आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241श्लोक 242 से 249 बाहुबली का युद्ध के लिए प्रस्थान
जिनेन्द्र वृषभदेव, जिन्होंने बिना युद्ध के कामदेव को जीता, सदा जयवंत रहते हैं। उनके आठ प्रातिहार्य तीनों लोकों की विजय के चिह्न हैं। बाहुबली को बंदीजन युद्ध में विजय की प्रेरणा देते हैं, कहते हैं कि उनकी भुजाएं भरत से श्रेष्ठ हैं। वे समय नष्ट न करने और जिनेन्द्र को नमस्कार करने का आह्वान करते हैं। बाहुबली शय्या छोड़कर, विशाल पराक्रमी सेना के साथ युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करते हैं, जैसे ऐरावत गंगा तट छोड़ता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 242 to 249
श्लोक ( Shlok ) 242
जयति समरभेरीभैरवारावभीमं बलमरचि न कूजच्चण्डकोदण्डकाण्डम् ।भ्रकुटिकुटिलमास्यं येन नाकारि वोच्चैः मनसिजरिपुघाते सोऽयमाद्यो जिनेशः ॥२४२॥
जिन्होंने जगद्विजयी कामदेवरूपी शत्रुको नष्ट करनेके लिये न तो युद्धके नगाड़ोंके भयंकर शब्दोंसे भीषण तथा शब्द करते हुए धनुषोंसे युक्त सेना ही रची और न अपना मुंह ही भौंहोंसे टेढ़ा किया वे प्रथम जिनेन्द्र भगवान् वृषभ-देव सदा जयवन्त रहें ।॥ २४२।।
Ever-victorious be the First Jina, Lord Ṛṣabhadeva,who, to vanquish the world-conquering foe Kāma,neither summoned the fearsome clangor of war-drums,nor marshaled armies armed with bows,
nor even furrowed his brow in anger.242
श्लोक ( Shlok ) 243
स जयति जिनराजो दुर्विभाव प्रभावः प्रभुरभिभवितुं यं “नाशकन्मारवोरः ।दिविजविजयदूरा रूढगर्वोऽपि गर्व न हृदि हृदिशयोऽधाद् यत्र “कुण्ठास्त्रवीर्यः ॥२४३॥
जो सब जगत्के स्वामी हैं, कामदेवरूपी योद्धा भी जिन्हें जीतने- के लिये समर्थ नहीं हो सका तथा जिनके सामने, देवोंको जीतनेसे जिसका अहंकार बढ़ गया है ऐसा कामदेव भी शस्त्र और सामर्थ्यके कुण्ठित हो जानेसे हृदयमें अहंकार धारण नहीं कर सका ऐसे अचिन्त्य प्रभावके धारक वे प्रसिद्ध जिनेन्द्रदेव सदा जयवन्त रहें ।। २४३।।
Ever-victorious be the renowned Jina Lord,the sovereign of all worlds,before whom even Kāma, the warrior,could not prevail;
who, having been vanquished by the gods themselves,was humbled in pride,and whose weapons and might were utterly powerless to rouse arrogance in his heart—such is the holder of the inconceivable power,ever triumphant, the illustrious Jina.243
श्लोक ( Shlok ) 244
जयति तरुरशोको दुन्दुभिः पुष्पवर्ष चमरिरुहसमेतं विष्टरं संहमुद्यम्’ ।वचनमसममुच्चै रातपत्रं च तेजः त्रिभुवनजयचिह्न यस्य सार्वो जिनोऽसौ ॥२४४।॥
अशोक वृक्ष, दुन्दुभि, पुष्पवृष्टि, चमर, उत्तम सिंहासन, अनुपम वचन, ऊंचा छत्र और भामण्डल ये आठ प्रातिहार्य जिनके तीनों लोकोंको जीतने के चिह्न हैं वे सबका हित करनेवाले श्री वृषभ-जिनेन्द्र सदा जयवन्त रहें ।॥२४४।।
The Ashoka tree, the drum’s resounding beat, showers of blossoms, the fan’s gentle flutter,a peerless throne, words unmatched in grace, a lofty canopy, and the radiant orb—these eight sacred symbols, marks of conquest over the three worlds,belong to the beneficent Lord Ṛṣabhadeva, the Jina,ever victorious, whose welfare embraces all.
