राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 –श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 561 to 575
श्लोक ( Shlok ) 561 – 575
सपक्षा इव सम्पन्नकङ्कटा गगनान्तरम् । लिलङ्घयिषवो 3 लालाजलफेनप्रसूनकैः ॥ ५६१ ॥स्वपादनटनृतार्थमर्चयम्तो धरामिव । हया यवनकाश्मीरवाह्वीकादिसमुद्भवाः ॥ ५६२ ॥स्फुरदुत्खातखड्गांशुविलसत्साद्यधिष्ठिताः । महासैन्याब्धिसम्भूततरङ्गाभा विनिर्गताः ॥ ५६३ ॥द्विषो भीषयितुं वोश्चैहैंषाघोषैविभूषणैः । स्वानुकूलानिलाः शस्नभाण्डाः प्रोद्दण्डकेतवः ॥ ५६४ ॥संग्रामाम्भोनिधेः प्रोप्ताः प्रचेलुः पृथवो रथाः । चक्रेणैकेन चेश्चक्री विक्रमी नस्तयोर्द्वयम् ॥ ५६५ ॥मत्वेति वा द्रुतं पेतुर्दिचक्राक्रमिणो रथाः । नायकाधिष्ठिता शस्त्रैः सम्पूर्णास्तूर्णवाजिनः ॥ ५६६ ॥सन्नद्धाः सन्तु नो युद्धे बद्धकक्षाः कथं रथाः । धावन्तु पत्तयो वाहा गजाश्चैभिः किमातुरैः ॥ ५६७ ॥ जयोऽस्मास्विति वा मन्दं सभराः स्यन्दना ययुः । सन्मार्गगामिभिः शखधारिभिश्चक्रवर्तिभिः ॥ ५६८॥रथैर्दिक्चक्रमाक्रम्य तैद्विचक्रं किमुच्यते । महीधरनिभैः पूर्वकायैरौदग्रयधारिणः ॥ ५६९ ॥पश्चात्प्रसारिताग्राङ्गली विलङ्घय ‘स्वपेचकाः । अम्भोरुहाकरा बोद्यद्रक्तपुष्करशोभिनः ॥ ५७० ॥परप्रणेयवृत्तित्वादर्भकानुविधाधिनः । रुषेवोत्थापयन्दोऽलीन् कर्णतालैः कटस्थितान् ॥ ५७१ ॥सबलाका इवाम्भोदाः समुद्यद्धवलध्वजैः । केचित्परमदामोदमाघ्रायाम्भोदवर्त्मनि ॥ ५७२ ॥ करैः प्रविकसत्पुष्करैस्तैर्योढुं समुद्यताः । निशितोर्ध्वाङ्कुशाघातदलनिर्याण वारिताः ॥ ५७३ ॥मुहुविधूतमूर्द्धनः करेणुगणसन्निधौ । प्रशान्तीभूतसंरम्भा 3 महामात्रायधिष्ठिताः ॥ ५७४ ॥मातङ्गास्तुङ्गदेहत्वादाक्रामन्त इवाखिलम् । सर्वतो निर्ययुर्वोच्चैर्जङ्गमा धरणीधराः ॥ ५७५ ॥
वे घोड़े कवच पहने हुए थे इसलिए ऐसे जान पड़ते थे मानो पंखोंसे युक्त होकरआकाशके मध्यभागको ही लाँघना चाहते हों। उनके मुखोंसे लार रूपी जलका फेन निकल रहा थाजिससे ऐसे जान पड़ते थे मानो अपने पैररूपी नटोंके नृत्य करनेके लिए फूलोंसे पृथिवीकी पूजाही कर रहे हों। वे घोड़े यूनान, काश्मीर और वाल्हीक आदि देशोंमें उत्पन्न हुए थे, उन पर ऊँचीउठाई हुईं देदीप्यमान तलवारोंकी किरणोंसे सुशोभित घुड़सवार बैठे हुए थे, वे महासेना रूपीसमुद्रमें उत्पन्न हुई तरंगोंके समान इधर-उधर चल रहे थे, और जोर-जोरसे हींसनेके शब्द रूपीआभूषणोंसे शत्रुओंको भयभीत करनेके लिए ही मानो निकले हुए थे। इनके सिवाय वायु जिनकेअनुकूल चल रही है जिसमें शस्त्र रूपी वर्तन भरे हुए हैं, जिनपर ऊँचे दण्ड वाली पताकाएँ फहरारही हैं, और संग्राम रूपी समुद्रके जहाजके समान जान पड़ते हैं ऐसे बड़े-बड़े रथ भी वहाँ चल रहेथे । चक्रवर्ती रावण यदि एक चक्रसे पराक्रमी है तो हमारे पास ऐसे दो चक्र विद्यमान हैं ऐसा समझ कर समस्त दिशाओंमें आक्रमण करनेवाले रथ वहाँ बड़ी तेजीसे आ रहे थे। जिनके भीतरउनके स्वामी बैठे हुए हैं, जो अनेक शस्त्रोंसे परिपूर्ण हैं और जिनमें शीघ्रतासे चलनेवाले वेगगामी घोड़े जुते हुए हैं ऐसे तैयार खड़े हुए हमारे रथ युद्धके लिए बद्धकक्ष क्यों न हों ? पैदल चलनेवाले सिपाही, घोड़े और हाथी भले ही आगे दौड़ते चले जावें पर इन व्यग्र प्राणियोंसे क्या होनेवाला है ? विजय तो हम लोगोंपर ही निर्भर है। यह सोचकर ही मानो बोझसे भरे रथ धीरे-धीरे चल रहे थे । सन्मार्ग पर चलनेवाले, शस्त्रोंके धारक एक चक्रवाले चक्रवर्तियोंने जब समस्त दिशाओं पर आक्रमण किया था तब दो चक्रवाले रथोंने समस्त दिशाओं पर आक्रमण किया इसमें आश्चर्य ही क्या है ? इसी प्रकार पर्वतके समान जिनका अग्रभाग कुछ ऊँचा उठा हुआ था, पीछेकी ओर फैली हुई पूँछसे जिनकी पूँछका उपान्त भाग कुछ खुल रहा था, जो ऊपरकी ओर उठते हुए सूँड़के लाल लाल अग्र-भागसे सुशोभित थे और इसीलिए जो कमलोंके सरोवरके समान जान पड़ते थे। जिनकी वृत्ति पर-प्रणेय थी- दूसरोंके आधीन थी अतः जो बच्चोंके समान जान पड़ते थे, जो अपने गण्डस्थलों पर स्थित भ्रमरोंको मानो क्रोधसे ही कान रूपी पंखोंकी फटकारसे उड़ा रहे थे। उड़ती हुई सफेद ध्वजाओंसे जो बगलाओंकी पंक्तियों सहित काले मेघोंके समान जान पड़ते थे, जिनमें कितने ही हाथी दूसरे हाथियोंके मदकी सुगन्ध सूंघकर आकाशमें खिले हुए कमलके समान जिनका अग्रभाग विकसित हो रहा है ऐसी सूँडोंसे युद्ध करनेके लिए तैयार हो रहे थे, जो पैनी नोकवाले अंकुशोंकी चोटसे अपाङ्ग प्रदेशमें घायल होनेके कारण युद्ध-क्रियासे रोके जा रहे थे, जो हथिनियोंके समूहके समीप बार-बार अपना मस्तक हिला रहे थे, जिनका सब क्रोध शान्त हो गया था, जिनपर प्रधान पुरुष बैठे हुए थे और जो उन्नत शरीर होनेके कारण समस्त संसार पर आक्रमण करते हुएसे जान पड़ते थे ऐसे चलते फिरते पर्वतोंके समान ऊँचे-ऊँचे हाथी सब ओरसे निकल कर चल रहे थे ॥५६१-५७५ ।।
