आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 342 | श्लोक 343 से 354 | श्लोक 355 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 391
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 392 to 403
श्लोक ( Shlok ) 392
अथ कदाचिदसौ वदनाम्बुजं समभिवीक्ष्य समुज्ज्वलदर्पणे ।पलितमैक्षत दूतमिवागतं परमसौख्यपदात् पुरुसन्निधेः ॥३९२॥
अथानन्तर भरत महाराजने किसी समय उज्ज्वल दर्पणमें अपना मुखकमल देखकर परम सुखके स्थान स्वरूप भगवान् वृषभदेवके पाससे आये हुए दूतके समान सफेद बाल देखा ।।३९२।।
Thereafter, one day, King Bharat, gazing upon his lotus-like countenance reflected in a resplendent mirror, beheld a single white hair—appearing like a messenger sent from the supreme abode of bliss, the realm of Lord Rishabhadeva—foretelling the impermanence of youth and the nearness of the ultimate truth. ॥392॥
श्लोक ( Shlok ) 393
आलोक्य तं गलितमोहरसः स्वराज्यं मत्वा जरत्तृणमिवोद्गत बोधिरुद्यन्’ ।आदातुमात्महितमात्मजमर्ककीर्ति लक्ष्म्या स्वया स्वयमयोजयदूर्जितेच्छः ॥३९३॥
उसे देखकर जिनका सब मोहरस गल गया है, जिन्हें आत्मज्ञान उत्पन्न हुआ है जो आत्महितको ग्रहण करनेके लिये उद्युक्त हैं और जिनकी वैराग्यविषयक इच्छा अत्यन्त सुदृढ़ तथा वृद्धिशील है ऐसे भरतने अपने राज्यको जीर्णतृणके समान मानकर अपने पुत्र अर्ककीति-को अपनी लक्ष्मीसे युक्त किया अर्थात् अपनी समस्त सम्पत्ति अर्ककीर्तिको प्रदान कर दी ॥३९३।।
Beholding that white hair, King Bharat—whose delusive attachment had melted away, in whom self-realization had arisen, who stood eager to embrace the welfare of his soul, and whose yearning for renunciation had become steadfast and ever-increasing—regarded his vast dominion as but withered grass. Resolute, he bestowed his entire wealth and royal splendor upon his son, Arkakriti, endowing him with the prosperity of the kingdom. ॥393॥
श्लोक ( Shlok ) 394
विदितसकलतत्त्वः सोऽपवर्गस्य मार्ग जिगमिषुरपसत्त्वे र्दुगमं निष्प्रयासम् ।”यमसमितिसमग्रं संयमं शम्बलं वा-ऽदित विदित समर्थाः किं परं प्रार्थयन्ते ॥३९४।।
जिसने समस्त तत्त्वोंको जान लिया हैं और जो हीन जीवोंके द्वारा अगम्य मोक्षमार्गमें गमन करना चाहते हैं ऐसे चक्रवर्ती भरतने मार्ग हितकारी भोजनके समान प्रयासहीन यम तथा समितियोंसे पूर्ण संयमको धारण किया था सो ठीक ही है क्योंकि पदार्थके यथार्थ स्वरूपको समझनेवाले पुरुष संयमके सिवाय अन्य किस पदार्थकी प्रार्थना करते हैं ? ॥३९४।।
Having realized the true nature of all fundamental principles, the Chakravartin Bharat—who sought to tread the path of liberation, inaccessible to those of lesser insight—rightly embraced the perfect restraint imbued with effortless observance of vows and careful conduct, akin to nourishing sustenance on the journey of the soul. Indeed, what else would one who comprehends the essence of reality desire, if not this supreme discipline? ॥394॥
श्लोक ( Shlok ) 395
मनःपर्ययज्ञानमप्यस्य सद्यः समुत्पन्नवत् केवलं चानु’ तस्मात् । तदेवाभवद् भव्यता तादृशी सा विचित्राङ्गिनां निर्वृतेः प्राप्तिरत्र ॥३९५॥
उन्हें उसी समय मनःपर्ययज्ञान उत्पन्न हो गया और उसके बाद ही केवलज्ञान प्रकट हो गया । उनकी वैसी भव्यता उसी समय प्रकट हो गई सो ठीक ही है क्योंकि प्राणियोंको मोक्षकी प्राप्ति बड़ी विचित्र होती है ।। ३९५।।
