श्लोक 1–8 : अजितनाथ पुराण की मंगलाचरण और विमलवाहन का धर्माभिमुख जीवन
भगवान अजितनाथ अनन्तचतुष्टय और अष्टप्रातिहार्य से विभूषित ऐसे तीर्थंकर हैं जिनकी निर्मल वाणी भव्य जीवों के राग-द्वेषरूपी मल को धो देती है। उनके चरित्र का श्रवण मोक्षलक्ष्मी की प्राप्ति कराने वाला है। पूर्वविदेह क्षेत्र के वत्स देश में सुसीमा नगर के राजा विमलवाहन अत्यंत गुणवान, न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ थे। वे उत्साह, मन्त्र और फलशक्ति से सम्पन्न होकर प्रजा का पुत्रवत पालन करते थे। उन्होंने यह समझकर कि धर्म ही पुण्य, अर्थ और काम का मूल है, जैनधर्म को अपनाया। जब उनके घातक कषाय क्षीण हुए तब उन्हें आत्मजागरण हुआ और वे संसार से विरक्त होकर जीवन की क्षणभंगुरता पर विचार करने लगे।
श्लोक 9–20 : वैराग्य, दीक्षा, तीर्थंकर नामकर्म और विजय विमान
राजा विमलवाहन ने आयु की क्षणभंगुरता समझकर आशारूपी बन्धनों को तोड़ दिया और राज्य त्यागकर अनेक राजाओं सहित जिनदीक्षा धारण की। कठोर तप, शास्त्रज्ञान और सोलह भावनाओं के चिंतन से उन्होंने तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया। समाधिमरण के पश्चात वे विजय नामक अनुत्तर विमान में देव हुए, जहाँ उन्होंने दिव्य सुखों का उपभोग किया। पृथ्वी पर अवतरण के छह माह पूर्व भरतक्षेत्र के राजा जितशत्रु के यहाँ प्रतिदिन रत्नवृष्टि होने लगी, जो तीर्थंकर प्रकृति के प्रभाव का सूचक था।
श्लोक 21–31 : माता के स्वप्न, अजितनाथ का जन्म और राजवैभव
रानी विजयसेना ने सोलह शुभ स्वप्न देखे और राजा जितशत्रु ने उनके गर्भ में तीर्थंकर के अवतरण की घोषणा की। माघ शुक्ल दशमी को भगवान अजितनाथ का जन्म हुआ। देवों ने मेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक कर उन्हें अजितनाथ नाम दिया। वे द्वितीय तीर्थंकर बने। उनका शरीर सुवर्णवर्ण, विशाल और अद्भुत तेज से युक्त था। उचित समय पर उन्होंने राज्य प्राप्त किया और दीर्घकाल तक राज्य तथा भोगों का उपभोग करते हुए भी भीतर से वैराग्य की दिशा में अग्रसर रहे।
श्लोक 32–41 : वैराग्य, दीक्षा और केवलज्ञान की भूमिका
एक दिन महल की छत पर उल्का देखकर अजितनाथ को लक्ष्मी की अस्थिरता का बोध हुआ और वे तत्काल वैराग्य से भर उठे। लौकान्तिक देवों ने उनके इस निर्णय की प्रशंसा की। उन्होंने राज्य अपने पुत्र अजितसेन को सौंप दिया और देवों द्वारा दीक्षाभिषेक के बाद सहेतुक वन में एक हजार राजाओं सहित संयम धारण किया। दीक्षा लेते ही उन्हें मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त हुआ। तत्पश्चात उन्होंने आहार ग्रहण किया और बारह वर्षों तक तपश्चर्या कर आत्मशुद्धि की दिशा में अग्रसर रहे।
श्लोक 42–51 : केवलज्ञान, धर्मसंघ और विश्वविहार
