भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251
श्लोक 252 से 261 महाबल का देवत्व
महाबल ऐशानस्वर्ग में ललितांगदेव बना। उपपाद शय्या पर उसका वैक्रियिक शरीर नवयौवन और आभूषणों से शोभित हुआ। उसका रूप मछलियों वाले सरोवर और कल्पवृक्ष समान था। पुष्पवर्षा और दुंदुभि से स्वागत हुआ। सुहावना पवन बहा।
English translation of Ādi purāṇa parv 5- Shlok 252 to 261
श्लोक ( Shlok ) 252
साचिव्य सचिबेनेति कृतमस्य निरत्ययम् । तदा धर्मसहायत्वं निर्व्यपेक्षं प्रक्कुर्वता ॥२५२॥
इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से महाराज महाबल की धर्म सहायता करने वाले स्वयंबुद्ध मंत्री ने अंत तक अपने मंत्रीपने का कार्य किया ।।252।।
Swayambudha minister, who selflessly assisted King Mahabal in upholding righteousness, carried out his ministerial duties until the very end. ॥252॥
श्लोक ( Shlok ) 253 – 254
देहभारमथोत्सृज्य लघुभूत इव क्षणात् । प्रापत् स करूपमैशानर्मेनल्पसुखसंनिधिम् ॥ २५३॥
तत्रोपपादद्याय्यायामुदपादि महोदयः । विमाने श्रीप्रमे रम्ये कक्षिताङ्गः सुरोत्तमः ॥२५४॥
तदनंतर वह महाबल का जीव शरीररूपी भार छोड़ देने के कारण मानो हलका होकर विशाल सुख-सामग्री से भरे हुए ऐशानस्वर्ग को प्राप्त हुआ । वहाँ वह श्रीप्रभ नाम के अतिशय सुंदर विमान में उपपाद शय्या पर बड़ी ऋद्धि का धारक ललितांग नाम का उत्तम देव हुआ ।।253-254।।
Thereafter, having cast off the burden of the body, King Mahabal seemed to become lighter and attained the glorious Eshan heaven, filled with immense joy and prosperity. There, he was reborn as an excellent deity named Lalitang, endowed with great splendor, residing in a magnificent celestial vehicle called Shriprabha, resting on the divine Upapada couch. ॥253-254॥
श्लोक ( Shlok ) 255
यथा वियति वीताभ्रे साभ्रा विद्युद् विरोचते । तथा बैक्रियिकी दिष्या तनुरस्याचिरादभात् ॥२५५॥
मेघरहित आकाश में श्वेत बादलोंसहित बिजली की तरह उपपाद शय्या पर शीघ्र ही उसका वैक्रियिक शरीर शोभायमान होने लगा ।।255।।
In the cloudless sky, like lightning accompanied by white clouds, his Vaikriyik (celestial) body soon began to radiate brilliantly on the Upapada couch. ॥255॥
श्लोक ( Shlok ) 256
नवयौवनपूर्णो ना सर्वलक्षणसंभृतः । सुसोत्थितो यथा भाति तथा सोऽन्तमुहूर्त्ततः ।।२५६।।
वह देव अंतर्मुहूर्त में ही नवयौवन से पूर्ण तथा संपूर्ण लक्षणों से संपन्न होकर उपपाद शय्या पर ऐसा सुशोभित होने लगा मानो सब लक्षणों से सहित कोई तरुण पुरुष सोकर उठा हो ।।256।।
That deity, within an instant, became full of youthful vigor and adorned with all auspicious qualities. He appeared resplendent on the Upapada couch, like a young man who had awakened, complete with all his virtues and brilliance. ॥256॥
श्लोक ( Shlok ) 257
ज्वलत्कुण्डलकेयूरमुकुटाङ्गद भूषणः । स्त्रग्वी सदंशुकभरः प्रादुरासीन्महाद्युतिः ॥२५७॥
दैदीप्यमान कुंडल, केयूर, मुकुट और बाजूबंद आदि आभूषण पहने हुए, माला से सहित और उत्तमवस्त्रों को धारण किये हुए ही वह अतिशय कांतिमां ललितांग नामक देव उत्पन्न हुआ ।।257।।
Adorned with radiant earrings, armlets, a crown, bracelets, and other ornaments, along with garlands and fine garments, the exceptionally luminous deity named Lalitang was thus born, exuding immense splendor. ॥257॥
श्लोक ( Shlok ) 258
तस्य रूपं तदा रेजे निमेषाक सललोचनम् । झषद्वयेन निष्कम्पस्थितेनेव सरोजलम् ।।२५८।।
उस समय टिमकाररहित नेत्रों से सहित उसका रूप निश्चल बैठी हुई दो मछलियों सहित सरोवर के जल की तरह शोभायमान हो रहा था ।।258।।
At that time, his form, with steady, unblinking eyes, appeared as radiant as the water of a lake adorned with two motionless fish. ॥258॥
श्लोक ( Shlok ) 259
बाहुशाखोज्ज्वलं श्रोमप्तलपल्लवकोमलम् । नेत्रभृङ्गं वपुस्तस्य भेजे कल्पाङिघ्रञ्जिपश्रियम् ।।२५९।।
अथवा उसका शरीर कल्पवृक्ष की शोभा धारणकर रहा था क्योंकि उसकी दोनों भुजाएँ उज्ज्वल शाखाओं के समान थी, अतिशय शोभायमान हाथों की हथेलियाँ कोमल पल्लवों के समान थीं और नेत्र भ्रमरों के समान थे ।।259।।
Alternatively, his body resembled the splendor of a celestial Kalpavriksha (wish-fulfilling tree), as his two arms were like radiant branches, his exceedingly beautiful palms resembled tender leaves, and his eyes were like bumblebees. ॥259॥
श्लोक ( Shlok ) 260
ललितं लकिताङ्गस्य दिव्यंरूपमयोनिजम् ।इत्येव वर्णनास्थास्तु किं वा वर्णनयानया ॥२६०।।
अथवा ललितांगदेव के रूप का और अधिक वर्णन करने से क्या लाभ है ? उसका वर्णन तो इतना ही पर्याप्त है कि वह योनि के बिना ही उत्पन्न हुआ था और अतिशय सुंदर था ।।260।।
Or what is the need for further description of Lalitangdeva’s form? It is sufficient to say that he was born without a womb and was exceedingly beautiful. ॥260॥
श्लोक ( Shlok ) 261
पुष्पवृष्टिस्तदायप्तग्मुक्ता कल्पद्रुमैः स्वयम् । दुन्दुभिस्तनितं मन्द्रं जज्रम्भे रुद्धदिकतटम् ।।२६१।।
कल्पवृक्षों के द्वारा ऊपर से छोड़ी हुई पुष्पों की वर्षा हो रही थी और दुंदुभि का गंभीर शब्द दिशाओं को व्याप्त करता हुआ निरंतर बढ़ रहा था ।।261।।
A shower of flowers was being released from above by the Kalpavrikshas (wish-fulfilling trees), and the deep sound of celestial drums resonated, spreading across all directions and continually intensifying. ॥261॥
श्लोक 262 से 271
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251
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