In that very moment, he attained the knowledge of others’ thoughts (manahparyaya-jnana), and soon thereafter, the radiant light of omniscience (kevala-jnana) revealed itself. The emergence of such supreme spiritual destiny at that precise instant was indeed most fitting—for the attainment of liberation by living beings ever unfolds in wondrous and mysterious ways. ॥395॥
श्लोक ( Shlok ) 396
स्वदेशोद्भवैरेव” सम्पूजितोऽसौ सुरेन्द्रादिभिः साम्प्रतं वन्द्यमानः ।त्रिलोकाधिनाथोऽभर्वात्क न साध्यं तपो दुष्करं चेत् समादातुमीशः ॥३९६।॥
जो भरत पहले अपने देशमें उत्पन्न हुए राजाओंसे ही पूजित थे वे अब इन्द्रोंके द्वारा भी वन्दनीय हो गये। इतना ही नहीं, तीन लोकके स्वामी भी हो गये सो ठीक ही है जो कठिन तपश्चरण ग्रहण करनेके लिये समर्थ रहता है उसे क्या क्या वस्तु साध्य नहीं है अर्थात् सभी वस्तुएं उसे साध्य हैं ।॥ ३९६॥
He who, as Bharat, was once venerated only by the kings born in his own realm—he has now become an object of reverence even for the sovereigns of the celestial realms. Nay, more: he has attained mastery over the three worlds themselves! And rightly so—for what goal remains unattainable to one who is steadfast in undertaking the most arduous austerities? Verily, all things lie within the grasp of such resolute souls. ॥396॥
श्लोक ( Shlok ) 397
परिचितयतिहंसो धर्मवृष्टि निषिञ्चन् नभसि कृतनिवेशो निर्मलस्तुङ्गवृत्तिः ।फलमविकलमध्यं भव्यसस्येषु कुर्वन् व्यहरदखिल देशान् शारदो वा स मेघः ॥३९७॥
मुनिरूपी हंस जिनसे परिचित हैं, जो धर्म-की वर्षा करते रहते हैं, जो आकाशमें निवास करते हैं, निर्मल हैं, उत्तमवृत्तिवाले हैं (पक्षमें ऊंचे स्थानपर विद्यमान रहते हैं) और जो भव्य जीवरूपी धानोंमें मोक्षरूपी पूर्ण फल लगानेवाले हैं ऐसे भरत महाराजने शरद् ऋतुके मेघके समान समस्त देशोंमें विहार किया ।॥३९७।।
Like the autumnal clouds that drift freely across the heavens, Maharaja Bharat—he who was known to the swan-like sages, who poured forth the nourishing rains of dharma, who dwelt in the vast expanse of the sky, who was pure and exalted in conduct, who ever soared to noble heights—wandered throughout all the lands, sowing in the fertile fields of noble souls the seeds that yield the supreme harvest of liberation. ॥397॥
श्लोक ( Shlok ) 398
विहृत्य सुचिरं विनेयजनतोपकृत्स्वायुषो, मुहूर्तपरिमास्थितौ विहितसत्क्रियो विच्युतौ ।तनुत्रितयबन्धनस्य गुणसारमूर्त्तिः स्फुरन् जगत्त्रय शिखामणिः सुखनिधिः स्वधाम्नि स्थितः ॥३९८॥
चिरकालतक विहारकर जिन्होंने शिक्षा देने योग्य जनसमूहका बहुत भारी कल्याण किया है ऐसे भरत महाराजने अपनी आयुकी अन्तर्मुहूर्त प्रमाण स्थिति बाकी रहनेपर योगनिरोध किया और औदारिक, तैजस तथा कार्माण इन तीन शरीररूप बन्धनोंके नष्ट होनेपर सम्यक्त्व आदि सारभूत गुण ही जिनकी मूर्ति रह गई है, जो प्रकाशमान हैं, जगत्त्रयके चूड़ामणि हैं और सुखके भाण्डार हैं ऐसे वह भरतेश्वर आत्मधाममें स्थित हो गये अर्थात् मोक्षको प्राप्त हो गये ।।३९८।।
