अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
तयोरमिततेजाश्च सुतारा चाभवत्सुता । प्रतिपञ्चन्द्रयोः शुक्लपक्षरेखेव चैन्दवी ॥ १५२ ॥
अर्ककीर्ति और ज्योतिर्मालाके अमिततेज नामका पुत्र तथा सुतारा नामकी पुत्री हुई। ये दोनों भाई-बहिन ऐसे सुन्दर थे मानो शुक्लपक्षके पडिवाके चन्द्रमा-की रेखाएँ ही हों ।। १५२ ।।
“To Arkakirti and Jyotirmala were born a son named Amitateja and a daughter named Sutara. These two siblings were so exceedingly beautiful that they resembled the delicate crescents of the moon on the first day of the bright fortnight.” 152
श्लोक ( Shlok ) 153
विष्णोः स्वयम्प्रभायां च सुतः श्रीविजयोऽजनि । ततो विजयभद्राख्यः सुता ज्योतिःप्रभाङ्ख्या ॥ १५३ ॥
इधर त्रिपृष्ठ नारायणके स्वयंप्रभा रानीसे पहिले श्रीविजय नामका पुत्र हुआ, फिर विजयभद्र पुत्र हुआ फिर, ज्योतिप्रभा नामकी पुत्री हुई ।। १५३ ॥
“Meanwhile, to Narayana Triprishta and his queen Svayamprabha was born first a son named Shrivijaya, then a son named Vijayabhadra, and thereafter a daughter named Jyotiprabha.” 153
श्लोक ( Shlok ) 154 – 155
प्रजापतिमहाराजः ‘भूरिप्राप्तमहोदयः । कदाचिञ्जातसंवेगः सम्प्राप्य पिहिताश्रवम् ॥ १५४ ॥आदाज्जैनेश्वरं रूपं त्यक्त्वाऽशेषपरिग्रहम् । येन सम्प्राप्यते भावः सुखात्मपरमात्मनः ॥ १५५ ॥
महान् अभ्युदयको प्राप्त हुए प्रजापति महाराजको कदाचित् वैराग्य उत्पन्न हो गया जिससे पिहितास्त्रव गुरुके पास जाकर उन्होंने समस्त परिग्रहका त्याग कर दिया और श्रीजिनेन्द्र भगवान्का वह रूप धारण कर लिया जिससे सुख स्वरूप परमात्माका स्वभाव प्राप्त होता है ।। १५४-१५५ ।।
“Upon a certain occasion, Maharaja Prajapati, who had attained supreme worldly prosperity, was suddenly struck by an intense wave of detachment (vairagya). Approaching the Guru Pihitasrava, he completely renounced all worldly possessions (parigraha) and adopted that very form of Lord Jinendra which leads to the realization of the blissful, divine nature of the supreme soul.”154 – 155
श्लोक ( Shlok ) 156 – 157
बाझेतरद्विषड्भेदतपस्यविरतोद्यमः । चिरं तपस्यन् सञ्चित्तमायुरन्ते समादधत् ॥ १५६ ॥मिथ्यात्वं संयमाभावं प्रमादं सकषायताम् । कैवल्यं स सयोगत्वं त्यक्त्वाऽभूत्परमः क्रमात् ॥ १५७ ॥
छह बाह्य और छह आभ्यन्तरके भेदसे बारह प्रकारके तपञ्चरणमें निरन्तर उद्योग करनेवाले प्रजापति मुनिने चिरकाल तक तपस्या की और आयुके अन्तमें चित्तको स्थिर कर क्रम से मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, सकषायता तथा सयोगकेवली अवस्थाका त्याग कर परमोत्कृष्ट अवस्था – मोक्ष पद प्राप्त किया ।। १५६-१५७ ॥
“Constantly striving in the twelvefold austerities—divided into six external and six internal practices—Sage Prajapati performed severe penance for a long time. At the end of his lifespan, stabilizing his consciousness and systematically casting away delusion (mithyatva), non-restraint (avirati), spiritual inertia (pramada), the passions (kashaya), and eventually the active bodily state of a Sayoga-Kevali, he attained the ultimate, supreme state—the station of absolute liberation (Moksha).”156 – 157
श्लोक ( Shlok ) 158
खेचरेशोऽपि तच्छ्रुत्वा राज्यं दत्त्वाऽर्ककीर्तये । निर्ग्रन्थरूपमापन्नो जगन्नन्दनसन्निधौ ॥ १५८ ॥
विद्याधरोंके राजा ज्वलनजटीने भी जब यह समाचार सुना तब उन्होंने अर्ककीर्तिके लिए राज्य देकर जगन्नन्दन मुनिके समीप दिगम्बर दीक्षा धारण कर ली ।। १५८ ।।
“When Jvalanajati, the king of the Vidyadharas, heard this news, he handed over his kingdom to Arkakirti and, approaching the Sage Jagannandana, initiated himself into the unclad (Digambara) ascetic order.”158
श्लोक ( Shlok ) 159
अयाचितमनादानमार्जवं त्यागमस्पृहाम् । क्रोधादिहापनं ज्ञानाभ्यासं ध्यानं च सोऽम्वयात् ॥ १५९॥
याचना नहीं करना, बिना दिये कुछ ग्रहण नहीं करना, सरलता रखना, त्याग करना, किसी चीज की इच्छा नहीं रखना, क्रोधादिका त्याग करना, ज्ञानाभ्यास करना और ध्यान करना – इन सब गुणोंको वे प्राप्त हुए थे ॥ १५९ ॥
“They had fully attained all these virtues—never begging, never accepting anything without it being freely given, maintaining absolute simplicity, practicing total renunciation, harboring no desires, casting away anger and other passions, dedicating themselves to the study of sacred knowledge, and immersing themselves in deep meditation.” 159
श्लोक ( Shlok ) 160
ततो निःशेषमंहांसि निहत्य निरुपोपधिः । निराकारोऽपि साकारो निर्वाणमगमत्परम् ॥ १६० ॥
वे समस्त पापोंका त्याग कर निर्द्वन्द्व हुए। निराकार होकर भी साकार हुए तथा उत्तम निर्माण पदको प्राप्त हुए ॥ १६० ॥
“Renouncing all sins, they became entirely free from all dualities and conflicts. Though formless (Nirakara), they became fully manifest in their true form (Sakara), and ultimately attained the supreme state of ultimate liberation (Nirvana).”160
श्लोक ( Shlok ) 161
त्रिपृष्ठो निष्ठुरारातिविजयो विजयानुगः । त्रिखण्डाखण्डगोमिन्याः कामं कामान्समन्वभूत् ॥ १६१॥
इधर विजय बलभद्रका अनुगामी त्रिपृष्ठ कठिन शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता हुआ तीन खण्डकी अखण्ड पृथिवीके भोगोंका इच्छानुसार उपभोग करता रहा ।। १६१ ॥
“Meanwhile, Triprishta Narayana—followed faithfully by Balabhadra Vijaya—conquered all his formidable enemies and, according to his desires, enjoyed the royal pleasures of the three undivided realms of the earth.”161
श्लोक 162 से 171
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