आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44
श्लोक 45 से 61 बाहुबली का दर्शन और स्वागत
दूत बाहुबली को एक विशाल पर्वत-से तेजस्वी और विजयलक्ष्मी से युक्त देखता है। बाहुबली का वक्ष चौड़ा, मुकुट उन्नत, और भुजाएं तराजू के दंड-सी हैं। उनकी कान्ति हरित मणि-सी और तेज परमाणुओं से निर्मित-सी प्रतीत होती है। दूत उनकी शोभा से प्रभावित होकर प्रणाम करता है। बाहुबली उसे सत्कार के साथ बिठाते हैं और मंद हास्य के साथ पूछते हैं कि भरत की कुशलता और उनके दिग्विजय के कार्य की स्थिति क्या है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 45 to 61
श्लोक ( Shlok ) 45–55
पृथुवक्षस्त टं तुङगमुकुटोदग्रशृङ्गकम् । जयलक्ष्मीविलसिन्याः क्रीडाशैलमिवैककम् ॥४५॥ललाटपट्टमारुढपट्टबन्धं सुविस्तृतम् । जयश्रिय इवोद्वाहपट्टं दधतमुच्चकैः ॥४६।।दधानं तुलिताशेषराजन्यकयशोधनम् । तुलादण्डमिवोदूढभूभारं भुजदण्डकम् ॥४७।। मुखेन पङ्कजच्छायां नेत्राभ्यामुत्पलश्रियम् । दधानमप्यना सन्नविजातिमजलाशयम् ॥४८॥विभ्राणमतिविस्तीर्ण मनो वक्षश्च यद् द्वयम् । “वाग्देवीकमलावत्योर्गतं नित्यावकाशताम् ॥४९।।रक्षावृत्तिपरिक्षेपं गुणग्रामं महाफलम् । निवेशयन्तमात्माङ्गे मनःसु च महीयसाम् ॥५०॥स्फुरदाभरणोद्योतच्छद्मना निखिला दिशः । प्रतापज्वलनेनेव लिम्पन्तमलघीयसा ॥५१॥ मुखेन चन्द्रकान्तेन पद्मरागेण चारुणा । चरणेन विराजन्तं वज्रसारेण” वर्ष्मणा ॥५२॥हरिन्मणिमयस्तम्भमिवैकं हरितत्विषम् । लोकावष्टम्भमाधातुं सृष्टमाद्येन वेधसा ॥५३॥सर्वाङ्गसङ्गतं तेजो दधानं क्षाव्रमूर्जितम्। नूनं तेजोमयैरेव घटितं परमाणुभिः ॥५४॥ तमित्यालोकयन् दूराद् धाम्नः पुञ्जमिवोच्छिखम् । चचाल प्रणिधिः किञ्चित् प्रणिधाना न्निधीशितुः ll५५ll
वहाँ जाकर उसने महाराज बाहु-वलीको देखा, उनका वक्ष स्थल किनारे के समान चौड़ा था, वे स्वयं ऊंचे थे और उनका मुकुट शिखरके समान उन्नत था इसलिये वे विजयलक्ष्मीरूपी स्त्रीके कीड़ा करनेके लिये एक अद्वितीय पर्वतके समान जान पड़ते थे-जिसपर यह बंधा हुआ है ऐसे लम्बे-चौड़े ललाटपट्टको धारण करते हुए वे ऐसे जान पड़ते थे मानो विजयलक्ष्मीका उत्कृष्ट विवाहपट्ट ही धारण कर रहे हों। वे बाहुबली स्वामी, जिसने समस्त राजाओंका यशरूपी धन तोल लिया है और जिसने समस्त पृथिवीका भार उठा रक्खा है ऐसे तराजूके दण्डके समान भुजदण्डको धारण कर रहे थे-यद्यपि वे मुखसे कमलकी और नेत्रोंसे उत्पलकी शोभा धारण कर रहे थे तथापि उनके समीप न तो विजाति अर्थात् पक्षियोंकी जातियाँ थीं और न वे स्वयं जलाशय अर्थात् सरोवर ही थे। भावार्थ इस श्लोक में विरोधाभास अलंकार है इसलिये विरोधका परिहार इस प्रकार करना चाहिये कि वे यद्यपि मुख और नेत्रोंसे कमल तथा उत्पलकी शोभा धारण करते थे तथापि उनके पास विजाति अर्थात् वर्णसंकर लोगोंका निवास नहीं था और न वे स्वयं जलाशय अर्थात् जड़ आशयवाले मूर्ख ही थे। वे बाहुबली जिनपर क्रमसे सरस्वती देवी और लक्ष्मीदेवीका निरन्तर निवास रहता था ऐसे अत्यन्त विस्तृत (उदार और लम्बे चौड़े) मन और वक्षःस्थलको धारण कर रहे थे-वे, प्रजाकी रक्षाके कारण तथा बड़े बड़े फल देनेवाले गुणोंके समूहको अपने शरीरमें धारण कर रहे थे और अन्य महापुरुषोंके मनमें धारण कराते थे-वे अपने देदीप्यमान आभूषणोंकी कान्तिके छलसे ऐसे जान पड़ते थे मानो अपने विशाल प्रतापरूपी अग्निसे समस्त दिशाओंको लिप्त ही कर रहे हों। वे चन्द्रकान्त मणिके समान मुखसे, पद्मराग मणिके समान सुन्दर चरणोंसे और वजूके समान सुदृढ़ अपने शरीरसे बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहे थे। उनकी कान्ति हरे रङ्गकी थी इसलिये वे ऐसे जान पड़ते थे मानो आदि ब्रह्मा भगवान् वृषभदेवके द्वारा लोकको सहारा देने के लिये बनाया हुआ हरित मणियोंका एक खम्भा ही हो। समस्त शरीरमें फैले हुए अतिशय श्रेष्ठ क्षात्रतेज को धारण करते हुए महाराज बाहुबली ऐसे जान पड़ते थे मानो तेजरूप परमाणुओंसे ही उनकी रचना हुई हो। जिसकी ज्वाला ऊपरकी ओर उठ रही है ऐसे तेजके पुंजके समान महाराज बाहुबलीको दूरसे देखता हुआ वह चक्रवर्तीका दूत अपने ध्यानसे कुछ विचलित-सा हो गया अर्थात् घबड़ा-सा गया ॥ ४५-५५।।
Upon arriving, the messenger beheld King Bāhubalī seated majestically,
whose broad chest resembled the firm shore of a mighty river;
tall in stature, he wore a crown rising like a mountain’s peak.
Thus adorned, he appeared as a singular mountain, upon which rested the divine goddess of Victory herself—Vijayalakṣmī—
symbolized by the grand forehead band he bore, as if it were her exquisite wedding sash.
Bāhubalī, the sovereign who has weighed the treasure of fame amassed by all kings,bore upon his arms the balance beam of justice,though his face shone with the radiance of the lotus and his eyes with the brilliance of the blue water lily.Yet, near him were neither foreign birds nor was he a mere pond of stagnant water.
(This verse employs a striking paradox: though his visage bore the beauty of lotus and water lily,he harbored no admixture of foreign or base elements, nor was he a dull, inert pool.)This mighty lord, upon whom the goddesses Sarasvatī and Lakṣmī ever dwell,
possessed a vast and noble heart, broad as it was long—
the protector of his subjects, the bearer of abundant virtues like heavy-laden fruit-bearing trees.He inspired similar greatness in the hearts of other noble souls.Clad in radiant jewels whose brilliance seemed to envelop all directions with fiery splendor,
he shone forth like a pillar of green gems, forged by the creator Brahmā himself,created to uphold the world as the bull god Viṣṇu’s steadfast support.Wreathed in the finest Kṣatriya valor, his very form seemed wrought from fiery atoms,a blazing flame rising upward—such was the vision of King Bāhubalī from afar.
