पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43 | श्लोक 44 से 53
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 73- shlok 54 to 66
श्लोक ( Shlok ) 54 – 60
तत्कथावसरे लोकत्रयचैत्यालयाकृतीः । सम्यग्वर्णयितुं वान्छन्प्रागादित्यविमानजे ॥ ५४ ॥जिनेन्द्रभवने भूतां विभूतिं सोऽन्ववर्णयत् । तामसाधारणीं श्रुत्वानन्दः श्रद्धां परां वहन् ॥ ५’५ ॥दिनादौ च दिनान्ते च कराभ्यां कृतकुड्मलः । स्तुवन्नानम्रमुकुटो जिनेशान् मण्डले रवेः ॥ ५६ ॥शिल्पिभिः कारयित्वार्कविमानं मणिकाञ्चनैः । क्रोडीकृतजिनाधीशभवनं विततद्युति ॥ ५७ ॥शास्त्रोक्तविधिना भक्तया पूजामाष्टाह्निकी व्यधात् । चतुर्मुखं रथावर्त सर्वतोभद्रमूर्जितम् ॥ ५८ ॥कल्पवृक्षञ्च दीनेभ्यो ददद्दानमवारितम् । तद्विलोक्य जनाः सर्वे तत्प्रामाण्यात्स्वयञ्च तत् ॥ ५९ ॥स्तोतुमारेभिरे भक्तया मण्डलं चण्डरोचिषः । तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन् बभूवार्कोपसेवनम् ॥ ६० ॥
इसी उपदेशके समय उक्त मुनिराजने तीनों लोकों सम्बन्धी चैत्यालयोंके आकार आदिका वर्णन करना चाहा और सबसे पहले उन्होंने सूर्यके विमानमें स्थित जिन-मन्दिरकी विभूतिका अच्छी तरह वर्णन किया भी। उस असाधारण विभूतिको सुनकर राजा आनन्दको बहुत ही श्रद्धा हुई। वह उस समयसे प्रति दिन आदि और अन्त समयमें दोनों हाथ जोड़कर तथामुकुट झुकाकर सूर्यके विमानमें स्थित जिन प्रतिमाओंकी स्तुति करने लगा। यही नहीं, उसने कारीगरोंके द्वारा मणि और सुवर्णका एक सूर्य-विमानभी बनवाया और उसके भीतर फैलती हुई कान्तिका धारक जिन-मन्दिर बनवाया। तदनन्तर उसने शास्त्रोक्त विधिसे भक्तिपूर्वक आष्टाह्निक पूजा की। चतुर्मुख, रथावर्त, सबसे बड़ी सर्वतोभद्र और दीनोंके लिए मन-चाहा दान देनेवाली कल्पवृक्ष-पूजा की। इस प्रकार उस राजाको सूर्यकी पूजा करते देख उसकी प्रामाणिकतासे अन्य लोग भी स्वयं भक्तिपूर्वक सूर्य-मण्डलकी स्तुति करने लगे। आचार्य कहते हैं कि इस लोकमें उसी समयसे सूर्य की उपासना चल पड़ी है ।। ५४-६० ।।
During this very discourse, the Sage intended to describe the form and structure of the celestial temples (Chaityalayas) across all three worlds, and he first thoroughly detailed the magnificent glory of the Jinendra temple situated within the chariot (Vimana) of the Sun. Hearing about this extraordinary grandeur, King Ānanda was filled with profound faith.
From that day forward, every single day at the beginning and the end of the day (sunrise and sunset), he would join both hands, bow his crown, and praise the Jinendra idols situated in the Sun’s chariot. Not only that, he had artisans construct a replica of the Sun’s chariot made of gems and gold, and within it, he built a Jinendra temple that radiated brilliant light.
Thereafter, he devotedly performed the Ashtahnika worship according to scriptural rituals. He performed the Chaturmukha, Rathavarta, the grandest Sarvatobhadra, and the Kalpavriksha worship, which grants desired charities to the needy.
Seeing the King worship the Sun in this manner, other people, influenced by his authority, also began to devotionally praise the solar orb on their own. The Acharyas state that it is from that very time that the practice of Sun worship began in this world. (54-60)
श्लोक ( Shlok ) 61 – 66
अथानन्तर – किसी एक दिन राजा आनन्दने यौवन चाहनेवाले लोगोंके हृदयको दो टूक करनेवाला सफेद बाल अपने शिर पर देखा। इस निमित्त से उसे वैराग्य उत्पन्न हो गया । विरक्त होते ही उसने बड़े पुत्रके लिए अभिषेक पूर्वक अपना राज्य दे दिया और समुद्रगुप्त मुनिराजके समीप राजसी भाव छोड़कर अनेक राजाओंके साथ निःस्पृह (निःस्वार्थ) तप धारण कर लिया । शुभ लेश्याके द्वारा उसने चारों आराधनाओंकी आराधनाकी विशुद्धता प्राप्त कर ग्यारह अङ्गोंका अध्ययन किया, तीर्थंकर नामकर्म के बन्धमें कारणभूत सोलह कारणभावनाओंका चिन्तवन किया, शास्त्रानुसार सोलह कारणभावनाओंका चिन्तवन कर तीर्थकर नामक पुण्य प्रकृतिका बन्ध किया और चिरकाल तक घोर तपश्चरण किया। आयुके अन्तमें, जिसकी अन्तरात्मा अत्यन्त शान्त हो गई है, जो धीर वीर है, धर्मध्यानके अधीन है और आकुलतारहित है ऐसा वह आनन्द मुनि प्रायोपगमन संन्यास लेकर क्षीरवनमें प्रतिमा योगसे विराजमान हुआ ।। ६१-६६ ।।
Thereafter, on a certain day, King Ānanda spotted a single white hair on his head—a sight that shatters the hearts of those who yearn for youth. This catalyst (nimitta) awakened a deep sense of detachment (vairagya) within him.
Becoming completely worldly-detached, he performed the anointment ceremony (abhisheka) to pass the kingdom to his eldest son. Leaving behind his royal stature, he renounced all worldly desires and embraced rigorous penance alongside many other kings under the guidance of Sage Samudragupta.
Through auspicious spiritual coloration (shubha leshya), he attained the utter purity of the four-fold path of adoration (aradhana) and studied the eleven primary scriptures (angas). He meditated on the Sixteen Causes (solah karan bhavana) that lead to the bondage of the Tirthankara name-karma. By contemplating these sixteen principles according to the scriptures, he bound the highly meritorious nature of the Tirthankara karma-deity and practiced severe austerities for a long time.
At the end of his lifespan, with a deeply serene inner soul, standing resolute and brave, immersed in righteous meditation (dharmadhyana) and completely free from agitation, Sage Ānanda embraced the ultimate vow of Prayopagamana Sannyasa (fasting unto death without seeking assistance) and remained seated in static meditation (pratima yoga) in the Ksheeravana forest. (61-66)
श्लोक 67 से 79
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पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43 | श्लोक 44 से 53
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