नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 244 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 312 to 321
श्लोक ( Shlok ) 312
वसुदेवकुमारोऽपि निजनामाक्षराङ्कितम् । प्रजिघाय शरं सद्यः समुद्रविजयं प्रति ॥ ३१२ ॥
कुमार वसुदेवने भी अपने नामके अक्षरोंसे चिह्नित एक बाण शीघ्र ही समुद्रविजयकी ओर छोड़ा ॥ ३१२ ॥
Prince Vasudeva also quickly unleashed an arrow, inscribed with the letters of his own name, toward Samudravijaya. || 312 ||
श्लोक ( Shlok ) 313 – 314
नामाक्षराणि तस्यासौ वाचयित्वा सविस्मयः । वसुदेवकुमारोऽत्र पुण्यात्सम्भावितो मया ॥ ३१३॥ इति तुष्ट्वा निवार्य द्राक्संग्रामं समुपागमत् । सहानुजैः कनीयांसमनुजं जितमन्मथम् ॥ ३१४ ॥
वाण पर लिखे हुए नामाक्षरोंको बाँचकर समुद्र-विजय आश्चर्यसे चकित हो गये, वे कहने लगे – अहो पुण्योदयसे मुझे वसुदेव मिल गया। उन्होंने सन्तुष्ट होकर शीघ्र ही संग्राम बन्द कर दिया और अपने अन्य छोटे भाइयोंको साथ लेकर वे कामदेवको जीतनेवाले लघु भाई वसुदेवसे मिलनेके लिए गये ॥ ३१३-३१४ ॥
Reading the letters of the name inscribed upon the arrow, Samudravijaya was struck with absolute amazement. He exclaimed, “Ah! By the rise of good fortune (Punya), I have found Vasudeva!” Deeply gratified, he immediately brought the battle to a halt and, taking his other younger brothers along, went to meet his youngest brother Vasudeva, who surpassed even Kamadeva (the god of love) in beauty. || 313-314 ||
श्लोक ( Shlok ) 315
समुद्रविजयाधीशं वसुदेवः कृताञ्जलिः । प्रणम्य प्रीणयामास शेषानपि निजाग्रजान् ॥ ३१५ ॥
हाथ जोड़े हुए कुमार वसुदेवने महाराज समुद्रविजयको प्रणाम कर प्रसन्न किया। तदनन्तर अपने अन्य बड़े भाइयोंको भी प्रणामके द्वारा प्रसन्न बनाया ।। ३१५ ।।
With folded hands, Prince Vasudeva paid his respects and prostrated before King Samudravijaya, filling him with joy. Thereafter, through his reverent salutations, he gladdened the hearts of his other elder brothers as well. || 315 ||
श्लोक ( Shlok ) 316 – 317
भुखेचराः कुमारेण तदा सर्वे निजात्मजाः । परिणीताः पुरानीय समुदः समजीगमन् ॥ ३१६ ॥ कुमारेण समं गत्वा स्वपुरं विहितोत्सवम् । दशार्हाः स्वेप्सितं सौख्यमन्वभूवन्ननारतम् ॥ ३१७ ॥
कुमारके द्वारा पहले विवाही हुई अपनी-अपनी पुत्रियोंको भूमिगोचरी और विद्याधर राजा बड़े हर्षसे ले आये और उन्हें कुमारके साथ मिला दिया। समुद्रविजय आदिने कुमार वसुदेवको साथ लेकर उत्सवोंसे भरे हुए अपने नगरमें प्रवेश किया और वहाँ वे सब निरन्तर इच्छानुसार सुख भोगते हुए रहने लगे ।। ३१६-३१७ ॥
With great joy, the earth-dwelling (Bhumigochari) and sky-dwelling (Vidyadhara) kings brought forward their respective daughters who had been previously wedded to the prince, and reunited them with him. Accompanied by Prince Vasudeva, Samudravijaya and the other kings entered their own city, which was filled with grand festivities, and there they all began to reside, continuously enjoying pleasures according to their hearts’ desires. || 316-317 ||
श्लोक ( Shlok ) 318 – 319
एवं काले प्रयात्येषां श्लाध्यैर्भोगैरभङ्गुरैः । महाशुक्रात्समुत्तीर्य शङ्खाख्यः प्राक्तनो मुनिः ॥ ३१८ ॥ रोहिण्याः पुण्यभाक्पद्मनामासौ समजायत । प्रतोषं बन्धुवर्गेषु वर्धयन्नवमो बलः ॥ ३१९ ॥
इस प्रकार इन सबका समय अविनाशी तथा प्रशंसनीय भोगोंके द्वारा सुखसे व्यतीत हो रहा था। कुछ समय बाद जिनका वर्णन पहले आ चुका है ऐसे शङ्खद्ध नामके मुनिराजका जीव महाशुक्र स्वर्गसे चय कर वसुदेवकी रोहिणी नामक स्त्रीके पद्म नामका पुण्यशाली पुत्र उत्पन्न हुआ। वह अपने भाइयोंमें आनन्दको बढ़ाता हुआ नौवाँ बलभद्र होगा ॥ ३१८-३१९ ॥
In this manner, the time of all these individuals passed happily through imperishable and highly praiseworthy worldly enjoyments. After some time, the soul of the royal monk named Shankhadha—whose description has appeared previously—descended from the Mahashukra heaven and was born to Vasudeva’s wife, Rohini, as an exceptionally meritorious son named Padma. Bringing ever-increasing joy to his brothers, he is destined to become the ninth Balabhadra. || 318-319 ||
श्लोक ( Shlok ) 320
सप्रतापा प्रभेवाभात्सौरी धीरस्य निर्मला । ‘शरदा प्राप्य संस्कारं श्रुत्या पद्मोद्भवावहा ॥ ३२० ॥
उसकी निर्मल बुद्धि सूर्यकी प्रभाके समान प्रताप युक्त थी। जिस प्रकार शरद् ऋतुका संस्कार पाकर सूर्यकी प्रभा पद्म अर्थात् कमलोंके विकासको बढ़ाने लगती है उसी प्रकार उसकी बुद्धि शास्त्रोंका संस्कार पाकर पद्मा अर्थात् लक्ष्मीकी उत्पत्तिको बढ़ाने लगी थी ।। ३२० ॥
His flawless intellect possessed a radiant majesty resembling the brilliance of the sun. Just as the sun’s rays, refined by the autumn season, begin to unfold and flourish the Padma (lotus flowers), so too did his intellect, refined by the sacred scriptures, begin to unfold and flourish Padma (the wealth of Goddess Lakshmi). || 320 ||
श्लोक ( Shlok ) 321
दुर्वारो दुष्टविध्वंसी विशिष्टप्रतिपालकः । तत्प्रतापः कथं सौरमपि सारं न लङ्घते ॥ ३२१ ॥
उसका प्रताप दुर्वार था, दुष्टोंको नष्ट करनेवाला था और विशिष्ट-पुरुषोंका पालन करनेवाला था फिर भला वह सूर्यके सारभूत तेजका उल्लङ्घन क्यों नहीं करता ? ।। ३२१ ।।
His majesty was irresistible, a destroyer of the wicked and a protector of virtuous men; why then, indeed, would he not eclipse the very essence of the sun’s radiant energy? || 321 ||
श्लोक 322 से 331
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