श्लोक ( Shlok ) 245
जयति जननतापच्छेदि यस्य क्रमाब्जं विपुलफलदमारान्नम्रनाकीन्द्रभृङ्गम् ।समुपनतजनानां प्रीणनं कल्पवृक्ष-स्थितिमतनुमहिम्ना सोऽवतात्तीर्थकृद्धः ॥२४५॥
जिनके चरणकमल जन्मरूप संतापको नष्ट करनेवाले हैं, स्वर्ग मोक्ष आदि बड़े बड़े फल देनेवाले हैं, दूरसे नमस्कार करते हुए इन्द्र ही जिनके भ्रमर हैं और जो शरणमें आये हुए लोगोंको कल्पवृक्षके समान संतुष्ट करनेवाले हैं ऐसे वे तीर्थ कर भगवान् सदा विजयी हों और अपने विशाल माहात्म्यसे तुम सबकी रक्षा करें ।॥ २४५॥
May the lotus-feet of Him, whose birth destroys the pangs of worldly existence,bestowing great fruits such as heaven and liberation,be ever victorious—before whom even Indra’s bees hum in reverence from afar,and who, like the wish-fulfilling tree, grants fulfillment to all who seek refuge.May that Lord of sacred pilgrimage sites protect you allby His boundless greatness.245
श्लोक ( Shlok ) 246
नृ वर भरतराज्योऽप्यूर्जितस्यास्य युष्मद् भुजरिघयुगस्य प्राप्नुयान्नेव कक्षाम् । भुजबलमिदमास्तां दृष्टिमात्रेऽपि कस्ते रणनिषकगतस्य स्थातुमीशः क्षितीशः ॥२४६॥
हे पुरुषोत्तम, महाराज भरत भी आपके दोनों भुजारूपी अर्गलदण्डोंकी तुलना नहीं प्राप्त कर सकते हैं, अथवा भुजाओंका बल तो दूर रहे, जब आप युद्धके निकट जा पहुँचते हैं तब आपके देखने मात्रसे ही ऐसा कौन राजा है जो आपके सामने खड़ा रहनेके लिये समर्थ हो सके ।।२४६।।
O Purushottama, even the great King Bharat cannot compare to the might of your twin arm-like maces;indeed, far be it from matching your strength.When you advance to the battlefield,who among kings dares to stand firm before your very gaze?246
श्लोक ( Shlok ) 247
“तदलमधिप कालक्षेपयोगेन निद्रां जहिहि महति कृत्ये ‘जागरूकस्त्वमेधि ।सपदि च जयलक्ष्मीं प्राप्य भूयोऽपि देवं जिनम वनम भक्त्या शासितारं जयाय ॥२४७॥
इसलिये हे अधीश्वर, समय व्यतीत करना व्यर्थ है, निद्रा छोड़िये, इस महान् कार्यमें सदा जाग-रूक रहिये और शीघ्र ही विजयलक्ष्मीको पाकर अन्य सब जगह विजय प्राप्त करनेके लिये सबपर शासन करनेवाले देवाधिदेव जिनेन्द्रदेवको भक्तिपूर्वक फिरसे नमस्कार कीजिये ।।२४७।।
O Lord of the world, cast off slumber through the passage of time;
be ever watchful and steadfast in this great task.
Attain again the goddess of victory, and, devoted to the Jina,
rule the forest of the divine, leading all to triumph.247
श्लोक ( Shlok ) 248
इति समुचितैरुच्चैरुच्चाव चैर्जयमङ्गलैः सुघटितपदैर्भूयोऽमीभिर्जयाय विबोधितः ।शयनममुचश्न्निद्रापायात् स पार्थिवकुञ्जरः सुरगज इवोत्सङ्गं गङ्गाप्रतीरभुवः शनैः ॥२४८॥
इस प्रकार जिनमें अच्छे अच्छे पदोंकी योजना की गई है ऐसे अनेक प्रकारके उत्कृष्ट तथा राजाओंके योग्य, विजय करानेवाले मंगल-गीतोंके द्वारा बाहुबली महाराज विजय प्राप्त करनेके लिये जगे और जिस प्रकार ऐरावत हाथी निद्रा छूट जानेसे गंगाके किनारे-की भूमिका साथ धीरे धीरे छोड़ता है उसी प्रकार उन्होंने भी निद्रा छूट जानेसे धीरे धीरे शय्या-का साथ छोड़ दिया ॥ २४८॥
Thus, roused by many splendid and kingly victory-songs, artfully composed in noble metres,the mighty Lord of arms awakened to triumph;and just as the elephant Airāvata,upon waking, slowly leaves behind the riverbank of the Ganges,so too, stirred from sleep, he gradually rose from his couch.248
श्लोक ( Shlok ) 249
जयकरिघटाबन्धै ‘रुन्धन् दिशो मदविह्वलैः र्बलपरिवृढै रारूढश्रीरुदूढपराक्रमः । “नृपकतिपयै रारादेत्य प्रणम्य दिदृक्षितो भुजबलि युवा भेजे सैन्यैर्भुव समरोचिताम् ॥२४९॥
सेनाके मुख्य मुख्य लोगों के द्वारा जिसकी शोभा बढ़ रही है, जो स्वयं विशाल पराक्रम धारण किये हुए हैं और कितने ही राजा लोग दूर दूरसे आकर प्रणाम करते हुए जिसे देखना चाहते हैं ऐसा वह तरुण बाहुबली मदोन्मत्त विजयी हाथियोंकी घटाओंसे दिशाओंको रोकता हुआ सेनाके साथ साथ युद्धके योग्य भूमिमें जा पहुँचा ॥२४९।।
Adorned by the chief warriors of the host,he who himself bears immense valour,whom countless kings from far and wide approach to pay homage and behold—that young, mighty conqueror, intoxicated with pride,like clouds of victorious elephants halting the directions,advanced alongside the army to the battlefield fit for war.249
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्य प्रणीते त्रिषष्टिलक्षण श्रीमहापुराणसङग्रहे कुमारबाहुबलिरणोद्योग-वर्णन नाम पञ्चत्रिंशत्तमं पर्व ।। ३५ ॥
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत तिरसठशलाकापुरुषोंका वर्णन करनेवाले महापुराणसंग्रहमें कुमार बाहुबलीके युद्धका उद्योग वर्णन करनेवाला पैतीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ।।। ३५ ॥
Thus ends the thirty-fifth canto,describing the preparations for the battle of Prince Bāhubali,in the Mahāpurāṇa Saṅgraha, composed by the venerable Acharya Jinasena,ll35ll
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन
पर्व 36 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241
Download PDF