राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 253 to 271
श्लोक ( Shlok ) 253 – 255
शङ्खत्र्यादिभिस्तस्मिन् ध्वनद्भिः सम्मुखाञ्जनान् । निर्गच्छतो प्रपश्यद्भिराशङ्कय वणिजां वरैः ॥ २५३॥ गत्वैतत्पुरमन्विष्य प्रस्येतुमिह कः सहः । इत्युदीरितमाकर्ण्य प्रीतिङ्गरकुमारकः ॥ २५४ ॥ कर्मणोऽस्य समर्थोऽहमिति सङ्गीर्णवांस्तदा । चोचबल्कजनिष्पन्नरज्ज्वा तैरवतारितः ॥ २५५ ॥
उस समय शङ्ख, तुरही आदि बाजे बजाते हुए लोग सामने ही नगरके बाहर निकल रहे थे उन्हें देखकर श्रेष्ठ वैश्योंने भयभीत हो यह घोषणा की कि नगर में जाकर तथा इस बातका पता चलाकर वापिस आनेके लिए कौन समर्थ है ? यह घोषणा सुनकर प्रीतिङ्कर कुमारने कहा कि मैं यह कार्य करनेके लिए समर्थ हूँ। वैश्योंने उसी समय उसे दालचीनीकी छालसे बने हुए रस्सेसे नीचे उतार दिया ।। २५३-२५५ ।।
At that moment, hearing the blaring sounds of conch shells, trumpets, and other musical instruments, the people of the city were seen rushing outside. Beholding them, the chief merchants grew frightened and made a proclamation: “Who among us is capable of going into the city, finding out what is happening, and returning safely?”
Upon hearing this proclamation, Prince Pritinkar said, “I am capable of performing this task.” The merchants immediately lowered him down using a rope made from the bark of cinnamon trees. [253-255]
श्लोक ( Shlok ) 256 – 258
विस्मयात्परितः ‘पश्यन्प्रविश्य नगरं पुरा । निरीक्ष्य भवनं जैनं परीत्य विहितस्तुतिः ॥ २५६ ॥ ततो गत्वायुधापातविगतासून्निरूपयन् । समन्तात्कन्यकां काञ्चिङ्गच्छन्तीं सरसो गृहान् ॥ २५७ ॥ केयमित्यनुयातोऽसौ तं सालोक्य गृहाङ्गणे । भद्रागतः कुतो चेति पीठमस्मै समर्पयत् ॥ २५८ ॥
आश्चर्यसे चारों ओर देखते हुए कुमारने नगर में प्रवेश किया तो सबसे पहले उसे जिन-मन्दिर-दिखाई दिया । उसने मन्दिरकी प्रदक्षिणा देकर स्तुति की। उसके बाद आगे गया तो क्या देखता है कि जगह-जगह शस्त्रोंके आघातसे बहुत लोग मरे पड़े हैं। उसी समय उसे सरोवरसे निकलकर घरकी ओर जाती हुई एक कन्या दिखी। यह कौन है ? इस बातका पता चलानेके लिए वह कन्याके पीछे चला गया । घरके आँगनमें पहुँचनेपर कन्याने प्रीतिङ्करको देखा तो उसने कहा, हे भद्र ! यहाँ कहाँ से आये हो ? यह कह कर उसके बैठनेके लिए एक आसन दिया ।। २५६-२५८ ।।
Looking around in astonishment, the young prince entered the city, and the first thing he beheld was a Jina temple. He circumambulated the temple and offered his prayers. As he proceeded further, he was shocked to see many people lying dead everywhere, slain by the blows of weapons.
Just then, he spotted a young maiden who had emerged from a lake and was heading toward a house. To find out who she was, he followed her. Upon reaching the courtyard of the house, the maiden noticed Pritinkar and said, “O noble one! Where have you come from?” Saying this, she offered him a seat to rest. [256-258]
श्लोक ( Shlok ) 259 – 265
सोऽपि तस्योपरि स्थित्वा नगरं केन हेतुना । सञ्जातमीदृशं ब्रूहीत्याह तामथ साब्रवीत् ॥ २५९ ॥ तद्वक्तुं नास्ति कालोऽस्माद्भद्र त्वं याहि सत्वरम् । भयं महत्तवेहास्तीत्येतच्छ्रुत्वा स निर्भयः ॥ २६० ॥यो भयं मम कर्ताऽश्र स किं बाहुसहस्त्रकः । इत्याह तद्भयोन्मुक्तवाग्गम्भीरविजृम्भणात् ॥ २६१ ॥ शिथिलीभूतभीः कन्याप्यवोचद्विस्तरेण तत् । एतत्खगाद्रयुदीच्यालकेश्वराः सहजाश्त्रयः ॥ २६२ ॥ ज्यायान्हरिबलस्तस्य महासेनोऽनुजोऽनुजः । तस्य भूतिलकस्तेषु धारिण्यां ज्यायसोऽभवत् ॥२६३॥ तनूजो भीमकस्तस्मादेव विद्याधरेशिनः । हिरण्यवर्मा श्रीमत्यामजायत सुतोऽपरः ॥ २६४ ॥ महासेनस्य सुन्दर्यामुग्रसेनः सुतोऽजनि । वरसेनश्च तस्यानुजा जाताहं वसुन्धरा ॥ २६५ ॥
कुमारने उस आसन पर बैठ कर कन्यासे पूछा कि कहो, यह नगर ऐसा क्यों हो गया है ? इसके उत्तर में कन्याने कहा कि यह कहने के लिए समय नहीं है। हे भद्र ! तुम यहाँ से शीघ्र ही चले जाओ क्योंकि यहाँ तुम्हें बहुत भारी भय उपस्थित है। कन्याकी बात सुनकर निर्भय रहनेवाले कुमारने कहा कि यहाँ जो मेरे लिए भय उत्पन्न करेगा उसके क्या हजार भुजाएँ हैं? कुमारका ऐसा भयरहित गम्भीर उत्तर सुनकर जिसका भय कुछ दूर हो गया है ऐसी कन्या विस्तारसे उसका कारण कहने लगी। उसने कहा कि इस विजयार्ध पर्वतकी उत्तर दिशामें जो अलका नामकी नगरी है उसके स्वामी तीन भाई थे । हरिबल उनमें बड़ा था, महासेन उससे छोटा था और भूतिलक सबसे छोटा था। हरिबलकी रानी धारिणीसे भीमक नामका पुत्र हुआ था और उसीकी दूसरी रानी श्रीमतीसे हिरण्यवर्मा नामका दूसरा पुत्र हुआ था । महासेनकी सुन्दरी नामक स्त्रीसे उग्रसेन और वरसेन नामके दो पुत्र हुए और मैं वसुन्धरा नामकी कन्या हुई ।। २५९-२६५ ॥
Seating himself upon that chair, the prince asked the maiden, “Tell me, why has this city fallen into such a state?”
In response, the maiden said, “There is no time to explain this. O noble one! Leave this place immediately, for a grave danger awaits you here.”
Hearing the maiden’s words, the fearless prince replied, “Does the one who intends to cause me fear possess a thousand arms?”
Reassured by the prince’s bold and profound response, the maiden, whose own fear was somewhat dispelled, began to explain the cause in detail. She said, “In the city named Alaka, which lies to the north of this Vijayardha mountain, there ruled three brothers. Haribala was the eldest among them, Mahasena was the middle one, and Bhutilaka was the youngest.