पौष शुक्ल एकादशी को अजितनाथ को केवलज्ञान प्राप्त हुआ और वे सर्वज्ञ बने। उनके विशाल धर्मसंघ में गणधर, मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ सम्मिलित थे। समवसरण में वे संसार, मोक्ष, कारण और फल का उपदेश देते रहे। वे अष्टप्रातिहार्यों से विभूषित, घातिया कर्मों के विजेता और ‘अजित’ नाम के पूर्णतः सार्थक स्वरूप बने। उन्होंने समस्त आर्यक्षेत्र में विहार कर धर्मप्रभावना की और अंततः सम्मेदाचल पहुँचे।
श्लोक 52–61 : मोक्ष, धर्ममहिमा और सगर चक्रवर्ती की भूमिका
सम्मेदाचल पर भगवान अजितनाथ ने शुक्लध्यान द्वारा समस्त कर्मक्षय कर चैत्र शुक्ल पंचमी को मोक्ष प्राप्त किया। उनका जीवन विमलवाहन से देव और फिर तीर्थंकरत्व तक आत्मविजय की महान यात्रा है। धर्म, सोलह भावनाओं और शुद्ध ध्यान की महिमा का प्रतिपादन करते हुए ग्रंथकार उनकी वंदना करता है। इसके बाद अजितनाथ के तीर्थ में उत्पन्न द्वितीय चक्रवर्ती सगर का चरित्र आरम्भ होता है। पूर्वविदेह के वत्सकावती देश में राजा जयसेन और रानी जयसेना के रतिषेण और धृतिषेण नामक दो तेजस्वी पुत्र थे। रतिषेण की अकाल मृत्यु से परिवार शोकसागर में डूब गया।
श्लोक 62–73 : जयसेन का वैराग्य और सगर का जन्म
पुत्रशोक से व्यथित राजा जयसेन और उनकी रानी मूर्छित हो गए, पर गुरु के उपदेश से जयसेन को संसार की नश्वरता का बोध हुआ। उन्होंने शरीर और परिग्रह को दुःखमूल मानकर धृतिषेण को राज्य सौंप दिया और अपने साले महारुत सहित दीक्षा ले ली। संन्यासमरण के बाद जयसेन अच्युत स्वर्ग में महाबल देव और महारुत मणिकेतु देव बने। वहाँ दोनों ने परस्पर यह संकल्प किया कि जो पहले मनुष्य जन्म लेगा, दूसरा उसे वैराग्य का उपदेश देगा। तत्पश्चात महाबल देव अयोध्या में राजा समुद्रविजय और रानी सुबाला के यहाँ सगर के रूप में जन्मे। सगर चक्रवर्ती दीर्घायु, दिव्य लक्षणों से युक्त, सुवर्णकान्तिमान और महान भविष्य वाले पुरुष बने।
श्लोक 74–84 : सगर का चक्रवर्ती वैभव और मणिकेतु का प्रथम उपदेश
सगर ने अठारह लाख पूर्व कुमारावस्था में बिताकर महामण्डलेश्वर पद प्राप्त किया और फिर चक्ररत्न प्रकट होने पर छह खण्डों की पृथ्वी पर दिग्विजय कर भरत चक्रवर्ती के समान सार्वभौम साम्राज्य स्थापित किया। अयोध्या लौटकर वह राज्यलक्ष्मी और भोगों में सुखपूर्वक स्थित रहा तथा उसके साठ हजार तेजस्वी पुत्र हुए। इसी समय केवलज्ञानी चतुर्मुख मुनि के समवसरण में मणिकेतु देव ने अपने पूर्वसखा महाबल को सगर रूप में पहचाना और उसे पूर्व प्रतिज्ञा स्मरण कराकर वैराग्य का उपदेश दिया। उसने भोगों की भयावहता और मोक्षमार्ग की महिमा समझाई, किन्तु काललब्धि के अभाव और सांसारिक आसक्ति के कारण सगर उस समय विरक्त न हो सका।
श्लोक 85–101 : मणिकेतु के पुनः प्रयास और राजपुत्रों की उत्सुकता
सगर की विमुखता देखकर भी मणिकेतु ने उसे नहीं छोड़ा और दूसरे उपाय से चारण ऋद्धिधारी मुनि का रूप धारण कर पुनः वैराग्योपदेश दिया। उसने यौवन, शरीर, संसार और कर्मबंधन की नश्वरता का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन किया, जिससे सगर क्षणिक रूप से प्रभावित तो हुआ, पर पुत्रमोह के कारण दीक्षा ग्रहण न कर सका। मणिकेतु ने समझ लिया कि सगर की सबसे बड़ी आसक्ति उसके पुत्र हैं। उधर सगर के वीर पुत्रों ने पिता से कोई महान कार्य माँगा जिससे उनका जीवन सार्थक हो सके और वे केवल भोगभोगी न कहलाएँ।
