नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 84 to 94
श्लोक ( Shlok ) 84 – 85
तत्पुराधीश्वरे चन्द्रकीर्तिनाममहीभुजि । विपुत्रे मरणं प्राप्ते राज्यसन्ततिसंस्थितेः ॥ ८४ ॥ सपुण्यं योग्यमन्वेष्टुं वारणं शुभलक्षणम् । गन्धादिभिः समभ्यर्थ्यांमुञ्चत्सन्मन्त्रिमण्डलम् ॥ ८५ ॥
दैव योगसे उसी समय चम्पापुरका राजा चन्द्रकीर्ति बिना पुत्र के मर गया इसलिए राज्यकी परम्परा ठीक ठीक चलानेके लिए सुयोग्य मन्त्रियोंने किसी योग्य पुण्यात्मा पुरुष ढूँढ़नेके अर्थ किसी शुभ लक्षणवाले हाथीको गन्ध आदिसे पूजा कर छोड़ा था ॥ ८४-८५ ॥
By a stroke of divine fate, at that very time, King Chandrakirti of Champapur passed away without an heir. Therefore, in order to properly maintain the royal lineage, the capable ministers—with the purpose of finding a worthy, meritorious soul—worshipped an auspiciously marked elephant with fragrances and other ceremonial offerings, and set it free. [84-85]
श्लोक ( Shlok ) 86
सोऽपि दिव्यो गजो गत्वा वनं पुण्यविपाकतः । तावुद्धत्य निजस्कन्धमारोप्य पुरमागमत् ॥ ८६ ॥
दिव्य हाथी भी वनमें गया और पुण्योदयसे उन दोनों- सिंहकेतु और विद्युन्मालाको अपने कंधे पर बैठा कर नगरमें वापिस आ गया ।॥ ८६ ॥
The divine elephant also entered the forest and, by the rise of their good fortune, placed both Singhaketu and Vidyunmala upon its shoulders and returned to the city. [86]
श्लोक ( Shlok ) 87
सिंहकेतोविधायाभिषेकं मन्त्र्यादयस्तदा । राज्यासनं समारोप्य बद्ध्वा पहं ‘ससम्मदाः ॥ ८७ ॥
प्रसन्नतासे भरे हुए मन्त्री आदिने सिंहकेतु अभिषेक किया, राज्यासन पर बैठाया और पट्ट बाँधा ।। ८७ ।।
Filled with immense joy, the ministers and other dignitaries performed the royal anointment (coronation) of Singhaketu, seated him upon the throne, and bound the royal turban (or diadem) upon his brow. [87]
श्लोक ( Shlok ) 88 – 89
त्वं कस्यात्रागतः कस्मादित्याहुः सोऽब्रवीदिदम् । प्रभब्जनः पिता माता मृकण्डू मण्डिता गुणैः ॥८८।हरिवंशामलव्योमसोमोऽहमिह केनचित् । सुरेणानीय मुक्तः सन् सह पल्ल्या वने स्थितः ॥ ८९ ॥
तदनन्तर उन लोगोंने पूछा आप किसके पुत्र हैं और यहाँ कहाँ से आये हैं? उत्तरमें सिंहकेतुने कहा कि ‘मेरे पिताका नाम प्रभञ्जन है और माताका नाम गुणोंसे मण्डित मृकण्डू है। मैं हरिवंश रूपी निर्मल आकाश चन्द्रमा हूं, कोई एक देव मुझे पत्नी सहित लाकर यहाँ वनमें छोड़ गया है, मैं अब तक वनमें स्थित था’ ।। ८८-८९ ॥
Thereafter, the people asked, “Whose son are you, and from where have you come here?” In response, Singhaketu said, “My father’s name is Prabhanjana, and my mother’s name is Mrikandu, who is adorned with all virtues. I am the moon in the unblemished sky of the Harivansh lineage. A certain deity brought me along with my wife and left us here in this forest, and I have remained in the forest until now.” [88-89]
श्लोक ( Shlok ) 90
इति तद्वचनं श्रुत्वा मृकण्ड्वास्तनयो यतः । मार्कण्डेयस्तु नाम्नैष इति ते तमुदाहरन् ॥ ९० ॥
सिंहकेतुके वचन सुनकर लोग चूंकि यह मृकण्डका पुत्र है इसलिए उस् माकण्डेय नाम रखकर उसी नामसे उसे पुकारने लगे ॥ ९० ॥
Upon hearing Singhaketu’s words, since he was the son of Mrikandu, the people named him Markandeya and began to call him by that very name. [90]
श्लोक ( Shlok ) 91 – 94
एष देवोपनीतं तद्राज्यं सुचिरमन्वभूत् । सन्ताने तस्य गिर्यन्तो हरिहिमगिरिः परः ॥ ९१ ॥तृतीयो वसुगिर्याख्यः परेऽपि बहवो गताः । तदा कुशार्थविषये तर्द्वशाम्बरभास्वतः ॥ ९२ ॥अवार्यनिजशौर्येण निर्जिताशेषविद्विषः । ख्यातशौर्यपुराधीशसूरसेनमहीपतेः ॥ ९३ ॥सुतस्य शूरवीरस्य धारिण्याश्च तनूद्भवौ । विख्यातोऽन्धकवृष्टिश्च पतिर्दृष्टिर्नरादिवाक् ॥ ९४ ॥
इस प्रकार वह माकण्डेय, दैवयोग से प्राप्त हुए राज्यका चिरकाल तक उपभोग करता रहा। उसीके सन्तानमें हरिगिरि, हिमगिरि तथा वसुगिरि आदि अनेक राजा हुए। उन्हीं में कुशार्थ देशके शौर्यपुर नगरका स्वामी राजा शूरसेन हुआ जो कि हरिवंश रूपी आकाशका सूर्य था और अपनी शूरवीरतासे जिसने समस्त शत्रुओंको जीत लिया था। राजा शूरसेनके वीर नामका एक पुत्र था उसकी स्त्रीका नाम धारिणी था। इन दोनोंके अन्धकवृष्टि और नरवृष्टि नामके दो पुत्र हुए ॥ ९१-९४ ॥
In this manner, that Markandeya enjoyed for a long time the kingdom obtained through divine destiny. In his lineage, there arose many kings, including Harigiri, Himagiri, and Vasugiri. Among them was King Shurasena, the lord of Shauryapur city in the Kushartha country, who was like the sun in the sky of the Harivansh lineage and who, by his valor, had conquered all his enemies. King Shurasena had a son named Vira, whose wife’s name was Dharini. To these two were born two sons named Andhakavrishti and Naravrishti. [91-94]
श्लोक 95 से 111
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