राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णनपर्व 76 – श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 342 to 360
श्लोक ( Shlok ) 342
अभिधाय स्वविज्ञातं शेषं वेत्तीयमेव तत् । देवता नाहमित्येवं सोऽपि भूपमबोधयत् ॥ ३४२ ॥
इसके उत्तरमें कुमारने अपना जाना हुआ हाल कह दिया और फिर राजासे समझाकर कह दिया कि बाकीका हाल मैं नहीं जानता यह देवी ही जानती है ॥ ३४२ ॥
“In response to this, the prince narrated the events known to him, and then explained to the king, ‘I do not know the rest of the story; only this goddess knows it.’ ॥ 342 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 343
गन्धादिभिः समभ्ययं सां पटान्तरितां नृपः । देव ते ब्रूहि यद्दष्टं तत्तथेत्यनुयुक्तवान् ॥ ३४३ ॥
राजाने कपड़ेकी आड़में बैठी हुई उस देवीकी गन्ध आदिसे पूजा कर पूछा कि हे देवि ! तूने जो देखा हो वह ज्योंका त्यों कह ॥ ३४३ ॥
“The king worshipped the goddess, who was seated behind a cloth screen, with fragrant items and other offerings, and then asked, ‘O Goddess! Narrate exactly what you have witnessed.’ ॥ 343 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 344 – 347
सा नागदत्तदुश्चेष्टां महीनाथमबू बुधत् । श्रुत्वा तत्सुविचार्यास्मै कुपित्वानेन पापिना ॥ ३४४ ॥कृतः पुत्रवधः स्वामिवधश्चेति महीपतिः । सर्वस्वहरणं कृत्वा निगृहीतुं तमुद्यतः ॥ ३४५ ॥प्रतिषिद्धः कुमारेण नैतद्युक्तं तवेति सः । सौजन्यतस्तदा तुष्ट्वा कुमाराय निजात्मजाम् ॥ ३४६ ॥पृथिवीसुन्दरीं नाम्ना कन्यकाञ्च वसुन्धराम् । द्वात्रिंशद्वैश्यपुत्रीश्च कल्याणविधिना ददौ ॥ ३४७ ॥
इसके उत्तरमें उस देवीने राजाको नागदत्तकी सब दुष्ट चेष्टाएँ बतला दीं। उन्हें सुनकर तथा उनपर अच्छी तरह विचार कर राजा नागदत्तसे बहुत ही कुपित हुआ। उसने कहा कि इस पापीने पुत्रवध किया है और स्वामि-द्रोह भी किया है। यह कहकर उसने उसका सब धन लुटवा लिया और उसका निग्रह करनेका भी उद्यम किया परन्तु कुमार प्रीतिङ्करने यह कहकर मना कर दिया कि आपके लिए यह कार्य करना योग्य नहीं है। उस समय कुमारकी सुजनतासे राजा बहुत ही संतुष्ट हुआ और उसने अपनी पृथिवीसुन्द्री नामकी कन्या, वह वसुन्धरा नामकी कन्या तथा वैश्योंकी अन्य बत्तीस कन्याएँ विधिपूर्वक उसके लिए ब्याह दीं ।। ३४४-३४७ ॥
“In response, the goddess revealed all the wicked deeds of Nagadatta to the king. Upon hearing them and deliberating deeply over the matter, the king became furious with Nagadatta. He said, ‘This sinner has murdered a son and has also committed treason against his master.’ Saying this, he had all of Nagadatta’s wealth plundered and made an effort to punish him. However, Prince Pritinkar stopped him, saying, ‘It is not worthy of you to do this act.’ At that moment, the king was highly pleased with the prince’s nobility, and he formally gave away his daughter named Prithvisundari, the daughter named Vasundhara, and thirty-two other daughters of the merchants in marriage to him according to prescribed rituals. ॥ 344-347 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 348
सह पूर्वधनस्थानमर्धराज्यञ्च मात्रते । पुरा विहितपुण्यानां स्वयमायान्ति सम्पदः ॥ ३४८ ॥
इसके सिवाय पहलेका धन, स्थान तथा अपना आधा राज्य भी दे दिया सो ठीक ही है क्योंकि जिन्होंने पूर्वभवमें पुण्य किया है ऐसे मनुष्योंको सम्पदाएँ स्वयं प्राप्त हो जाती हैं ॥ ३४८ ॥