Having long wandered and compassionately brought immense welfare to multitudes worthy of instruction, Maharaja Bharat, when but an instant of his lifespan remained, stilled all his activities through the cessation of his yogas. With the dissolution of the three corporeal bonds—namely, the physical, fiery, and karmic bodies—he stood revealed in the pure essence of right faith and the highest virtues, a radiant jewel adorning the three worlds and a reservoir of infinite bliss. Thus did that illustrious Bharat attain the abode of the Self—he entered the state of liberation. ॥398॥
श्लोक ( Shlok ) 399
सर्वेऽपि ते वृषभसेन मुनीशमुख्याः सौख्यं गताः सकलजन्तुषु शान्तचित्ताः ।कालक्रमेण यमशीलगुणाभिपूर्णा निर्वाणमापुरभितं गुणिनो गणीन्द्राः ॥३९९।।
जो समस्त जीवोंके विषयमें शान्तचित्त हैं, उत्तम सुखको प्राप्त हैं, यम शील आदि गुणोंसे पूर्ण हैं, गुणवान् हैं और गण अर्थात् मनिसमूहके इन्द्र हैं ऐसे वृषभसेन आदि मुख्य मुनिराज भी कालक्रमसे अपरिमित निर्वाणधामको प्राप्त हुए ॥ ३९९॥
Those illustrious ascetics—Rishabhasena and the foremost among the muni-lords—who remained serene toward all living beings, who attained supreme bliss, who were replete with the virtues of restraint, conduct, and righteousness, who embodied the highest excellence, and who were veritable kings among assemblies of sages—these, too, in due course of time, attained the boundless abode of liberation. ॥399॥
श्लोक ( Shlok ) 400
यो नेतेव पृथु जघान दुरितारातिं चतुस्साधनो येनाप्तं कनकाश्मनेव विमलं रूपं स्वमाभा स्वरम् ।आभेजुश्चरणौ सरोजजयिनौ यस्यालिनो वाऽमरा-स्तं त्रैलोक्यगुरुं पुरुं श्रितवतां श्रेयांसि वः स क्रियात् ॥४००।।
जिन्होंने नेताकी तरह चार आराधनारूप चार प्रकारकी सेनाको साथ लेकर पापरूपी विशाल शत्रुको नष्ट किया था, जिन्होंने सुवर्ण पाषाणके समान अपना देदीप्यमान स्वरूप प्राप्त किया है, भ्रमरोंके समान सब देवलोग जिनके कमलविजयी चरणोंकी सेवा करते हैं और जो तीन लोकके गुरु हैं ऐसे श्री भगवान् वृषभदेवकी सेवा करनेवाले तुम सबको वे ही कल्याण प्रदान करनेवाले हों ।।४००।।
They who, like a mighty leader, marched with the fourfold army of the fourfold religious practices and utterly vanquished the vast enemy of sin; they who attained a resplendent form akin to a radiant golden rock; they whose lotus-victorious feet are served by swarms of celestial beings like bees; and they who stand as the supreme preceptors of the three worlds—may that glorious Lord Rishabhadeva, whom you all devotedly serve, bestow auspiciousness upon you all. ॥400॥
श्लोक ( Shlok ) 401
योऽभूत्पञ्चदशो विभुः कुलभृतां तीर्थेशिनां चाग्रिमो दृष्टो येन मनुष्यजीवन विधिर्मुक्तेश्च मार्गो महान् ।बोधो रोध विमुक्तवृतिरखिलो यस्योदयाद्यन्तिमः स श्रीमान् जनकोऽखिला ” वनिपते राद्यः स दद्याच्छ्रियम् ॥४०१॥
जो कुलकरोंमें पन्द्रहवें कुलकर थे, तीर्थ करोंमे प्रथम तीर्थ कर थे, जिन्होंने मनुष्योंकी जीविका की विधि और मोक्षका महान् मार्ग प्रत्यक्ष देखा था, जिन्हें आवरणसे रहित पूर्ण अन्तिम -केवलज्ञान उत्पन्न हुआ और जो समस्त पृथिवीके अधिपति भरत चक्रवर्तीके पिता थे वे श्रीमान् प्रथम तीर्थ कर तुम सबको लक्ष्मी प्रदान करें ॥ ४०१॥
He who was the fifteenth Kulakara among the noble progenitors of mankind, the first Tirthankara among the enlightened ford-makers; he who revealed the righteous means of livelihood for humankind and directly perceived the great path to liberation; he who attained the final, unobstructed, and perfect Kevala Jnana; he who was the revered father of Emperor Bharata, the sovereign of the entire earth—may that illustrious First Tirthankara bestow upon you all the blessings of prosperity and divine fortune. ॥401॥
