राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 232 to 241
श्लोक ( Shlok ) 232 – 237
तीव्रलोभविषक्तोऽयमित्यसाववगम्य तत् । किमावाभ्यामविज्ञातं धनमस्ति गुरोः पृथक् ॥ २३२ ॥सन्न्यस्य विधिना स्वर्गगतस्योपरि दूषणम् । महत्पापमिदं वक्तुं भातस्तव न युज्यते ॥ २३३ ॥श्रोतुं ममापि चेत्याह सोऽप्यपास्यास्य दुर्मतिम् । विभज्य सकळं वस्तु चैत्यचैत्यालयादिकम् ॥ २३७॥निर्माप्य जिनपूजाश्च विधाय विविधाः सदा । दानं चतुर्विधं पात्रत्रये भक्त्या प्रवर्त्य तौ ॥ २३५ ॥कालं गमयतः स्मोद्यत्प्रीती प्रति परस्परम् । दत्वा सागरसेनाय कदाचिद्भक्तिपूर्वकम् ॥ २३६ ॥भिक्षां कुबेरदत्ताख्यः सहितो धनमित्रया । अभिवन्ध किमावाभ्यां तनूजो लप्स्यते न वा ॥ २३७ ॥
‘यह तीव्र लोभसे आसक्त हो रहा है’ ऐसा समझकर कुबेरदत्तने उत्तर दिया कि क्या पिताजीके पास अलगसे ऐसा कोई धन था जिसे हम दोनों नहीं जानते हों। वे विधिपूर्वक संन्यास धारण कर स्वर्ग गये हैं अतः उनपर दूषण लगाना बड़ा पाप है। भाई ! यह बात न तो तुझे कहनेके योग्य है और न मुझे सुननेके योग्य है। इस तरह कुबेरदत्तने नागदत्तकी सब दुर्बुद्धि दूर कर दी। सब धनका बाँट किया, अनेक चैत्य और चैत्यालय बनवाये, अनेक तरहकी जिन-पूजाएँ कीं, तीनों प्रकारके पात्रोंके लिए भक्तिपूर्वक चार प्रकारका दान दिया। इस प्रकार जिनकी परस्परमें प्रीति बढ़ रही है ऐसे दोनों भाई सुखसे समय बिताने लगे। किसी एक दिन कुबेरदत्तने अपनी स्त्री, धन, मित्रोंके साथ सागरसेन मुनिराजके लिए शक्तिपूर्वक आहार दिया। आहार देनेके बाद नमस्कार कर उसने मुनिराजते पूछा कि क्या कभी हम दोनों पुत्र लाभ करेंगे अथवा नहीं ? ॥ २३२-२३७ ।।
Realizing that Nagadatta was completely gripped by intense greed, Kuberdatta replied, “Did father possess any such exclusive wealth that was unknown to the two of us? He ritually embraced Sannyasa and ascended to heaven; therefore, casting aspersions on him is a great sin. Brother! This matter is neither fit for you to speak of, nor is it fit for me to hear.”
In this manner, Kuberdatta dispelled all of Nagadatta’s malicious thoughts. He then divided all the wealth, built numerous shrines (Chaitya) and temples (Chaityalaya), performed various forms of Jina-worship, and devoutly offered the four types of charity (Dana) to all three classes of worthy recipients (Patra). Bound by ever-growing mutual affection, both brothers began to spend their time in happiness.
One day, Kuberdatta, along with his wife, wealth, and friends, joyfully offered food (Ahara-dana) within his capacity to the great sage Sagarsen. After offering the food and bowing down respectfully, he asked the sage, “Will the two of us ever be blessed with sons or not?” [232-237]
श्लोक ( Shlok ) 238 – 241
नैवं चेत्प्रब्रजिष्याव इत्यप्राक्षीत्स चाब्रवीत् । युवां सुतं महापुण्यभागिनं चरमाङ्गकम् ॥ २३८ ॥लभेथामिति तद्वाक्यश्रवणात्तोषिताशयौ । यद्येवं पूज्यपादस्य भवतः क्षुल्लकोऽस्त्वसौ ॥ २३९ ॥तस्मिन्नुत्पन्नवस्येव दास्याव इति तौ सुखम् । भुञ्जानौ कतिचिन्मासान्गमयित्वा सुतोत्तमम् ॥२४०॥ लब्ध्वा प्रीतिङ्कराह्वानमेतस्याकुरुतां मुदा । करोतु स्वगुणैस्तोषं सर्वेषां जगतामिति ॥ २४१ ॥
यदि नहीं करेंगे तो फिर हम दोनों जिन-दीक्षा धारण कर लें। इसके उत्तर मेंमुनिराजने कहा कि आप दोनों, महापुण्यशाली तथा चरमशरीरी पुत्र अवश्य ही प्राप्त करेंगे । इस प्रकार मुनिराजके वचन सुनकर उन दोनोंका हृदय आनन्दसे भर गया। वे प्रसन्नचित्त होकर बोले कि यदि ऐसा है तो वह बालक आप पूज्यपादके चरणों में क्षुल्लक होवे । उसके उत्पन्न होते ही हम दोनों उसे आपके लिए समर्पित कर देंगे। इस तरह सुखका उपभोग करते हुए उन दोनोंने कुछ मास सुखसे बिताये । कुछ मास बीत जानेपर उन्होंने उत्तम पुत्र प्राप्त किया । ‘यह पुत्र अपने गुणोंसे समस्त संसारको सन्तुष्ट करेगा’ ऐसा विचार कर उन्होंने उसका बड़े हर्षसे प्रीतिङ्कर नाम रक्खा ॥ २३८-२४१ ।।
“If we are not to be blessed with sons, then both of us shall initiate into the holy order of Jina monks (Jina-diksha).”
In response, the great sage said, “Both of you will certainly be blessed with a son who is highly meritorious (Mahapunyashali) and in his final bodily incarnation (Charam-shariri, destined for liberation in this very life).”
Upon hearing these words of the great sage, the hearts of both brothers were filled with joy. Delighted, they said, “If that is so, let that child become a junior monk (Kshullaka) at your revered feet. As soon as he is born, we shall dedicate him to you.”
Enjoying their happiness in this manner, both of them spent a few months in comfort. After a few months had passed, they were blessed with an excellent son. Thinking, “This son will satisfy the entire world with his virtuous qualities,” they named him Pritinkar with great joy. [238-241]
श्लोक 242 से 252
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231
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