आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 256 to 271
श्लोक ( Shlok ) 256
कदाचिद् वत्सविषये सुसीमा नगरे मुनेः । शिवघोषस्य कैवल्यमुदपाद्यस्तघातिनः ॥२५६॥
किसी एक दिन वत्स देशमें सुसीमानगरीके समीप घातिया कर्म नष्ट करनेवाले शिवघोष मुनिराजको केवलज्ञान उत्पन्न हुआ ॥२५६।।
One day, near the city of Susima in the land of Vatsa, the venerable sage Shivaghosa, having destroyed the destructive ghatiya karmas, attained omniscience (kevalajnana). ॥256॥
श्लोक ( Shlok ) 257 – 259
शक्र प्रिये शची मेनका च नत्वा जिनेश्वरम् । समाश्रित्य सुराधीशं स्थिते प्रश्नात्’ सुरेशितुः ॥२५७।। अत्रैव सप्तमेऽन्हि प्राक् “समाप्त्तश्रावकव्रते । नाम्ना ‘पुष्यवती सान्त्या प्रथमा पुष्पपालिता ॥ २५८॥’कुसुमावचयासक्ते वने सर्वाग्निहेतुना । मृते देव्यावजायेतामित्याहासौ स्म तीर्थकृत् ॥२५९ ॥
उस उत्सवमें शची और मेनका नामकी देवांगनाएं भी इन्द्रके साथ आईं और श्रीजिनेन्द्रदेवको नमस्कारकर इन्द्रके पास ही बैठ गई । इन्द्रने भगवान्से पूछा कि ये दोनों किस कारणसे देवियां हुई हैं ? तब तीर्थ कर देव कहने लगे कि दोनों ही पूर्वभवमें मालिनकी लड़कियां थीं, पहलीका नाम पुष्पपालिता था और दूसरीका पुष्पवती । इन दोनोंने आजसे सातवें दिन पहले श्रावकव्रत लिये थे । एक दिन ये वनमें फूल तोड़नेमें लगी हुई थीं कि सर्परूपी अग्निके कारण मर गई और मरकर देवियां हुई हैं ।॥ २५७-२५९॥
At that auspicious celebration, two celestial maidens named Shachi and Menaka also descended alongside Indra. Having offered their salutations to the glorious Lord Jina, they seated themselves near Indra. Then Indra inquired of the Blessed Lord, “By what cause have these two become goddesses?”The Tirthankara replied, “In their former births, both were daughters of a gardener; the first was named Pushpapalita, and the second, Pushpavati. Seven days ago, both embraced the vows of a householder (shravaka-vrata). One day, while they were gathering flowers in the forest, they perished from the flames of a serpent’s fiery breath and, through the fruits of their vows, were reborn as celestial beings.” ॥257–259॥
श्लोक ( Shlok ) 260 – 261
प्रभावतीवरी देवी श्रुत्वा देवश्च तत्पतिः । स्वपूर्वभवसम्बन्धं तत्रागातां सभावनेः ॥२६०॥ निजान्य जन्म सौख्यानुभूतदेशान्निजेच्छया । आलोकयन्तौ तत्सर्पसरोवणसमीपगौ ॥२६१॥
हिरण्यवर्मा और प्रभावती-के जीव जो देवदेवी हुए थे उन्होंने भी उस समय समवसरणमें अपने पूर्वभवके सम्बन्ध सुने और फिर दोनों ही सभाभूमिसे निकलकर इच्छानुसार पूर्वभव सम्बन्धी सुखानुभवनके स्थानोंको देखते हुए सर्पसरोवरके समीपवाले वनमें पहुंचे ॥ २६०-२६१॥
The souls of Hiranyavarma and Prabhavati, who had become celestial beings, also heard the account of their former births while present in that divine assembly (samavasarana). Thereafter, both departed from the gathering place and, at their will, journeyed through various sites linked to the joys and events of their previous lives, until they arrived at the forest near the Serpent Lake (Sarpasarovara). ॥260–261॥
श्लोक ( Shlok ) 262
सह सार्थेन भीमाख्यं साधुं दृष्ट्वा समागतम् । विनयेनाभिवन्द्यैनं धर्म तौ समपृच्छताम् ॥२६२॥
उस वनमें अपने संघके साथ साथ एक भीम नामके मुनि भी आये हुए थे, दोनोंने उन्हें देखकर विनयपूर्वक नमस्कार किया और धर्मका स्वरूप पूछा ।। २६२।।
In that forest, a sage named Bhima had also arrived along with his monastic retinue. Beholding him, both of them reverently offered salutations and inquired into the true nature of Dharma. ॥262॥
श्लोक ( Shlok ) 263 – 264
मुनिस्तद्वचनं श्रुत्वा नाहं धर्मोपदेशन । सर्वागमार्थवित्कार्येऽसमर्थो नवसंयतः ॥२६३॥ प्ररूपयिष्यते किञ्चित् स दुष्मदनुरोधतः । मया तथापि श्रोतव्यं यथाशदत्यवधानवत् ॥२६४।।
उनके वचन सुनकर मुनि कहने लगे कि अभी नवदीक्षित हूँ, धर्मका उपदेश देना तो समस्त शास्त्रोंका अर्थ जाननेवाले मुनियोंका कार्य है इसलिये यद्यपि मैं धर्मोपदेश देनेमें समर्थ नहीं हूं तथापि तुम्हारे अनुरोधसे शक्तिके अनुसार कुछ कहता हूँ तुम लोगोंको सावधान होकर सुनना चाहिये ॥ २६३-२६४॥
