शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 254 | श्लोक 255 से 271 | श्लोक 272 से 281
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 282 to 293
श्लोक ( Shlok ) 282
ईशानेन्द्रो विदित्वैतन्मरुत्तदसि शुद्धदृक् । धैर्यसारस्त्वमेवाद्य चित्रमित्यब्रवीन्मुदा ॥२८२॥
उसी समय देवोंकी सभामें ईशानेन्द्रने यह सब जानकर बड़े हर्षसे कहा कि अहा ? आश्चर्य है आज संसारमें तू ही शुद्ध सम्यग्दृष्टि है और तू ही धीर-वीर है ॥ २८२ ॥
“At that very moment, having learned of all this in the assembly of the gods, Ishanendra (the lord of the Ishana heaven) said with great joy, ‘Oh! How wonderful! Today in this world, you alone are the truly pure right-believer (Samyagdrishti), and you alone are the steadfast and courageous one.'”282
श्लोक ( Shlok ) 283 – 284
स्वगतं तं स्तवं श्रत्वा देवैः कस्य स्तुतिः सतः । त्वयाऽकारीत्यसौ पृष्टः प्रत्याहेति सुरान् प्रति ॥ २८३॥धीरो मेघरथो नाम शुद्धदृक् पार्थिवाग्रणीः । प्रतिमायोगधार्यद्य तस्य भक्त्या स्तुतिः कृता ॥२८४॥
इस तरह अपने आप की हुई स्तुतिको सुनकर देवोंने ईशानेन्द्रसे पूछा कि आपने किस सज्जनकी स्तुति की है ? उत्तरमें इन्द्र देवोंसे इस प्रकार कहने लगा कि राजाओंमें अग्रणी मेघरथ अत्यन्त धीरवीर है, शुद्ध सम्यग्दृष्टि है, आज वह प्रतिमायोग धारण कर बैठा है। मैंने उसीकी भक्ति से स्तुति की है ।। २८३-२८४ ॥
“Hearing this praise which he had uttered on his own, the gods asked Ishanendra, ‘Which righteous person have you praised?’ In response, Indra said to the gods, ‘Megharatha, the foremost among kings, is exceptionally steadfast and brave, and possesses pure right-belief (Samyagdrishti). Today, he sits absorbed in Pratimayoga (a deep, motionless meditative posture). It is out of devotion to him that I have sung his praises.'”283 – 284
श्लोक ( Shlok ) 285 – 287
तदुदीरितमाकर्ण्य तत्परीक्षातिदक्षिणे । अतिरूपासुरूपाख्ये देव्यावागत्य भूपतिम् ॥ २८५॥विलासैविभ्रमैहावैर्भावैर्गीतैः प्रजल्पितैः । अन्यैश्च मदनोन्मादहेतुभिस्तन्मनोबलम् ॥ २८६ ॥विद्युल्लतेव देवाद्रिं ते चालतियमक्षमे । सत्यमीशानसम्प्रोक्तमिति स्तुत्वा स्वरीयतुः ॥ २८७ ॥
ईशानेन्द्रकी उक्त बातको सुनकर उसकी परीक्षा करनेमें अत्यन्त चतुर अतिरूपा और सुरूपा नामकी दो देवियाँ राजा मेघरथके पास आईं और विलास, विभ्रम, हाव-भाव, गीत, बातचीत तथा कामके उन्मादको बढ़ानेवाले अन्य कारणोंसे उसके मनोबलको विचलित करनेका प्रयत्न करने लगीं परन्तु जिस प्रकार बिजलीरूपी लता सुमेरु पर्वतको विचलित नहीं कर सकती उसी प्रकार वे देवियाँ राजा मेघरथके मनोबलको विचलित नहीं कर सकीं। अन्तमें वे ‘ईशानेन्द्रके द्वारा कहा हुआ सच है’ इस प्रकार स्तुति कर स्वर्ग चली गई ।। २८५-२८७ ।।-
“Upon hearing these words of Ishanendra, two goddesses named Atirupa and Surupa, who were exceptionally clever in putting others to the test, approached King Megharatha. They attempted to shake his mental resolve through amorous gestures, playful movements, alluring expressions, songs, conversation, and other means that heighten passionate intoxication. However, just as a streak of lightning cannot shake Mount Sumeru, those goddesses could not waver King Megharatha’s mental fortitude. Ultimately, praising him with the words, ‘What was spoken by Ishanendra is indeed true,’ they returned to heaven.”285 – 287
