आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 284 to 303
श्लोक ( Shlok ) 284
एष पात्रविशेषस्ते संबोढ शासनं महत् । इति विश्वमहीशेन’ देवदेवस्य सोऽर्पितः ॥२८४॥
उस समय भगवान् ऋषभदेवके समीप जयकुमार ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो आपके बड़े भारी शासनको धारण करनेके लिये यह एक विशेष पात्र है यही समझकर महाराज भरत-ने उसे भगवान्के लिये सौंपा हो ।॥ २८४।।
At that time, Jayakumar appeared so resplendent as he stood before the venerable Bhagavan Rishabhadeva that it seemed he was a singularly worthy vessel, destined to uphold the great dominion of the Lord; as though Emperor Bharata himself had entrusted him to the service of the Blessed One. ॥284॥
श्लोक ( Shlok ) 285 – 286
कृतग्रन्थपरित्यागः प्राप्तग्रन्थार्थ सङ्ग्रहः । प्रकृष्टं संयमं प्राप्य सिद्धसप्तर्द्धिवर्द्धितः ॥२८५।। चतुर्ज्ञाना मलज्योतिर्हताततमनस्तमाः । अभूद गणधरो भर्तुरे कसप्ततिपूरकः ॥२८६॥
इस प्रकार जिसने सब परिग्रहका त्याग कर दिया है, सम्पूर्ण श्रुतका अर्थसंग्रह प्राप्त किया है, जो उत्कृष्ट संयम धारणकर सात ऋद्धियोंसे निरन्तर बढ़ रहा है, और चार ज्ञानरूपी निर्मल ज्योतिसे जिसने मनका विस्तीर्ण अंधकार नष्ट कर दिया है ऐसा वह जयकुमार भगवान का इकहत्तरवां गणधर हुआ ॥२८५-२८६॥
Thus, having renounced all possessions, mastering the full import of the sacred scriptures, upholding supreme self-restraint, continually advancing through the seven kinds of spiritual powers (riddhis), and dispelling the vast darkness of the mind with the pure light of the fourfold knowledge, Jayakumar became the seventy-first Ganadhara—a chief disciple—of the Blessed Lord. ॥285–286॥
श्लोक ( Shlok ) 287 – 303
सुलोचनाप्यसंहार्यशोका पतिवियोगतः । गलिताकल्पवल्लीव “प्रम्लानामरभूरुहात् ॥ २८७॥ शमिता चक्रवर्तीष्टकान्तयाऽशु सुमद्रया । ब्राह्मीसमीपे प्रव्रज्य भाविसिद्धिश्चिरं तपः ॥२८८॥कृत्वा विमाने साऽनुत्तरेऽभूत् कल्पेऽच्युतेऽमरः । आदितीर्थाधिनाथोऽपि मोक्षमार्ग प्रवर्तयन् ॥२८९॥चतुरुत्तरयाऽशीत्या विविधर्द्धिविभूषितै । चिरं वृषभसेनाविगणेशैः परिवेष्टितः ॥२९०।।खपञ्चसप्तवार्राशिमितपूर्वधरान्वितः । खपञ्चैकचतुर्मेय शिक्षकैर्मुनिभिर्युतः ॥२९१॥ तृतीयज्ञानसन्नेत्रैः सहस्रैर्नवभिर्वृतः’ । केवलावगमैविंशतिसहस्त्रैः समन्वितः ॥२९२॥खद्वयर्तुं खपक्षोरुविक्रियर्द्धि विवर्द्धितः । स्त्रपञ्चसप्तपक्षैकमिततुर्य विदन्वितः ॥२९३॥ तावद्भिर्वादिभिर्वन्द्यो निरस्तपरवादिभिः । चतुरष्टखवार्द्ध्यष्टमितैः सर्वैश्च पिण्डितैः ॥२९४॥संयमस्थानसम्प्राप्तसम्पद्भिस्सद्भिर्चितः । खचतुष्केन्द्रियाग्न्युक्तपूज्यब्राह्मयार्यिकादिभिः ॥२९५॥आर्यिकाभिरभिष्ट्यूमाननाना गुणोदयः । दृढव्रतादिभिर्लक्षत्रयोक्तैः श्रावकैः श्रितः ॥ २९६॥श्राविकाभिः स्तुतः पञ्चलक्षाभिः सुव्रतादिभिः । भावनादिचतुर्भेददेवदेवीडितक्रमः ॥२९७॥चतुष्पदादिभिस्तिर्यग्जातिभिश्चाभिषेवितः । चतुस्त्रिशदतीशेष ‘विशेषैर्लक्षितोदयः ॥२९८॥आत्मोपाधिविशिष्टावबोधदृक् सुखवीर्यसद् । देहसौन्दर्य वासोक्त सप्तसंस्थानसंगतः ॥२९९॥प्रातिहार्याष्टको द्दिष्टनष्टघातिचतुष्टयः । वृषभाद्यन्वितार्थाष्टसहस्रा ह्वयभाषितः ॥३००॥ विकासित विनेयाम्बु जावलिर्वजनांशुभिः । सॅवृताञ्जलिपङ् केजमुकुलेनाखिलेशिना ॥३०१॥भरतेन समभ्यर्च पृष्टो धर्ममभाषत । ध्रियते धारयत्युच्चै र्विनेयान् “कुगतेस्ततः ॥३०२॥ धर्म इत्युच्यते सद्भिश्चतुर्भेदं समाश्रितः । सम्यग्दृक्ज्ञानचारित्रतपोरूपः कृपापरः ॥३०३॥