The messenger of the Emperor, gazing upon this dazzling figure,
found himself somewhat unsettled—his composure shaken, as if struck by awe or trepidation. 45–55
श्लोक ( Shlok ) 56
प्रणमंश्चरणावेत्य दधदूरानतं शिरः । ससत्कारं कुमारेण नातिदूरे न्यवेशि सः ॥५६॥
दूरसे ही झुके हुए शिरको धारण करनेवाले उस दूतने जाकर कुमारके चरणोंमें प्रणाम किया और कुमारने भी उसे सत्कारके साथ अपने समीप ही बैठाया ॥५६॥
The messenger, bearing a bowed head from afar, approached and humbly bowed at the feet of the prince;and the prince, with gracious hospitality, welcomed him and seated him close by.56
श्लोक ( Shlok ) 57
तं शासनहरं जिष्णोर्निविष्टमुचितासने । कुमारो निजगादेति स्मितांशून् विष्वगाकिरन् ।॥५७॥
कुमार बाहुबली अपने मन्द हास्यकी किरणोंको चारों ओर फैलाते हुए योग्य आसनपर बैठे हुए उस भरतके दूतसे इस प्रकार कहने लगे ॥ ५७।।
Prince Bāhubalī, his gentle smile radiating warmly all around,
seated upon a fitting throne, thus addressed the messenger of Bharata:57
श्लोक ( Shlok ) 58
चिराच्चक्रधरस्याद्य वयं ‘चिन्त्यत्वमागताः । भद्र भद्रं जगद्भर्तुर्बहुचिन्त्यस्य चक्रिणः ॥५८॥
कि आज चक्रवर्ती ने बहुत दिनमें हम लोगोंका स्मरण किया, हे भद्र, जो समस्त पृथिवीके स्वामी हैं और जिन्हें बहुत लोगोंकी चिन्ता रहती है ऐसे चक्रवर्तीकी कुशल तो है न ? ॥५८॥
“Today, the Emperor has recalled us after many days, O noble one—
he who is the sovereign of the entire earth and the guardian of countless lives.Is the Emperor in good health, I pray?”58
श्लोक ( Shlok ) 59
विश्वक्षत्रजयोद्योगम द्यापि न समापयन् । स कच्चिद् भूभुजां भर्तुः कुशली दक्षिणो भुजः ॥५९॥
जिसने समस्त क्षत्रियोंको जीतनेका उद्योग आज तक भी समाप्त नहीं किया है ऐसे राजाधिराज भरतेश्वर की वह प्रसिद्ध दाहिनी भुजा कुशल है न ? ॥५९॥
“How fares the renowned right arm of the King of Kings, Bharateshvara,who to this day has not ceased his striving to conquer all the Kshatriyas?”59
श्लोक ( Shlok ) 60
श्रुता विश्वदिशः सिद्धा जिताश्च निखिला नृपाः । कर्तव्यशेषमस्याद्य किमस्ति वद नास्ति वा ॥६०॥
सुना है कि भरतने समस्त दिशाएँ वश कर ली हैं और समस्त राजाओंको जीत लिया है। हे दूत, कहो अब भी उनको कुछ कार्य बाकी रहा है या नहीं ? ॥६०॥
“I have heard that Bharata has subdued all the directions and vanquished every king.O messenger, tell me—does he still have any task unfinished?”60
श्लोक ( Shlok ) 61
इति प्रशान्तमोजस्वि वचःसार मिताक्षरम् । वदन् कुमारो दूतस्य वचनावसरं व्यधात् ॥६१॥
इस प्रकार जो अत्यन्त शान्त हैं, तेजस्वी हैं, साररूप हैं, और जिनमें थोड़े अक्षर हैं ऐसे वचन कहकर कुमारने दूतको कहने के लिये अवसर दिया ।।६१।।
Thus, with words serene, radiant, and profound, composed of but few syllables,the prince granted the messenger the opportunity to speak.61
श्लोक 62 से 71
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44
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