवृक्ष को छोड़कर क्या कहीं अन्यत्र भी पाये जाते हैं ।।10।।
The beauty of Bāhubali was unmatched and seen nowhere else. Rightly so—can exquisite ornaments be found anywhere other than on the divine Kalpavṛkṣa (wish-fulfilling tree)? ||10||
श्लोक ( Shlok ) 11
कुञ्चितास्तस्य केशान्ता विबभुर्भ्रंमरत्विषः। मनोभुवः शिरस्त्राण सूक्ष्मायो वलयैः समाः ॥११॥
उसके भ्रमर के समान काले तथा कुटिल केशों के अग्रभाग कामदेव के शिर के कवच के सूक्ष्म लोहे के गोल तारों के समान शोभायमान होते थे ।।11।।
The tips of his curly, bee-black hair shone like the fine, round iron wires of Kāmadeva’s helmet, enhancing his divine beauty. ||11||
श्लोक 12 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224