Hearing their words, the sage spoke, “I am newly initiated and the exposition of Dharma is the duty of those monks who are well-versed in the full import of the scriptures. Therefore, though I am not fully capable of imparting the teachings of Dharma, yet at your earnest request, I shall say what I can; you must listen with attentive minds.” ॥263–264॥
श्लोक ( Shlok ) 265 – 266
इति सम्यक्त्वसत्पात्रदानादि श्रावकाश्रयम् । “यमादियतिसम्बन्धं धर्मं गतिचतुष्टयम् ॥२६५॥तद्धेतुफलपर्यन्तं भुक्तिमुक्तिनिबन्धनम् । जीवादिद्रव्यत्तत्त्वं च यथावत् प्रत्यपादयत् ॥ २६६॥
यह कहकर उन्होंने सम्यग्दर्शन तथा सत्पात्रदान आदि श्रावक सम्बन्धी और यम आदि मुनि सम्बन्धी धर्मका निरूपण किया । चारों गतियां, उनके कारण और फल, स्वर्ग मोक्षके निदान एवं जीवादि द्रव्य और तत्त्व इनसबका भी यथार्थ प्रतिपादन किया ॥ २६५-२६६॥
Having spoken thus, he expounded upon right faith (samyagdarshana), the giving of alms to the worthy, and other duties pertaining to householders, as well as the vows (yamas) and disciplines of monks. He set forth the nature of the four destinies, their causes and fruits, the means of attaining heaven and liberation, and offered a true exposition of the substances beginning with the soul (jiva) and the fundamental principles (tattvas). ॥265–266॥
श्लोक ( Shlok ) 267
तच्श्रुत्वा पुनरप्याभ्यां भवता केन हेतुना । प्रव्रज्येत्यनुयुक्तो ऽसौ वक्तुं ‘प्रक्रान्तवान् मुनिः ॥२६७।।
वह सुनकर उन देव-देवियोंने फिर पूछा कि आपने किस कारणसे दीक्षा धारण की हैं इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिराज कहने लगे ।।२६७।।
Hearing this discourse, the celestial beings then asked, “What was the cause for which you embraced renunciation?” Thus questioned, the venerable sage began to speak. ॥267॥
श्लोक ( Shlok ) 268
विदेहे पुष्कलावत्यां नगरी पुण्डरीकिणी । तत्राहं भीमनामाऽऽसं स्वपापाद् दुर्गते” कुले ॥२६८॥
विदेहक्षेत्रके पुष्कलावती देशमें एक पुण्डरीकिणी नगरी है वहांपर मैं अपने पापोंके कारण एक अत्यन्त दरिद्र कुलमें उत्पन्न हुआ था। मेरा नाम भीम है ॥ २६८।।
In the land of Pushkalavati, situated within the Videha region, lies the city of Pundarikini. There, owing to the burden of my past misdeeds, I was born into an exceedingly impoverished family. My name is Bhima. ॥268॥
श्लोक ( Shlok ) 269
अन्येद्युर्यतिमासाद्य किञ्चित्कालादिलब्धितः । श्रुत्वा धर्मं ततो लेभे गृहिमूलगुणाष्टकम् ॥२६९ ।।
किसी अन्य दिन थोड़ी सी काललब्धि आदिके निमित्तसे मैं एक मुनिराजके पास पहुंचा और उनसे धर्मश्रवण कर मैंने गृहस्थोंके आठ मूल गुण धारण किये ॥ २६९।।
On another day, through the conjunction of a brief span of auspicious karma and other favorable conditions, I came into the presence of a venerable monk. Hearing his discourse on Dharma, I adopted the eight fundamental virtues of a householder. ॥269॥
श्लोक ( Shlok ) 270 – 271
तज्ज्ञात्वा मत्पिता पुत्र किमेभिर्दुष्करैर्वृथा । दारिद्य्र कर्दमालिप्तदेहानां निष्फलैरिह ॥२७०॥व्रतान्येतानि दास्यामस्तस्मै स्वर्लोककाङ्क्षिणे । ऐहिकं फलमिच्छामो भवेद्येनेह जीविका ॥२७१॥
जब हमारे पिताको इस बातका पता चला तब वे कहने लगे कि “दरिद्रतारूपी कीचड़से जिनका समस्त शरीर लिप्त हो रहा है ऐसे हम लोगोंको इन व्यर्थके कठिन व्रतोंसे क्या प्रयोजन है। इनका फल इस लोकमें तो मिलता नहीं है, इसलिये आओ, ये व्रत स्वर्गलोककी इच्छा करनेवाले उसी मुनिके लिये दे आवें। हम तो इस लोकसम्बन्धी फल चाहते हैं जिससे कि जीविका चल सके ॥ २७०-२७१।।
When my father came to know of this, he declared, “We, whose entire bodies are mired in the mud of poverty, have no use for these futile and arduous vows. Their fruits are not reaped in this very life. Therefore, come, let us offer these vows to that monk himself, who aspires for heaven. We, for our part, seek worldly gains, by which our livelihood may be sustained.” ॥270–271॥
श्लोक 272 से 286
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255