आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 182 to 194
श्लोक ( Shlok ) 182 – 183
हिरण्यवर्मणः सर्वखगराजाभिषेचनम् । विधाय बहुभिः साधं सम्प्राप्य मुनिपुङ्गवम् ।।१८२॥संयमं प्रतिपन्नः सन् सहवायुरथः स्वयम् । तपो द्वादशधा प्रोक्तं यथाविधि समाचरत् ॥१८३॥
महाराज आदित्यगति सब विद्याधरोंके राज्यपर हिरण्यवर्माका अभिषेक कर अनेक लोगोंके साथ किन्हीं मुनिराजके समीप पहुंचे, और वायुरथ के साथ साथ स्वयं भी संयम धारण कर विधिपूर्वक शास्त्रोंमें कहे हुए बारह प्रकारके तपश्चरण करने लगे ।।१८२-१८३।।
King Ādityagati performed the coronation of Hiraṇyavarmā, installing him as sovereign over all the realms of the Vidyādharas. Then, accompanied by many people, he proceeded with Vāyuratha to the presence of revered ascetic monks. There, both he and Vāyuratha embraced renunciation, and in strict accordance with the scriptures, they began to undertake the twelve kinds of austerities prescribed in the sacred texts.॥182–183॥
श्लोक ( Shlok ) 184
इत्युक्त्वा रतिवेगाऽहं रतिषेणा’ प्रभावती । चाहमेवेति सभ्यानां निजगाद’ सुलोचना ॥१८४।।
यह सब कहकर सुलोचनाने सब सभासदोंसे कहा कि वह रतिवेगा भी मैं ही हूँ, रतिषेणा (कबूतरी) भी मैं ही हूँ और प्रभावती भी मैं ही हूँ ॥ १८४।।
Having recounted all this, Sulochanā then turned to the entire assembly and declared, “I myself was Rativegā; I myself was Ratiśeṇā, the dove-hen; and I myself am Prabhāvatī.”॥184॥
श्लोक ( Shlok ) 185
तदाकर्ण्य जयोऽप्याह पतिस्तासामहं’ क्रमात् । जाये स्म तत्र तत्रेति विश्वविस्मयकृद्वचः ॥१८५।।
यह सुनकर जयकुमारने भी सबको आश्चर्य करनेवाले वचन कहे कि उन तीनों भवोंमें अनुक्रमसे मैं ही उन रतिवेगा आदिका पति हुआ हूँ ॥ १८५।।
Hearing this, Jayakumāra also spoke words that filled all present with wonder: “In each of those three successive births, I myself was the husband of Rativegā and the others.”॥185॥
श्लोक ( Shlok ) 186
पुनः प्रियां जयः प्राह प्रकृतं किञ्चिदप्यतः । अवशिष्टं तदप्युच्चैस्त्वया कान्ते निगद्यताम् ॥१८६॥
जयकुमार फिर अपनी प्रिया-सुलोचनासे कहने लगा कि हे प्रिये, कुछ बात बाकी और रह गई है उसे भी तू अच्छी तरह कह दे ।।१८६।।
Then Jayakumāra turned to his beloved Sulochanā and said, “Dearest, there still remains something unsaid—please recount it fully and clearly.”॥186॥
श्लोक ( Shlok ) 187 – 194
इति पत्युः परिप्रश्नाद्दशन ज्योत्स्नया सभाम् । मूतिः कुमुद्वतीं वेन्दोर्विकासमुपनीयताम् ॥१८७॥साऽब्रवीदिति तद्वृत्तं स्वपुण्यपरिपाकजम् । सुखं राज्यसमुद्भूतं यथेष्टसपि निर्विशन् ॥१८८॥परेद्युः कान्तया सार्द्ध स्वेच्छ्या विहरन् वनम् । सरो धान्यकमालाख्यं वीक्ष्यादित्यगतेः सुतः ॥१८९॥स्वप्राच्यभवसम्बन्धं प्रत्यक्षमिव लक्षयन् । काललब्धिबलाल्लब्धनिर्वेदो विदुषां वरः ॥१९०।। भङ्गगुरः सङ्गमः सर्वोऽप्यङ्गिनामभिवाञ्छितः । कि नाम सुखमत्रेदमल्पसंकल्पसम्भवम् ॥१९१॥आयुर्वायुचलं कायो हेय एवामयालयः । साम्राज्यं भुज्यते “लोलैर्वालि “शैर्बहुदोषलम् ॥ १९२॥अदूरपारः कायोऽयमसारो दुरिताश्रयः । तादात्म्यप्रात्मनोऽनेन धिगेनमशुचिप्रियम् ॥ १९३॥ देहवासो’ भयं नास्य यानमस्मान्म हद् भयम् । देहिनः किल मार्गस्य ‘विपर्यासोऽत्र निवृतेः ॥१९४॥
जिस प्रकार चन्द्रमाकी मूर्ति कुमुदिनीको विकसित कर देती है उसी प्रकार वह सुलोचना भी अपने पतिके पूर्वोक्त प्रश्नसे दांतोंकी कान्तिके द्वारा सभाको विकसित हर्षित करती हुई अपने पुण्यके फलसे होनेवाले समाचारोंको इस प्रकार कहने लगी कि वह हिरण्यवर्मा राज्यसे उत्पन्न हुए सुखका इच्छानुसार उपभोग करने लगा । किसी एक दिन अपनी वल्लभाके साथ विहार करता हुआ वह आदित्यगतिका पुत्र हिरण्यवर्मा धान्यकमाल नामके वनमें जा पहुंचा । वहां सर्पसरोवर देखकर उसे अपने पूर्वभवके सब सम्बन्ध प्रत्यक्षकी तरह दिखने लगे, काल-लब्धिके निमित्तसे जिसे वैराग्य उत्पन्न हुआ है और जो विद्वानों में श्रेष्ठ है ऐसा वह हिरण्यवर्मा सोचने लगा कि प्राणियोंकी इच्छाका विषयभूत यह सभी समागम क्षणभंगुर है, इस समागममें थोडेसे संकलसे उत्पन्न हुआ यह सुख क्या वस्तु है ? यह आयु वायुके समान चंचल है। अनेक रोगोंका घर स्वरूप यह शरीर छोड़ने योग्य ही है। अनेक दोषोंको देनेवाले राज्यको चंचल और मूर्ख लोग ही भोगते हैं, इस शरीरका अन्त निकट है, यह असार है, और पापका आश्रय है, इसी शरीरके साथ इस आत्माका तादात्म्य हो रहा है, इसलिये अपवित्र पदार्थोंसे प्रेम करने-वाले इस प्राणीको धिक्कार हो, इस प्राणीको शरीरमें निवास करनेसे तो भय मालूम नहीं होता परन्तु उससे निकलनेमें बड़ा भय मालूम होता है, निश्चयसे इस संसारमें मोक्षमार्गसे विपरीत प्रवृति ही होती हे ॥१८७-१९४।।
Just as the moon’s radiance causes the night-lotus to bloom, so too did Sulochanā, with the gleaming brilliance of her teeth, fill the assembly with joy as she prepared to recount, in detail, the remaining events destined by the fruits of her past merits. She began:“Hiraṇyavarmā, enjoying the pleasures of his kingdom as he wished, spent his days in great happiness. One day, as he wandered with his beloved, he arrived at Dhānyakamāla forest. There, upon beholding the Serpent Lake, the memories of his past births appeared before him as vividly as if they were unfolding before his eyes.Then, as if ordained by time itself, that wise Hiraṇyavarmā, stirred by dispassion, reflected thus: ‘All these assemblies of beings, which arise to satisfy the desires of living creatures, are fleeting as a passing moment. What worth is this transient joy that arises with a brief stir of passions? Life itself is as fickle as the wind. This body, a dwelling place of countless ailments, is something to be cast aside. The restless and ignorant alone delight in kingdoms that bring myriad faults.The end of this body draws near—it is ephemeral and a breeding ground for sin. The soul’s attachment to this impure, transient body is pitiable. Shame on the creature who delights in such unclean things! This being feels no fear in inhabiting the body, yet dreads nothing more than the moment of departing it. Truly, in this world, all movements tend in directions contrary to the path of liberation.’”॥187–194॥
श्लोक 195 से 211
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181