आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 297 से 313 | श्लोक 314 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 361 | श्लोक 362 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 13 to 30
श्लोक ( Shlok ) 13
उपायैः प्रतिबोध्यैनां तदा प्रश्रयपूर्वकम् । इति विज्ञापयामास काचित्तं भाविचक्रिणम् ॥१३॥
उसी समय अनेक उपायोंसे नटीको सचेत कर कोई स्त्री उस होनहार चक्रवर्ती श्रीपालसे विनयपूर्वक इस प्रकार कहने लगी ॥१३॥
At that moment, after many efforts were made to revive the dancer, a woman approached the destined emperor Shripal with great humility and spoke to him thus: ॥13॥
श्लोक ( Shlok ) 14
सुरभ्यविषये श्रीपुराधिपः श्रीधराह्वयः । तद्देवी श्रीमती तस्याः सुता जयवतीत्यभूत् ॥१४॥
कि सुरम्य देशके श्रीपुर नगरके राजाका नाम श्रीधर है उसकी रानीका नाम श्रीमती है और उसके जयवती नामकी पुत्री है ।।१४।।
“In the beautiful land lies the city of Shripur, whose king is named Shridhar. His queen is Shrimati, and they have a daughter named Jayavati.” ॥14॥
श्लोक ( Shlok ) 15 – 16
तज्जातौ चक्रिणो देवी आविनीत्यादिशन्विदः । अभिज्ञानं च तस्यैतत् नटनट्योविंवेत्ति यः ॥१५॥भेदं स चक्रवर्तीति तत्परीक्षितुमागताः । पुण्याद् दृष्टस्त्वमस्माभिर्नि धिकल्पो यदृच्छया ॥१६॥
उसके जन्मके समय ही निमित्तज्ञानियोंने कहा था कि यह चक्रवर्तीकी पट्टरानी होगी और उस चक्रवर्तीकी पहिचान यही है कि जो नट और नटीके भेदको जानता हो वही चक्रवर्ती है, हम लोग उसीकी परीक्षा करनेके लिये आये हैं, पुण्योदयसे हम लोगोंने निधिके समान इच्छा-नुसार आपके दर्शन किये हैं ।॥१५-१६।।
“At the time of her birth, the seers skilled in omens declared that she would become the chief queen of a universal monarch, and that monarch could be recognized by one sign alone: he would be the one able to discern the difference between a male and a female dancer. We have come here to test for that very sign, and by the rise of our good fortune, we have beheld you, who are like a hidden treasure come to life.” ॥15–16॥
श्लोक ( Shlok ) 17 – 28
अहं प्रियरतिर्नामा सुतेयं नर्तकी मम । ज्ञेया मदनवेगाख्या पुरुषाकारधारिणी ॥१७॥ नटोऽयं वासवो नाम ख्यातः स्त्रोवेषधारकः । तच्छ्रुत्वा नृपतिस्तुष्ट्वा तां सन्तर्य्य यथोचितम् ॥१८।। गुरुं वन्दितुमात्मीयं गच्छन् सुरगिरिं ततः । अश्वं केनचिदानीतम् आरुह्यासक्तचेतसा ॥१६॥ “अधावयदसौ किञ्चिदन्तरं धरणीतले । गत्वा गगनमारुह्य व्यक्तीकृतखगाकृतिः ॥२०॥ न्यग्रोधपादपाधःस्थप्रतिमावासिना भृशम् । देवेन तर्जितो भीत्वाऽशनिवेगोऽमुचत् खगः ॥२१॥ कुमारं पर्णलध्वा ख्वविद्ययास्वनियुक्तया । रत्नावर्तगिरेर्नूध्नि स्थितं तं सन्ति भाविनः ॥२२॥ बहवोऽप्यस्य लम्भा इत्यग्रहीत्वा निवृत्तवान् । देवः सरसि कस्मिँश्चित् स्नानादिविधिना श्रमम् ॥२३॥ मार्गजं स्थित मुद् धूय तनेकस्मात् सुधागृहात् । आगत्य राजपुत्रोऽयमिति ज्ञात्वा यथोचितम् ॥२४॥ दृष्ट्वा षड्राजकन्यास्ताः स्ववृत्तान्तं न्यवेदयन् । स्वगोत्रकुलनामादि निर्दिश्य खचरेशिना ॥२५॥ बलादशनिवेगेन वयमस्मिन्निवेशिताः । इति तत्प्रोक्तमाकर्ण्य कुमारस्थानुकम्पिनः ॥२६॥ निजागमन वृत्तान्तकथनावसरे परा । विद्युद्वेगाभिधा विद्याधरी तत्र समागता ॥२७॥ पापिनाऽशनिवेगेन हन्तुमेनं प्रयोजिता । समीक्ष्य मदनाक्रान्ताऽभूच्चित्राश्चित्तवृत्तयः ॥२८॥
मेरा नाम प्रियरति है, यह पुरुषका आकार धारण कर नृत्य करनेवाली मदनवेगा नामकी मेरी पुत्री है और स्त्रीका वेष धारण करनेवाला यह वासव नामका नट है यह सुनकर राजाने संतुष्ट होकर उस स्त्रीको योग्यतानुसार संतोषित किया और स्वयं अपने पिताकी वन्दना करनेके लिये सुरगिरि नामक पर्वतकी ओर चला, मार्ग-में कोई पुरुष घोड़ा लाया उसपर आसक्तचित्त हो श्रीपालने सवारी की और दौड़ाया । कुछ दूरतक तो वह घोड़ा पृथिवीपर दौड़ाया परन्तु फिर अपना विद्याधरका आकार प्रकट कर उसे आकाशमें ले उड़ा। उस वट वृक्षके नीचे स्थित प्रतिमाके समीप रहनेवाले देवने उस विद्याधरको ललकारा, देवकी ललकारसे डरे हुए अशनिवेग नामके विद्याधरने अपनी भेजी हुई पर्णलघु विद्यासे उस कुमार श्रीपालको रत्नावर्त नामके पर्वतकी शिखरपर छोड़ दिया । देवने देखा कि उस पर्वतपर रहकर ही उसे बहुत लाभ होनेवाला