नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 72 –श्लोक 223 से 234 | श्लोक 235 से 248 | श्लोक 249 से 259 | श्लोक 260 से 271 | श्लोक 272 से 281
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 282 to 288
श्लोक ( Shlok ) 282
द्रोहान्मुनेः ‘पलपचः स कुधीरधोऽगा-तद्बीज एव तपसाऽऽप्य च चक्रिलक्ष्मीम्ध्वंसं समाप तदपास्तपरिग्रहाणां माकृध्वमल्पमपि पापधियापकारम् ॥ २८२ ॥
कृष्णके जीवने चाण्डाल अवस्थामें मुनिके साथ द्रोह किया था इसलिए वह दुर्बुद्धि नरक गया और उसी कारणसे तपश्चरणके द्वारा राज्यलक्ष्मी पाकर अन्तमें उसके विनाशको प्राप्त हुआ इसलिए आचार्य कहते हैं कि परिग्रहका त्याग करनेवाले मुनियोंका पाप-बुद्धिसे थोड़ा भी अपकार मत करो ॥ २८२ ॥
“In a previous birth as a Chandala (an outcast), the soul of Krishna had shown malice and hostility toward a sage (Muni); because of that wicked intellect, he went to hell. For that very same reason, even though he later attained the splendor of kingship (Rajyalakshmi) through austere penance, he ultimately met with its total destruction. Therefore, the Acharyas (spiritual masters) advise: do not cause even the slightest harm or offense, with sinful intent, to the sages who have renounced all worldly possessions (Parigraha). || 282 ||”
श्लोक ( Shlok ) 283
कंसञ्च कंसमित्र वाशनिरन्वमैत्सात् । चाणूरमेणमित्र यो हतवान् हरिर्वामृत्युर्यधाहत शिशुं शिशुपालमाजौ तेजस्विनां कथमिहास्तु न सोऽग्रगण्यः ॥ २८३ ॥
जिस प्रकार सिंह हरिणको मार डालता है उसी प्रकार जिसने चाणूर मल्लको मार डाला था, जिस प्रकार वज्र कंस (कांसे) के टुकड़े-टुकड़े कर डालता है उसी प्रकार जिसने कंसके (मथुराके राजाके) टुकड़े-टुकड़े कर डाले थे और जिसप्रकार मृत्यु बालकका हरण कर लेती है उसी प्रकार जिसने युद्धमें शिशुपालका हरण किया था- उसे पराजित किया था। ऐसा श्रीकृष्ण नारायण भला प्रतापी मनुष्योंमें सबसे मुख्य क्यों न हो ? ॥ २८३ ॥
“Just as a lion slays a deer, he slew the wrestler Chanura; just as a thunderbolt shatters bronze (Kansa) into pieces, he shattered Kansa (the King of Mathura) into pieces; and just as death snatches away a child (Shishu), he snatched away—and defeated—Shishupala in battle. Why, then, should such a Shri Krishna Narayana not be supreme among all glorious and mighty men? || 283 ||”
श्लोक ( Shlok ) 284
जरासन्धं हत्वोर्जितमिव गजं शौर्यजलधि-गंजारिर्वा गर्जन् प्रतिरिपुजयाद्विश्वविजयी ।त्रिखण्डां निष्खण्डां करविधृतदण्डोऽप्रतिहतां यथापाद्वाल्ये गाः किल खलु स गोपोऽन्वपि ततः ॥ २८४ ॥
जिस प्रकार सिंह बलवान् हाथीको जीतकर गरजता है उसी प्रकार शूरवीरताके सागर श्रीकृष्णने अतिशय बलवान् जरासन्धको जीतकर गरजना की थी, इन्होंने अपने समस्त शत्रुओंको जीत लिया था इसलिए ये विश्वविजयी कहलाये थे तथा जिस प्रकार इन्होंने बाल अवस्था में गायोंकी रक्षा की थी इसलिए गोप कहलाये थे उसी प्रकार इन्होंने तरुण अवस्थामें भी हाथमें केवल एक दण्ड धारणकर किसीके द्वारा अविजित इस तीन खण्डकी अखण्ड भूमिकी रक्षा की थी इसलिए बादमें भी वे गोप (पृथिवीके रक्षक) कहलाते थे ॥ २८४ ॥
“Just as a lion roars after conquering a mighty elephant, so did Shri Krishna—an ocean of valor—roar after defeating the exceedingly powerful Jarasandha. He conquered all his enemies, and was thus hailed as the conqueror of the universe (Vishwavijayi). Furthermore, just as he protected the cows (Gau) during his childhood and was called a Gopa (cowherd), in his youth, armed with only a single staff in his hand, he protected this undivided earth comprising three realms (Teer-Khand), remaining undefeated by anyone; hence, he continued to be fittingly called Gopa (the protector of the Earth). || 284 ||”
श्लोक ( Shlok ) 285
क्क सकलपृथुशत्रुध्वंसनात्साद्भुतश्रीः कच स भुवनबाह्यो ही हरेर्मूलनाशः ।स्वकृतविधिविधानात्कस्य किं वात्र न स्याद्-भ्रमति हि भवचक्रं चक्रनेमिक्रमेण ॥ २८५ ॥
देखो, कहाँ तो श्रीकृष्णको बड़े-बड़े समस्त शत्रुओंका नाश करनेसे उस आश्चर्यकारी लक्ष्मीकी प्राप्ति हुई थी और कहां समस्त जगत् से जुदा रहकर निर्जन वनमें उनका समूल नाश हुआ सो ठीक ही है क्योंकि इस संसार में अपने किये हुए कर्मोंके अनुसार किसे क्या नहीं प्राप्त होता है? यथार्थमें संसाररूपी चक्र पहियेकी हालकी तरह घूमा ही करता है ।। २८५ ॥
“Look, on one hand, Shri Krishna attained that astonishing, magnificent splendor by destroying all his mighty enemies; yet, on the other hand, living completely isolated from the entire world, he met with his utter and absolute destruction in a lonely, deserted forest. This is truly fitting, for in this world, what is there that a person does not receive according to their own past deeds (Karmas)? In truth, the wheel of worldly existence (Samsara-Chakra) keeps rotating constantly, just like the rim of a wheel. || 285 ||”
श्लोक ( Shlok ) 286
बध्वायुराप दृशमध्यमथान्त्यनाम चास्मादधोऽगमदसौ धृतराज्यभारः ।तद्धीधनाः कुरुत यत्नमखण्डमायु-र्बन्धं प्रति प्रतिपदं सुखलिप्सवश्चेत् ॥ २८६ ॥
देखो, श्रीकृष्णने पहले नरक आयुका बन्ध कर लिया था और उसके बाद सम्यग्दर्शन तथा तीर्थंकर नाम-कर्म प्राप्त किया था इसीलिए उन्हें राज्यका भार धारण करनेके बाद नरक जाना पड़ा। आचार्य कहते हैं कि हे बुद्धिमान् जन ! यदि आप लोग सुखके अभिलाषी हैं तो पद-पदपर आयु बन्धके लिए अखण्ड प्रयत्न करो अर्थात् प्रत्येक समय इस बातका बिचार रक्खो कि अशुभ आयुका बन्ध तो नहीं हो रहा है ।। २८६ ।।
“Look, Shri Krishna had already bound his life-span karma (Ayu-Karma) for hell before he subsequently attained right belief (Samyagdarshana) and Tirthankara name-karma (Tirthankara Nama-Karma); it was for this reason that after bearing the burden of ruling the kingdom, he had to go to hell.
The Acharya says: O wise people! If you are desirous of true happiness, make unceasing efforts at every step regarding the binding of your life-span karma. That is to say, reflect at every single moment to ensure that you are not binding an inauspicious life-span (Ashubha Ayu). || 286 ||”
श्लोक ( Shlok ) 287 – 288
अस्यैव तीर्थसन्ताने ब्रह्मणो धरणीशितुः । ‘चूडादेव्याश्च संजज्ञे ब्रह्मदत्तो निधीशिनाम् ॥ २८७ ॥ द्वादशो नामतः सप्तचापः सप्तशताब्दकैः । परिच्छिन्नप्रमाणायुस्तदन्ताश्चक्रवर्तिनः ॥ २८८ ॥
इन्हीं नेमिनाथ भगवान्के तीर्थमें ब्रह्मदत्त नामका बारहवाँ चक्रवर्ती हुआ था वह ब्रह्मा नामक राजा और चूड़ादेवी रानीका पुत्र था, उसका शरीर सात धनुष ऊँचा था और सात सौ वर्षकी उसकी आयु थी। वह सब चक्रवर्तियोंमें अन्तिम चक्रवर्ती था- उसके बाद कोई चक्रवर्ती नहीं हुआ ।। २८७-२८८ ॥
“During the era of this very Lord Neminath’s holy order (Teertha), the twelfth Chakravarti (universal monarch) named Brahmadatta was born. He was the son of King Brahma and Queen Chudadevi; his body was seven bows (Dhanusha) tall, and his life-span was seven hundred years. He was the final Chakravarti among all the universal monarchs—no other Chakravarti came after him. || 287-288 ||”
इत्यार्षे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे नेमितीर्थंकर-पद्मनाम-बलदेव-कृष्णनामार्धश्चक्रि-जरासन्धप्रतिवासुदेव-ब्रह्मदत्तसकलचक्रवर्ति पुराणं नाम द्विसप्ततितमं पर्व ॥ ७२ ॥
इस प्रकार आर्ष नाममे प्रसिद्ध, भगवद् गुणभद्राचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणके संग्रहमे नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म नामक बलभद्र, कृष्ण नामक अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन करने वाला बहत्तरत्राँ पर्व समाप्त हुआ ।
“Thus ends the seventy-second chapter, which describes the histories (Puranas) of the Tirthankara Neminath, the Balabhadra named Padma, the Ardha-Chakravarti (Narayana) named Krishna, the Pratinarayana Jarasandha, and the complete Chakravarti named Brahmadatta, in this compendium of the Trishashti-Lakshana Mahapurana—widely renowned as Arsha (sacred authoritative scripture) and composed by the venerable Acharya Gunabhadra. ||”
पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11
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नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 234 | श्लोक 235 से 248 | श्लोक 249 से 259 | श्लोक 260 से 271 | श्लोक 272 से 281
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