Here is the English translation of this expansive and highly descriptive passage, preserving the grand epic vocabulary, classical similes, and poetic dual-meanings (Slesha):
English Translation
“Clad in protective armor, those horses appeared as if they were endowed with wings, eager to leap across the mid-regions of the sky. The frothy water of saliva trickling from their mouths made it seem as though they were worshipping the earth with white flowers, setting a stage for the dance of their actor-like hooves. These steeds were born in premium lands such as Greece (Yunan), Kashmir, and Balkh (Valhik). Mounted upon them were horsemen resplendent with the glittering rays of their uplifted, flashing swords. Moving hither and thither like surging waves born of a colossal ocean-like army, they seemed to have advanced for the sole purpose of terrifying the enemy with the ornaments of their loud, thunderous neighing.
Beside them, massive chariots were moving—chariots with the wind blowing in their favor, packed with chests of diverse weapons, and fluttering with tall-staffed flags, appearing like grand ships sailing across the ocean of battle. Moving with immense speed, these chariots charged across all directions as if driven by the thought: ‘If Emperor Ravana possesses the power of a single divine discus (Chakra), we have two wheels (Chakras) right here on our side!’ Why should our fully equipped chariots—carrying their masters within, packed with countless weapons, yoked to swift, fast-paced horses—not gird their loins for battle? It was as if the heavily laden chariots moved forward deliberately and slowly, thinking: ‘Let the infantry, horses, and elephants sprint ahead if they wish—what can these anxious creatures accomplish? Victory, after all, depends entirely upon us!’ If single-wheeled (one-discus) Emperors (Chakravartis) who tread the path of righteousness can conquer all directions, what wonder is there if these two-wheeled chariots conquer all corners of the earth?
Furthermore, moving ahead from all sides like walking mountains were towering elephants. Their forefronts were arched high like mountain peaks; their hindquarters were subtly revealed by their outstretched tails; and they were beautified by the bright crimson tips of their raised trunks, making them resemble lakes filled with blooming red lotuses. Because their actions were completely governed by their drivers (par-praneya), they looked as innocent as children. Yet, as if in pure fury, they flapped their fan-like ears to drive away the swarms of bees hovering around their rut-flowing temples (gandhasthala). Adorned with fluttering white flags, they looked like dark storm clouds accompanied by rows of white cranes. Among them, several elephants, catching the fragrance of the rutting fluid of rival beasts, raised their trunks—which bloomed at the tips like lotuses opening toward the sky—ready to engage in combat.
Some were momentarily restrained from battle as they were reined in by sharp-tipped goads (ankush) that wounded the outer corners of their eyes. Others repeatedly shook their heads near herds of female elephants, their battle-fury completely pacified. Mounted by noble commanders and possessing colossal frames, these moving mountains advanced from every direction, looking as though they were ready to trample and conquer the entire world.” ॥ 561-575 ॥
श्लोक 576 से 585
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473
राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560
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