Summary of Uttar Puran Parv 57 by Acharya Gunabhadra
उत्तरपुराण पर्व 57 (श्लोक 1–100) : संक्षिप्त सारांश
इस पर्व में श्रेयांसनाथ भगवान् के पूर्वभव, जन्म, वैराग्य, केवलज्ञान और मोक्ष का वर्णन किया गया है, साथ ही प्रथम नारायण त्रिपृष्ठ, विजय बलभद्र और अश्वग्रीव प्रतिनारायण के चरित्र का भी निरूपण किया गया है। प्रारम्भ में नलिनप्रभ नामक धर्मात्मा राजा का वर्णन आता है, जिन्होंने जिनेन्द्र भगवान् के उपदेश से वैराग्य प्राप्त कर राज्य त्याग दिया और संयम धारण किया। तप एवं आराधना के प्रभाव से वे अच्युत स्वर्ग में इन्द्र हुए और पुनः भरत क्षेत्र में राजा विष्णु तथा रानी सुनन्दा के यहाँ श्रेयांसनाथ भगवान् के रूप में अवतीर्ण हुए।
भगवान् श्रेयांसनाथ के जन्म से संसार में हर्ष और शान्ति फैल गई। देवों ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक किया। युवावस्था में उन्होंने आदर्श रूप से राज्य संचालन किया, किन्तु संसार की अनित्यता का अनुभव होने पर वैराग्य धारण कर दीक्षा ले ली। कठोर तपस्या के पश्चात् उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त किया और विशाल धर्मसंघ सहित अनेक जीवों को धर्ममार्ग का उपदेश दिया। अन्ततः सम्मेदशिखर पर योगनिरोध कर उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया।
इसके बाद प्रथम नारायण त्रिपृष्ठ, विजय बलभद्र और अश्वग्रीव प्रतिनारायण के पूर्वभवों का वर्णन है। विश्वभूति राजा के पुत्र विश्वनन्दी और उनके भाई विशाखभूति के पुत्र विशाखनन्दी के बीच वैर उत्पन्न हुआ। युद्ध और अपमान की घटनाओं से विश्वनन्दी को वैराग्य हुआ और उन्होंने दीक्षा ग्रहण की, किन्तु अन्त समय में शल्य रहने से वे महाशुक्र स्वर्ग में देव होकर पुनः त्रिपृष्ठ नारायण बने। विशाखभूति विजय बलभद्र हुए और विशाखनन्दी अश्वग्रीव प्रतिनारायण बना।
त्रिपृष्ठ और विजय ने मिलकर अश्वग्रीव को पराजित कर विशाल साम्राज्य स्थापित किया। त्रिपृष्ठ अत्यधिक परिग्रह और विषय-भोगों में आसक्त रहा, जिसके कारण वह मृत्यु के बाद सातवें नरक में गया। अश्वग्रीव भी अधोगति को प्राप्त हुआ। दूसरी ओर विजय बलभद्र ने वैराग्य ग्रहण कर संयम धारण किया, अनगार केवली बने और अन्ततः मोक्ष प्राप्त किया। पर्व के अन्त में यह निष्कर्ष दिया गया है कि कर्म के प्रभाव से ही जीव सुख और दुःख को प्राप्त होता है तथा मोक्षमार्ग ही वास्तविक कल्याण का पथ है।
श्लोक 1 से 11 : राजा नलिनप्रभ का वैभव और वैराग्य
श्रेयांसनाथ भगवान् को समस्त कल्याण का सर्वोत्तम आश्रय बताया गया है। पूर्व विदेह क्षेत्र के क्षेमपुर नगर में नलिनप्रभ नामक राजा राज्य करते थे। वे धर्म, अर्थ और काम को मर्यादित रूप से धारण करने वाले न्यायप्रिय और प्रजावत्सल राजा थे। एक दिन सहस्राम्रवन में जिनेन्द्र भगवान् के दर्शन और धर्मोपदेश सुनकर उन्हें तत्त्वज्ञान उत्पन्न हुआ। उन्होंने समझा कि परिग्रह मोह का कारण है और उसका त्याग ही कल्याणकारी है।
श्लोक 12 से 22 : दीक्षा, स्वर्गगमन और गर्भ कल्याणक
राजा नलिनप्रभ ने राज्य अपने पुत्र सुपुत्र को सौंपकर अनेक राजाओं के साथ संयम धारण किया। तप और साधना से उन्होंने तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया और समाधिमरण के बाद अच्युत स्वर्ग में इन्द्र हुए। वहाँ दिव्य सुख भोगकर वे भरत क्षेत्र के सिंहपुर नगर में राजा विष्णु और रानी सुनन्दा के यहाँ गर्भ में अवतीर्ण हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और देवों ने गर्भ कल्याणक का उत्सव मनाया।
श्लोक 23 से 31 : भगवान् श्रेयांसनाथ का जन्म महोत्सव
फाल्गुन कृष्ण एकादशी को भगवान् श्रेयांसनाथ का जन्म हुआ। उनके जन्म से समस्त संसार में हर्ष और शान्ति फैल गई। रोगी निरोग हो गये, दुखी प्रसन्न हो गये और धर्म की भावना जागृत हुई। देवों ने आकर दुन्दुभियाँ बजाईं, पुष्पवृष्टि की और सौधर्मेन्द्र ने सुमेरु पर्वत पर भगवान् का जन्माभिषेक कर उनका “श्रेयांस” नाम रखा।