श्लोक 102–112 : कैलास पर कार्य, गंगापरिखा और मणिकेतु की कठोर नीति
प्रारम्भ में सगर ने पुत्रों को राज्यभोग का ही उपदेश दिया, पर उनके आग्रह पर उसने उन्हें धर्मकार्य सौंपा कि वे भरत चक्रवर्ती द्वारा निर्मित कैलास स्थित चौबीस जिनमन्दिरों के चारों ओर गंगा की परिखा बनाएँ। राजपुत्रों ने दण्डरत्न से यह कार्य शीघ्र पूर्ण कर दिया। तब मणिकेतु ने विचार किया कि हित के लिए कभी-कभी अप्रिय उपाय भी आवश्यक होते हैं। उसने दुष्ट नाग का रूप धारण कर उन अहंकारी राजकुमारों को मायामय भस्मावस्था में डाल दिया ताकि इस घटना से सगर को गहन वैराग्य प्राप्त हो सके।
श्लोक 113–121 : ब्राह्मण वेश में शोकसंदेश और यम पर प्रश्न
मंत्रियों ने सगर के पुत्रों के विनाश का समाचार सीधे देने का साहस नहीं किया। तब मणिकेतु ब्राह्मण रूप में सगर के पास पहुँचा और अपने पुत्र की मृत्यु का उदाहरण देकर यमराज की शक्ति पर प्रश्न उठाया। सगर ने उत्तर दिया कि मृत्यु अटल है और उससे बचाव केवल मोक्षमार्ग द्वारा संभव है; इसलिए शोक के स्थान पर वैराग्य और दीक्षा श्रेष्ठ हैं। तब ब्राह्मण-वेषधारी मणिकेतु ने अवसर देखकर संकेत दिया कि यदि मृत्यु इतनी प्रबल है, तो सगर को अपने ही पुत्रों के प्रसंग में इस सत्य को स्वीकार करना होगा।
श्लोक 122–131 : पुत्रशोक से वैराग्य, दीक्षा और राजकुमारों का जागरण
जब मणिकेतु ने सगर को बताया कि उसके पुत्र भी यम के अधीन हो चुके हैं, तब सगर शोक से मूर्छित हो गया; किन्तु चेतना आने पर उसने संसार, शरीर, यौवन और राज्य की नश्वरता को पहचान लिया। उसने भगीरथ को राज्य देकर दृढ़धर्मा केवली के पास दीक्षा धारण कर ली। इसके बाद मणिकेतु राजकुमारों के पास गया, उन्हें उनके पिता के वैराग्य की सूचना दी और अपनी मायाशक्ति से उन्हें सचेत किया। राजकुमारों ने भी जिनधर्म का आश्रय लेकर तपमार्ग स्वीकार किया।
श्लोक 132–143 : भगीरथ, गंगातीर्थ, मित्रधर्म और सगर की परम सिद्धि
भगीरथ ने भी मुनियों के दर्शन कर श्रावकधर्म ग्रहण किया। मणिकेतु ने अंततः अपनी समस्त योजना प्रकट कर क्षमा माँगी, पर सबने इसे हितकारी मित्रधर्म माना। सगर, उसके पुत्र और अन्य मुनिराज दीर्घ तप के बाद सम्मेदशैल से मोक्ष को प्राप्त हुए। बाद में भगीरथ ने भी राज्य त्यागकर दीक्षा ली; इन्द्र द्वारा उसके चरणाभिषेक से गंगा तीर्थरूप में प्रतिष्ठित हुई। गौतम स्वामी ने निष्कर्ष दिया कि सच्चा मित्र वही है जो हित के लिए कठिनतम उपाय भी करे; मणिकेतु इसका आदर्श उदाहरण है। जयसेन से महाबल देव, फिर सगर चक्रवर्ती और अंततः मोक्षगामी आत्मा बनने तक सगर का चरित्र वैभव से वैराग्य और वैराग्य से परम सिद्धि की महान यात्रा है।
उत्तरपुराण पर्व 48 – श्लोक 1 से 8
English translation of Uttar Puran parv 48- shlok1 to 8
श्लोक ( Shlok ) 1
