आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 109 to 122
श्लोक ( Shlok ) 109 – 117
स्वदेव्यां चित्रसेनायां भृत्ये दुष्टतरे सति । तं निहत्यादहत्तस्मिन् धूमवेगो निधाय तम् ॥१०९।॥कुमारं चागमत्तत्र महौषधजशक्तितः । निराकृतज्वलद्वह्निशक्तिस्तस्मात् स निर्गतः ॥११०॥हतानुचरभार्यात्र काचिन्निरपराधकः । हतो नृपेण मद्भर्तेत्यस्य” शुद्धिप्रकाशिनी ॥१११॥ तत्कुमारस्य संस्पर्शानिश्शक्ति सा हुताशनम् । विदित्वा प्राविशद् दृष्ट्वा कुमारस्तां सकौतुकः ॥११२॥अभेद्यमपि वज्रण स्त्रीणां मायाविनिर्मितम् । कवचं दिविजेशा च नीरन्ध्रमिति निर्भयः ॥११३॥स्थितस्तत्र स्मरन्नेवं सुता तन्त्रगरेशिनः । राज्ञो विमलसेनस्य वत्यन्तकमला ह्वया ॥११४॥कामग्रहाहिता तस्यास्तद्ग्रहाप जिहीर्षया । जन समुदिते सद्यः कुमारस्तमपाहरत् ॥११५।।सत्योऽभूत् प्राक्तनादेश इति तस्मै महीपतिः । तुष्ट्वा तां कन्यकां ‘दित्सुस्तस्या निच्छां’ विबुध्य सः ॥११६॥अभ्यर्ण बन्धुवर्गस्य नेयोऽयं भवता द्रुतम् । यत्नेनेत्यात्मजं स्वस्य वरसेनं समादिशत् ॥११७॥
उसकी चित्रसेना नामकी रानीसे कोई दुष्ट नौकर फँस गया था, इसलिये राजा उसे मारकर जला रहा था । धूमवेग विद्याधर श्रीपालकुमारको उसी अग्निकुंडमें रखकर चला गया परन्तु कुमारकी महौषधिको शक्तिसे वह अग्नि निस्तेज हो गई इसलिये वह उससे बाहर निकल आया । उस मारकर जलाये हुए सेवककी स्त्रीको जब इस बातका पता चला कि कुमारके स्पर्शसे अग्नि शक्तिरहित हो गई है तब वह स्वयं उस अग्निमें घुस पड़ी और उससे निकलकर यह कहती हुई अपनी शुद्धि प्रकट करने लगी कि ‘मेरा पति निरपराध था राजाने उसे व्यर्थ ही मार डाला है।’ कुमारको यह सब चरित्र देखकर बड़ा कौतुक हुआ, वह सोचने लगा कि स्त्रियोंकी मायासे बने हुए इस कवचको इन्द्र भी अपने वज्रसे नहीं भेद सकता है, यह छिद्ररहित है’ इस प्रकार सोचता हुआ वह निर्भय होकर वहीं बैठा था। इधर उस नगरके स्वामी राजा विमलसेनकी पुत्री कमलावती कामरूप पिशाचसे आक्रान्त हो रही थी, उसके उस पिशाचको दूर करनेकी इच्छा से बहुत आदमी इकट्ठे हुए थे, श्रीपालकुमार भी वहां गया था और उसने उस पिशाचको दूर कर दिया था। ‘निमित्तज्ञानियोंने जो पहले आदेश दिया था वह आज सत्य सिद्ध हुआ।’ यह देख राजाने संतुष्ट होकर वह पुत्री कुमारको देनी चाही परन्तु जब कुमारकी इच्छा न देखी तब उसने अपने पुत्र वरसेनको आज्ञा दी कि इन्हें शीघ्र ही बड़े यत्नके साथ इनके बन्धु वर्गके समीप भेज आओ ।॥१०९-११७॥
When the slain servant’s wife learned that the fire had been subdued by Shripal’s mere touch, she herself leapt into the flames. Emerging unhurt, she declared her innocence before all, proclaiming, “My husband was guiltless; the king slew him unjustly!” Witnessing this extraordinary event, Shripal was filled with wonder and mused, “The armor of deception woven by women is so impenetrable that even Indra’s thunderbolt cannot pierce it—it is without flaw.”Pondering thus, he sat there unafraid. Meanwhile, in that very city, Princess Kamalavati, daughter of King Vimalsena, was tormented by a lustful demon that had seized her body. Countless people gathered in hopes of banishing the fiend, and Shripal too went there. By his power, he exorcised the demon and freed the princess.Seeing the fulfillment of the prophecies foretold by the astrologers, the king rejoiced. Out of gratitude, he wished to offer his daughter to Shripal in marriage; yet perceiving no desire in Shripal’s heart, the king commanded his son Varsena, “Escort him with great care and devotion to his kin.”॥109–117॥
श्लोक ( Shlok ) 118
नीत्वा सोऽपि कुमारं तं विमलादिपुरो बहिः । वने तृष्णोपसन्तप्तं स्थापयित्वा गतोऽम्बुनें ॥११८॥
वह वरसेन भी कुमारको लेकर चला और विमलपुर नामक नगरके बाहर प्याससे पीड़ित कुमारको बैठाकर पानी लेनेके लिये गया ।॥११८॥
Varsena then set forth, taking Shripal with him. But as they traveled and reached the outskirts of a city named Vimalapura, the prince, overcome by thirst, was made to sit down while Varsena went in search of water.॥118॥
श्लोक ( Shlok ) 119
तदा सुखावती कुब्जा भूत्वा कुसुममालया । परिस्पृश्य तृषां नीत्वा’ कन्यकां तं चकार सा ॥११९॥
उसी समय कूबड़ीका रूप बनाकर सुखावती वहां आ गई, उसने अपने फूलोंकी मालाके स्पर्शसे कुमार की प्यास दूर कर दी और उसे कन्या बना दिया ॥ ११९॥
At that very moment, Sukhaavati arrived there, having assumed the form of a hunchbacked woman. With the mere touch of a garland of flowers she carried, she quenched the prince’s thirst and then transformed him into the form of a maiden.॥119॥
श्लोक ( Shlok ) 120 – 122
धूमवेगो हरिवरश्चैतां वीक्ष्याभिलाषिणौ । अभूतां बद्धमात्सयौ तस्याः स्वीकरणं प्रति ॥१२०॥ द्वेषवन्तौ तदाऽऽलोक्य युवयोर्विग्रहो वृथा । पतिर्भवत्वसावस्या यमेषाऽभिलपिप्यति ॥१२१॥ इति बन्धुजनैर्वार्यमाणौ वैराद् विरेभतुः । स्त्रीहेतोः कस्य वा न स्यात् प्रतिघातः परस्परम् ॥१२२॥
उस कन्याको देखकर धूमवेग और हरिवर दोनों ही उसकी इच्छा करने लगे। उसे स्वीकार करनेके लिये दोनों ईर्ष्यालु हो उठे और दोनों ही परस्पर द्वेष करने लगे । यह देखकर उनके भाई बन्धुओंने रोका और कहा कि ‘तुम दोनोंका लड़ना व्यर्थ है इसका पति वही हो जिसे यह चाहे’ इस प्रकार बन्धुजनोंके द्वारा रोके जानेपर वे दोनों वैरसे विरत हुए । देखो ! स्त्रीके कारण परस्पर किस किसका प्रेम भंग नहीं हो जाता है ? ॥ १२०-१२२॥
Beholding the maiden, both Dhumavega and Harivara were instantly seized by desire for her. Each burned with envy of the other, and mutual hatred flared between them as they vied to claim her hand. Seeing their fierce quarrel, their kinsmen intervened and said, “Your strife is futile; let her herself choose whom she would wed, and he alone shall be her husband.”Thus, restrained by the words of their brothers, both were pacified and laid aside their enmity. Ah, see how the allure of a woman can shatter even the strongest bonds of friendship and kindle bitter discord!॥120–122॥
श्लोक 123 से 131
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367 | जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271 | श्लोक 272 से 286 | श्लोक 287 से 296 | श्लोक 297 से 313 | श्लोक 314 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 361 | श्लोक 362 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64 | श्लोक 65 से 108