राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 365 to 382
श्लोक ( Shlok ) 365 – 366
प्रणम्य तां स्ववृत्तान्तं सर्व संश्राव्य वानरः । रामस्वामिनिदेशेन लेखगर्भकरण्डकम् ॥ ३६५ ॥ मयाऽऽनीतमिदं देवीत्यग्रेऽस्याः स तदक्षिपत् । ‘तं दृष्ट्वा किमयं मायाविग्रहो रावणोऽधमः ॥ ३६६॥
वानर रूपधारी अणुमान् ने सीताको नमस्कारकर उसे अपना सब वृत्तान्त सुना दिया और कहा कि मैं राजा रामचन्द्र-जीके आदेशसे, जिसके भीतर पत्र रखा हुआ है ऐसा यह एक पिटारा ले आया हूं। इतना कह उसने वह पिटारा सीता देवीके आगे रख दिया। वानरको देखकर सीताको सन्देह हुआ कि क्या यह मायामयी शरीरको धारण करनेवाला नीच रावण ही है ? ॥ ३६५-३६६ ॥
Anuman, who had assumed the form of a monkey, bowed to Sita, narrated his entire story to her, and said, “By the command of King Ramachandra, I have brought this box, inside of which a letter is placed.” Having said this, he placed the box before Goddess Sita. However, upon seeing the monkey, Sita was struck with doubt: could this be the vile Ravana himself, assuming a deceptive form? || 365-366 ||
श्लोक ( Shlok ) 367 – 373
शङ्कमानेति सा वीक्ष्य तन्त्र श्रीवत्सलान्छनम् । रत्नाङ्गुलीयकं चात्मपतिनामाक्षराङ्कितम् ॥ ३६७ ॥ ममेदर्माप भात्येव मायेवास्य दुरात्मनः । को जानाति तथाप्येतत्पत्रं तस्यैव वा भवेत् ॥ ३६८ ॥ मद्भाग्यादिति निर्भिद्य मुद्रां अपत्रमवाचयत् । ४वाचनानन्तरं वीतशोकया स्निग्धवीक्षया ॥ ३६९ ॥ जीविताहं त्वया स्थानमधितिष्ठसि मे पितुः । इत्युक्तः सीतया कर्णौ पिधाय पवनात्मजः ॥ ३७०॥ मत्स्वामिनो महादेवी मातर्नेहान्यकल्पना । त्वां नेतुं मम सामर्थ्यमद्यैवास्ति पतिव्रते ॥ ३७१ ॥ नास्ति भट्टारक्रस्याज्ञा स्वयमेव महीपतिः । हत्वैत्य रावणं तस्य त्वां नेष्यति सह श्रिया ॥ ३७२ ॥तत्साहसेन तत्कीतिर्व्याप्यास्ताम् भुवनत्रयम् । ततः शरीरसन्धारणार्थमाहारमाहर ॥ ३७३ ॥
इस प्रकार सीता संशय कर रही थी कि उसकी दृष्टि श्रीवत्सके चिह्नसे चिह्नित एवं अपने पतिके नामाक्षरोंसे अङ्कित रत्नमयी अंगूठीपर जा पड़ी। उसे देख वह फिर भी संशय करने लगी कि मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि यह दुष्ट रावणकी ही माया है। क्या है? यह कौन जाने, परन्तु यह पत्र तो उन्हींका है और मेरे भाग्यसे ही यहाँ आया है ऐसा सोचकर उसने पत्रपर लगी हुई मुहर तोड़कर पत्र बाँचा। पत्र बाचते ही उसका शोक नष्ट हो गया। वह स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखकर कहने लगी कि तूने मुझे जीवित रक्खा है अतः मेरे पिताके पदपर अधिष्ठित है – मेरे पिताके समान है। जब सीताने उक्त वचन कहे तब पवनपुत्र अणुमान्ने अपने कान ढककर उत्तर दिया कि हे माता ! आप मेरे स्वामीकी महादेवी हैं, इसपर अन्य कल्पना न कीजिये । हे पतिव्रते ! यद्यपि तुम्हें आज ही ले जानेकी मेरी शक्ति है तथापि स्वामीकी आज्ञा नहीं है। राजा रामचन्द्रजी स्वयं ही आकर रावणको मारेंगे और उसकी लक्ष्मीके साथ साथ तुम्हें ले जावेगें । उस साहसपूर्ण कार्यसे उनकी कीर्ति तीनों लोकोंमें व्याप्त होकर रहेगीअतः शरीर धारण करनेके लिए आहार ग्रहण करो ।। ३६७-३७३ ॥