श्रीमान् जिनोऽजितो जीयाद् यद्वचास्यमलान्यलम् । क्षालयन्ति जलानीव विनेयानां मनोमलम् ॥ १ ॥
अनन्तचतुष्टय रूप अन्तरङ्ग लक्ष्मी और अष्टप्रातिहार्य रूप बहिरङ्ग लक्ष्मीसे युक्त वे अजितनाथ स्वामी सदा जयवन्त रहें जिनके कि निर्दोष-पूर्वापरविरोध आदि दोपोंसे रहित वचन, जलकी तरह भव्य जीवोंके मनमें स्थित रागद्वेषादिरूप मलको धो डालते हैं ।॥ १ ॥
May Ajitanatha, ever triumphant, eternally reign—He who is adorned with the inner splendour of the infinite fourfold excellence (Ananta Chatuṣṭaya) and the outer majesty of the eight divine manifestations (Aṣṭa Prātihārya); whose flawless discourse, free from all blemishes such as inconsistency of past and future, washes away—like pure water—the impurities of attachment and aversion abiding in the hearts of receptive souls. ॥ 1 ॥
श्लोक ( Shlok ) 2
पुराणं तस्य वक्ष्येऽहं मोक्षलक्ष्मीसमागमः । श्रुतेन येन भव्यानामव्याहतमहोदयः ॥ २ ॥
मैं उन अजितनाथ स्वामीके उस पुराणको कहूँगा जिसके कि सुननेसे भव्य जीवोंको बाधाहीन महा-भ्युदयसे युक्त मोक्षरूपी लक्ष्मीका समागम प्राप्त हो जाता है ।। २ ।।
I shall expound that sacred Purāṇa of Ajitanatha, by the hearing of which the spiritually receptive souls attain the blessed union with the goddess-like Mokṣa—endowed with unobstructed and supreme exaltation. ॥ 2 ॥
श्लोक ( Shlok ) 3
इह जम्बूमति द्वीपे विदेहे प्राचि विश्रुते । सीतासरिदपाग्भागे वत्साख्यो विषयो महान् ॥ ३ ॥
इस जम्बूद्वीपके अतिशय प्रसिद्ध पूर्वविदेह क्षेत्रमें सीता नदीके दक्षिण तटपर वत्स नामका विशाल देश है ।॥ ३ ॥
In this Jambudvipa, within the exceedingly renowned region of Purvavideha, there lies to the southern bank of the Sita River a vast country known as Vatsa. ॥ 3 ॥
श्लोक ( Shlok ) 4
सुसीमानगर’ तस्मिन् विभूत्या विस्मयावहम् । नाम्नास्यनृपतिः प्राभूत् प्रभुर्विमलवाहनः ॥ ४ ॥
उसमें अपने वैभवसे आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला सुसीमा नामका नगर है। किसी समय इस सुसीमा नगरका राजा विमलवाहन था जो बड़ा ही प्रभावशाली था ।। ४ ।।
Within it stands a city named Susīmā, wondrous for the astonishment inspired by its own splendour. At one time, the ruler of this illustrious city of Susīmā was King Vimalavāhana, a sovereign of extraordinary power and influence. ॥ 4 ॥
श्लोक ( Shlok ) 5
गुणा गुर्णार्थिभिः प्रार्थ्या न्यायोऽयं चित्रमन्त्र तत् । गुणाः प्रणयिनः सर्वे स्वयं तं ‘वृण्वते स्म यत् ॥ ५ ॥
संसारमें यह न्याय प्रसिद्ध है कि गुणोंकी चाह रखनेवाले मनुष्य गुणोंकी खोज करते हैं परन्तु इस राजामें यह आश्वर्यकी बात थी कि स्नेहसे भरे हुये सभी गुण अपने आप ही आकर रहने लगे थे ।। ५ ।।
