अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 391 to 401
श्लोक ( Shlok ) 391 – 400
प्रज्ञप्तिकामरूपिण्यावथाग्निस्तम्बिनी परा। उदकस्तम्भिनी विद्या विद्या विश्वप्रवेशिनी ॥ ३९१ ॥अप्रतीघातगामिन्या सहान्याकाशगामिनी । उत्पादिनी पराविद्या सा वशीकरणी श्रुता ॥३९२आवेशिनी दशम्यन्या मान्या प्रस्थापनीति च । प्रमोहनी प्रहरणी संग्रामण्याख्ययोदिता ॥३९३॥आवर्तनी संग्रहणी भञ्जनी च विपाटनी । प्रावर्तनी प्रमोदिन्या सहान्यापि प्रहापणी ॥३९४॥प्रभावती प्रलापिन्या निक्षेपिण्या च या स्मृता । ‘शवरी परा चाण्डाली मातङ्गीति च कीर्तिता ॥ ३९५॥गौरी षडङ्गिका श्रीमत्कन्या च शतसंकुला । कुभाण्डीति च विख्याता तथा विरलवेगिका ॥३९६॥रोहिण्यतो मनोवेगा महावेगाह्वयापि च । चण्डवेगा सचपलवेगा लघुकरीति च ॥ ३९७ ॥पर्णलध्वाख्यका वेगावतीति प्रतिपादिता । शीतोष्णदे च वेताल्यौ महाज्वालाभिधानिका ॥३९८॥छेदनी सर्वविद्यानां युद्धवीर्येति चोदिता । बन्धानां मोचनी चोक्ता २ प्रहारावरणी तथा ॥३९९॥भ्रामर्या भोगिनीत्यादिकुलजातिप्रसाधिता । विद्यास्तासामयं पारं गत्वा योगीव निर्बभौ ॥४००॥
प्रज्ञप्ति, कामरूपिणी, अग्निस्तम्भिनी, उदकस्तम्भिनी, विश्वप्रवेशिनी, अप्रतिघातगामिनी, आकाशगामिनी, उत्पादिनी, वशीकरणी, दशमी, आवेशिनी, माननीयप्रस्था-पिनी, प्रमोहनी, प्रहरणी, संक्रामणी, आवर्तनी, संग्रहणी, भंजनी, विपाटिनी, प्रावर्तकी, प्रमोदिनी, प्रहापणी, प्रभावती, प्रलापिनी, निक्षेपणी, शर्वरी, चांडाली, मातङ्गी, गौरी, षडङ्गिका, श्रीमत्कन्या, शतसंकुला, कुभाण्डी, विरलवेगिका, रोहिणी, मनोवेगा, महावेगा, चण्डवेगा, चपलवगा, लघुकरी, पर्णलघु, वेगावती, शीतदा, उष्णदा, वेताली, महाज्वाला, सर्वविद्याळेदिनी, युद्धवीर्या, बन्धमोचनी, प्रहारावरणी, भ्रामरी, अभोगिनी इत्यादि कुल और जातिमें उत्पन्न हुई अनेक विद्याएँ सिद्ध कीं। उन सब विद्याओंका पारगामी होकर वह योगीके समान सुशोभित हो रहा ॥ ३९१-४०० ।।
“He successfully mastered numerous Vidyas (occult sciences and mystical arts) originating from diverse spiritual lineages and categories, such as: Prajnapti, Kamarupini, Agnistambhini, Udakastambhini, Vishvapraveshini, Apratighatagamini, Akashagamini, Utpadini, Vashikarani, Dashami, Aveshini, Mananiyaprasthapini, Pramohani, Praharani, Samkramani, Avartani, Samgrahani, Bhanjani, Vipatini, Pravartaki, Pramodini, Prahapani, Prabhavati, Pralapini, Nikshepani, Sharvari, Chandali, Matangi, Gauri, Shadangika, Shrimatkanya, Shatasankula, Kubhandi, Viralavegika, Rohini, Manovega, Mahavega, Chandavega, Chapalavega, Laghukari, Parnalaghu, Vegavati, Shitada, Ushnada, Vetali, Mahajvala, Sarvavidyaledini, Yuddhavirya, Bandhamochani, Praharavarani, Bhramari, and Abhogini. Having attained the absolute mastery and ultimate depth of all these sciences, he shone with a brilliant splendor, looking just like an enlightened yogi. (391–400)”
श्लोक ( Shlok ) 401
श्रेणीद्वयाधिपत्येन’ विद्याधरधराधिपः । प्राप्य तच्चक्रवर्तित्वं चिरं भोगानमुक्त सः ॥ ४०१ ॥
दोनों श्रेणियोंका अधिपति होनेसे वह सब विद्याधरोंका राजा था और इसप्रकार विद्याधरोंका चक्रवर्तीपना पाकर वह चिरकाल तक भोग भोगता रहा ।। ४०१ ।।
“By virtue of being the supreme ruler over both mountain ranges (Shrenis), he became the king of all Vidyadharas. Having thus attained the grand sovereignty (Chakravartipana) of the Vidyadhara world, he continued to enjoy all the royal pleasures and bounties for a very long time. (401)”
श्लोक 402 से 411
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85
धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 |श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390
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