स्थापना – चंदनषष्ठी व्रत विधान
विधान प्रारम्भ
चंदन षष्ठी व्रत करें, करते भव्य विधान ।
शुद्धि से प्रभु को भजें, कहते सब भगवान ।
अथ मंडलस्योऽपि पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्
शेर छंद (तर्ज: हे दीनबंधु श्रीपति…)
जिनमात देखती है सोलह स्वप्न रात में।
स्वप्नों का फल बताये पिता सुप्रभात में ।।
आकर के अष्ट देवियाँ माता को सजायें।
हम अर्घ चढ़ा आज गर्भ पर्व मनायें ।। 1 ।।
ॐ ह्रीं अर्ह गर्भमंगल मण्डिताय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
अवतार लेके नाथ ने सबको जगा दिया ।
क्षणमात्र को त्रिलोक से सब दुःख भगा दिया ।।
सौधर्म ने जिन राज का अभिषेक रचाया।
हमने चढ़ाके अर्घ वही पुण्य कमाया ।।2।।
ॐ ह्रीं अर्ह जन्ममंगल मंडिताय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
संसार को असार जान वन को चल दिये ।
केशों का लोच करके प्रभु आत्मरस पिये ।।
मुद्रा प्रभु की त्याग का संदेश दे रही।
अनुमोदना दीक्षा की करें भाव से यही ॥ ३ ।।
ॐ ह्रीं अर्ह तपोमंगल मंडिताय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति
स्वाहा।
प्रभु के समवशरण में सभी भव्य आ रहे ।
शुभ दर्श पाके आप से सम्यक्त्व पा रहे ।।
श्री केवली भगवान की हम आरती करें।
कीर्तन करें वंदन करें, पर मन नहीं भरे ॥4 ।।
ॐ ह्रीं अहँ ज्ञानमंगल मण्डिताय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
भगवान तीर्थनाथ हमें पास बुलायें।
भगवान शब्द मात्र ही भव पार लगाये ।।
भगवान भव से तर गये भव्यों को तारते ।
हम भव्य प्राणी आपको मन से पुकारते ॥ 5 ||
ॐ ह्रीं अर्ह मोक्षमंगल मंडिताय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति
स्वाहा।
प्रभुवर का गर्भ जन्म हुआ चंद्रपुरी में ।
उत्सव मनाने आये देव स्वर्गपुरी से ।।
मधुवन से मोक्ष पा लिया भगवान आपने ।
हम अर्घ चढ़ा भक्ति करें पाप नाशने ।।6 ।।
ॐ ह्रीं अर्ह पंचकल्याणक पूजिताय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति
स्वाहा।
शत इन्द्र पूजते सदैव चंद्रनाथ को ।
हम अर्घ चढ़ा नमन करें चंद्रनाथ को ।।
हमसे हुई अशुद्धि उनकी माँगते क्षमा ।
सब पाप दोष कष्ट हरो माँगते क्षमा ।।7 ।।
ॐ ह्रीं अर्ह शतेन्द्र पूज्याय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
जिस तीर्थ -नगर- क्षेत्र चन्द्रनाथ विराजे ।
अतिशय वहाँ पे होय बजे नित्य ही बाजे ।।
इस व्रत में होती है विशेष चंद्र अर्चना ।
हम नाथ आपकी करें त्रिकाल वन्दना ।।8 ।।
ॐ ह्रीं अर्ह सर्वक्षेत्र विराजित त्रिकाल पूजिताय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।
🌙 Chandanaṣaṣṭhī Vrat Vidhan – Dual-Script with Meaning
The Chandanaṣaṣṭhī Vrat is a sacred observance dedicated to Śrī Chandraprabha Bhagwān, the eighth Tīrthaṅkara. This special vidhan (ritual) celebrates the Pañcha Kalyāṇakas – the five great events in the Lord’s life – with offerings of arghya.