In this world, it is a well-known maxim that those who yearn for virtues go forth in search of them; yet, in this king lay a marvel—that all virtues, imbued with affection, of their own accord came and dwelt within him. ॥ 5 ॥
श्लोक ( Shlok ) 6
शक्तिसिद्धित्रयोपेतो यथान्यायमतन्द्रितः । प्रजाः स पालयामास विधाय स्वप्रजासमाः ॥ ६ ॥
वह राजा उत्साह शक्ति, मन्त्रशक्ति और फलशक्ति इन तीन शक्तियोंसे तथा उत्साहसिद्धि, मन्त्रसिद्धि और फल-सिद्धि इन तीन सिद्धियोंसे सहित था, आलस्यरहित था और अपनी सन्तानके समान न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करता था ।। ६ ।।
That king was endowed with the threefold powers—Utsāha-śakti (the power of endeavour), Mantra-śakti (the power of counsel), and Phala-śakti (the power of accomplishment); and likewise with the three attainments—Utsāha-siddhi, Mantra-siddhi, and Phala-siddhi. Free from indolence, he governed and protected his subjects with justice, cherishing them as though they were his own children. ॥ 6 ॥
श्लोक ( Shlok ) 7
धर्मादयस्ततोऽर्थोऽर्थात् कामो ऽये ऽनिष्ठिते, “न तौ । इति स्मरन् बभूवासौ जैनधर्मेण धार्मिकः ॥७॥
‘धर्मसे पुण्य होता है, पुण्यसे अर्थकी प्राप्ति होती है और अर्थसे काम-अभिलषित भोगोंकी प्राप्ति होती है, पुण्यके बिना अर्थ और काम नहीं मिलते हैं’ यही सोचकर वह राजा जैनधर्मके द्वारा सच्चा धर्मात्मा हो गया था ।॥ ७ ॥
Reflecting thus—“From Dharma arises merit (puṇya); from merit is gained wealth (artha); and from wealth are obtained the desired enjoyments (kāma). Without merit, neither wealth nor enjoyment can be attained”—that king, through the path of the Jain Dharma, became a true and righteous soul. ॥ 7 ॥
श्लोक ( Shlok ) 8
स कदाचित् समुत्पन्नबोधिः सब्ज्वलनोदयी । स्वगतं जातसंवेदो रहस्येवमचिन्तयत् ॥ ८ ॥
किसी समय उस राजाके अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण कषायका उदय दूर होकर सिर्फ संज्वलन कषायका उदय रह गया उसी समय उसे आत्मज्ञान अथवा रत्नत्रयकी प्राप्ति हुई और वह संसारसे विरक्त हो मन ही मन एकान्तमें इस प्रकार विचार करने लगा ।॥ ८ ॥
At a certain time, the rise of his Anantānubandhī, Apratyākhyānavaraṇa, and Pratyākhyānavaraṇa passions subsided, leaving only the mild Sanjvalana passions in operation. At that very moment, he attained self-realization—indeed, the attainment of the Ratnatraya (the Three Jewels); and, becoming detached from worldly existence, he began to reflect inwardly, in solitude, in the following manner. ॥ 8 ॥
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अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्तीका वर्णन
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आदिपुराण सारांश :
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