“Apart from this, the king also gave him his former wealth, position, and half of his kingdom. This is indeed fitting, because those individuals who have accumulated merit (Punya) in their past lives obtain immense wealth and prosperity effortlessly on their own. ॥ 348 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 349
प्रीतः प्रीतिङ्करस्तत्र कामभोगान्समीप्सितान् । स्वेच्छ्या वर्धमानेच्छश्चिरायानुबभूव सः ॥ ३४९ ॥
इस प्रकार जो अतिशय प्रसन्न है तथा जिसकी इच्छाएँ निरन्तर बढ़ रही हैं ऐसे प्रीतिङ्कर कुमारने वहाँ अपनी इच्छानुसार चिरकाल तक मनचाहे काम-भोगोंका उपभोग किया ।। ३४९ ॥
“In this manner, Prince Pritinkar, who was exceedingly delighted and whose desires were continuously expanding, enjoyed his heart’s contents and pleasures there for a very long time, just as he wished. ॥ 349 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 350 – 360
मुनौ सागरसेनाख्ये सन्न्यस्यान्येद्यरीयुषि । लोकान्तरं तदागत्य चारणौ समुपस्थितौ ॥ ३५० ॥ऋजुश्च विपुलाख्यश्च मत्यन्तौ मतिभूषणौ । रम्ये मनोहरोद्याने गत्वा स्तुत्वा वणिग्वरः ॥ ३०५१ ॥धर्म समन्वयुङ्क्तैतावित्याहर्जुमतिस्तयोः । धर्मोऽपि द्विविधो ज्ञेयः स गृहागृहभेदतः ॥ ३५२ ॥एकादशविधस्तत्र धर्मो गृहनिवासिनाम् । श्रद्धा न व्रतभेदादिः शेषो दशविधः स्मृतः ॥ ३५३ ॥क्षान्त्यादिः कर्मविध्वंसी तच्छ्रुत्वा तदनन्तरम् । स्वपूर्वभवसम्बन्धं पप्रच्छेवञ्च सोऽब्रवीत् ॥ ३५४ ॥शृणु सागरसेनाख्यमुनिमातपयोगिनम् । पुरेऽस्मिन्नेव भूपालप्रमुखा वन्दितुं गताः ॥ ३५५ ॥ नानाविधार्चनादव्यैः सम्पूज्य पुरमागताः । शङ्खतूर्यादिनिर्घातं श्रुत्वैकमिह जम्बुकम् ॥ ३५६ ॥कश्चिल्लोकान्तरं यातः पुरेऽचैतं जनो बहिः । क्षिप्त्वा यातु ततो भक्षयिष्यामीत्यागतं मुनिः ॥३५७॥भध्योऽयं ब्रतमादाय मुक्तिमाशु गमिष्यति । इति मत्वा तमासनमसावेवमभाषत ॥ ३५८ ॥ प्राग्जन्मकृतपापस्य फलेनाभूः शृगालकः । इदानीञ्च कुधीः साधुसमायोगेऽपि मन्यसे ॥ ३५९ ॥दुष्कर्म विरमैतस्मादुरन्तदुरितावहात् । गृहाण व्रतमभ्येहि परिणामनुभावहम् ॥ ३६० ॥
तदनन्तर किसी एक दिन मुनिराज सागरसेन, आयुके अन्तमें संन्यास धारण कर स्वर्ग चले गये । उसी समय वहाँ बुद्धि-रूपी आभूषणों से सहित ऋजुमति और विपुलमति नामके दो चारण ऋद्धिधारी मुनिराज मनोहर नामक उद्यानमें आये। प्रीतिङ्कर सेठने जाकर उनकी स्तुति की और धर्मका स्वरूप पूछा। उन दोनों मुनियोंमें जो ऋजुमति नामके मुनिराज थे वे कहने लगे कि गृहस्थ और मुनिके भेदसे धर्म दो प्रकारका जानना चाहिए। गृहस्थोंका धर्म दर्शन-प्रतिमा, व्रत-प्रतिमा आदिके भेदसे ग्यारह प्रकारका है और कर्मोंका क्षय करनेवाला मुनियोंका धर्म क्षमा आदिके भेदसे दश प्रकारका है। धर्मका स्वरूप सुननेके बाद प्रीतिङ्करने मुनिराजसे अपने पूर्वभवोंका सम्बन्ध पूछा। इसके उत्तरमें मुनिराज इस प्रकार कहने लगे कि सुनो, मैं कहता हूं- किसी समय इसी नगरके बाहर सागरसेन मुनिराजने आतापन योग धारण किया था इसलिए उनकी वन्दनाके लिए राजा आदि बहुतसे लोग गये थे, वे नाना प्रकारकी पूजाकी सामग्रीसे उनकी पूजा कर शङ्ख तुरही आदि बाजोंके साथ नगरमें आये थे। उन बाजोंका शब्द सुनकर एक शृगालने विचार कियाकि ‘आज कोई नगर में मर गया है इसलिए लोग उसे बाहर छोड़कर आये हैं, मैं जाकर उसे खाऊँगा’ ऐसा विचार कर वह शृगाल मुनिराजके समीप आया। उसे देखकर मुनिराज समझ गये कि यह भव्य है और व्रत लेकर शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त करेगा। ऐसा विचार कर मुनिराज उस निकटभव्यसे इस प्रकार कहने लगे कि पूर्व जन्ममें जो तूने पाप किये थे उनके फलसे अब शृगाल हुआ है और अब फिर दुर्बुद्धि होकर मुनियोंका समागम मिलने पर भी उसी दुष्कर्मका विचार कर रहा है। हे भव्य ! तू दुःखदायी पापको देनेवाले इस कुकर्म से विरत हो व्रत ग्रहण कर और शुभ परिणाम धारण कर ॥ ३५०-३६० ॥
