आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 212 to 223
श्लोक ( Shlok ) 212
तदा पुत्रवियोगेन सा सर्वदयिताऽचिरात् । स्त्रीवेदनिन्दनान्मृत्वा सम्प्रापज्जन्म पौरुषम् ॥२१२॥
सर्वदयिताने पुत्रके वियोगसे बहुत दिनतक स्त्रीवेदकी निन्दा की और मरकर पुरुष-का जन्म पाया ।।२१२॥
For a long time, tormented by the loss of her son, Sarvadayita condemned the very essence of womanhood. In the course of time, she died and was reborn as a man.॥212॥
श्लोक ( Shlok ) 213 – 214
ततः समुद्रदत्तोऽपि सार्थेनामा’ समागतः । श्रुत्वा स्वभार्यावृत्तान्तं निन्दित्वा भ्रातरं निजम् ॥२१३॥श्रेष्ठिनेऽनपराधाया गृहवेशनिवारणात् । अकुप्यन्नितरां कृत्यं कः सहेताविचारितम् ॥२१४॥
तदनन्तर समुद्रदत्त भी अपने झुण्डके साथ वापिस आ गया और अपनी स्त्रीका वृत्तान्त सुनकर अपने भाईकी निन्दा करने लगा । सेठने अपराधके बिना ही उसकी स्त्रीको घरमें प्रवेश करनेसे रोका था इसलिये वह सेठपर अत्यन्त क्रोध करता रहता था सो ठीक ही है क्योंकि जो कार्य बिना विचारे किया जाता है उसे भला कौन सहन कर सकता है ? ॥२१३-२१४॥
Thereafter, Samudradatta too returned with his companions. When he heard of all that had transpired with his wife, he began to reproach his brother bitterly. For the merchant had unjustly barred his innocent wife from their home, and Samudradatta’s heart burned with anger toward him. Truly, who can bear the consequences of actions done rashly, without thought or discernment?॥213–214॥
श्लोक ( Shlok ) 215 – 216
ज्येष्ठे न्यायगतं योग्ये मयि स्थितवति स्वयम् । श्रेष्ठित्वमयमध्यास्त इति श्रेष्ठिनि कोपवान् ॥२१५॥ वै वैश्रवणदत्तोऽपि स ससागरदत्तकः । सार्द्ध समुद्रदत्तेन मात्सर्याच्छ्रे ष्ठिनि स्थिताः ॥२१६॥
कुछ दिन बाद वैश्रवण सेठ सागरदत्तसे यह कहकर क्रोध करने लगा कि ‘जब मैं बड़ा हूं, और योग्य हूं तो न्यायसे मुझे सेठ पद मिलना चाहिये, मेरे रहते हुए यह सेठ क्यों बन बैठा है’। इसी प्रकार सागरदत्त और समुद्रदत्त भी सेठ के साथ ईर्ष्या करने लगे ।।२१५-२१६॥
Some days later, Vaishravana, filled with anger, confronted the merchant Sagardatta, declaring, “Since I am the elder and the rightful one, by all justice the position of chief merchant should be mine. How has he assumed this title while I yet live?”In the same way, Sagardatta and Samudradatta too began to harbour jealousy and resentment toward the chief merchant.॥215–216॥
श्लोक ( Shlok ) 217 – 218
दुस्सहे तपसि श्रेयो मत्सरोऽपि क्वचित् नृणाम् । अन्येद्युर्जितशत्रु तं दृष्ट्वा श्रेष्ठी कुतो भवान् ॥२१७।।’समुद्रदत्तसारूप्यं दधत्संसदमागतः । इति पप्रच्छ सोऽप्यात्मागमन क्रममब्रवीत् ॥२१८॥
आचार्य कहते हैं कि कठिन तपश्चरणके विषयमें की हुई मनुष्यों की ईर्ष्या भी कहीं कहीं अच्छी होती है परन्तु अन्य सब जगह अच्छी नहीं होती । किसी एक दिन सेठ सर्वद्धितने जितशत्रुसे पूछा कि तू समुद्रदत्तकी समानता क्यों धारण कर रहा है–तेरा रूप उसके समान क्यों है ? और तू सभामें किसलिये आया है ? तब जितशत्रुने भी अनुक्रमसे अपने आनेका सब समाचार कह दिया ॥२१७-२१८॥