श्लोक ( Shlok ) 402
साक्षात्कृत प्रथितसप्तपदार्थसार्थः सद्धर्मतीर्थपथपालनमूलहेतुः ।भव्यात्मनां भवभृतां स्वपरार्थसिद्धि-मिक्ष्वाकुवंशवृषभो वृषभो विदध्यात् ॥॥॥४०२॥
जिन्होंने प्रसिद्ध सप्त पदार्थोंके समूह को प्रत्यक्ष देखा है और जो समीचीन धर्मरूपी तीर्थके मार्गकी रक्षा करनेमें मुख्य हेतु हैं ऐसे इक्ष्वाकु वंशके प्रमुख श्री वृषभनाथ भगवान् संसारी भव्य प्राणियोंको मोक्षरूपी आत्माकी उत्कृष्ट सिद्धिको प्रदान करें ।॥ ४०२।।
He who directly beheld the renowned assemblage of the seven eternal principles, who stands as the foremost guardian of the sacred path of the true and righteous Dharma, and who is the illustrious Lord Rishabhanatha, the eminent scion of the Ikshvaku lineage—may he bestow upon all noble, yet wandering souls the supreme perfection of self-realization that is liberation itself. ॥402॥
श्लोक ( Shlok ) 403
यो नाभेस्तनयोऽपि विश्वविदुषां पूज्यः स्वयम्भूरिति त्यक्ताशेषपरिग्रहोऽपि सुधियां स्वामीति यः शब्द्यते ।मध्यस्थोऽपि विनेयसत्त्वसमितेरेवोपकारी मतो निर्दानोऽपि बुधैरपास्य चरणो यः सोऽस्तु वः शान्तये ॥४०३॥
जो नाभिराजके पुत्र होकर भी स्वयंभू हैं अर्थात् अपने आप उत्पन्न हैं, समस्त विद्वानोंके पूज्य हैं, समस्त परिग्रहका त्याग कर चुके हैं फिर भी विद्वानों-के स्वामी कहे जाते हैं, मध्यस्थ होकर भी भव्यजीवोंके समूहका उपकार करनेवाले हैं और दानरहित होनेपर भी विद्वानोंके द्वारा जिनके चरणोंकी सेवा की जाती है ऐसे भगवान् वृषभ-देव तुम सबकी शान्तिके लिये हों अर्थात् तुम्हें शान्ति प्रदान करनेवाले हों ।।४०३।।
Though born as the son of King Nabhi, he is self-existent, sprung forth of his own accord; he is revered by all the wise, having renounced every possession yet hailed as the Lord of the learned; dwelling in serene equanimity yet ever benevolent to assemblies of noble souls; and though devoid of worldly gifts, still worshipped at his lotus feet by the enlightened—may that Lord Rishabhadeva grant you all abiding peace and tranquillity. ॥403॥
इत्यार्षे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणश्रीमहापुराणसङ्ग्रहे प्रथमतीर्थङ्करचक्रधरपुराणं नाम सप्तचत्वारि-शत्तमं पर्व परिसमाप्तम् ।॥४७॥
इस प्रकार भगवान् गुणभद्राचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण श्रीमहापुराण संग्रहके हिन्दी भाषानुवादमें प्रथम तीर्थ कर और प्रथम चक्रवर्तीका वर्णन करनेवाला यह सैंतालीसवां पर्व पूर्ण हुआ ।
Thus is completed the forty-seventh canto in this Hindi translation of the Śrī Mahāpurāṇa Saṅgraha, composed by the venerable Āchārya Guṇabhadra, which narrates the glorious account of the First Tīrthaṅkara and the First Universal Monarch.
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367 | जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 219 | जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 303 | श्लोक 304 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 342 | श्लोक 343 से 354 | श्लोक 355 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 391