While Sita was doubting in this manner, her gaze fell upon a gem-encrusted ring, marked with the sign of Shrivatsa and engraved with the letters of her husband’s name. Seeing it, she still began to doubt, thinking, “It appears to me that this is merely the illusion of the wicked Ravana. What could it be? Who knows, but this letter belongs strictly to Him and has arrived here solely due to my good fortune.” Thinking thus, she broke the seal on the letter and read it. As soon as she read the letter, her grief vanished. Looking with an affectionate gaze, she began to say, “You have kept me alive, therefore you are established in the position of my father—you are just like a father to me.”
When Sita spoke these words, Anuman, the son of the wind, covered his ears and replied, “O Mother! You are the chief queen of my master; do not harbor any other thoughts in this regard. O chaste and devoted wife! Although I possess the power to take you away this very day, I do not have the command of my master. King Ramachandra himself will come, slay Ravana, and take you back along with his royal fortune. Through that heroic deed, his glory will pervade all the three worlds; therefore, partake of food to sustain your body.” || 367-373 ||
श्लोक ( Shlok ) 374 – 375
भगवत्यत्र को दोषो राज्ञा ते सङ्गमोऽचिरात् । इत्याख्यत्सा ततस्त्यक्त्वा वैमनस्यं महीसुता ॥ ३७४ ॥ ‘कायस्थितिसमादानं चाभ्युपेत्य कृतत्वरम् । तत्कालोचितकार्योक्तिकुशला तं व्यसर्जयत् ॥ ३७५ ॥
हे भगवति ! आहार ग्रहण करनेमें क्या दोष है ? राजा रामचन्द्रके साथ तुम्हारा समागम शीघ्र ही हो जावेगा । इस प्रकार जब अणुमान्ने कहा तब सीताने उदासीनता छोड़कर शीघ्र ही शरीरकी स्थितिके लिए आहार ग्रहण करना स्वीकृत कर लिया और उस समयके योग्य कार्यों के कहनेमें कुशल सीताने उस दूतको शीघ्र ही विदा कर दिया ।।३७४-३७५।।
“O Goddess! What harm is there in partaking of food? Your reunion with King Ramachandra will happen very soon.” When Anuman spoke in this manner, Sita cast away her indifference and quickly agreed to take food to sustain her body. Then, Sita, who was highly skillful in speaking words appropriate for the occasion, promptly bid the messenger farewell. || 374-375 ||
श्लोक ( Shlok ) 376
प्रणम्य सोऽपि तत्पादपङ्कजं भास्करोदये । गत्वा ततो झटित्याप रामं स्वागमनोन्मुखम् ॥३७६॥
दूत-अणुमान् भी सीताके चरणकमलोंको नमस्कार कर सूर्योदयके समय चला और अपने आगमनकी प्रतीक्षा करनेवाले रामचन्द्रके समीप शीघ्र ही पहुँच गया ।॥ ३७६।।
The messenger Anuman, after bowing down to the lotus-like feet of Sita, departed at sunrise and quickly reached the presence of Ramachandra, who was eagerly awaiting his arrival. || 376 ||
श्लोक ( Shlok ) 377 – 382
बदनाब्जप्रसादेन कार्यसिद्धिं न्यवेदयत् । प्रणम्य स्वामिना सम्यक् परिरभ्योदितासनः ॥ ३७७ ॥ उपविष्टो मुदा तेन पृष्टो इष्टेति मत्प्रिया । सप्तपञ्चमुदीर्योष्वेवंचस्तत्प्रीतिहेतुकम् ॥३७८ ॥ निसर्गाद्रावणो दृप्तश्चक्रं चान्यत्समुद्ययौ । लङ्कायां दुर्निमित्तानि चासन् कृत्याश्च खेचराः ॥ ३७९ ॥ सन्ति तत्सेवकाः सर्वमेतदालोच्य मन्त्रिभिः । जानक्यानयनोपायो निश्चितव्यो यथा तथा ॥ ३८० ॥ इतीदमुचितं कार्यमवदत्पवनात्मजः । तदुक्तं चेतसा सम्यगवधार्योजिताशयः ॥ ३८१ ॥ ततः सेनापतिं पट्टबन्धेनानिलनन्दनम् । कृत्वाधिराज्यपहुं च सुग्रीवस्य महीपतिः ॥ ३८२ ॥
उसने पहुँचते ही पहले अपने मुखकमलकी प्रसन्नतासे रामचन्द्रजीको कार्यसिद्धिकी सूचना दी फिर उन्हें प्रणाम किया। स्वामी रामचन्द्रने उसे अच्छी तरह आलिङ्गन कर आसन पर बैठनेके लिए कहा। जब वह हर्ष पूर्वक आसन पर बैठ गया तब रामचन्द्रने उससे पूछा कि क्यों मेरी प्रिया देखी है? उत्तर में अणुमान् ने रामचन्द्र -को प्रीति उत्पन्न करनेवाले उत्कृष्ट वचन विस्तारके साथ कहे। वह कहने लगा कि रावण स्वभाव से ही अहङ्कारी है फिर उसके चक्ररत्न भी प्रकट हो गया है। इसके सिवाय लङ्कामें बहुतसे अपशकुन हो रहे हैं और उसके विद्याधर सेवक बहुत ही कुशल हैं। इन सब बातोंका मन्त्रियोंके साथ अच्छी तरह विचार कर जिस तरह सम्भव हो उसी तरह सीताको लानेके उपायका शीघ्र ही निश्चय करना श्राहिये । इस प्रकार यह योग्य कार्य अणुमान् ने सूचित किया। बलिष्ठ अभिप्रायको धारण करनेवाले रामचन्द्रने अणुमान्के कहे वचनोंका हृदयमें अच्छी तरह विचार किया। उसी समय उन्होंने अणुमान्-को सेनापतिका पट्ट बाँधा और सुग्रीवको युवराज बनाया ॥ ३७७-३८२ ॥
As soon as he arrived, he first indicated the success of the mission to Ramachandra through the joy on his lotus-like face, and then bowed to him. Master Ramachandra embraced him warmly and asked him to take a seat. When he had sat down joyfully, Ramachandra asked him, “Tell me, have you seen my beloved?” In response, Anuman spoke excellent and affection-inspiring words in great detail to Ramachandra.
He began to say, “Ravana is arrogant by nature, and moreover, his Chakraratna (divine discus weapon) has also manifested. Apart from this, many ill omens are occurring in Lanka, and his Vidyadhara servants are highly skilled. Deliberating upon all these matters thoroughly with the ministers, you must quickly determine a method to bring Sita back in whatever way possible.”
In this manner, Anuman advised the appropriate course of action. Ramachandra, who possessed a powerful intellect and strong resolve, pondered deeply in his heart over the words spoken by Anuman. At that very moment, he bound the commander’s band (Patta) upon Anuman, appointing him the Army Chief, and appointed Sugriva as the Crown Prince (Yuvaraja). || 377-382 ||
श्लोक 383 से 401
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