राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 222 to 235
श्लोक ( Shlok ) 222 – 224
तद्व्ययात्पालयाम्येतान् गुणप्राणान्न जीविकाम् । मूर्तिविंनश्वरी यातु विनाशमविनश्वरम् ॥ २२२ ॥विनश्यति न मे शीलं कुलशैलानुकारि तत् । इति प्रत्युत्तरं दत्वा गृहीत्वा सा व्रतं तदा ॥ २२३॥वदिष्यामि न भोक्ष्ये च यावन्न श्रूयते मया । रामस्य क्षेमवार्तेति मनसालोच्य सुव्रता ॥ २२४ ॥
मैं प्राण देकर अपने इन गुणरूपी प्राणोंकी रक्षा करूँगी जीवनकी नहीं। यह नश्वर शरीर भले ही नष्ट हो जावे परन्तु कुला-चलोंका अनुकरण करनेवाला मेरा शील कभी नष्ट नहीं हो सकता’। इस प्रकार प्रत्युत्तर देकर उत्तम शील व्रतको धारण करनेवाली सीताने मनसे विचार किया और यह नियम ले लिया कि जबतक रामचन्द्रजीकी कुशलताका समाचार नहीं सुन लूँगी तबतक न बोलूँगी और न भोजन ही करूँगी ।। २२२-२२४ ।।
“‘I shall readily surrender my physical breath to safeguard these virtues, which are my true life-force; I care nothing for the survival of this flesh. Let this ephemeral body perish if it must, but my virtue (Sheel)—which stands as unyielding as the primordial, axial mountains (Kula-achalas)—shall never be shattered.’ Having delivered this defiant reply, Sita, the steadfast bearer of the highest vows of virtue, reflected deeply within her mind and took a solemn vow: ‘Until I receive tidings of the safety and well-being of Ramachandra, I shall neither speak a single word nor partake of any food.'” (222-224)
श्लोक ( Shlok ) 225
अवबोधितवैधव्यविरुद्धस्वल्पभूषणा । यथार्थ चिन्तयन्त्यास्त सन्ततं संसृतेः स्थितिम् ॥ २२५ ॥
वैधव्यपना प्रकट न हो इस विचारसे जिसने अपने शरीरपर थोड़ेसे ही आभूषण रख छोड़े थे बाकी सब दूरकर दिये थे ऐसी सीता वहाँ संसारकी दशाका विचार करती हुई रहनेलगी ।। २२५ ।।
“Anxious to ensure that no sign of widowhood should ever be cast upon her, Sita kept only a few essential ornaments upon her body and discarded all the rest. Thus stripped of luxury, she remained there, deeply contemplating the transient and unpredictable nature of existence (Samsara).” (225)
श्लोक ( Shlok ) 226
प्रादुरासंस्तदोत्पाता लङ्कायां किङ्करा इव । तद्ध्वंसिकालराजस्य समन्ताद्भयदायिनः ॥ २२६ ॥
उसी समय लङ्कामें उसे नष्ट करनेवाले यमराजके किकररीक समान भय उत्पन्न करन-वाले अनेक उत्पात सब ओर होने लगे ॥ २२६ ।।
“At that very moment, widespread and terrifying omens of imminent destruction began to manifest all across Lanka, looking for all the world like the fierce, dread-inducing emissaries (Kinkaras) of Yamaraja, the Lord of Death, arriving to annihilate the realm.” (226)
श्लोक ( Shlok ) 227 – 228
उत्पन्नमायुधागारे चक्रं वा कालचक्रवत् । यज्ञशालाप्रबद्धस्य वस्तकस्यैव शाड्वलम् ॥ २२७ ॥ तदुत्पत्तिफलस्यास्या नवबोद्धः खगेशिनः । ज्वलदारं महाचक्रं महातोषमजीजनत् ॥ २२८ ॥
जिस प्रकार यज्ञशालामें बँधे हुए बकराके समीप हरी घास उत्पन्न हो उसी प्रकार रावणकी आयुधशालामें कालचक्रके समान चक्ररत्न प्रकट हुआ । विद्याधरोंका राजा रावण उसके उत्पन्न होनेका फल नहीं जानता था- उसे यह नहीं मालूम था कि इससे हमारा ही घात होगा अतः जिसके अरोंका समूह देदीप्यमान हो रहा है ऐसे उस महाचक्रने उसे बहुत भारी सन्तोष उत्पन्न किया ।। २२७-२२८ ।।
“Just as fresh green grass might sprout right beside a sacrificial goat bound within a slaughter-hall, a magnificent Wheel-Jewel (Chakra-Ratna)—resembling the cosmic wheel of time and death—suddenly manifested inside Ravana’s armory. Ravana, the king of the Vidyadharas, remained entirely blind to the true consequence of its appearance; he did not realize that this very weapon would bring about his own slaughter. Consequently, beholding that grand weapon whose cluster of spokes blazed with brilliant radiance, his heart was filled with immense pride and satisfaction.” (227-228)
