राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 494 to 501
श्लोक ( Shlok ) 494 – 497
सीतां नेति विनिश्चित्य तां रामाय समर्पय । इति लक्ष्मीलतावृद्धिसाधनं धर्मशर्मदम् ॥ ४९४ ॥वचोऽवोसद्विचार्योच्चैर्यशः कर्तुं शशिप्रभम् । भाषा विभीषणायैवं भाषमाणाय भीषणः ॥ ४९५ ॥रुषितो रावणो दूते नैकत्वमुपगम्य मे । पराभवं सभामध्ये प्राग्दुस्सहमजीजनः ॥ ४९६ ॥सम्प्रत्यपि दुरुक्तोऽहं त्वया सहजताबलात् । अवध्यो याहि मद्देशादित्यभाषत निष्ठुरम् ॥ ४९७ ॥
इसलिए इन सब बातोंकानिश्चय कर सीता रामचन्द्रके लिए सौंप दीजिये। इस प्रकार विभीषणने अच्छी तरह विचार कर यशको चन्द्रमा के समान उज्ज्वल करनेके लिए लक्ष्मीरूपी लताको बढ़ानेवाले तथा धर्म और सुख देनेवाले उत्कृष्ट वचन कहे। परन्तु इस प्रकारके उत्तम वचन कहनेवाले विभीषणके लिए वह भयङ्कर रावण कुपित होकर कहने लगा कि ‘तूने दूतके साथ मिलकर पहले सभाके बीच मेरा असहनीय तिरस्कार किया था और इस समय भी तू दुर्वचन बोल रहा है। तू मेरा भाई होनेसे मारने योग्य नहीं है इसलिए जा मेरे देशसे निकल जा’। इस प्रकार रावणने बहुत ही कठोर शब्द कहे ॥ ४९४-४९७ ॥
“Therefore, resolving all these matters, hand Sita over to Ramachandra.’ In this manner, having pondered deeply, Vibhishana spoke these excellent words—words that make one’s fame as bright as the moon, nourish the vine of prosperity, and bestow both righteousness (dharma) and happiness.
However, becoming furious at Vibhishana for speaking such noble words, the terrifying Ravana began to say, ‘Conspiring with the messenger, you have previously inflicted an unbearable insult upon me in the midst of the assembly, and even now, you continue to utter abusive words. Because you are my brother, you are not fit to be slain; therefore, go, banish yourself from my kingdom!’ Speaking in this manner, Ravana uttered these exceedingly harsh words.” [494-497]
श्लोक ( Shlok ) 498
सोऽपि दुश्चरितस्यास्य नाशोऽवश्यं भविष्यति । सहानेन विनाशो मां दूषयत्ययशस्करः ॥ ४९८ ॥
रावणकी बात सुनकर विभीषणने विचार किया कि इस दुराचारीका नाश अवश्य होगा, इसके साथ मेरा भी नाश होगा और यह अपयश करनेवाला नाश मुझे दूषित करेगा ।। ४९८॥
“Hearing Ravana’s words, Vibhishana reflected, ‘The destruction of this evildoer is certain; along with him, I too shall be destroyed, and this ruin, bringing nothing but infamy, will leave me tainted.'” [498]
श्लोक ( Shlok ) 499 – 500
निर्वासितोऽहं निर्भर्त्य देशाद्धितमुदाहरन् । इष्ट एव किलारण्ये वृष्टो देव इति श्रुतिः ॥ ४९९ ॥पुण्याम्ममाद्य सम्पन्ना यामि रामक्रमाम्बुजम् । इत्यन्तर्गतमालोच्य विनिश्चित्य विभीषणः ॥ ५०० ॥
इसने तिरस्कार कर मुझे देशसे निकाल दिया है यह अच्छा ही किया है क्योंकि मुझे यह इष्ट ही है। ‘बादल जङ्गलमें ही बरसे’ यह कहावत आज मेरे पुण्यसे सम्पन्न हुई है। अब मैं रामचन्द्रके चरणकमलोंके समीप ही जाता हूँ। इस प्रकार चित्तमें विभीषणने विचार किया और ऐसा ही निश्चय कर लिया ।। ४९९-५०० ।।
“‘By insulting me and banishing me from the kingdom, he has actually done me a favor, for this is exactly what I desired. The proverb “let the rain clouds pour over the forest itself” has come true for me today by virtue of my merits (punya). Now, I shall go straight to the lotus feet of Ramachandra.’ In this manner, Vibhishana reflected in his heart and made this firm resolve.” [499-500]
श्लोक ( Shlok ) 501
जलधेर्जलमुल्लङ्घय सौजन्यमिव सत्वरम् । महानदीप्रवाहो वा वारिधिं राममासदत् ॥ ५०१ ॥
वह शीघ्र ही सौजन्यकी तरह समुद्रके जलका उल्लङ्घन कर गया और जिस प्रकार किसी महानदीका प्रवाह समुद्रके पास पहुँचता है उसी प्रकार वह रामचन्द्रके समीप जा पहुँचा ।। ५०१ ।।
“He swiftly crossed over the waters of the ocean, just as virtue easily transcends obstacles, and he arrived near Ramachandra just as the currents of a great river reach the ocean.” [501]
श्लोक 502 से 515
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473
राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493
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