राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 662 से 672 | श्लोक 673 से 681 | श्लोक 682 से 691 | श्लोक 692 से 701 | श्लोक 702 से 711
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 712 to 721
श्लोक ( Shlok ) 712
तथा सीता महादेवी पृथिवीसुन्दरी युताः । देव्यः श्रुतवती क्षान्तिनिकटे तपसि स्थिताः ॥७१२॥
इसी प्रकार सीता महादेवी और पृथिवीसुन्दरी से सहित अनेक देवियोंने श्रुतवती आर्यिकाके समीप दीक्षा धारण कर ली ।। ७१२ ॥
“In the same manner, Empress Sita and Queen Prithivisundari, along with many other royal ladies, accepted the vows of ascetic renunciation (Diksha) under the guidance of the venerable nun Shrutavati Aryika.”712
श्लोक ( Shlok ) 713
तौ राजयुवराजौ च गृहीतश्रावकव्रतौ । जिनाङ्घ्रियुग्ममानम्य सम्यक् प्राविशर्ता पुरीम् ॥७१३॥
तदनन्तर जिन्होंने श्रावकके व्रत ग्रहण किये हैं ऐसे राजा तथा युवराज ने जिनेन्द्र भगवान्के चरण-युगलको अच्छी तरह नमस्कार कर नगरी में प्रवेश किया ।। ७१३ ॥
“Thereafter, those kings and crown princes who had accepted the vows of a lay follower (Shravaka) respectfully prostrated at the twin feet of Lord Jinendra and returned to the city.”713
श्लोक ( Shlok ) 714
मोक्षमार्गमनुष्ठाय यथाशक्ति यथाविधि । रामाणुमन्तौ सञ्जातौ श्रुतकेवलिनौ मुनी ॥७१४॥
रामचन्द्र और अणुमान् दोनों ही मुनि, शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक मोक्षमार्गका अनुष्ठान कर श्रुतकेवली हुए ॥ ७१४ ॥
“Both the ascetics, Ramachandra and Anuman (Hanuman), diligently practiced the rituals of the path to liberation (Mokshamarga) according to their capacity, and consequently became Shrutakevalis (scriptural omniscients).”714
श्लोक ( Shlok ) 715 – 716
जाताः शेषाश्च बुद्ध्यादिसप्तद्धर्याविष्कृतोदयाः । एवं छद्मस्थकालेऽस्य पञ्चाब्दोनचतुःशतेः ॥७१५॥व्यतीतवति सद्व्यानविशेषाद्धतघातिनः । रामस्य केवलज्ञानमुदपाद्यर्कबिम्बवत् ॥ ७१६ ॥
शेष बचे हुए मुनिराज भी बुद्धि आदि सात ऋद्धियोंके ऐश्वर्यको प्राप्त हुए । इस प्रकार जब छद्मस्थ अवस्थाके तीन सौ पंचानवे वर्ष बीत गये तब शुक्ल ध्यानके प्रभाव से घातिया कर्मोंका क्षय करनेवाले मुनिराज रामचन्द्रको सूर्य-विम्बके समान केवलज्ञान उत्पन्न हुआ ।। ७१५-७१६ ॥
“The remaining venerable monks also attained the spiritual majesty of the seven supernatural powers (Riddhis), including extraordinary intellect (Buddhi).”
