वज्रदंत की दीक्षा
वज्रदंत ने राज्य पुंडरीक को सौंपा और गुणधर मुनि से 60,000 रानियों, 20,000 राजाओं, 1,000 पुत्रों, और पंडिता के साथ दीक्षा ली। लक्ष्मीमती और अनुंधरी शोकग्रस्त हुईं। प्रजा पुंडरीक को लेकर नगर लौटी।
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 83 to 91
श्लोक ( Shlok ) 83
ततस्तनिश्चयं ज्ञात्वा राज्यं तत्सूनवे ददौ । पुण्डरीकाय बालाय सन्तान स्थितिपालिने ॥८३॥
तदनंतर, वज्रदंत चक्रवर्ती ने पुत्रों का राज्य नहीं लेने का दृढ़ निश्चय जानकर अपना राज्य, अमिततेज के पुत्र पुंडरीक के लिए दे दिया । उस समय वह पुंडरीक छोटी अवस्था का था और वही संतान की परिपाटी का पालन करने वाला था ।।83।।
“After realizing that his sons were resolute in not accepting the throne, Emperor Vajradant decided to give his kingdom to Amitatej’s son, Pundarik. At that time, Pundarik was still young, and he was the one who would follow the tradition of succession.”
श्लोक ( Shlok ) 84
स यशोधरयोगोन्द्रशिष्यं गुणधरं श्रितः । सपुत्रदारो राजर्षिरदीक्षिष्ट नृपैः समम् ॥८४॥
राज्य की व्यवस्था कर राजर्षि वज्रदंत यशोधर तीर्थंकर के शिष्य गुणधर मुनि के समीप गये और वहाँ अपने पुत्र, स्त्रियों तथा अनेक राजाओं के साथ दीक्षित हो गये ।।84।।
“After arranging the affairs of the kingdom, King Vajradant, accompanied by his son, wives, and many other kings, went to the revered sage Gunadhar, a disciple of Lord Yashodhara, and was initiated into the spiritual order.”
श्लोक ( Shlok ) 85
देव्यः षष्टिसहस्राणि तत्त्र्यंशप्रमिता नृपाः । प्रभु तमन्वदीक्षन्त सहस्रं व सुतोत्तमाः ॥८५॥
महाराज वज्रदंत के साथ साठ हजार रानियों ने, बीस हजार राजाओं ने और एक हजार पुत्रों ने दीक्षा धारण की थी ।।85।।
“King Vajradant was accompanied by sixty thousand queens, twenty thousand kings, and one thousand sons, all of whom took initiation with him.”
श्लोक ( Shlok ) 86
पण्डितापि तदात्मानुरूपां दीक्षां समाददे । तदेव ननु पाण्डित्यं यत् संसारात् स मुद्धरेत् ॥८६॥
उसी समय श्रीमती की सखी पंडिता ने भी अपने अनुरूप दीक्षा धारण की थी―व्रत ग्रहण किये ये । वास्तव में पांडित्य वही है जो संसार से उद्धार कर दे ।।86।।
“At that time, Shri Mati’s companion, Pandita, also took initiation according to her own path and adopted vows. True scholarship is that which leads one to liberation from the cycle of worldly existence.”
श्लोक ( Shlok ) 87
सतश्चक्रधरापायालक्ष्मीमतिरगाच्छुचम् । अनुन्धर्या सहोष्णांशुवियोगान्नलिनी यथा ॥87।।
तदनंतर, जिस प्रकार सूर्य के वियोग से कमलिनी शोक को प्राप्त होती है उसी प्रकार चक्रवर्ती वज्रदंत और अमिततेज के वियोग से लक्ष्मीमती और अनुंधरी शोक को प्राप्त हुई थीं ।।87।।
“Afterward, just as the lotus withers in sorrow due to the separation of the sun, similarly, Lakshmimati and Anundhari fell into sorrow due to the separation of Emperor Vajradant and Amitatej.”
श्लोक ( Shlok ) 88
पुण्डरीकमथादाय बालं मन्त्रिपुरस्कृतम् । ते प्रविष्टाः पुरीं शोकाद् विच्छायत्वमुपागताम् ॥८८।।
पश्चात् जिन्होंने दीक्षा नहीं ली थी मात्र दीक्षा का उत्सव देखने के लिए उनके साथ-साथ गये थे ऐसे प्रजा के लोग, मंत्रियों-द्वारा अपने आगे किये गये पुंडरीक बालक को साथ लेकर नगर में प्रविष्ट हुए । उस समय वे सब शोक से कांति शून्य हो रहे थे ।।88।।
“Later, those who had not taken initiation but had gone to witness the initiation ceremony, along with the citizens and ministers, entered the city with young Pundarik, who had been entrusted to them. At that time, they were all overwhelmed with sorrow, their faces devoid of joy.”
श्लोक ( Shlok ) 89 – 91
ततोऽभून्महती रिता लक्ष्मीमत्या महाभरे । राज्ये बालोऽयमव्यक्तः स्थापितो नप्तृभाण्डकम् ।।८९।।
कथं नु पालयाम्येनं बिना पक्ष बलादहम् । वज्रजङ्घस्य तन्मूलं प्रहिणोम्यद्य धीमतः ॥९०।।
“तेनाधिष्ठित “मस्येदं राज्यं निष्कण्टकंभवेत् । अन्यथा गत “मेबैतदाक्रान्तं बलिभिनृपैः ॥91॥
तदनंतर लक्ष्मीमती को इस बात की भारी चिंता हुई कि इतने बड़े राज्य पर एक छोटा-सा अप्रसिद्ध बालक स्थापित किया गया है । यह हमारा पौत्र (नाती या पोता) है । बिना किसी पक्ष की सहायता के मैं इसकी रक्षा किस प्रकार कर सकूँगी । मैं यह सब समाचार आज ही बुद्धिमान् वज्रजंघ के पास भेजती हूँ । उनके द्वारा अधिष्ठित (व्यवस्थित हुआ) इस बालक का यह राज्य अवश्य ही निष्कंटक हो जायेगा अन्यथा इस पर आक्रमण कर बलवान् राजा इसे अवश्य ही नष्ट कर देंगे ।।89-91।।
“Then, Lakshmimati was greatly troubled by the fact that such a vast kingdom had been entrusted to a young, unknown boy. ‘This is our grandson. How can I protect him without any support?’ she thought. ‘I must send this news today to the wise Vajrajangh. Under his guidance, this child’s kingdom will surely become secure; otherwise, powerful kings will certainly invade and destroy it.'”
श्लोक 92 से 104
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 |
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |