अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 492 to 501
श्लोक ( Shlok ) 492
कनकश्रीः सहाभ्येत्य ताभ्यां भक्त्या पितामहम् । वन्दित्वा घातिहन्तारमप्राक्षीत्स्वभवान्तरम् ॥४९२॥
कनकश्री भी उनके साथ गई थी। उसने अपने पितामहको भक्तिपूर्वक नमस्कार किया और घातिया कर्मोंको नष्ट करनेवाले उक्त जिनराजसे अपने भवान्तर पूछे ॥ ४९२ ।।
“Princess Kanakaśrī had also accompanied them. She bowed down with intense devotion before her grandfather, and requested the glorious Lord of Jinas—who had completely annihilated all the destructive karmas (ghātiyā karmas)—to reveal the journey of her past lifetimes (bhavāntara).”492
श्लोक ( Shlok ) 493
इति पृष्टो जिनाधीशो निजवागमृताम्बुभिः । तां तर्पयितुमित्याह परार्थैकफले हितः ॥ ४९३ ॥
ऐसा पूछने पर परोपकार करना ही जिनकी समस्त चेष्टाओंका फल है ऐसे जिनेन्द्रदेव अपने वचनामृत रूप जलसे कनकश्रीको संतुष्ट करनेके लिए इस प्रकार कहने लगे ॥ ४९३ ॥
“Upon being asked thus, the Lord of Jinendras—whose every single action yields nothing but the ultimate well-being of all living beings—began to speak in the following manner, satisfying Kanakaśrī with the divine nectar of His words.”493
श्लोक ( Shlok ) 494 – 497
अत्र जम्बूद्रुमालक्ष्यद्वीपेऽस्यां भरतावनौ । शङ्खाख्यनगरे वैश्यो देविलस्तत्सुताभवः ॥ ४९४ ॥बन्धुश्रियां त्वमेवैका श्रीदचा ज्यायसी सती । सुताः पराः कनीयस्यः कुटी पङ्ग कुणी तथा ॥४९५॥वधिरा कुब्जका काणा खब्जा पोषिका स्वयम् । त्वं कदाचिन्मुनिं सर्वयशसं सर्वशैलगम् ॥ ४९६ ॥अभिवन्द्य शमं याता हिंसाविरमणव्रतम् । गृहीत्वा धर्मचक्राख्यमुपवासं च शुद्धधीः ॥ ४९७ ॥
इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रकी भूमि पर एक शङ्ख नामका नगर था। उसमें देविल नामका वैश्य रहता था । उसकी बन्धुश्री नामकी स्त्रीसे तू श्रीदत्ता नामकी बड़ी और सती पुत्री हुई थी। तेरी और भी छोटी बहिनें थीं जो कुष्ठी, लँगड़ी, टोंटी, बहरी, कुबड़ी, कानी और खंजी थीं। तू इन सबका पालन स्वयं करती थी। तूने किसी समय सर्वशैल नामक पर्वत पर स्थित सर्वयश मुनिराजकी वन्दना की, शान्ति प्राप्त की, अहिंसा व्रत लिया, और परिणाम निर्मल कर धर्मचक्र नामका उपवास किया ॥ ४९४-४९७ ॥
“On the land of the Bharata region (Bharata-kṣetra) within this very Jambu-dvīpa continent, there was a city named Śaṅkha. A merchant (Vaiśya) named Devila lived there. From his wife, Bandhuśrī, you were born as their eldest and deeply virtuous (Satī) daughter, named Śrīdattā.
You also had several younger sisters who suffered from various afflictions—they were leprous, lame, hand-crippled, deaf, hunchbacked, one-eyed, and cross-eyed. You selflessly cared for and sustained all of them on your own. At one time, on the Sarvaśaila mountain, you went to offer your respects to the holy sage Sarvayaśa Munirāja. There, you attained profound inner peace, took the vow of non-violence (Ahiṃsā-vrata), and with a completely purified consciousness, you observed the sacred fast known as Dharma-cakra.”494 – 497
श्लोक ( Shlok ) 498 – 501
अन्यदा सुव्रताख्यायै गणिन्यै विधिपूर्वकम् । दत्वाऽन्नदानमेतस्या वमने सत्युपोषितात् ॥ ४९८ ॥सम्यक्त्वाभावतस्तत्र विचिकित्सामगात्ततः । सौधर्मे जीवितस्यान्ते भूत्वा सामानिकामरी ॥ ४९९ ॥ततो मन्दरमालिन्यां दमितारेः सुताभवः । पुण्याद् व्रतोपवासान्ताद्विचिकित्साफलं त्विदम् ॥ ५०० ॥सबलं पितरं हत्वा धृत्वा नीतासि दुःखिनी । विचिकित्सां न कुर्वन्ति तस्मात्साधौ सुधीधनाः ॥५०१॥
किसी दूसरे दिन तूने सुव्रता नामकी आर्यिकाके लिए विधिपूर्वक आहार दिया, उन आर्यिकाने पहले उपवास किया था इसलिए आहार लेनेके बाद उन्हें वमन हो गया और सम्यग्दर्शन न होनेसे तूने उन आर्यिकासे घृणा की। तूने जो अहिंसा व्रत तथा उपवास धारण किया था उसके पुण्यसे तू आयुके अन्तमें मर कर सौधर्म स्वर्गमें सामानिक जातिकी देवी हुई और वहांसे चय कर राजा दमितारिकी मन्दरमालिनी नामकी रानीसे कनकश्री नामकी पुत्री हुई है। तूने आर्यिकासे जो घृणा की थी उसका फल यह हुआ कि ये लोग तेरे बलवान् पिताको मारकर तुझे जबर्दस्ती ले आये तथा तूने दुःख उठाया। यही कारण है कि बुद्धिमान् लोग कभी साधुओंमें घृणा नहीं करते हैं ।॥ ४९८-५०१ ॥
“On another day, you ritually offered pure food (āhāra) with all prescribed rites to a holy Jain nun (Āryikā) named Suvratā. Because that Āryikā had previously been fasting, she inadvertently vomited after taking the food. Due to a lack of deep spiritual insight (Samyagdarśana) at that moment, you felt intense disgust and aversion toward her.
By the merit (puṇya) of the non-violence vow (Ahiṃsā-vrata) and the fasts you had observed, you died at the end of your lifespan and were reborn in the Saudharma heaven as a celestial goddess of the Sāmānika class. Falling from that heavenly realm, you were conceived by Queen Mandaramālinī, the wife of King Damitarī, and were born as this Princess Kanakaśrī.
However, the consequence of the disgust you felt toward the holy nun was this: these warriors killed your powerful father, abducted you by force, and you had to suffer such intense grief. This is exactly why wise people never harbor feelings of disgust or aversion toward holy ascetics.”498 – 501
श्लोक 502 से 513
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85
धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 |श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491
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