आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
दधानास्ते तपस्तापमन्तर्दीप्तं दुरासदम् । रेजुस्तरङङगितैरङगैः प्रायोऽनु कृतवार्द्धयः ॥१६२॥
अन्तरङ्गमें देदीप्यमान और अतिशय कठिन तप के तेजको धारण करते हुए वे मुनि तरङ्गोंके समान अपने अङ्गोंसे ऐसे जान पड़ते थे मानो समुद्रका ही अनुकरण कर रहे हों ।॥ १६२॥
Radiant within, bearing the blazing effulgence of an exceedingly arduous penance, the sage appeared, through the undulating motions of his limbs, as though he were imitating the ocean itself—his form a living echo of its ceaseless waves.162
श्लोक ( Shlok ) 163
ते स्वभुक्तोज्झितं भूयो न च्छन् भोगपरिच्छदम् । निर्भुक्तमाल्यनिःसारं मन्यमाना मनीषिणः ॥१६३॥
वे बुद्धिमान् अपने द्वारा उपभोग कर छोड़ी हुई भोगसामग्रीको भोगमें आई हुई मालाके समान सारहीन मानते हुए फिर उसकी इच्छा नहीं करते थे ।। १६३।।
The wise regarded the pleasures they had once enjoyed and set aside as devoid of essence—like a garland that has already been worn—and thus, they no longer desired them. 163
श्लोक ( Shlok ) 164
फेनोमि हिमसन्ध्या भ्रचलं जीवितमङगिनाम् । मन्वाना दृढमाक्ति भेजुस्ते पथि शाश्वते ॥१६४॥
वे प्राणियोंके जीवनको फेन, ओस अथवा संध्याकालके बादलों के समान चञ्चल मानते हुए अविनाशी मोक्षमार्गमें दृढ़ता के साथ आसक्तिको प्राप्त हुए थे ॥ १६४।।
Beholding the lives of beings as fleeting as foam, dew, or the evening clouds, they grew steadfastly attached to the imperishable path of liberation, unwavering in their pursuit of the eternal.164
श्लोक ( Shlok ) 165
संसारावासनिविण्णा गृहावासाद्विनिःसृताः । जैने मार्गे विमुक्त्यङगे ते परां धृतिमादधुः ॥१६५॥
संसारके निवाससे विरक्त हुए और घरके आवास से छूटे हुए वे मुनिराज मोक्षके कारणभूत जिनेन्द्रदेवके मार्गमें परम संतोष धारण करते थे ।।१६५।।
Disenchanted with worldly dwelling and freed from the confines of household life, those noble sages embraced supreme contentment upon the path of the Jinas—illumined by the cause of liberation. 165
श्लोक ( Shlok ) 166
इतो ऽन्यदुत्तरं नास्तीत्यारूढदृढभावनाः । तेऽमी मनोवचः कायैः श्रद्दधुर्गुरुशासनम् ॥१६६॥
इससे बढ़कर और कोई शासन नहीं है इस प्रकारकी मजबूत भावनाएं जिन्हें प्राप्त हो रही हैं ऐसे वे ऋषि इससे बढ़कर और कोई शासन नहीं है इस प्रकारकी मजबूत भावनाएं जिन्हें प्राप्त हो रही हैं ऐसे वे ऋषि मन वचन कायसे भगवान्के शासनका श्रद्धान करते थे ।।१६६।।
With firm conviction arising within that there exists no dominion higher than this, those seers offered their devout faith to the Lord’s sacred order—through mind, speech, and body.166
श्लोक ( Shlok ) 167
तेऽनुरक्ता जिनप्रोक्ते सूक्ते धर्मे सनातने । उत्तिष्ठन्ते स्म मुक्त्यर्थ बद्धकक्ष्या मुमुक्षवः ॥१६७॥
जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहे हुए और अनादिसे चले आये यथार्थ जैनधर्ममें अनुरक्त हुए वे मोक्षाभिलाषी मुनिराज मोक्षके लिये कमर कसकर खड़े हुए थे ॥ १६७॥
Devoted to the true Jain Dharma—proclaimed by the Blessed Jina and flowing from time immemorial—those sages, earnestly yearning for liberation, stood prepared for the great ascent, girded with resolute determination.167
श्लोक ( Shlok ) 168
संवेगजनितश्रद्धाः शुद्धे वर्त्मन्यनुत्तरे । दुरायां भावयामासुस्ते महाव्रतभावनाम् ॥१६८॥
संवेग होनेसे जिन्हें शुद्ध और सर्वश्रेष्ठ मोक्षमार्ग में श्रद्धान उत्पन्न हुआ है ऐसे वे मुनि कठिनाईसे प्राप्त होने योग्य महाव्रतकी भावनाओंका निरन्तर चितवन किया करते थे ॥१६८।।
Stirred by profound spiritual urgency, and their faith awakened in the pure and supreme path of liberation, those sages ceaselessly contemplated the exalted vows—so rare and arduous to attain.168
श्लोक ( Shlok ) 169
हिसा सत्यमस्त्येयं ब्रह्मचर्य विमुक्तताम् । राज्यभोजनषष्ठानि व्रतान्येतान्यभावयन् ॥१६९॥
अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, परिग्रहत्याग और रात्रिभोजनत्याग इन छह महाव्रतोंका वे निरन्तर पालन करते थे ॥१६९।।
They faithfully observed the six great vows—non-violence, truthfulness, non-stealing, celibacy, renunciation of possessions, and abstinence from night meals—steadfast in their practice at all times.169
श्लोक ( Shlok ) 170
यावज्जीवं व्रतेष्वेषु ते दृढीकृतसगङराः । त्रिविधेन प्रतिक्रान्त दोषाः शुद्धि परां दधुः ॥१७०॥
जिन्होंने ऊपर कहे हुए छह व्रतोंकी जीवनपर्यन्तके लिये दृढप्रतिज्ञा धारण की है और मन, वचन तथा कायसे उन व्रतोंके समस्त दोष दूर कर दिये हैं ऐसे वे मुनिराज परम विशुद्धिको धारण कर रहे थे ॥ १७०।।
Having embraced, for life, an unwavering vow to uphold the six aforesaid disciplines, and having purged all blemishes of mind, speech, and body from those vows, those noble sages abided in supreme purity.170
श्लोक ( Shlok ) 171
सर्वारम्भविनिर्मुक्ता निर्मला” निष्परिग्रहाः । मार्गमाराधयञ्जनं व्युत्सृष्टतनुयष्टयः ॥ १७१॥
जिन्होंने सब प्रकारके आरम्भ छोड़ दिये हैं, जो ममता रहित हैं, परिग्रहरहित हैं और शरीररूप लकड़ीसे भी जिन्होंने ममत्व छोड़ दिया है ऐसे वे मुनि जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहे हुए मोक्षमार्गकी आराधना करते थे ।। १७१।।
Having renounced all forms of attachment, free from possessiveness, and liberated even from the illusion of ownership over the body—likened unto a mere piece of wood—those sages devoted themselves to the worship of the liberation path, as revealed by Lord Jina.171
श्लोक 172 से 182
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
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