राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 303 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 360 | श्लोक 361 से 371
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 372 to 381
श्लोक ( Shlok ) 372
निर्श्वतः संसृतौ दीर्घमश्नन् दुःखान्यनारतम् । अपारं खेदमायाति दुभिक्षे दुविधो यथा ॥ ३७२ ॥
आचार्य कहते हैं कि जिस प्रकार दुर्भिक्ष पड़ने पर दरिद्र मनुष्य बहुत ही दुःखी होता है उसी प्रकार इस संसारमें व्रतरहित मनुष्य दीर्घकाल तक दुःख भोगता हुआ निरन्तर अपार खेदको प्राप्त होतारहता है ।। ३७२ ।।
“The Acharya (spiritual master) states that just as a destitute person suffers immensely during a severe famine, in the exact same manner, a person devoid of vows in this worldly cycle suffers for an exceptionally long duration, continuously plunging into boundless misery and despair. ॥ 372 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 373
अत्तात्प्रत्ययमायाति निर्जतः शङ्कयते जनैः । व्रती सफलवृक्षो वा निर्ब्रतो वन्ध्यवृक्षवत् ॥ ३७३ ॥
व्रतके कारण इस जीवका सब विश्वास करते हैं और व्रतरहित मनुष्यसे सब लोग सदा शङ्कित रहते हैं। व्रती फलसहित वृक्षके समान हैं और अव्रती फलरहित वन्ध्य वृक्ष के समान है ॥ ३७३ ॥
“Because of their vows, everyone places their trust in a living being, whereas everyone remains perpetually suspicious of a person who is devoid of vows. A person who observes vows is like a fruit-bearing tree, while a person without vows is like a barren, fruitless tree. ॥ 373 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 374
अभीष्टफलमाप्नोति प्रतवान्परजन्मनि । न बतादपरो बन्धुर्नाग्रतादपरो रिपुः ॥ ३७४ ॥
व्रती मनुष्य पर-जन्ममें इष्ट फलको प्राप्त होता है इसलिए कहना पड़ता है कि इस जीवका व्रतसे बढ़कर कोई भाई नहीं है और अव्रतसे बढ़कर कोई शत्रु नहीं है ॥ ३७४ ॥
“A person who observes vows attains desirable fruits in their next birth; therefore, it must be said that for a living being, there is no greater brother than a vow, and there is no greater enemy than the lack of vows. ॥ 374 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 375
सर्वेषांग्ग्रतिनो ग्राह्या निर्बतस्य न केनचित् । उग्राभिर्देवताभिश्च व्रतवानाभिभूयते ॥ ३७५ ॥
व्रती मनुष्यके वचन सभी स्वीकृत करते हैं परन्तु व्रतहीन मनुष्यकी बात कोई नहीं मानता । बड़े-बड़े देवता भी व्रती मनुष्यका तिरस्कार नहीं कर पाते हैं ।॥ ३७५ ॥
“Everyone accepts the words of a person who observes vows, but no one believes a person who is devoid of vows. Even the great deities cannot insult or look down upon a person who observes vows. ॥ 375 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 376
जरन्तोऽपि ममन्त्येव व्रतवन्तं ‘बयोनवम् । वयोवृद्धो व्रताद्धीनस्तृणवद्ङ्गण्यते जनैः ॥ ३७६ ॥
व्रती मनुष्य अवस्थाका नया हो तो भी वृद्ध जन उसे नमस्कार करते हैं और वृद्धजन व्रतरहित हो तो उसे लोग तृणके समान तुच्छ समझते हैं ।॥ ३७६ ॥
“Even if a person who observes vows is young in age, the elders bow down to him; on the other hand, if an elderly person is devoid of vows, people consider him as insignificant as a blade of grass. ॥ 376 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 377
प्रकृत्यादीयते पापं निवृत्त्या तस्य सङ्क्षयः । ब्रतं निवृतिमेवाहुस्तद्गृह्णात्युरामो व्रतम् ॥ ३७७ ॥
प्रवृत्तिसे पापका ग्रहण होता है और निवृत्तिप्ते उसका क्षय होता है। यथार्थमें निवृत्तिको ही व्रत कहते हैं इसलिए उत्तम मनुष्य व्रतको अवश्य ही ग्रहण करते हैं ।॥ ३७७ ।।