इधर पतिके वियोगसे जिसे बड़ा भारी शोक रहा है और जो पड़े हुए कल्पवृक्षसे नीचे गिरी हुई कल्पलताके समान निष्प्रभ हो गई है ऐसी सुलोचनाने भी चक्रवर्तीकी पट्टरानी सुभद्राके समझाने पर ब्राह्मी आयिकाके पास शीघ्र ही दीक्षा धारण कर ली और जिसे आगामी पर्यायमें मोक्ष होनेवाला है ऐसी वह सुलोचना चिरकाल तक तप कर अच्युतस्वर्गके अनुत्तरविमानमें देव पैदा हुई ।
इधर जो मोक्षमार्गकी प्रवृत्ति चला रहे हैं, अनेक ऋद्धियोंसे सुशोभित वृषभसेन आदि चौरासी गणधरोंसे घिरे हुए हैं, चार हजार सात सौ पचास पूर्वज्ञानियोंसे सहित हैं, चार हजार एक सौ पचास शिक्षक मुनियोंसे युक्त हैं, नौहजार अवधिज्ञानरूपी नेत्रको धारण करनेवाले मुनियोंसे सहित हैं, बीस हजार केवलज्ञानियोंसे युक्त हैं, बीस हजार छह सौ विक्रिया ऋद्धिके धारक मुनियोंसे वृद्धिको प्राप्त हो रहे हैं, बारह हजार सात सौ पचास मनःपर्ययज्ञानियोंसे अन्वित हैं, परवादियोंको हटानेवाले बारह हजार सात सौ पचास वादियोंसे वन्दनीय हैं, और इस प्रकार सब मिलाकर तपश्चरणरूपी सम्पदाओंको प्राप्त करनेवाले चौरासी हजार चौरासी मुनिराज जिनकी निरन्तर पूजा करते हैं, ब्राह्मी आदि तीन लाख पचास हजार आर्यिकाएं जिनके गुणोंका स्तवन कर रही हैं, दृढव्रत आदि तीन लाख श्रावक जिनकी सेवा कर रहे हैं, सुव्रता आदि पांच लाख श्राविकाएं जिनकी स्तुति कर रही हैं, भवनवासी आदि चार प्रकारके देव देवियां जिनके चरणकमलोंका स्तवन कर रही हैं, चौपाये आदि तिर्यञ्चगतिके जीव जिनकी सेवा कर रहे हैं, चौंतीस अतिशय विशेषोंसे जिनका अभ्युदय प्रकट हो रहा है, जो केवल आत्मा से उत्पन्न होनेवाले विशिष्ट ज्ञान, विशिष्ट दर्शन, विशिष्ट सुख और विशिष्ट वीर्यको प्राप्त हो रहे हैं, जो शरीरकी सुन्दरतासे युक्त हैं, जो सज्जाति आदि सात परम स्थानोंसे संगत हैं, जो आठ प्रातिहार्योंसे युक्त हैं, जिन्होंने चार घातिया कर्म नष्ट कर दिये हैं, जो वृषभ आदि एक हजार आठ नामोंसे कहे जाते हैं और जिन्होंने भव्य जीवरूपी कमलोंके वनको प्रफुल्लित कर दिया है ऐसे भगवान् वृषभदेवके पास जाकर मुकुलित कमलके समान हाथ जोड़े हुए चक्रवर्ती भरतने उनकी पूजा की और धर्मका स्वरूप पूछा तब भगवान् इस प्रकार कहने लगे— जो शिष्योंको कुगतिसे हटाकर उत्तम स्थानमें पहुंचा दे सत् पुरुष उसे ही धर्म कहते हैं । उस धर्मके चार भेद हैं- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और सम्यक्तप । यह धर्म कर्तव्य प्रधान है ।॥२८७-३०३॥
Meanwhile, Sulochana, overwhelmed with profound sorrow at her husband’s separation and grown pale like a heavenly creeper fallen from the wish-fulfilling celestial tree, was consoled by Subhadra, the chief queen of the Chakravartin. Thus persuaded, she soon approached Brahmi, the revered ascetic nun, and embraced initiation. Performing rigorous austerities for a long time, she—destined for liberation in her next birth—was