नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 145 से 153 | श्लोक 154 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 202 | श्लोक 203 से 211
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 212 to 221
श्लोक ( Shlok ) 212 – 214
इति सर्वमिदं श्रुत्वा ससंवेगपरायणः । सप्रेक्षोऽन्धकवृष्ठ्याख्यः स्वीचिकीर्षुः परं पदम् ॥ २१२ ॥समुद्रविजयाख्याय दत्वाभिषवपूर्वकम् । राज्यमुज्झितसङ्गः सन् शमसङ्गस्तपोऽग्रहीत् ॥ २१३ ॥सुप्रतिष्ठजिनाभ्यर्णे राजभिर्बहुभिः समम् । स संयमान्ते संन्यस्य विन्यासं निर्वृतेरगात् ॥ २१४ ॥
महाराज अन्धकवृष्टि यह सब सुनकर संसारसे भयभीत हो उठे। वे विद्याधर तो थे ही, अतः परम पद – मोक्षपद प्राप्त करनेकी इच्छासे उन्होंने अभिषेकपूर्वक समुद्रविजयके लिए राज्य दे दिया और स्वयं समस्त परिग्रह छोड़कर शान्तचित्त हो उन्हीं सुप्रतिष्ठित जिनेन्द्रके समीप बहुतसे राजाओंके साथ तप धारण कर लिया। संयम धारण कर अन्तमें उन्होंने संन्यास धारण किया और कर्मोंको नष्ट कर मोक्ष प्राप्त कर लिया ॥ २१२-२१४ ॥
Upon hearing all this, King Andhakavrishti became deeply detached and fearful of the worldly cycle of existence ($samsara$). Being a Vidyadhara (a being possessed of supernatural powers) by nature, and desiring to attain the supreme state—the state of liberation (Moksha)—he ritually consecrated and handed over the kingdom to Samudravijaya. Abandoning all worldly possessions and attachments with a serene mind, he, along with many other kings, initiated a life of penance under the guidance of the same revered Jina, Supratisthita. Adopting self-restraint and ultimately embracing the vow of Sannyasa (complete renunciation), he destroyed all his karmas and attained ultimate liberation (Moksha). || 212-214 ||
श्लोक ( Shlok ) 215
समुद्रविजये पाति क्षितिं वर्णाश्रमाः सुखम् । सुधर्मकर्मसु स्वैरं प्रावर्तन्त यथोचितम् ॥ २१५ ॥
इधर समुद्रविजय पृथिवीका पालन करने लगे । उनके राज्यमें समस्त वर्णों और समस्त आश्रमोंके लोग, उत्तम धर्मके कार्योंमें इच्छानुसार सुखपूर्वक यथायोग्य प्रवृत्ति करते थे ॥ २१५ ॥
Meanwhile, Samudravijaya began to rule and protect the Earth. Under his reign, people belonging to all classes (varna) and all stages of life (ashrama) happily engaged themselves in the supreme duties of righteousness (dharma) according to their desires and fittingly as per their duties. || 215 ||
श्लोक ( Shlok ) 216
राज्यं विभज्य दिक्पालैरिव भ्रातृभिरष्टभिः । सहान्वभूत्स भूपालः सकलं सर्वसौख्यदम् ॥ २१६ ॥
राजा समुद्रविजय राज्यका यथायोग्य विभाग कर दिक्पालोंके समान अपने आठों भाइयोंके साथ सर्व प्रकारका सुख देनेवाले राज्यका उपभोग करते थे ।। २१६ ।।
Having appropriately divided the responsibilities of the kingdom, King Samudravijaya enjoyed the realm—which bestowed all forms of happiness—alongside his eight brothers, who were majestic like the Dikpalas (the guardian deities of the directions). || 216 ||
श्लोक ( Shlok ) 217 – 222
एवं सुखेन सर्वेषां काले गच्छत्ययोदयात् । चतुरङ्गबलोपेतो वसुदेवो युवाग्रणीः ॥ २१७ ॥गन्धवारणमारुह्य सञ्चरच्चामरावलिः । वाद्यमानाखिलातोद्यध्वनिनिभिन्नदिक्तटः ॥ २१८ ॥ बन्दिमागधसूतादिसूद्यमानाङ्कमालकः । नानाभरणभाभारभासमानस्वविग्रहः ॥ २१९ ॥निगृहीतुमिवोग्रांशुमुद्यतो निजतेजसा । अधो विधातुं वाप्येष भूषणाङ्गसुरद्रुमम् ॥ २२० ॥अमराणां कुमारो वा कुमारः प्रत्यहं बहिः । निर्गच्छति पुरात्स्वैरं स्वलीलादर्शनोत्सुकः ॥ २२१ ॥विसस्मरुविलोक्यैनं स्वव्यापारान् पुरस्त्रियः । निरादरा बभूवुश्च मातुलान्यादिवारणे ॥ २२२ ॥
इस प्रकार पुण्योदयसे उन सबका काल सुखसे बीत रहा था। इन सबमें वसुदेव सबसे अधिक युवा थे इसलिए वे अपनी लीला दिखानेकी उत्कण्ठासे प्रतिदिन स्वेच्छानुसार गन्धवारण नामक हाथीपर सवार होकर नगरके बाहर जाते थे। उस समय चतुरङ्ग सेना उनके साथ रहती थी, चमरोंके समूह उनके आस-पास दुराये जाते थे, बजते हुए समस्त बाजोंका ऐसा जोरदार शब्द होता था जिससे कि दिशाओंके किनारे फटेसे जाते थे, वन्दी, मागध तथा सूत आदि लोग उनकी विरुदावलीका वर्णन करते जाते थे, अनेक प्रकारके आभरणोंकी कान्तिके समूहसे उनका शरीर देदीप्यमान रहता था जिससे ऐसा जान पड़ता था कि मानो अपने तेजसे सूर्यका निग्रह करनेके लिए ही उद्यत हो रहे हैं, अथवा भूषणाङ्ग जातिके कल्पवृक्षका तिरस्कार करनेके लिए ही तैयारी कर रहे हों। उस समय वे देवोंके कुमारके समान जान पड़ते थे इसलिए नगरकी स्त्रियाँ इन्हें देखकर अपना अपना कार्य भूल जाती थीं और अपनी मामी आदिके रोकनेमें निरादर हो जाती थीं-किसीके निषेध करने पर भी नहीं मानती थीं ।। २१७-२२२ ।।
In this manner, due to the rise of their meritorious deeds (punya), time passed happily for them all. Among them, Vasudeva was the youngest; therefore, eager to display his youthful sports and pastimes, he would ride out of the city every day at his own pleasure upon a majestic elephant named Gandhavarana.
At that time, a fourfold army (chaturanga sena) accompanied him, and clusters of ceremonial whisks (chamaras) were waved all around him. The musical instruments played with such a thunderous sound that the very horizons seemed to burst. Bards, chroniclers, and heralds (vandi, magadha, and suta) continuously sang his praises. His body blazed with the brilliant luster of various ornaments, making it appear as though he were ready to eclipse the sun with his own splendor, or as if he were preparing to surpass the beauty of the ornament-bearing wish-fulfilling tree (Bhushananga Kalpavriksha).
At that moment, he looked just like a prince of the gods; beholding him, the women of the city would forget their chores and completely disregard the rebukes of their aunts and elders—refusing to listen to anyone who tried to restrain them. || 217-222 ||
श्लोक 223 से 243
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नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144 | श्लोक 145 से 153 | श्लोक 154 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 202 | श्लोक 203 से 211
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