The Acharyas declare that, in rare instances, envy among men concerning the performance of arduous austerities may bear good fruit—but in all other matters, jealousy is never noble.One day, the merchant Sarvadayita questioned Jitashatru, asking, “Why do you resemble Samudradatta so closely in appearance? Why do you mirror him so precisely? And for what purpose have you come to this assembly?”In response, Jitashatru narrated, in full and in proper order, the story of his arrival and all that had transpired.॥217–218॥
श्लोक ( Shlok ) 219 – 220
नान्यो मद्भागिनेयोऽयमिति तद्धस्तसंस्थिताम् । मुद्रिकां वीक्ष्य निश्चित्य निःपरीक्षकतां निजाम् ॥ मैथुनस्य च संस्मृत्य तस्मै सर्वश्रियं सुताम् । धनं श्रेष्ठिपदं चासौ दत्वा निविण्णमानसः ॥२२०॥
उसी समय सेठकी दृष्टि उसके हाथमें पहिनी हुई अंगूठीपर पड़ी, उसे देखकर उसने निश्चय कर लिया कि ‘यह मेरा भानजा ही है, दूसरा कोई नहीं है । उसे अपनी और अपने बहनोईकी अपरीक्षकता (बिना विचारे कार्य करने) की याद आ गई और उसे सर्वश्री नामकी पुत्री, बहुत सा धन और सेठका पद देकर स्वयं विरक्तचित्त हो गया ।।२१९-२२०॥
At that very moment, the merchant’s gaze fell upon the ring worn on Jitashatru’s finger. Seeing it, he became certain in his heart: This is indeed my nephew; he can be none other.The memory of his own rashness, and that of his brother-in-law, came flooding back to him, filling him with remorse. Then, bestowing upon Jitashatru his daughter, named Sarvashri, along with abundant wealth and the esteemed title of chief merchant, he himself renounced worldly attachment and embraced a life of detachment.॥219–220॥
श्लोक ( Shlok ) 221 – 223
जयधामा जयभामा जयसेना” तथाऽपरा । जयदत्ताभिधानाच परा सागरदत्तिका ॥२२१॥सा वैश्रवणदत्ता” च पर चोत्पन्नबोधकाः । संजातास्तैः सह श्रेष्ठी संयमं प्रत्यपद्यत ॥ २२२॥मुनिं रतिवरं प्राप्य चिरं विहितसंयमाः । एते सर्वेऽपि कालान्ते स्वर्गलोकं समागमन् ॥२२३॥
उसी समय जितशत्रुको पालनेवाला जयधाम विद्याधर, उसकी स्त्री जयभामा, जयसेना और जयदत्ता नामकी अपनी स्त्रियां, वैश्रवण-दत्तकी स्त्री सागरदत्ता और वैश्रवणदत्तकी बहिन वैश्रवणदत्ता तथा और भी अनेक लोगोंको आत्मज्ञान उत्पन्न हुआ। उन सबके साथ साथ सेठने रतिवर मुनिके समीप जाकर संयम धारण, कर लिया । वे सभी लोग चिरकालतक संयमका साधन कर आयुके अन्तमें स्वर्ग गये ॥२२१-२२३।।
At that very time, Jitashatru’s foster father, the Vidyadhara Jayadham, along with his wife Jayabhama; his wives Jayasena and Jayadatta; Vaishravandatta’s wife Sagardatta; Vaishravandatta’s sister, also named Vaishravandatta; and many others—all of them were awakened to self-realization.Together with them, the merchant approached the venerable sage Rativara Muni and embraced the vows of renunciation. All of them diligently practiced self-restraint for the remainder of their lives and, at the end of their span on earth, ascended to the heavenly realms.॥221–223॥
श्लोक 224 से 232
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367 | जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271 | श्लोक 272 से 286 | श्लोक 287 से 296 | श्लोक 297 से 313 | श्लोक 314 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 361 | श्लोक 362 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108 | श्लोक 109 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211