reborn as a divine being in the supreme celestial palace (Anuttara Vimana) of the Achyuta heaven.At that time, the Lord Rishabhadeva, propagating the path of liberation, was surrounded by eighty-four Ganadharas of great splendor, including the illustrious Vrishabhasena; accompanied by four thousand seven hundred fifty monks who had mastered the complete sacred knowledge of the Purvas; attended by four thousand one hundred fifty teacher-monks; surrounded by nine thousand monks endowed with clairvoyant knowledge (Avadhi Jnana); enriched by twenty thousand omniscient monks; supported by twenty thousand six hundred monks who possessed the power of transformation (Vikriya Riddhi); accompanied by twelve thousand seven hundred fifty monks endowed with telepathic knowledge (Manahparyaya Jnana); revered by twelve thousand seven hundred fifty skilled debaters who silenced adversaries.In all, there were eighty-four thousand eighty-four ascetic monks adorned with the wealth of intense austerities, who ceaselessly worshiped the Blessed One. Moreover, three hundred fifty thousand Aryikas, including Brahmi, extolled his virtues; three hundred thousand laymen with firm vows served him; five hundred thousand devout laywomen, such as Suvrata, praised him; celestial beings and goddesses of the four orders of heavenly realms, including Bhavanavasi, offered their homage; animals and other beings of the lower realms rendered him service.Manifesting thirty-four extraordinary attributes, he shone with unique knowledge, perception, bliss, and energy—all arising solely from his purified soul; his form was adorned with matchless beauty; he was endowed with seven supreme places, such as the noble class (sajjati); he possessed the eight auspicious symbols (Ashta Pratiharya); he had annihilated the four destructive karmas; he was celebrated by one thousand eight names, including Vrishabha; and he had caused the forest of lotus-like noble souls to bloom into spiritual awakening.Then Emperor Bharata approached this Blessed Lord Rishabhadeva, joined his hands like a budding lotus before him, and offered reverent worship. With deep humility, he inquired into the true nature of Dharma. Thereupon, the Lord proclaimed:“A noble soul who rescues his disciples from evil destinies and leads them to the supreme state alone is said to embody Dharma. This Dharma has four divisions: right perception (Samyagdarshan), right knowledge (Samyagjnana), right conduct (Samyakcharitra), and right austerity (Samyaktapa). This Dharma is founded upon righteous action.” ॥287–303॥
श्लोक 304 से 321
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367 | जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 219 | जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283