शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162 – 163
तस्मिन्नेव पुरे शक्तिवरशब्दादिसेनयोः । मेषावभूतां तौ राजपुत्रयोर्वज्रमस्तकौ ॥ १६२॥युद्ध्वाऽन्योन्यं गतप्राणौ सञ्जातौ कुक्कुटाविमौ । स्वविद्याध्यासितावेतौ गूढौ योधयतः खगौ ॥ १६३॥
अबकी वार वे दोनों उसी अयोध्या नगरमें शक्तीवर-सेन और शब्दवरसेन नामक राजपुत्रोंके मेढा हुए। उनके मस्तक वज्रके समान मजबूत थे । मेढ़े भी परस्परमें लड़े और मर कर ये मुर्गे हुए हैं। अपनी अपनी विद्याओंसे युक्त हए दो विद्याधर छिप कर इन्हें लड़ा रहे हैं ।। १६२ – १६३ ॥
“This time, they were reborn in that very city of Ayodhya as the rams of the princes Shaktivar-sena and Shabdavar-sena. Their foreheads were as strong as thunderbolts (vajra). Those rams also fought each other to the death, and after dying, they have now become these roosters. Furthermore, two Vidyadharas (celestial/magical beings), utilizing their respective mystical arts, are hiding and making them fight.” [162-163]
श्लोक ( Shlok ) 164 – 166
कारणं किं तयोः कौ च तौ चेच्छृणु महीपते । जम्बूपलक्षिते द्वीपे भरते खचराचले ॥ १६४॥पुरेऽभूदुत्तरश्रेण्यां कनकादिनि भूपतिः । खगो गरुडवेगाख्यो टतिषेणास्य वल्लभा ॥ १६५॥तिलकान्तदिविश्चन्द्र तिलकश्च सुतौ तयोः । सिद्धकूटे समासीनं चारणद्वन्द्वमाश्रितौ ॥१६६॥
उन विद्याधरोंके लड़ानेका कारण क्या है ? और वे कौन हैं ? हे राजन्, यदि यह आप जानना चाहते हैं तो सुनें। इसी जम्बूद्वीप सम्बन्धी भरतक्षेत्रके विजयार्ध पर्वतकी उत्त्तर श्रेणी पर एक कनकपुर नामका नगर है। उसमें गरुडवेग नामका राजा राज्य करता था। धृतिषेणा उसकी स्त्रीका नाम था। उन दोनोंके दिवितिलक और चन्द्रतिलक नामके दो पुत्र थे। एक दिन ये दोनों ही पुत्र सिद्धकूट पर विराजमान चारणयुगलके पास पहुँचे ।। १६४-१६६ ।।
“What is the reason behind those Vidyadharas making them fight? And who are they? O King, if you wish to know this, then listen. On the northern range of the Vijayardha Mountain within the Bharata-kshetra of this very Jambudvipa, lies a city named Kanakapura. A king named Garudavega ruled there, and Dhritishena was the name of his queen. They had two sons named Divitilaka and Chandratilaka. One day, both of these princes arrived in the presence of a pair of Charana ascetics who were seated majestically on the Siddhakuta mountain.” [164-166]
श्लोक ( Shlok ) 167
स्तुत्वा स्वजन्मसम्बन्धं सप्रश्रयमपृच्छताम् । ज्येष्ठो मुनिस्तयोरेवं तत्प्रपञ्चमभाषत ॥१६७॥
और स्तुति कर बड़ी विनयके साथ अपने पूर्वभवके सम्बन्ध पूछने लगे। उनमें जो बड़े मुनि थे वे इस प्रकार विस्तारसे कहने लगे ।। १६७ ।।
“And after offering their praises, they began to ask about the connections of their past lives with great humility. Out of the two, the elder monk began to narrate the details in this expansive manner:” [167]
श्लोक ( Shlok ) 168 – 170
धातकीखण्डप्राग्भाने पुरमैरावते भुवि । तिलकाख्यं पतिस्तस्य बभूवाभयघोषवाक् ॥१६८॥सुवर्णतिलका तस्य देवी जातौ सुतौ तयोः । विजयोऽन्यो जयन्तश्च सम्पन्ननयविक्रमौ ॥१६९॥खगाद्रिदक्षिणश्रेणीमन्दाराख्यपुरेशिनः । शङ्खस्य जयदेव्याश्च पृथिवीतिलका सुता ॥ १७७॥
धातकीखण्ड द्वीपके पूर्व भागमें जो ऐरावत क्षेत्र है उसकी भूमिपर एक तिलक नामका नगर है। उसके स्वामीका नाम अभयघोष था और उनकी स्त्रीका नाम सुवर्णतिलक था। उन दोनों-के विजय और जयन्त नामके दो पुत्र थे। वे दोनों ही पुत्र नीति और पराक्रमसे सम्पन्न थे। इसी क्षेत्रके विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमें स्थित मन्दारनगरके राजा शङ्ख और उनकी रानी जयदेवीके पृथिवीतिलका नामकी पुत्री थी ।। १६८-१७० ॥
“In the eastern part of the Dhatakikhanda island, upon the land of the Airavata region, lies a city named Tilaka. Its ruler’s name was Abhayaghosha, and his wife’s name was Suvarnatilaka. They had two sons named Vijaya and Jayanta, both of whom were endowed with exceptional morality (neeti) and valor (parakram).
Now, on the southern range of the Vijayardha Mountain within this very same region, lies the city of Mandaranagara. Its king, Shankha, and his queen, Jayadevi, had a daughter named Prithivitilaka.” [168-170]
श्लोक ( Shlok ) 171
तस्य त्वभयघोषस्य साऽभवत्प्राणवल्लभा । ‘एकं संवत्सरं तस्यामेवासक्तेऽन्यदा विभौ ॥१७१॥
वह राजा अभयघोषकी प्राणवल्लभा हुई थी। राजा अभयघोष उसमें आसक्त होनेसे एक वर्ष तक उसीके यहाँ रहे आये ।। १७१ ।।
“She became the beloved of King Abhayaghosha’s life. Being deeply infatuated with her, King Abhayaghosha went to stay at her palace for an entire year.” [171]
श्लोक 172 से 182
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