श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराणका वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41
English translation of Uttar Puran parv 57- shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
तथा शुभविनोदेषु देवैः पुण्यानुबन्धिषु । सम्पादितेषु कान्ताभिदिंनान्यारमतोऽगमन् ॥ ४२ ॥
देवोंके द्वारा किये हुए पुण्यानुबन्धी शुभ विनोदोंमें स्त्रियोंके साथ क्रीडा करते हुए उनके दिन व्यतीत हो रहे थे ।। ४२ ।।
“His days passed gracefully as He engaged in pastimes with His consorts, amidst the auspicious and virtuous amusements arranged by the celestial beings (Devas).”42
श्लोक ( Shlok ) 43 – 45
एवं पञ्चखपक्षाब्धिमितसंवत्सरावधौ । राज्यकालेऽयमन्येधुर्वसन्तपरिवर्तनम् ॥ ४३ ॥विलोक्य किल कालेन सर्व ग्रासीकृतं जगत् । सोऽपि कालो व्ययं याति क्षणादिपरिवर्तनैः ॥ ४४ ॥कस्यान्यस्य स्थिरीभावो विश्वमेतद्विनश्वरम् । शाश्वतं न पदं यावत् प्राप्यते सुस्थितिः कुतः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार बयालीस वर्ष तक उन्होंने राज्य किया। तदनन्तर किसी दिन वसन्त ऋतुका परिवर्तन देखकर वे विचार करने लगे कि जिस कालने इस समस्त संसारको ग्रस्त कर रक्खा है वह काल भी जब क्षण घड़ी घंटा आदिके परिवर्तनसे नष्ट होता जा रहा है तब अन्य किस पदार्थमें स्थिरता रह सकती है ? यथार्थमें यह समस्त संसार विनश्वर है, जब तक शाश्वत पद-अविनाशी मोक्ष पद नहीं प्राप्त कर लिया जाता है तब तक एक जगह सुखसे कैसे रहा जा सकता है ? ।। ४३-४५ ।।
“In this manner, He ruled the kingdom for forty-two lakh years. Then, one day, observing the changing of the spring season, He began to reflect: ‘When Time itself—which has consumed this entire world—is being steadily destroyed by the constant transition of moments, minutes, and hours, then what other object can possibly possess stability?
In reality, this entire universe is perishable. Until the eternal state—the indestructible state of Liberation (Moksha)—is attained, how can one truly remain in a state of lasting happiness?'”43 – 45
श्लोक ( Shlok ) 46 – 49
इति स चिन्तयन् लब्धस्तुतिः सारस्वतादिभिः । श्रेयस्करे समारोप्य सुते राज्यं सुराधिपैः ॥ ४६ ॥प्राप्य निष्क्रमणस्नानमारुह्य विमलप्रभाम् । शित्रिकां देवसंवाह्यां त्यक्ताहारो दिनद्वयम् ॥ ४७ ॥मनोहरमहोद्याने फाल्गुनैकादशीदिने । कृष्णपक्षे सहस्त्रेण पूर्वाले भूभुजां समम् ॥ ४८ ॥श्रवणे संयमं प्राप्य चतुर्थावगमेन सः । दिने द्वितीये सिद्धार्थनगरं भुक्तयेऽविशत् ॥ ४९ ॥
भगवान् ऐसा विचार कर ही रहे थे कि उसी समय सारस्वत आदि लौकान्तिक देवों-ने आकर उनकी स्तुति की। उन्होंने श्रेयस्कर पुत्रके लिए राज्य दिया, इन्द्रोंके द्वारा दीक्षा-कल्याणकके समय होनेवाला महाभिषेक प्राप्त किया और देवोंके द्वारा उठाई जानेके योग्य विमलप्रभा नामकी पालकी पर सवार होकर मनोहर नामक महान् उद्यानकी ओर प्रस्थान किया। वहाँ पहुँच कर उन्होंने दो दिनके लिए आहारका त्याग कर फाल्गुन कृष्ण एकादशीके दिन प्रातःकालके समय श्रवण नक्षत्रमें एक हजार राजाओंके साथ संयम धारण कर लिया। उसी समय उन्हें चौथा मनःपर्ययज्ञान उत्पन्न हो गया। दूसरे दिन उन्होंने भोजनके लिए सिद्धार्थ नगर में प्रवेश किया ॥ ४६-४९ ।।
“While the Lord was reflecting thus, the Laukantika gods (celestial beings from the edge of the universe), such as Saraswata and others, arrived and offered their praises. He then handed over the kingdom to his auspicious son and received the grand ceremonial bath (Mahabhisheka) performed by the Indras during the Diksha-Kalyanak.
He ascended the ‘Vimalaprabha’ palanquin, which was worthy of being carried by the gods, and set out toward the great ‘Manohara’ garden. Upon arriving there, He renounced all food for two days and, on the morning of the eleventh day of the dark fortnight of the month of Phalguna (Phalguna Krishna Ekadashi), under the Shravana constellation, He embraced asceticism (Sanyama) along with one thousand kings.46 – 49
At that very moment, He attained the fourth type of knowledge, Manah-paryaya Jnana (the ability to read the minds of others). The following day, He entered the city of Siddhartha to seek alms (Ahar).”
श्लोक ( Shlok ) 50
तस्मै हेमद्युतिर्नन्दभूपतिर्भक्तिपूर्वकम् । दत्त्वाऽन्नं प्राप्य सत्पुण्यं पञ्चाश्चर्यागयजर्यधीः ॥ ५० ॥
वहाँ उनके लिए सुवर्णके समान कान्तिवाले नन्द राजाने भक्ति-पूर्वक आहार दिया जिससे उत्तम बुद्धिवाले उस राजाने श्रेष्ठ पुण्य और पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ॥ ५० ॥
“There, King Nanda, whose radiance was like pure gold, offered the meal with deep devotion. By doing so, that wise king earned supreme merit and was graced by the ‘Five Wonders’ (Panchashcharya).”50
श्लोक ( Shlok ) 51 – 52
द्विसंवत्सरमानेन छाद्मस्थ्ये गतवत्यसौ । मुनिर्मनोहरोद्याने तुम्बुरद्रुमसंश्रयः ॥ ५१ ॥दिनद्वयोपवासेन माघे मास्यपराह्नगः । श्रवणे कृष्णपक्षान्ते कैवल्यमुदपादयत् ॥ ५२ ॥
इस प्रकार छद्मस्थ अवस्थाके दो वर्ष बीत जाने पर एक दिन महामुनि श्रेयांसनाथ मनोहर नामक उद्यानमें दो दिनके उपवासका नियम लेकर तुम्बुर वृक्षके नीचे बैठे और वहीं पर उन्हें माघकृष्ण अमावस्याके दिन श्रवण नक्षत्रमें सायंकालके समय केवलज्ञान उत्पन्न हो गया ।। ५१-५२ ।।
“In this manner, after two years had passed in the state of spiritual practice (Chadmastha), the great ascetic Shreyansunatha entered the ‘Manohara’ garden one day. Taking a vow of a two-day fast, He sat beneath a Tumburu tree; there, on the evening of the new moon day of the month of Magha (Magha Krishna Amavasya), under the Shravana constellation, He attained Kevala Jnana (Omniscience).”51 – 52
श्लोक 53 से 62
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