श्लोक ( Shlok ) 229 – 235
रामो नाम बलो भावी लक्ष्मणोऽप्यनुजातवान् । तस्य रूढप्रतापौ तौ द्वाप्यभिमुखोदयौ ॥ २२९ ॥सीता शीलवती नेयं जीवन्ती ते भविष्यति । अभिभूतिः सशीलानामत्रैव फलदायिनी ॥ २३० ॥ उत्पाताश्च पुरेऽभूवन् बहवोऽशुभसूचकाः । लोकद्वयाहितं वाढमयशश्च युगावधि ॥ २३१ ॥ मुच्यतां मंक्ष्वियं यावन्न चेदं रुढिमृच्छति । इति युक्तिमतीं वाणीमुक्तो मन्त्र्यादिभिस्तदा ॥ २३२ ॥ प्रत्यभाषत लङ्केशो यूयं युक्तिविरोधि किम् । अस्मृत्या वदतैवं च प्रत्यक्षे का विचारणा ॥ २३३ ॥ चक्ररनं समुत्पन्नं सीतापहरणेन मे । षट्खण्डार्धाधिपत्यं च तेन चिन्त्यं करस्थितम् ॥ २३४ ॥ स्वयं गृहागतां लक्ष्मीं हन्यात्पादेन को विधीः । इति तद्भाषितं श्रुत्वा व्यरमन् हितवादिनः ॥ २३५ ॥
तदनन्तर मन्त्रियोंने उसे समझाया कि ‘रामचन्द्र होनहार बलभद्र हैं, और उनका छोटा भाई लक्ष्मण नारायण होनेवाला है। इस समय उन दोनोंका प्रताप बढ़ रहा हैं और दोनों ही महान् अभ्युदयके सन्मुख हैं। सीता शीलवती स्त्री है, यह जीते जी तुम्हारी नहीं होगी। शीलवान् पुरुषका -तिरस्कार इसी लोकमें फल दे देता है। इसके सिवाय नगरमें अशुभकी सूचना देनेवाले बहुत भारी उत्पात भी हो रहे हैं इसलिए दोनों लोकोंमें अहित करने एवं युगान्ततक अपयश बढ़ानेवाले इस कुकार्यको उसके पहले ही शीघ्र छोड़ दो जबतक कि यह बात सर्वत्र प्रसिद्धिको प्राप्त होती है’। इस प्रकार मन्त्रियोंने युक्तिसे भरे वचन रावणसे कहे। रावण प्रत्युत्तरमें कहने लगा कि ‘इस तरह आप लोग बिना कुछ सोचे-विचारे ही युक्ति-विरुद्ध वचन क्यों कहते हैं ? अरे, प्रत्यक्ष वस्तुमें विचार करनेकी क्या आवश्यकता है? देखो, सीताका अपहरण करनेसे ही मेरे चक्ररत्न प्रकट हुआ है, इसलिए अब तीन खण्डका आधिपत्य मेरे हाथमें ही आगया यह सोचना चाहिये। ऐसा कौन मूर्ख होगा जो घरपर आई हुई लक्ष्मीको पैरसे ठुकरावेगा’। इस प्रकार रावणका उत्तर सुनकर हितका उपदेश देनेवाले सब मन्त्री चुप हो गये ।। २२९-२३५ ।।
“Thereafter, the ministers counselled him, saying, ‘Ramachandra is the destined Balabhadra, and his younger brother Lakshmana is bound to become the Narayana. At this very moment, their glory and prowess are ascending, and both are moving toward a magnificent, unhindered rise. Sita is a woman of spotless virtue (Sheelvati); she will never be yours as long as she breathes. Bringing humiliation upon the virtuous yields its bitter fruit in this very lifetime. Moreover, terrifying omens of ruin are manifesting all across our city. Therefore, abandon this evil deed immediately—before the news spreads far and wide—for it will bring you ruin in both worlds and leave a stain of infamy upon your name until the end of the cosmic age (Yuganta).’
Thus did the ministers address Ravana with words filled with logic and righteousness. In response, Ravana said, ‘Why do you all speak such irrational words without any careful deliberation? Tell me, what need is there to ponder over something that is physically manifest before our eyes? Behold! It is precisely because I abducted Sita that the supreme Wheel-Jewel (Chakra-Ratna) has manifested in my armory. Hence, you must realize that the absolute sovereignty over the three realms (Three Khandas) is now securely in my grasp. What fool would kick away Goddess Fortune (Laxmi) when she arrives at his very doorstep?’ Hearing this obstinate reply from Ravana, all the well-wishing ministers fell silent.” (229-235)
श्लोक 236 से 252
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