राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585 | श्लोक 586 से 594 | श्लोक 595 से 604
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 605 to 622
श्लोक ( Shlok ) 605
मृताः केचित्पुनः केचित् प्रहताः प्राणमोक्षणे । अक्षमाः पापकर्माणः स्थिताः कण्ठगतासवः ॥ ६०५ ॥
उस युद्धमें कितने ही लोग मर गये, कितने ही घायल हो गये, और कितने ही पापी, प्राण छोड़नेमें असमर्थ हो कण्ठगत प्राण हो गये ।। ६०५ ॥
“In that battle, countless men perished, numerous others were severely wounded, and many wicked souls, unable to completely let go of life, found their breath trapped in their throats, lingering on the very brink of death.” || 605 ||
श्लोक ( Shlok ) 606
समवर्तीनरान् सर्वान् ग्रस्तान् जरयितुं तदा । निःशक्तिर्वान्तवानेतानिति शङ्काविधायिनः ॥ ६०६ ॥
उस समय वे मरणासन्न पुरुष ऐसा सन्देह उत्पन्न कर रहे थे कि यमराजखाते समय तो सबको खा गया परन्तु वह खाये हुए समस्त लोगोंको पचानेमें समर्थ नहीं हो सका, इसलिए ही मानो उसने उन्हें उगल दिया था ।। ६०६ ॥
“At that moment, those dying men aroused such a doubt as if Yamaraja (the Lord of Death) had devoured everyone during his feast, but being unable to digest all the people he had consumed, he had, as it were, vomited them back out.” || 606 ||
श्लोक ( Shlok ) 607
इतस्ततो भटा व्यस्ताः सङ्गरे जर्जराङ्गकाः । जनयन्त्यन्तकस्यापि ‘वीक्षमाणस्य भीरसम् ॥ ६०७ ॥
जिनके अङ्ग जर्जर हो रहे हैं ऐसे कितने ही योद्धा उस युद्धस्थलमें जहाँ-तहाँ बिखरे पड़े हुए थे और वे देखनेवाले यमराजको भी भयानक रस उत्पन्न कर रहे थे- उन्हें देख यमराजं भी भयभीत हो रहा था ॥ ६०७ ॥
“Countless warriors, whose bodies were shattered and mutilated, lay scattered here and there across that battlefield; they were evoking a sense of sheer terror (Bhayanaka Rasa) even in Yamaraja, the Lord of Death himself, who looked upon them and trembled with fear.” || 607 ||
श्लोक ( Shlok ) 608
बाजिनोऽत्र समुच्छिन्नचरणाः सत्वशालिनः । अङ्गेनैव समुत्थातुमुद्यन्ति स्मोर्जितौजसः ॥ ६०८ ॥
जिनके पैर कट गये हैं ऐसे कितने ही प्रतापी एवं बलशाली घोड़े अपने शरीर से ही उठनेका प्रयत्न कर रहे थे ।। ६०८ ॥
“Countless majestic and powerful steeds, whose legs had been severed, were desperately attempting to lift themselves up using the sheer strength of their torsos alone.” || 608 ||
श्लोक ( Shlok ) 609
अभानिभा भटोन्मुक्तशरनाराचकीलिताः । प्रक्षरद्धातुनिष्यन्दगिरयो बाल्यवेणवः ॥ ६०९ ॥
योद्धाओंके द्वारा छोड़े हुए बाणों और नाराचोंसे कीलित हाथी ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो जिनसे गेरूके निर्झर झर रहे हैं और जिनपर छोटे-छोटे बाँस लगे हुए हैं ऐसे पर्वत ही हों ॥ ६०९ ॥
“The elephants, pierced all over by the arrows and iron shafts (Narachas) unleashed by the warriors, looked as magnificent as mountains from which streams of red ochre (Geru) cascade down, and upon which small bamboo trees stand tall.” || 609 ||