विधान प्रारम्भ
| Hindi (Original) | English (Meaning) |
|---|---|
| चंदन षष्ठी व्रत करें, करते भव्य विधान। शुद्धि से प्रभु को भजें, कहते सब भगवान।। अथ मंडलस्योऽपि पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् | Let us observe the Chandanaṣaṣṭhī Vrat, performing the grand vidhan. With purity, let us worship the Lord, as all call Him “Bhagwān.” Now, let us offer flowers into the mandala. |
1️⃣ Garbha Kalyāṇaka – Conception Celebration
(Meter: Śer Chhand – Tune: “He Dīnabandhu Śrīpati…”)
| Hindi | English |
|---|---|
| जिनमात देखती है सोलह स्वप्न रात में। स्वप्नों का फल बताये पिता सुप्रभात में।। आकर के अष्ट देवियाँ माता को सजायें। हम अर्घ चढ़ा आज गर्भ पर्व मनायें।। | Jina-mother sees sixteen auspicious dreams at night. In the morning, the father tells their divine meanings. Eight goddesses arrive to adorn the mother. We offer arghya today to celebrate the Conception Festival. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह गर्भमंगल मण्डिताय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
2️⃣ Janma Kalyāṇaka – Birth Celebration
| Hindi | English |
|---|---|
| अवतार लेके नाथ ने सबको जगा दिया। क्षणमात्र को त्रिलोक से सब दुःख भगा दिया।। सौधर्म ने जिन राज का अभिषेक रचाया। हमने चढ़ाके अर्घ वही पुण्य कमाया।। | The Lord took birth and awakened all. In a moment, He removed the sorrows of the three worlds. Lord Śakra performed the Abhiṣeka (anointing) of the Jina. By offering arghya, we too earn this merit. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह जन्ममंगल मंडिताय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
3️⃣ Dīkṣā Kalyāṇaka – Renunciation
| Hindi | English |
|---|---|
| संसार को असार जान वन को चल दिये। केशों का लोच करके प्रभु आत्मरस पिये।। मुद्रा प्रभु की त्याग का संदेश दे रही। अनुमोदना दीक्षा की करें भाव से यही।। | Realizing the world is worthless, the Lord went to the forest. Plucking His hair, He drank the nectar of the soul. His posture conveys the message of renunciation. We rejoice in His Dīkṣā with heartfelt devotion. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह तपोमंगल मंडिताय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
4️⃣ Keval Jñāna Kalyāṇaka – Omniscience
| Hindi | English |
|---|---|
| प्रभु के समवशरण में सभी भव्य आ रहे। शुभ दर्श पाके आप से सम्यक्त्व पा रहे।। श्री केवली भगवान की हम आरती करें। कीर्तन करें वंदन करें, पर मन नहीं भरे।। | All worthy souls gather in the Lord’s Samavasaraṇa. By seeing Him, they attain Right Faith. We perform ārati of the Omniscient Lord. We sing and bow to Him, but our hearts are never full. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह ज्ञानमंगल मण्डिताय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
5️⃣ Mokṣa Kalyāṇaka – Liberation
| Hindi | English |
|---|---|
| भगवान तीर्थनाथ हमें पास बुलायें। भगवान शब्द मात्र ही भव पार लगाये।। भगवान भव से तर गये भव्यों को तारते। हम भव्य प्राणी आपको मन से पुकारते।। | Lord Tīrthanātha calls us near. Even His name alone takes us across saṁsāra. He has crossed worldly existence and helps others cross. We, as worthy souls, call upon You with our hearts. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह मोक्षमंगल मंडिताय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
6️⃣ Pañcha Kalyāṇaka Worship
| Hindi | English |
|---|---|
| प्रभुवर का गर्भ जन्म हुआ चंद्रपुरी में। उत्सव मनाने आये देव स्वर्गपुरी से।। मधुवन से मोक्ष पा लिया भगवान आपने। हम अर्घ चढ़ा भक्ति करें पाप नाशने।। | The Lord’s Garbha and Janma occurred in Candrapurī. Gods came from heaven to celebrate. In Madhuban, You attained liberation. We offer arghya and worship to destroy our sins. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह पंचकल्याणक पूजिताय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
7️⃣ Śateśvara Pūjā – Worship by Hundred Indras
| Hindi | English |
|---|---|
| शत इन्द्र पूजते सदैव चंद्रनाथ को। हम अर्घ चढ़ा नमन करें चंद्रनाथ को।। हमसे हुई अशुद्धि उनकी माँगते क्षमा। सब पाप दोष कष्ट हरो माँगते क्षमा।। | A hundred Indras always worship Chandranātha. We offer arghya and bow to Him. We seek forgiveness for our impurities. Please remove all sins, faults, and troubles. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह शतेन्द्र पूज्याय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
8️⃣ Tri-Kāla Vandana – Worship in All Three Times
| Hindi | English |
|---|---|
| जिस तीर्थ-नगर-क्षेत्र चन्द्रनाथ विराजे। अतिशय वहाँ पे होय बजे नित्य ही बाजे।। इस व्रत में होती है विशेष चंद्र अर्चना। हम नाथ आपकी करें त्रिकाल वन्दना।। | In the holy region where Chandranātha resides, miracles happen and auspicious sounds are always heard. This vow includes special worship of Chandranātha. O Lord, we worship You three times a day. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह सर्वक्षेत्र विराजित त्रिकाल पूजिताय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
The Chandanaṣaṣṭhī Vrat Vidhan is a journey through the sacred milestones of Lord Chandraprabha’s life. By offering devotion during each Kalyāṇaka, one purifies body, speech, and mind, moving closer to liberation.