आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
श्लोक 92 से 101 बाहुबली का भरत को संबोधन
बाहुबली भरत को संबोधित कर कहते हैं कि उन्होंने मोहवश अनुचित साहस किया। उनका चक्र बाहुबली के शरीर पर निष्फल रहा, जैसे वज्र पर वज्र। भरत ने भाइयों की सामग्री नष्ट कर अधर्म और यश-हानि की। वे व्यंग्य करते हैं कि भरत ने कुल का उद्धार किया। बाहुबली राज्यलक्ष्मी को पापमय और नश्वर मानकर त्यागते हैं, क्योंकि यह बंधन सज्जनों के लिए नहीं। वे तपरूपी लक्ष्मी को अपनाने की इच्छा रखते हैं और अपनी चंचलता के लिए क्षमा मांगते हैं। उनकी वाणी भरत के संतप्त मन को शांत करती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 36 – Shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
शृणु भो नृपशार्दूल क्षणं “वैलक्ष्यमुत्सृज । मुह्यतेदं त्वयाऽलम्बि दुरीहमतिसाहसम् ॥९२॥
हे राजाओं-में श्रेष्ठ, क्षणभर के लिये अपनी लज्जा या झेंप छोड़, मैं कहता हूं सो सुन। तूने मोहित होकर ही इस न करने योग्य बड़े भारी साहस का संहारा लिया है ।।९२।।
“O foremost among kings, cast aside your fleeting shame and hesitation; hear now what I say. It is in delusion that you have embraced this grievous and ill-advised boldness.” ||92||
श्लोक ( Shlok ) 93
अभेद्ये मम देहाद्रौ त्वया चक्रं नियोजितम् । विद्धयकिञ्चित्करं वाज्रे शैले व ज्रमिवापतत् ॥९३॥
जो कभी भिद नहीं सकता । ऐसे मेरे शरीररूपी पर्वतपर तूने चक्र चलाया है सो तेरा यह चक्र वज्र के बने हुए पर्वतपर पड़ते हुए वज्र के समान व्यर्थ है ऐसा निश्चयसे समझ ॥९३।।
Upon the unyielding mountain of my body—one that can never be breached—you have hurled your discus. Know with certainty that your weapon strikes as futilely as a thunderbolt against a mountain forged of thunderbolts. ||93||
श्लोक ( Shlok ) 94
अन्यत्र भातृभाण्डानि भङक्त्वा राज्यं यदीप्सितम् । त्वया धर्मो यशश्चैव तेन “पेशलमर्जितम् ॥९४॥
दूसरी बात यह है कि जो तूने भाइयोंकी सामग्री नष्ट कर राज्य प्राप्त करना चाहा है सो उससे तूने बहुत ही अच्छा धर्म और यशका उपार्जन किया है ॥ ९४।॥
Secondly, know that by seeking to seize the kingdom through the destruction of your brothers’ possessions, you have in fact accrued great merit and fame. ||94||
श्लोक ( Shlok ) 95
चक्रभृद्भरतः स्त्रष्टुः सूनुद्यस्य योऽग्रणीः । कुलस्योद्धारकः सोऽभूदिती डाऽस्थापि च त्वया ॥९५॥
तूने अपनी यह स्तुति भी स्थापित कर दी कि चक्रवर्ती भरत आदिब्रह्मा भगवान् वृषभदेवका ज्येष्ठ पुत्र था तथा वह अपने कुलका उद्धारक हुआ था ।।९५।।
You have also firmly established this praise—that Chakravartin Bharata was the eldest son of the primordial Brahman, Lord Vrishabha-deva, and the illustrious savior of his lineage. ||95||
श्लोक ( Shlok ) 96
जितां च भवतैवाद्य यत्पापोपहतामिमाम् । मन्यसेऽनन्यभोगीनां नृपश्रियमनश्वरीम ॥९६॥
हे भरत, आज तूने जिसे जीता है और जो पापसे भरी हुई है ऐसी इस राज्य-लक्ष्मीको तू एक अपने ही द्वारा उपभोग करने योग्य तथा अविनाशी समझता है ।॥९६॥
O Bharata, today you have conquered what is steeped in sin—this very kingdom of fleeting fortune—and yet you deem it yours alone to enjoy, as if it were eternal and indestructible. ||96||
श्लोक ( Shlok ) 97
प्रेयसीयं तवैवास्तु राज्यश्रीर्या त्वयाऽदृता । नोचितैषा ममायुष्मन् बन्धो न हि सतां मुदे ॥९७॥
जिसका तूने आदर किया है ऐसी यह राज्यलक्ष्मी अब तुझे ही प्रिय रहे, हे आयुष्मन्, अब यह मेरे योग्य नहीं है क्योंकि बन्धन सज्जन पुरुषोंके आनन्दके लिये नहीं होता है। भावार्थ – यह लक्ष्मी स्वयं एक प्रकारका बन्धन है अथवा कर्म बन्धका कारण है इसलिये सज्जन पुरुष इसे कभी नहीं चाहते ॥९७॥
You have honored this fleeting fortune, yet now let it be dear to you alone, O long-lived one; for it is no longer fitting for me—since bonds are not meant for the joy of the virtuous.
—Meaning: This fortune itself is a kind of bondage, the root of karmic ties; hence, the noble seek to shun it. ||97||
श्लोक ( Shlok ) 98
दूषितां कटकैरेनां फलिनीमपि ते श्रियम् । करेणापि स्पृशेद् धीमान् लतां कण्टकिनीं च कः ॥९८॥
यद्यपि यह तेरी लक्ष्मी फलवती है तथापि अनेक प्रकारके कांटोंसे-विपत्तियोंसे दूषित है। भला, ऐसा कौन बुद्धिमान् होगा जो कांटेवाली लताको हाथसे छूएगा भी ।॥९८॥
Though this fortune of yours bears fruit, yet it is beset by countless thorns and afflictions. Indeed, who in their wisdom would willingly grasp a vine so laden with prickles? ||98||
श्लोक ( Shlok ) 99
विषकण्टकजालीव त्याज्यैषा सर्वथाऽपि नः । निष्कण्टकां तपोलक्ष्मीं स्वाधीनां कर्तुमिच्छताम् ॥९९॥
अब हम कंटक रहित तपरूपी लक्ष्मीको अपने आधीन करना चाहते हैं इसलिये यह राज्यलक्ष्मी हम लोगोंके लिये विषके कांटोंकी श्रेणीके समान सर्वथा त्याज्य है ।।९९।।
Now we seek to possess the fortune of asceticism, free from all thorns; therefore, this thorn-ridden kingdom’s fortune must be utterly forsaken by us, as one rejects the barbs of poison. ||99||
श्लोक ( Shlok ) 100
मृष्यतां च तदस्माभिः कृतमागो यदीदृशम् । प्रच्युतो विनयात् सोऽहं स्वं चापलमदीदृशम् ॥१००॥
अतएव जो मैंने यह ऐसा अपराध किया है उसे क्षमा कर दीजिये । मैं विनयसे च्युत हो गया था अर्थात् मैंने आपकी विनय नहीं की सो इसे में अपनी चंचलता ही समझता हूँ ।॥१००॥
Therefore, forgive me this transgression I have committed; I was led astray by arrogance and failed in humility—thus I acknowledge this as but a fault born of my own fickleness. ||100||
श्लोक ( Shlok ) 101
इत्युच्चरद् गिरामोधो मुखाद् बाहुबलीशितुः । ध्वनिरब्दादिवाऽऽतप्तं जिष्णोराह्लादयन्मनः ॥१०१।।
जिस प्रकार मेघसे निकलती हुई गर्जना संतप्त मनुष्योंको आनन्दित कर देती है उसी प्रकार महाराज बाहुबली के मुखसे निकलते हुए वाणीके समूहने चक्रवर्ती भरतके संतप्त मनको कुछ-कुछ आनन्दित कर दिया था ।। १०१।।
Just as the thunder that breaks forth from the clouds brings joy to troubled souls, so too did the words spoken by Mahārāja Bahubali soothe, in measure, the vexed heart of Chakravartin Bharata. ||101||
श्लोक 102 से 111
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
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