श्लोक ( Shlok ) 288 – 293
‘अन्यदैशानकल्पेशो मरुन्मध्ये यदृच्छया । समस्तौत्प्रियमित्राया रूपमाकर्ण्य तत्स्तवम् ॥२८८॥रतिषेणा रतिश्चैत्य देव्यौ तद्रूपमीक्षितुम् । ऐतां मज्जनवेलायां गन्धतैलाक्तदेहिकाम् ॥२८९॥निरूप्येन्द्रवचः सम्यक श्रद्धायाप्यभिभाषितुम् । तया सहैत्य कन्याकृती धृत्वा तां समूचतुः ॥२९०॥त्वामिध्यकन्यके द्रष्टुमैतामिति सखीमुखात् । ताभ्यामुक्तं समाकर्ण्य प्रमदादस्तु तिष्ठताम् ॥२९१॥तावदित्यात्मसंस्कारं कृत्वाऽऽहूयाभ्यदर्शयत् । तां निशम्याहतुस्ते च प्राग्वत्कान्तिर्न चाधुना ॥२९२॥इति सा तद्वचः श्रुत्वा प्रियमिश्रा महीपतेः । वक्त्रं व्यलोकयत् प्राह सोऽपि कान्ते तथेति ताम् ॥२९३॥
किसी दूसरे दिन ऐशानेन्द्रने देवोंकी सभामें अपनी इच्छासे राजा मेघरथकी रानी प्रियमित्रा-के रूपकी प्रशंसा की। उसे सुनकर रतिषेणा और रति नामकी दो देवियाँ उसका रूप देखनेके लिए आईं। वह स्नानका समय था अतः प्रियमित्राके शरीरमें सुगन्धित तेलका मर्दन हो रहा था । उस समय प्रियमित्राको देखकर देवियोंने इन्द्रके वचन सत्य समझे । अनन्तर उसके साथ बातचीत करनेकी इच्छासे उन देवियोंने कन्याका रूप धारण कर सखीके द्वारा कहला भेजा कि दो धनिक कन्याएँ- सेठकी पुत्रियाँ आपके दर्शन करना चाहती हैं। उनका कहा सुनकर प्रियमित्राने हर्षसे कहा कि ‘बहुत अच्छा, ठहरें’ इस प्रकार उन्हें ठहराकर रानी प्रियमित्राने अपनी सजावट की। फिर उन कन्याओंको बुलाकर अपने आपको दिखलाया – उनसे भेंट की। रानीको देखकर दोनों देवियाँ कहने लगी कि ‘जैसी कान्ति। पहले थी अब वैसी नहीं है’। कन्याओंके वचन सुनकर प्रियमित्रा राजाका मुख देखने लगी। उत्तरमें राजाने भी कहा कि हे प्रिये ! बात ऐसी ही है ॥ २८८-२९३ ॥
“On another day, in the assembly of the gods, Ishanendra voluntarily praised the beauty of King Megharatha’s queen, Priyamitra. Hearing this, two goddesses named Ratishena and Rati came down to see her beauty. It happened to be her bath time, so fragrant oil was being massaged onto Priyamitra’s body. Upon seeing Priyamitra at that moment, the goddesses realized that Indra’s words were indeed true.
Afterward, desiring to converse with her, the goddesses assumed the forms of young maidens and sent a message through a friend, saying, ‘Two wealthy maidens—daughters of a merchant—wish to see you.’ Hearing their request, Priyamitra gladly replied, ‘Very well, let them wait.’ Having them wait in this manner, Queen Priyamitra adorned herself. She then called the maidens in, presented herself to them, and met with them.
Looking at the queen, the two goddesses remarked, ‘The radiance you had earlier is no longer the same.’ Hearing the maidens’ words, Priyamitra looked toward the king’s face. In response, the king also said, ‘O beloved! It is exactly as they say.'”288 – 293
श्लोक 294 से 301
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