श्लोक ( Shlok ) 610
चक्राद्यवयवैर्भन्नैविक्षिप्ता सर्वतो रथाः । भान्ति स्म भिन्नपोता वा तत्संग्रामाब्धिमध्यगाः ॥ ६१० ॥
चक्र आदि अवयवोंके टूट जानेसे सब ओर बिखरे पड़े रथ ऐसे जान पड़ते थे मानो उस संग्राम रूपी समुद्रके बीच में चलनेवाले जहाज ही टूटकर बिखर गये हों ।। ६१० ।।
“The chariots, shattered in all directions due to the breaking of their wheels and other components, looked as if ships navigating the middle of that ocean-like battle had been wrecked and cast asunder.” || 610 ||
श्लोक ( Shlok ) 611 – 612
दिनान्येवं बहून्यासीत् संग्रामो बलयोर्द्वयोः । प्रायेण विमुखे दैवे स्वं बलं वीक्ष्यभङ्गरम् ॥ ६११ ॥ सन्तप्तो मायया सीताशिरश्छेदं दशाननः । विधाय तव देवीयं गृहाणेति रुपाक्षिपत् ॥ ६१२ ॥
इस प्रकार उन दोनों सेनाओंमें बहुत दिन तक युद्ध होता रहा। एक दिन रावण भाग्यके प्रतिकूल होनेसे अपनी सेनाको नष्ट होती देख बहुत दुःखी हुआ। उसी समय उसने मायासे सीताका शिर काट कर ‘लो, यह तुम्हारी देवी है ग्रहण करो’ यह कहते हुए क्रोधसे रामचन्द्रजीके सामने फेंक दिया ।। ६११-६१२ ।।
“In this manner, the battle between the two armies continued for many days. One day, with fortune turning against him, Ravana grew deeply distressed upon seeing his army being decimated. At that very moment, using his powers of illusion (Maya), he severed a deceptive head of Sita and, crying out in fury, ‘Here, take your goddess!’, threw it right in front of Ramachandra.” || 611-612 ||
श्लोक ( Shlok ) 613 – 616
शिरस्तत्पश्यतो भर्तुर्हदि मोहे कृतास्पदे । खेचरेश्वरसैन्यस्य समीक्ष्य समरोत्सवम् ॥ ६१३ ॥ सीतां शीलवतीं कश्चिदपि स्प्रष्टुं त्वया विना । शक्तो नास्ति दशास्यस्य मायेयं मात्रगाः शुचम् ॥६१४॥ नाथेति राघवं तथ्यमब्रवीद्रावणानुजः । विभीषणस्य तद्वाक्यं श्रद्धाय रघुनन्दनः ॥ ६१५ ॥ गजारिर्गजयूथं वा भास्करो वा तमस्तत्तिम् । बलं विभेदयामास सद्यो विद्याधरेशिनः ॥ ६१६ ॥
इधर सीताका कटा हुआ शिर देखते ही रामचन्द्रजीके हृदयमें मोहने अपना स्थान जमाना शुरू किया और उधर रावणकी सेनामें युद्धका उत्सव होना शुरू हुआ। यह देख, विभीषणने रामचन्द्रजीसे सच बात कही कि शीलवती सीताको आपके सिवाय कोई दूसरा छूनेके लिए भी समर्थ नहीं है। हे नाथ, यह रावणकी माया है अतः आप इस विषयमें शोक न कीजिए । विभीषणकी इस बातपर विश्वास रख कर रामचन्द्रजी रावणकी सेनाको शीघ्र ही इस प्रकार नष्ट करने लगे जिस प्रकार कि सिंह हाथियोंके समूहको अथवा सूर्य अन्धकारके समूहको नष्ट करता है ॥ ६१३-६१६ ॥
“The moment Ramachandra beheld the severed head of Sita, profound grief and delusion began to take hold of his heart; conversely, a celebratory surge of battle-frenzy erupted within Ravana’s army. Seeing this, Vibhishana revealed the truth to Ramachandra, saying: ‘No one else but you possesses the power to even touch the exceptionally virtuous Sita. O Lord, this is merely Ravana’s illusion (Maya); therefore, do not grieve over this.’ Placed in absolute faith by Vibhishana’s words, Ramachandra swiftly began to decimate Ravana’s army, just as a lion destroys a herd of elephants, or the sun dissipates a mass of darkness.” || 613-616 ||
श्लोक ( Shlok ) 617
प्रकाशयुद्धमुज्झित्वा मायायुद्धविधित्सया । स पुत्रैः सह पौलस्त्यो लङ्घते स्म नभोऽङ्गणम् ॥ ६१७ ॥
अब रावण खुला ‘युद्ध छोड़कर माया-युद्ध करनेकी इच्छासे अपने पुत्रोंके साथ आकाश रूपी आँगनमें जा पहुँचा ।। ६१७।।
“Now, abandoning open warfare with the desire to wage a war of illusions (Maya-yuddha), Ravana, along with his sons, ascended into the courtyard of the sky.” || 617 ||
श्लोक ( Shlok ) 618 – 622
तं वीक्ष्य तद्रणे दक्षौ दुरीक्ष्यं रामलक्ष्मणौ । गजारिविनतासूनु वाहिनीभ्यां समुद्यतौ ॥ ६१८ ॥ सुग्रीवाणुमदाद्याविद्याधरबलान्वितौ । रावणेन समं रामो लक्ष्मणोप्यग्रसूनुना ॥ ६१९ ॥सुग्रीवः कुम्भकर्णेन मरुत्तुप्रविकीर्तिना । खरेण केतुरब्जादिरङ्गदश्वेन्द्रकेतुना ॥ ६२० ॥ इन्द्रवर्माभिधानेन कुमुदो युद्धविश्रतः । खरदूषणनान्नापि नीलो मायाविशारदः ॥ ६२१ ॥ एवमन्येऽपि तैरन्ये रामभृत्या रणोद्धताः । दशास्यनायकैः सार्द्ध मायायुद्धमकुर्वत ॥ ६२२ ॥
उस माया-युद्धमें रावणको दुरीक्ष्य (जो देखा न जा सके) देख कर, अत्यन्त चतुर राम और लक्ष्मण, सिंहवाहिनी तथा गरुड़वाहिनी विद्याओंके द्वारा अर्थात् इन विद्याओंके द्वारा निर्मित -आकाशगामी सिंह और गरुड़ पर आरूढ़ होकर युद्ध करनेके लिए उद्यत हुए । सुग्रीव, अणुमान् आदि अपने पक्ष के समस्त विद्याधरोंकी सेना भी उनके साथ थी। रावणके साथ रामचन्द्र, इन्द्रजीतके साथ लक्ष्मण, कुम्भकर्णके साथ सुग्रीव, रविकीर्तिके साथ अणुमान् खरके साथ कमलकेतु, इन्द्रकेतुकेसाथ अङ्गद, इन्द्रवर्माके साथ युद्धमें प्रसिद्ध कुमुद और खर-दूषणके साथ माया करनेमें चतुर नील युद्ध कर रहे थे। इसी प्रकार युद्ध करनेमें अत्यन्त उद्धत रामचन्द्रजीके अन्य भृत्य भी रावणके मुखिया लोगोंके साथ मायायुद्ध करने लगे ।। ६१८-६२२ ।।
“Seeing that Ravana had become durikshya (invisible/unassailable) in that war of illusions, the exceptionally clever Rama and Lakshmana prepared themselves for battle by invoking the Simhavahini and Garudavahini mystical powers (Vidyas)—thereby mounting the sky-faring lion and eagle created by these arts. The entire army of Vidyadharas on their side, including Sugriva and Hanuman (Anuman), accompanied them.
Then, the individual duels commenced: Ramachandra fought against Ravana, Lakshmana against Indrajit, Sugriva against Kumbhakarna, Hanuman against Ravikirti, Kamalaktu against Khara, Angada against Indraketu, the renowned warrior Kumuda against Indravarma, and Nila—who was highly skilled in countersorcery—fought against Khara-Dushan. In this very manner, the other highly fierce and zealous generals of Ramachandra also engaged in illusion-warfare with the chief leaders of Ravana’s army.” || 618-622 ||
श्लोक 623 से 631
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