आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 172 to 183
श्लोक ( Shlok ) 172
जयावत्यां समुत्पन्नो गुणपालो गुणोज्ज्वलः । श्रीपालस्थायुधागारे चक्रं च समजायत ॥१७२॥
कुछ दिन बाद श्रीपालकी जयावती रानीके गुणोंसे उज्ज्वल गुणपाल नामका पुत्र उत्पन्न हुआ और इधर आयुधशालामें चक्ररत्न प्रकट हुआ ॥ १७२॥
Some time thereafter, a son named Gunapala—radiant with virtues—was born to Shripal’s queen, Jayavati. Meanwhile, in the royal armory, the wondrous Wheel-Jewel (Chakraratna) manifested itself.॥172॥
श्लोक ( Shlok ) 173
स सर्वांश्चक्रवर्त्यक्तभोगाननुभवन् भृशम् । शक्रलीलां व्यडम्विष्ट लक्ष्म्या लक्षितविग्रहः ॥१७३॥
जिसका शरीर लक्ष्मीसे सुशोभित हो रहा है ऐसा वह श्रीपाल चक्रवर्तीके कहे हुए सब भोगोंका अत्यन्त अनुभव करता हुआ इन्द्रकी लीलाको भी उल्लंघन कर रहा था ।।१७३॥
Glorious in his radiant splendor, Shripal the Emperor reveled fully in every pleasure and luxury he had ever desired, so much so that his grandeur even surpassed the divine pastimes of Indra himself.॥173॥
श्लोक ( Shlok ) 174
अभूज्जयावतीभ्रातुस्तनूजा जयवर्मणः । जयसेनाह्वया कान्तेस्सा सेनेव विजित्वरी ॥१७४।॥
जयावतीके भाई जयवर्माके जयसेना नामकी पुत्री थी जो अपनी कान्ति से सेनाके समान सबको जीतनेवाली थी ॥१७४।॥
Jayavati’s brother, Jayavarma, had a daughter named Jayasena, whose dazzling beauty was such that she conquered all hearts like a victorious army on the battlefield.॥174॥
श्लोक ( Shlok ) 175 – 176
मनोवेगोऽशनिवरः शिवाख्योऽशनिवेगवाक् । हरिकेतुः परे चोच्चैः क्ष्माभुजः खगनायकाः ॥१७५॥”जय सेनाख्यमुख्याभिस्तेषां तुग्भिः सहाभवत् । विवाहो गुणपालस्य स ताभिः प्राप्तसम्मदः ॥१७६॥
इसके सिवाय मनोवेग, अशनिवर, शिव, अशनिवेग, हरिकेतु तथा और भी अनेक अच्छे अच्छे विद्याधर राजा थे, जयसेनाको आदि लेकर उन सब राजाओंकी पुत्रियोंके साथ गुणपालका विवाह हुआ । इस प्रकार वह गुणपाल उन कन्याओंके मिलनेसे बहुत ही हर्षित हुआ ।।१७५-१७६।।
Moreover, there were many noble Vidyadhara kings—such as Manovega, Ashanivar, Shiva, Ashanivega, Hariketu, and many others of great renown. Beginning with Jayasena, the daughters of all these illustrious kings were given in marriage to Gunapala. Thus, surrounded by these maidens, Gunapala was filled with immense joy and delight.॥175–176॥
श्लोक ( Shlok ) 177 – 179
कदाचित् काललब्ध्यादिचोदितोऽभ्यर्णनिवृतिः । विलोकयन्नभोभागम कस्मादन्धकारितम् ॥१७७॥चन्द्रग्रहणमालोक्य धिगैत’ स्यापि चेदियम् । अवस्था संसृतौ पापग्रस्तस्यान्यस्य का गतिः ॥१७८॥इति निर्विद्य सञ्जातजातिस्मृतिरुदात्तधीः । स्वपूर्वभवसम्बन्धं प्रत्यक्षमिव संस्मर ॥१७९॥
अथानन्तर-किसी समय जिसका मोक्ष जाना अत्यन्त निकट रह गया है ऐसा गुणपाल काललब्धि आदिसे प्रेरित होकर आकाशकी ओर देख रहा था कि इतनेमें उसकी दृष्टि अक-स्मात् अन्धकारसे भरे हुए चन्द्रग्रहणकी ओर पड़ी, उसे देखकर वह सोचने लगा कि इस संसार-को धिक्कार हो, जब इस चन्द्रमाकी भी यह दशा है तब संसारके अन्य पापग्रसित जीवोंकी क्या दशा होती होगी ? इस प्रकार वैराग्य आते ही उस उत्कृष्ट बुद्धिवाले गुणपालको जाति स्मरण उत्पन्न हो गया जिससे उसे अपने पूर्वभवके सम्बन्धका प्रत्यक्षकी तरह स्मरण होने लगा ॥१७७-१७९॥