“Thereafter, on one particular day, the ascetic (Muniraj) Sagarsen embraced Sannyasa (holy vow of fasting unto death) at the end of his lifespan and departed for heaven. At that very time, two Charana-Riddhidhari Muniraj (ascetics endowed with the miraculous power of levitation), named Rijumati and Vipulamati, who were adorned with the ornaments of wisdom, arrived at a garden named Manohar. Seth Pritinkar went there, offered his prayers to them, and enquired about the nature of Dharma. Among the two ascetics, the one named Rijumati began to speak, ‘Dharma should be known to be of two types, divided into the duties of a householder (Grihastha) and an ascetic (Muni). The Dharma of householders is of eleven types, categorized into Darshana-Pratima, Vrata-Pratima, and so forth. The Dharma of ascetics, which destroys karmas, is of ten types, categorized into forgiveness (Kshama) and others.’
After listening to the nature of Dharma, Pritinkar asked the ascetic about the connections to his past lives. In response, the ascetic began to speak as follows, ‘Listen, I shall tell you—Once upon a time, outside this very city, Muniraj Sagarsen had undertaken the Atapan Yoga (penance under the scorching sun). Consequently, many people, including the king, went to pay their respects to him. After worshipping him with various kinds of offerings, they returned to the city playing instruments like conch shells and trumpets. Hearing the sound of those instruments, a jackal thought to himself, “Today someone has died in the city, which is why the people have left the body outside and are returning. I will go and eat it.” With this thought, the jackal approached the ascetic. Seeing him, the ascetic realized that this soul is Bhavya (spiritually capable of liberation) and, by taking vows, will soon attain Moksha (salvation). Reflecting thus, the ascetic spoke to that Nikata-Bhavya (a soul near liberation) in this manner: “As a result of the sins you committed in your past birth, you have now become a jackal. And now, even upon finding the association of ascetics, you are maliciously harboring thoughts of the same wicked deeds. O Bhavya! Turn away from this evil deed which yields sorrowful sins, accept vows, and maintain pure, auspicious thoughts.” ‘ ॥ 350-360 ॥”
श्लोक 361 से 371
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549 | चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 691
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111| श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341
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