राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 586 से 594 | श्लोक 595 से 604 | श्लोक 605 से 622 | श्लोक 623 से 631 | श्लोक 632 से 641 | श्लोक 642 से 651 | श्लोक 652 से 661 | श्लोक 662 से 672
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 673 to 681
श्लोक ( Shlok ) 673 – 674
हलायुधं महारत्नमपराजितनामकम् । अमोघाख्याः ४शरास्तीक्ष्णाः संज्ञया कौमुदी गदा ॥ ६७३॥रत्नावतंसिका माला रत्नान्येतानि सौरिणः । तानि यक्षसहस्त्रेण रक्षितानि पृथक् पृथक् ॥ ६७४ ॥
रामचन्द्रजीके अपराजित नामका हलायुध, अमोघ नामके तीक्ष्ण वाण, कौमुदी नामकी गदा और रत्नावतंसिका नामक माला ये चार महारत्न थे। इन सब रत्नोंकी अलग-अलग एक-एक हजार यक्षदेव रक्षा करते थे ॥ ६७३-६७४ ।।
“Ramachandra possessed four great treasures (maharatnas): the ploughshare-weapon (halayudha) named Aparajita, the sharp and unerring arrows named Amogha, the mace named Kaumudi, and the garland named Ratnavatansika. Each of these treasures was individually guarded by one thousand Yaksha deities.”673 – 674
श्लोक ( Shlok ) 675 – 677
चक्रं सुदर्शनाख्यानं कौमुदीत्युदिता गदा । असिः सौनन्दकोऽमोघमुखी” शक्तिः शरासनम् ॥ ६७५ ॥शाङ्ग पञ्चमुखः पाञ्चजन्यः शङ्खो महाध्वनिः । कौस्तुभं स्वप्रभाभारभासमानं महामणिः ॥ ६७६ ॥रत्नान्येतानि सप्तैव केशवस्य पृथक् पृथक् । सदा यक्षसहस्त्रेण रक्षितान्यमितद्युतेः ॥ ६७७ ॥
इसी प्रकार सुदर्शन नामका चक्र, कौमुदी नामकी गदा, सौनन्दक नामका खड्ग, अमोघमुखी शक्ति, शाङ्ग नामका धनुष, महाध्वनि करनेवाला पाँच मुखका पाश्चजन्य नामका शङ्ख और अपनी कान्तिके भारसे शोभायमान कौस्तुभ नामका महामणि ये सात रत्न अपरिमित कान्तिको धारण करनेवाले लक्ष्मणके थे और सदा एक-एक हजार यक्ष देव उनकी पृथक् पृथक् रक्षा करते थे ।। ६७५-६७७ ।।
“Similarly, the divine discus named Sudarshana, the mace named Kaumudi, the sword named Saunandaka, the unerring spear (shakti) named Amoghamukhi, the bow named Sharnga, the five-mouthed conch named Panchajanya that produced a thunderous sound, and the great gem named Kaustubha resplendent with its immense brilliance—these seven treasures belonged to Lakshmana, who possessed boundless radiance. Each of these treasures was constantly and individually guarded by one thousand Yaksha deities.” 675 – 677
श्लोक ( Shlok ) 678 – 680
एवं तयोर्महाभागधेययोर्भोगसम्पदा । निमग्नयोः सुखाम्भोधौ काले गच्छत्यथान्यदा ॥ ६७८॥जिनं मनोहरोद्याने शिवगुप्तसमाह्वयम् । विनयेन समासाद्य पूजायित्वाभिवन्द्य तम् ॥ ६७९ ॥श्रद्धालुर्धर्ममप्राक्षीद्धीमान् रामः सकेशवः । प्रत्यासन्नात्मनिष्ठत्वान्निष्ठितार्थ निरञ्जनम् ॥ ६८० ॥
इस प्रकार सुख रूपी सागर में निमग्न रहनेवाले महाभाग्यशाली दोनों भाइयोंका समय भोग, और सम्पदाओंके द्वारा व्यतीत हो रहा था कि किसी समय मनोहर नामके उद्यानमें शिवगुप्त नामके जिनराज पधारे । श्रद्धासे भरे हुए बुद्धिमान् राम और लक्ष्मणने बड़ी विनयके साथ जाकर उनकी पूजा-बन्दना की। तदनन्तर आत्म-निष्ठाके अत्यन्त निकट होनेके कारण कृतकृत्य एवं कर्ममलकलङ्कसे रहित उक्त जिनराजसे धर्मका स्वरूप पूछा ।। ६७८-६८० ॥