श्लोक 32 से 41 : कुमारकाल और आदर्श राज्य
भगवान् श्रेयांसनाथ के शरीर और गुण क्रमशः बढ़ते गये। उनकी आयु चौरासी लाख वर्ष और शरीर अस्सी धनुष ऊँचा था। युवावस्था पूर्ण होने पर उन्होंने राज्य संभाला। वे चन्द्रमा के समान प्रजा को शीतलता देने वाले और धर्ममय जीवन जीने वाले आदर्श सम्राट थे। उन्हें अर्थ की चिन्ता नहीं थी, क्योंकि पूर्व जन्म के पुण्यों से सभी सम्पत्तियाँ स्वतः प्राप्त थीं।
श्लोक 42 से 52 : वैराग्य, दीक्षा और केवलज्ञान
वसन्त ऋतु के परिवर्तन को देखकर भगवान् श्रेयांसनाथ को संसार की अनित्यता का बोध हुआ। उन्होंने विचार किया कि मोक्ष प्राप्त किये बिना स्थायी सुख सम्भव नहीं है। उसी समय लौकान्तिक देवों ने आकर उनकी स्तुति की। उन्होंने पुत्र को राज्य देकर मनोहर उद्यान में एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण की और मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया। कठोर तप के बाद तुम्बुर वृक्ष के नीचे उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ।
श्लोक 53 से 62 : विशाल धर्मसंघ और मोक्ष
देवों ने भगवान् के केवलज्ञान कल्याणक की पूजा की। उनके विशाल संघ में गणधर, पूर्वधारी, केवलज्ञानी, अवधिज्ञानी, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ बड़ी संख्या में थीं। धर्मोपदेश देते हुए वे सम्मेदशिखर पहुँचे। वहाँ एक माह तक योगनिरोध कर श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन उन्होंने समस्त कर्मों का नाश कर सिद्धपद प्राप्त किया।
श्लोक 63 से 72 : भगवान् की स्तुति और विश्वनन्दी का प्रारम्भिक चरित्र
देवों ने भगवान् श्रेयांसनाथ का निर्वाण कल्याणक मनाया। उनकी स्तुति करते हुए कहा गया कि उनका ज्ञान अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश करने वाला है। इसके बाद प्रथम नारायण के चरित्र का वर्णन आरम्भ होता है। मगध देश के राजगृह नगर में विश्वभूति राजा राज्य करते थे। उनके पुत्र विश्वनन्दी और छोटे भाई विशाखभूति के पुत्र विशाखनन्दी थे।
श्लोक 73 से 81 : वैराग्य और मुनि दीक्षा
विश्वभूति ने राज्य त्यागकर तप स्वीकार किया और विशाखभूति राजा बने। विशाखनन्दी ने विश्वनन्दी के प्रिय नन्दन वन पर अधिकार कर लिया, जिससे दोनों में युद्ध हुआ। विशाखनन्दी के पराजित होकर भागने पर विश्वनन्दी को वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने सम्भूत गुरु के पास दीक्षा ग्रहण कर तपस्या प्रारम्भ की। बाद में मथुरा में विशाखनन्दी ने उनका उपहास किया, जिससे उनके मन में शल्य उत्पन्न हुई।
श्लोक 82 से 91 : त्रिपृष्ठ, विजय और अश्वग्रीव का जन्म
विश्वनन्दी मृत्यु के बाद महाशुक्र स्वर्ग में देव हुए और फिर पोदनपुर में त्रिपृष्ठ नारायण के रूप में जन्मे। विशाखभूति भी उसी स्वर्ग से च्युत होकर विजय बलभद्र बने। विशाखनन्दी अनेक भवों में भटककर अश्वग्रीव प्रतिनारायण हुआ। विजय और त्रिपृष्ठ दोनों अत्यन्त प्रभावशाली और विशाल साम्राज्य के स्वामी बने। उन्होंने अश्वग्रीव को पराजित कर तीन खण्डों वाली पृथ्वी पर शासन किया।
श्लोक 92 से 100 : कर्मफल और तीनों का अन्त
त्रिपृष्ठ नारायण के पास सात दिव्य रत्न थे और विजय बलभद्र के पास चार रत्न थे। त्रिपृष्ठ अत्यधिक परिग्रह और विषय-भोगों में आसक्त रहा, जिसके फलस्वरूप वह सातवें नरक में गया। अश्वग्रीव भी अधोगति को प्राप्त हुआ। दूसरी ओर विजय बलभद्र ने वैराग्य लेकर संयम धारण किया, अनगार केवली बने और मोक्ष प्राप्त किया। अंत में कवि ने निष्कर्ष दिया कि दुष्ट कर्म के रहते संसार में स्थायी सुख सम्भव नहीं है; इसलिए मोक्षमार्ग ही वास्तविक कल्याण का मार्ग है।
पर्व 58
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