अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 263 to 301
श्लोक ( Shlok ) 293
भवद्भाषाबृहनावा रत्नत्रयमहाधनाः । स्वस्थानं जन्मवाराशेरवापन्सुखसाधनम् ॥२९३॥
रत्नत्रय रूपी महाधनको धारण करनेवाले पुरुष आपकी दिव्यध्वनि रूपी बड़ी भारी नावके द्वारा ही इस संसार-रूपी समुद्रसे निकल कर सुख देने वाले अपने स्थानको प्राप्त करते हैं ॥ २९३ ॥
“Only by means of the great vessel of Your divine voice (Divyadhvani) do those individuals who possess the supreme wealth of the Three Jewels (Ratnatraya) cross over this ocean of worldly existence (Samsara) and attain their own bliss-giving abode.” [293]
श्लोक ( Shlok ) 294
इति तं च ततो देवो वाचा प्रोवाच दिव्यया । सन्तर्प्यन्ते यया भव्याः प्राच्या वृष्ठ्येव चातकाः ॥२९४॥
ऐसा विद्याधरों-के राजाने भगवान से पूछा । तदनन्तर भगवान् दिव्यध्वनिके द्वारा कहने लगे सो ठीक ही है क्योंकि जिस प्रकार पूर्व वृष्टिके द्वारा चातक पक्षी संतोषको प्राप्त होते हैं उसी प्रकार भव्य जीव दिव्यध्वनि-के द्वारा संतोषको प्राप्त होते हैं ।॥ २९४ ॥
Thus did the king of the Vidyadharas inquire of the Lord. Thereafter, the Lord began to speak through His divine voice (Divyadhvani); and rightly so, for just as the Chataka birds find utter contentment through the rainfall of the eastern clouds, so too do the liberated-capable souls (Bhavya Jivas) find perfect contentment through the divine voice. [294]
श्लोक ( Shlok ) 295
शृणु भव्य भवस्यास्य कारणं कर्म कर्मणः । हेतवो हे खगाधीश मिथ्यात्वासंयमादयः ॥ २९५ ॥
हे विद्याधर भव्य ! सुन, इस संसारके कारण कर्म हैं और कर्मके कारण मिथ्यात्व असंयम आदि हैं ।॥ २९५ ॥
“O Bhavya Vidyadhara! Listen, the cause of this worldly existence (Samsara) is karma, and the causes of karma are wrong belief (Mithyatva), lack of self-restraint (Asamyama), and the like.” [295]
श्लोक ( Shlok ) 296
मिथ्यात्वोदयसम्भूतपरिणामो विपर्ययम् । ज्ञानस्य जनयन् विद्धि मिथ्यात्वं बन्धकारणम् ॥ २९६ ॥
मिथ्यात्व कर्मके उदयसे उत्पन्न हुआ जो परिणाम ज्ञानको भी विपरीत कर देता है उसे मिथ्यात्व जानो । यह मिथ्यात्व बन्धका कारण है ॥ २९६ ॥
“Know that Mithyatva (wrong belief) is the disposition arising from the fruition (udaya) of the Mithyatva karma, which distorts even right knowledge into misconception. This Mithyatva is the primary cause of karmic bondage (bandha).” [296]
श्लोक ( Shlok ) 297
अज्ञान संशयैकान्तविपरीतविकल्पनम् । विनयैकान्तजं चेति तज्ज्ञस्तत्पञ्चधा मतम् ॥ २९७ ॥
अज्ञान, संशय, एकान्त, विपरीत और विनयके भेदसे ज्ञानी पुरुष उस मिथ्यात्व को पांच प्रकारका मानते हैं ।॥ २९७॥
“The wise sages consider that Mithyatva (wrong belief) to be of five types, categorized by its variants: ignorance (Ajnana), doubt (Samshaya), absolutism (Ekanta), perversion (Viparita), and indiscriminate reverence (Vinaya).” [297]
श्लोक ( Shlok ) 298
पापधर्माभिधानावबोधदूरेषु जन्तुषु । मिथ्यात्वोदयपर्यायो मिथ्यात्वं स्यात्तदादिमम् ॥ २९८ ॥
पाप और धर्मके नामसे दूर रहनेवाले जीवोंके मिथ्यात्व कर्मके उदय-से जो परिणाम होता है वह अज्ञान मिथ्यात्व है ।॥ २९८ ॥
“The disposition that arises due to the fruition (udaya) of Mithyatva karma in living beings who remain completely aloof from the concepts of sin (Papa) and righteousness (Dharma) is known as Ajnana Mithyatva (ignorance-based wrong belief).” [298]
श्लोक ( Shlok ) 299
‘आप्तागमादिनानात्वात्तत्त्वे दोलायमानता । येन संशयमिथ्यात्वं तद्विद्धि बुधसत्तम ॥ २९९ ॥
आप्त तथा आगम आदिके नाना होने के कारण जिसके उदयसे तत्त्वके स्वरूपमें दोलायमानता – चञ्चलता बनी रहती है उसे हे श्रेष्ठ विद्वान् ! तुम संशय मिथ्यात्व जानो ॥ २९९ ॥
“O excellent scholar! Know that to be Samshaya Mithyatva (doubt-based wrong belief) due to the fruition of which there remains a constant wavering and instability regarding the true nature of reality (Tattva), caused by the existence of a multiplicity of conflicting teachers (Apta) and scriptures (Agama).” [299]
श्लोक ( Shlok ) 300
द्रव्यपर्यायरूपेऽर्थे अङ्गङ्गे चाक्षयसाधने । तत्स्यादेकान्तमिथ्यात्वं येनैकान्तावधारणम् ॥ ३०० ॥
द्रव्य पर्यायरूप पदार्थमें अथवा मोक्षका साधन जो सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र है उसमें किसी एकका ही एकान्त रूपसे निश्चय करना एकान्त मिध्यादर्शन है ॥ ३०० ॥
“To single-mindedly and absolutely assert only one aspect of a reality that is inherently composed of both substance (Dravya) and modification (Paryaya), or to dogmatically insist upon only one of the constituents among Right Faith (Samyagdarshana), Right Knowledge (Samyagjnana), and Right Conduct (Samyak-charitra) as the sole means to liberation, is known as Ekanta Mithyadarshana (absolutist wrong belief).” [300]
श्लोक ( Shlok ) 301
यो ज्ञानज्ञायकज्ञेययाथात्म्ये निर्णयोऽन्यथा । स येनात्मनि तद्विद्धि मिथ्यात्वं विपरीतजम् ॥ ३०१ ॥
आत्मामें जिसका उदय रहते हुए ज्ञान ज्ञायक और ज्ञेयके यथार्थ स्वरूपका विपरीत निर्णय होता है उसे विपरीत मिथ्या दर्शन जानो ॥ ३०१ ॥
“Know that to be Viparita Mithyadarshana (perverted wrong belief), during the operation (udaya) of which within the soul, one arrives at a distorted and contrary conclusion regarding the true, intrinsic nature of the knower (jnayaka), the knowledge (jnana), and the object of knowledge (jneya).” [301]
श्लोक 302 से 311
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