“In this manner, when three hundred and ninety-five years of the non-omniscient state (Chhadmastha) had passed, the venerable monk Ramachandra destroyed his destructive karmas (Ghatiya Karmas) through the power of pure meditation (Shukla Dhyana), and infinite, supreme omniscience (Kevalajnana) dawned within him, radiant like the orb of the sun.”715 – 716
श्लोक ( Shlok ) 717
समुद्भ तैकछत्रादिप्रातिहार्यविभूषितः । असिञ्चद्भव्यसस्यानां वृष्टि धर्ममयीमसौ ॥ ७१७ ॥
प्रकट हुए एकछत्र आदि प्रातिहार्योंसे विभूषित हुए केवल रामचन्द्रजीने धर्ममयी वृष्टिके द्वारा भव्य-जीवरूपी धान्यके पौधोंको सींचा ॥ ७१७ ॥
“Adorned with the miraculously manifested divine splendors (Pratiharyas), including the single royal parasol (Ekachhatra), the Omniscient Lord Ramachandra nourished the crop-like souls of the spiritually fit beings (Bhavya-jivas) through the gentle rain of his sacred Dhamma.”717
श्लोक ( Shlok ) 718 – 720
एवं केवलबोधेन नीत्वा षट्शतवत्सरान् । फाल्गुने मासि पूर्वाह्ने शुक्लपक्षे चतुर्दशी ॥७१८॥ दिने सम्मेदगिर्यमे तृतीयं शुक्लमाश्रितः । योगत्रितयमारुध्य समुच्छिन्नक्रियाश्रयः ॥ ७१९ ॥ निःशेषन्यक्कृताधातिकर्मा सोऽणुमदादिभिः । शरीरत्रितयापायादवापत्पदमुत्तमम् ॥७२०॥
इस प्रकार केवलज्ञानके द्वारा उन्होंने छह सौ वर्ष बिताकर फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशीके दिन प्रातःकालके समय सम्मेदाचलकी शिखर पर तीसरा शुक्लध्यान धारण किया और तीनों योंगोंका निरोधकर समुच्छिन्नक्रियाप्रतिपाती नामक चौथे शुक्ल ध्यानके आश्रयसे समस्त अघातिया कर्मोंका क्षय किया। इस प्रकार औदारिक, तैजस और कार्मण इन तीन शरीरोंका नाश हो जानेसे उन्होंने अणुमान् आदिके साथ उन्नत पद-सिद्ध क्षेत्र प्राप्त किया ।। ७१८-७२० ।।
“In this manner, having spent six hundred years in the state of omniscience (Kevalajnana), on the morning of Phalguna Shukla Chaturdashi, He entered the third stage of pure meditation (Shukla Dhyana) on the summit of Mount Sammedachala.”
“By completely halting all three forms of activity (Yogas—mind, speech, and body) and taking refuge in the fourth stage of pure meditation, known as Samucchinna-kriya-nivritti, He utterly destroyed all remaining non-destructive karmas (Aghatiya Karmas).”
“Consequently, with the complete annihilation of the three bodies—the gross physical (Audarika), the luminous (Taijasa), the karmic (Karmana)—He, along with Anuman (Hanuman) and others, attained the supreme state of liberation (Siddha Kshetra).”718 – 720
श्लोक ( Shlok ) 721
विभीषणादयः केचित् प्रापन्ननुदिशं पुनः । रामचत्रयग्रदेव्याद्याः काश्चिदीयुरितोऽच्युतम् ॥७२१॥
विभीषण आदि कितने ही मुनि अनुदिशको प्राप्त हुए और रामचन्द्र तथा लक्ष्मणकी पट्टरानियाँ सीता तथा पृथिवीसुन्दरी आदि कितनी ही आर्यिकाएँ अच्युत स्वर्गमें उत्पन्न हुई ।। ७२१ ।।
“Many venerable monks, including Vibhishana, attained rebirth in the Anudisha celestial realms, while Empress Sita, Queen Prithivisundari, and many other Aryikas (nuns) were reborn in the Achyuta heaven.”721
श्लोक 722 से 732
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585 | श्लोक 586 से 594 | श्लोक 595 से 604 | श्लोक 605 से 622 | श्लोक 623 से 631 | श्लोक 632 से 641 | श्लोक 642 से 651 | श्लोक 652 से 661 | श्लोक 662 से 672 | श्लोक 673 से 681 | श्लोक 682 से 691 | श्लोक 692 से 701 | श्लोक 702 से 711
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