है इसलिये वह कुमारको साथ लिये बिना ही लौट गया। कुमार भी किसी तालाबमें स्नान आदि कर मार्गमें उत्पन्न हुए परिश्रमको दूर कर बैठे ही थे कि इतनेमें एक सफेद महलसे छह राजकन्याएं निकलकर आई और कुमारको ‘यह राजाका पुत्र है’ ऐसा समझकर यथायोग्य रीतिसे दर्शन कर अपना समा-चार निवेदन करने लगीं। उन्होंने अपने गोत्र-कुल और नाम आदि बतलाकर कहां कि ‘अशनि-वेग नामके विद्याधरने हम लोगोंको यहां जबर्दस्ती लाकर पटक दिया है’ कन्याओंकी यह बात सुनकर कुमारको उनपर दया आई और वह भी अपने आनेका वृत्तान्त कहनेके लिये उद्यत हुआ । वह जिस समय अपने आनेका समाचार कह रहा था उसी समय विद्युद्वेगा नामकी एक दूसरी विद्याधरी वहां आई। पापी अशनिवेगने कुमारको मारनेके लिये इसे भेजा था परन्तु वह कुमारको देखकर कामसे पीड़ित हो गई सो ठीक ही है क्योंकि चित्तकी वृत्ति विचित्र होती है ।।१७-२८।।
“My name is Priyarati,” she continued, “and this is my daughter Madanvega, who dances in the guise of a man, while this male dancer in the form of a woman is Vasava.” Hearing this, the prince was pleased and suitably rewarded the woman. Then he proceeded towards Mount Suragiri to pay his respects to his father.Along the way, a man brought him a horse; Shripal, enchanted by it, mounted and began to ride. At first, the horse galloped swiftly over the earth, but soon revealed its true nature as a vidyadhara steed and soared into the sky.A deity residing near the idol beneath the banyan tree challenged the vidyadhara. Frightened by the deity’s shout, the vidyadhara, named Ashanivega, used his mystical leaf-charms to cast Prince Shripal onto the peak of a mountain called Ratnavarta.Observing that the prince’s stay on that mountain would bring him great benefit, the deity returned without taking him back.Meanwhile, after refreshing himself with a bath in a nearby pond, the prince had just seated himself to recover from his journey when, from a gleaming white palace, six royal maidens emerged. Recognizing Shripal as the son of a king, they offered him respectful greetings and introduced themselves with proper decorum.They revealed their lineages, families, and names, saying, “The wicked vidyadhara Ashanivega forcibly brought us here and cast us down on this mountain.” Hearing their tale, the prince was filled with compassion and prepared to recount how he himself had arrived there.Just as he began to narrate his story, another vidyadhari named Vidyutvega appeared. Ashanivega had sent her to slay the prince; however, upon seeing him, she was instantly overcome with desire—which is but natural, for the mind’s impulses are indeed strange and unpredictable. ॥17–28॥
श्लोक ( Shlok ) 29
सूनुः स्तनितवेगस्य राज्ञो राजपुरेशिनु । खगेशोऽशनिवेगाख्यो ‘ज्योतिर्वेगाख्यमातृकः ॥२९॥
वह कहने लगी कि अशनिवेग नामका विद्याधर राजपुरके स्वामी राजा स्तनितवेगका पुत्र है, उसकी माताका नाम ज्योतिर्वेगा है ॥ २९॥
She began to speak: “Ashanivega, the vidyadhara, is the son of King Stanitvega, the sovereign of Rajapura. His mother’s name is Jyotirvega.” ॥29॥
श्लोक ( Shlok ) 30
त्वमत्र तेन सौहार्दादानीतः स ममाग्रजः । विद्युद्वेगा ह्वयाऽहं च प्रेषिता ते स मैथुनः ॥३०॥
वह अशनिवेग मित्रताके कारण आपको यहां लाया है, वह मेरा बड़ा भाई है, मेरा नाम विद्युद्वेगा है और उसीने मुझे आपके पास भेजा है, अब वह आपका साला होता है ।॥ ३०॥
“Ashanivega brought you here out of a desire for friendship; he is my elder brother. My name is Vidyutvega, and it was he who sent me to you. Thus, he is now your brother-in-law.” ॥30॥
श्लोक 31 से 45
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कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271 | श्लोक 272 से 286 | श्लोक 287 से 296 | श्लोक 297 से 313 | श्लोक 314 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 361 | श्लोक 362 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12