A son named Bhimaka was born to Haribala’s queen, Dharini, and another son named Hiranyavarma was born to his second queen, Shrimati. From Mahasena’s wife, Sundari, two sons named Ugrasena and Varasena were born, and I was born as their daughter, named Vasundhara.” [259-265]
श्लोक ( Shlok ) 266 – 268
कदाचिन्मत्पिता भौमविहारे विपुलं पुरम् । निरीक्ष्येदं चिरं चिराहारीति स्वीचिकीर्षुकः ॥ २६६ ॥ एतन्निवासिनीजित्वा रणे व्यन्तरदेवताः । अत्र भूतिलकाख्येन सोदर्येण समन्वितः ॥ २६७ ॥ इह संवासिभिर्भूपैः सेव्यमानः सुखेन सः । कालं गमयति स्मैवं कञ्चित्सञ्चितपुण्यकः ॥ २६८ ॥
किसी एक समय मेरे पिता पृथिवी पर विहार करनेके लिए निकले थे उस समय इस मनोहरी विशाल नगरको देख कर उनकी इच्छा इसे स्वीकृत करनेकी हुई । पहले यहाँ कुछ व्यन्तर देवता रहते थे, उन्हें युद्धमें जीतकर हमारे पिता यहाँ भूतिलक नामक भाईकेसाथ सुखसे रहने लगे। यहाँ रहनेवाले राजा लोग उनकी सेवा करते थे। इस प्रकार पुण्यका संचय करते हुए उन्होंने यहाँ कुछ काल व्यतीत किया ।। २६६-२६८ ।।
“Once upon a time, my father went out to tour the earth. Beholding this captivating and vast city, he desired to claim it for himself. Previously, certain Vyantara deities (demigods) resided here; having defeated them in battle, my father began to live here happily along with his brother, Bhutilaka. The kings ruling in this region served him faithfully. In this manner, accumulating merit (punya), he spent some time here.” [266-268]
श्लोक ( Shlok ) 269 – 271
इतः कनीयसे विद्यां भीमकायालकश्रियम् । दत्वा संसारभीरुत्वान्निविंद्य विजितेन्द्रियः ॥ २६९ ॥ कर्मनिर्मूलनं कर्तुं दीक्षां हरिबलाह्वयः । विद्वान्विपुलमत्याख्यचारणस्याप्यसन्निधौ ॥ २७० ॥ शुक्रुध्यानानलालीढदुरिताष्टकदुष्टकः । अष्टमीमगमत्पृथ्वीमिष्टामष्टगुणान्वितः ॥ २७१ ॥
उधर इन्द्रियोंको जीतनेवाले विद्वान् राजा हरिबलको वैराग्य उत्पन्न हुआ। उसने अपने छोटे पुत्र हिरण्यवर्माके लिए विद्या दी और बड़े पुत्र भीमकको अलकापुरीका राज्य दिया । संसारसे भयभीत होनेके कारण विरक्त होकर उसने समस्त कर्मोंका क्षय करनेके लिए विपुलमति नामक चारण मुनिराजके पास जाकर उसने दीक्षा ले ली और शुक्लध्यान रूपी अग्निके द्वारा आठों दुष्ट कर्मोंको जलाकर आठ गुणोंसे सहित हो इष्ट आठवीं पृथिवी प्राप्त कर ली (मोक्ष प्राप्त कर लिया ॥ २६९-२७१ ॥
Meanwhile, the wise King Haribala, who had conquered his senses, developed a deep detachment (vairagya) toward the material world. He bestowed sacred knowledge upon his younger son, Hiranyavarma, and granted the sovereignty of Alakapuri to his eldest son, Bhimaka.
Spurred by a profound detachment born from the fear of worldly existence (samsara), and aiming to destroy all his karmas, he approached the Charana ascetic (a sage with miraculous powers of flight) named Vipulamati. There, he took the vows of initiation (diksha). By the fire of pure meditation (shukla-dhyana), he incinerated all eight malevolent karmas, attained the eight supreme attributes, and reached the desired eighth realm—liberation (Moksha). [269-271]
श्लोक 272 से 283
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252
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