Thereafter, on an occasion when liberation was drawing near for Gunapala, he was inspired by the force of time’s fruition and gazed skyward. At that moment, his eyes fell unexpectedly upon a lunar eclipse, with the moon shrouded in darkness. Seeing this, he pondered, “Fie upon this worldly existence! When even the serene moon meets such a fate, what must be the condition of other beings, burdened with countless sins, in this cycle of birth and death?”As deep dispassion welled up within him, Gunapala—possessed of supreme wisdom—experienced the awakening of Jati-Smarana (memory of past births), and in that instant, the entire course of his previous existences became as clear to him as if seen directly before his eyes.॥177–179॥
श्लोक ( Shlok ) 180 – 183
पुष्करार्द्धेऽपरे भागे विदेहे पद्मकाह्वये । विषये विश्रुते कान्त पुराधीशोऽवनीश्वरः ॥१८०॥रथान्तकनकस्तस्य वल्लभा कनकप्रभा । तयोर्भूत्वा प्रभापास्तभास्करः कनकप्रभः ॥१८१॥तस्मिन्नद्युरुद्याने दष्टा सर्पेण मत्प्रिया । विद्युत्प्रभाह्वया तस्या वियोगेन विषगणवान् ॥१८२॥ सार्धं समाधिगुप्तस्य समीपे संयमं परम् । सम्प्राप्तवानतिस्निग्धैः पितृमातृसनाभिभिः ॥१८३॥
उसे स्मरण हुआ कि पुष्करार्ध द्वीपके पश्चिम विदेहमें पद्मक नामका एक प्रसिद्ध देश है, उसके कान्तपुर नगरका स्वामी राजा कनकरथ था। उसकी रानीका नाम कनक-प्रभा था, उन दोनोंके मैं अपनी प्रभासे सूर्यको तिरस्कृत करनेवाला कनकप्रभ नामका पुत्र हुआ था । किसी दिन एक बगीचेमें विद्युत्प्रभा नामकी मेरी स्त्रीको सांपने काट खाया, उसके वियोगसे मैं विरक्त हुआ और अपने ऊपर अत्यन्त स्नेह रखनेवाले पिता माता तथा भाइयोंके साथ साथ मैंने समाधिगुप्त मुनिराजके समीप उत्कृष्ट संयम धारण किया था ।।१८०-१८३॥
He recalled that in a former life he had been born in Padmaka, a renowned land in Western Videha, within the Pushkarardha continent. In its city of Kantapura reigned King Kanakaratha, and his queen was Kanakaprabha. To them, he was born as a son named Kanakaprabha, whose brilliance rivaled and even eclipsed the sun itself.One day, while in a garden, his beloved wife Vidyutprabha was bitten by a serpent and perished. Stricken by grief at her loss, he became deeply dispassionate. Thereafter, together with his loving parents, brothers, and others dear to him, he approached the venerable monk Samadhigupta and undertook the highest vows of spiritual discipline.॥180–183॥
श्लोक 184 से 191
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367 | जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271 | श्लोक 272 से 286 | श्लोक 287 से 296 | श्लोक 297 से 313 | श्लोक 314 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 361 | श्लोक 362 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171