“Acquisitive action (Pravritti) leads to the accumulation of sin, whereas renunciation (Nivritti) leads to its destruction. In reality, renunciation itself is called a vow; therefore, noble individuals most certainly adopt vows. ॥ 377 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 378
श्रतेन जायते सम्पश्नाश्रतं सम्पदे भवेत् । तस्मात्सम्पदमाकांक्षन्निःकांक्षः सुव्रतो भवेत् ॥ ३७८ ॥
व्रत से सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है और अव्रतसे कभी संपत्ति नहीं मिलती इसलिए सम्पत्तिकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको निष्काम होकर उत्तम व्रती होना चाहिये ॥ ३७८ ।।
“Wealth and prosperity are obtained through vows, whereas true prosperity is never attained through the lack of vows; therefore, a person who desires prosperity must become an excellent observer of vows, remaining completely detached from selfish desires. ॥ 378 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 379
स्वर्गापवर्गयोबींज जन्तोः स्वत्पमपि व्रतम् । तत्र प्रीतिङ्करो वाच्यो व्यक्तं दृष्टान्तकांक्षिणाम् ॥ ३७९॥
इस जीवके लिए छोटा-सा व्रत भी स्वर्ग और मोक्षका कारण होता है इस विषयमें जो दृष्टान्त चाहते हैं उन्हें प्रीतिंकरका दृष्टान्त अच्छी तरह दिया जा सकता है ॥ ३७९ ॥
“For this living being, even a minor vow becomes the cause for attaining heaven and liberation (Moksha). For those who wish to see an example of this truth, the story of Pritinkar can be excellently presented as a fitting illustration. ॥ 379 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 380
पूर्वोपात्तव्रतस्येष्टं फलमत्रानुभूयते । कचित्कदाचिस्किञ्चिरिंक जायते कारणाद्विना ॥ ३८० ॥
जिन्होंने पूर्वभवमें अच्छी तरह व्रतका पालन किया है वे इस भवमें इच्छानुसार फल भोगते हैं सो ठीक ही है क्योंकि बिना कारण के क्या कभी कोई कार्य होता हैं? ॥ ३८० ॥
“Those who have thoroughly observed their vows in a previous birth enjoy the desired fruits in this life, which is only fitting; after all, can an effect ever manifest without a cause? ॥ 380 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 381
कारगादिच्छता कार्य कार्ययोः सुखदुःखयोः । धर्मपापे विपर्यस्ते तदा वान्यशदीक्ष्यताम् ॥ ३८१ ॥
जो कारणसे कार्यकी उत्पत्ति मानता है उसे सुख-दुःख रूपी कार्यका कारण धर्म और पाप ही मानना चाहिये अर्थात् धर्मसेसुख और पापसे दुःख होता है ऐसा मानना चाहिये। जो इससे विपरीत मानते हैं उन्हें विपरीत फलकी ही प्राप्ति होती देखी जाती है ।। ३८१ ।।
“One who believes that an effect arises from a cause must accept that righteousness (Dharma) and sin (Paap) are the true causes behind the effects of happiness and sorrow—meaning, one must accept that happiness stems from Dharma and sorrow stems from sin. It is observed that those who believe contrary to this truth only receive contrary results. ॥ 381 ॥”
श्लोक 382 से 391
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549 | चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 691
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 360 | श्लोक 361 से 371
Download PDF
महापुराण हिन्दी-भाषानुवाद
आदिपुराण पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72 | पर्व 73 | पर्व 74
महापुराण सारांश
आदिपुराण पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72 | पर्व 73 | पर्व 74