“In this manner, while the time of both the highly fortunate brothers, immersed in the ocean of happiness, was passing in the enjoyment of pleasures and luxuries, the King of Jinas (Jinaraaja) named Shivagupta arrived at the beautiful Manohar garden. Filled with deep devotion, the wise Rama and Lakshmana approached him with great humility and offered their worship and salutations. Thereafter, because they were exceedingly close to self-realization, they asked the said Lord Jina—who was entirely fulfilled and free from the blemish of karmic impurities—about the true nature of Dharma.” 678 – 680
श्लोक ( Shlok ) 681
भव्यानुग्रह मुख्यात्मप्रवृत्तिः सोऽप्यभाषत । स्ववाद्मसरसज्ज्योत्स्ना समाह्लादिततत्समः ॥ ६८१ ॥
भव्य जीवोंका अनुग्रह करना ही जिनका मुख्य कार्य है ऐसे शिवगुप्त जिनराज भी अपने वचन-समूह रूपी उत्तम चन्द्रिकासे उस सभाको आह्लादित करते हुए कहने लगे ।। ६८१ ॥
“Shivagupta Jinraj, whose primary mission is to bestow grace upon noble souls, began to delight the assembly with his speech, which resembled the sublime moonlight, and said…”681
श्लोक ( Shlok ) 682 – 686
प्रमाणनयनिक्षेपानुयोगैर्ज्ञानहेतुभिः । गुणमुख्यनयादानविशेषबललाभतः ॥ ६८२ ॥स्याच्छब्दलान्छितास्तित्वनास्तित्वाद्यन्तसन्ततम् । जीवादीनां पदार्थानां तत्त्वमाप्तस्वलक्षणम् ॥ ६८३ ॥मार्गणा गुणजीवानां समासं संसृतिस्थितिम् । अन्यच्च धर्मसम्बद्धं व्यक्तं युक्तिसमाश्रितम् ॥ ६८४ ॥कर्मभेदान् फलं तेषां सुखदुःखादिभेदकम् । बन्धमोचनयोर्हेतुं स्वरूपं मुक्तिमुक्तयोः ॥ ६८५ ॥इति धर्मविशेषं तत् ततः श्रुत्वा मनीषिणः । सर्वे रामादयोऽभूवन् गृहीतोपासकव्रताः ॥ ६८६ ॥
कि इस संसारमें जीवादिक नौ पदार्थ हैं उनका प्रमाण नय निक्षेप तथा निर्देश आदि अनुयोगोंसे जो कि ज्ञान प्राप्तिके कारण हैं बोध होता है। गौण और मुख्य नयोंके स्वीकार करने रूप बलके मिल जानेसे ‘स्यादस्ति’, ‘स्यान्नास्ति’ आदि भङ्गों द्वारा प्रतिपादित धर्मोंसे वे जीवादि पदार्थ सदा युक्त रहते हैं। इनके सिवाय शिवगुप्त जिनराजने आप्त भगवान्का स्वरूप, मार्गणा, गुणस्थान, जीवसमास, संसारका स्वरूप, धर्मसे सम्बन्ध रखने-वाले अन्य युक्ति-युक्त पदार्थ, कर्मोंके भेद, सुख-दुःखादि अनेक भेद रूप कर्मोंके फल, बन्ध और मोक्षका कारण, मुक्ति और मुक्त जीवका स्वरूप आदि विविध पदार्थोंका विवेचन भी किया। इस प्रकार उनसे धर्मका विशेष स्वरूप सुनकर रामचन्द्रजी आदि समस्त बुद्धिमान् पुरुषोंने श्रावकके व्रत ग्रहण किये ।। ६८२-६८६ ।।
“By drawing strength from the acceptance of both secondary (gauna) and primary (mukhya) viewpoints, these substances like soul and others are eternally endowed with attributes established through aspects (bhangas) like ‘Syadasti’ (in some respect, it is) and ‘Syadnasti’ (in some respect, it is not).”
“In addition to this, Shivagupta Jinraj also expounded upon various other subjects: the true nature of the Omniscient Lord (Apta), the spiritual search-places (Margana), the stages of spiritual development (Gunasthana), the classification of living beings (Jivasamasa), the nature of worldly existence (Samsara), and other logical matters related to Dharma. He further explained the classifications of karmas, the fruits of karma in the form of multiple variations of pleasure and pain, the causes of bondage (bandha) and liberation (moksha), and the nature of liberation and liberated souls.”
“Having thus heard the detailed nature of Dharma from him, Ramachandraji and all other wise men accepted the vows of a lay follower (Shravaka).”682 – 686
श्लोक ( Shlok ) 687
निदानशल्य दोषेण भोगासक्तः स केशवः । बध्वायुर्नारकं घोरं नागृहीद्दर्शनादिकम् ॥ ६८७ ॥
परन्तु भोगोंमें आसक्त रहनेवाले लक्ष्मणने निदान शल्य नामक दोषके कारण नरककी भयङ्कर आयुका बन्ध कर लिया था इसलिए उसने सम्यग्दर्शन आदि कुछ भी ग्रहण नहीं किया ।। ६८७ ।।
“However, Lakshmana, being deeply attached to worldly pleasures, bound himself to a dreadful lifespan in hell due to the spiritual blemish known as Nidana Shalya (the flaw of desiring future worldly rewards). Consequently, he did not adopt right belief (Samyagdarshana) or any other spiritual vows.”687
श्लोक ( Shlok ) 688 – 689
एवं संवत्सरान्नीत्वा साकेते कतिचित्सुखम् । तदाधिपत्यं भरतशत्रुम्नाभ्यां प्रदाय तौ ॥ ६८८ ॥स्वयं स्वपरिवारेण गत्वा वाराणसीं पुरीम् । प्राविक्षतामधिक्षिप्य शक्रलीलां स्वसम्पदा ॥ ६८९ ॥
इस प्रकार राम और लक्ष्मणने कुछ वर्ष तो अयोध्यामें ही सुखसे बिताये तदनन्तर वहाँका राज्य भरत और शत्रुघ्न के लिए देकर वे दोनों अपने परिवारके साथ बनारस चले गये और अपनी सम्पदासे इन्द्रकी लीलाको तिरस्कृत करते हुए नगरी में प्रविष्ट हुए ।। ६८८-६८९ ॥
“In this manner, Rama and Lakshmana spent a few years happily in Ayodhya itself. Thereafter, handing over the kingdom to Bharata and Shatrughna, they both departed for Banaras (Varanasi) along with their families, entering the city with a grandeur that eclipsed the celestial opulence of Indra.”688 – 689
श्लोक ( Shlok ) 690
सुतो विजयरामाख्यो रामस्यामरसन्निभः । पृथिवीचन्द्रनामाभूच्चन्द्राभः केशवस्य च ॥ ६९० ॥
रामचन्द्रके देवके समान विजयराम नामका पुत्र था और लक्ष्मणके चन्द्रमाके समान पृथिवीचन्द्र नामका पुत्र उत्पन्न हुआ था ।। ६९० ॥
“A god-like son named Vijayarama was born to Ramachandra, and a moon-like son named Prithivichandra was born to Lakshmana.”690
श्लोक ( Shlok ) 691
अन्यैश्च पुत्रपौत्राद्यैः परीतौ तौ धृतोदयौ । नयतःस्म सुखं कालं त्रिवर्णफलशालिनौ ॥ ६९१ ॥
जिनका अभ्युदय प्रसिद्ध है और जो धर्म, अर्थ, काम रूप त्रिवर्गके फलसे सुशोभित हैं ऐसे रामचन्द्र और लक्ष्मण अन्य पुत्र-पौत्रादिकसे युक्त होकर सुखसे समय बिताते थे ।। ६९१ ॥
“Ramachandra and Lakshmana—whose worldly prosperity was legendary and who were adorned with the fruits of Trivarga (the three worldly pursuits: Dharma, Artha, and Kama)—spent their time happily, surrounded by their sons, grandsons, and other family members.” 691
श्लोक 682 से 691
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473
राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585 | श्लोक 586 से 594 | श्लोक 595 से 604 | श्लोक 605 से 622 | श्लोक 623 से 631 | श्लोक 632 से 641 | श्लोक 642 से 651 | श्लोक 652 से 661 | श्लोक 662 से 672
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |