राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषों का वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 123 to 133
श्लोक ( Shlok ) 123
कस्मादनेन बन्धुत्वमस्येति श्रेणिकोऽभ्यधात् । गौतमं विनयात्सोऽपि न्यगदत्तदतिस्फुटम् ॥ १२३ ॥
यह देख, राजा श्रेणिकने बड़ी विनयके साथ गौतम गणधरसे पूछा कि इस अनावृत देवका जम्बू स्वामीके साथ भाईपना कैसे है? इसके उत्तरमें गणधर भगवान् स्पष्ट रूपसे कहने लगे ॥१२३।।
“Seeing this, King Shrenik asked Gautama Ganadhara with great humility, ‘How does this deity Anavrita share a bond of brotherhood with Jambukumar Swami?’ In response, the venerable Ganadhara began to speak clearly. || 123 ||”
श्लोक ( Shlok ) 124
जम्बूनाम्नोऽन्वये पूर्व धर्मप्रियवणिक्पतेः । गुणदेव्याश्च नाम्नार्हद्दासः पुत्रोऽजनिष्ट सः ॥ १२४ ॥
कि जम्बूकुमारके वंशमें पहले धर्मप्रिय नामका एक सेठ था। उसकी गुणदेवी नामकी स्त्रीसे एक अर्हद्दास नामका पुत्र हुआ था ।॥ १२४ ॥
“That in the lineage of Jambukumar, there was formerly a merchant named Dharmapriya. From his wife named Gunadevi, a son named Arhaddasa was born. || 124 ||”
श्लोक ( Shlok ) 125 – 126
धनयौवनदर्पेण शिक्षामगणयन् पितुः । निरंकुशोऽभवत्सप्तव्यसनेषु विधेर्वशात् ॥ १२५ ॥स दुश्चेष्टितदौर्गत्यात्सञ्जातानुशयो मया । न श्रुता मत्पितुः शिक्षेत्यवाप्तशमभावनः ॥ १२६ ॥
धन और यौवनके अभिमानसे वह पिताकी शिक्षाको कुछ नहीं गिनता हुआ कर्मोदयसे सातों व्यसनोंमें स्वच्छन्द हो गया था। इन खोटी चेष्टाओंके कारण जब उसकी दुर्गति होने लगी तब उसे पश्चात्ताप हुआ और ‘मैंने पिताकी शिक्षा नहीं सुनी’ यह विचार करते हुए उसकी भावना कुछ शान्त हो गई ॥ १२५-१२६ ।।
“Blinded by the pride of wealth and youth, he completely disregarded his father’s teachings and, due to the ripening of his past karmas, became recklessly self-indulgent in the seven vices. When these evil pursuits began to bring about his ruin, he was filled with deep remorse. Reflecting upon the thought, ‘I did not heed my father’s counsel,’ his mind grew somewhat calm and peaceful. || 125-126 ||”
श्लोक ( Shlok ) 127
किञ्चित्पुण्यं समावर्ज्य व्यन्तरत्वमुपागतः । आददेऽनावृताख्योऽयं तत्र सम्यक्त्वसम्पदम् ॥ १२७ ॥
तदनन्तर कुछ पुण्यका संचय कर वह अनावृत नामका व्यन्तर देव हुआ है। इसी पर्याय में इसने सम्यग्दर्शन धारण किया है ॥ १२७ ।।
“Thereafter, by accumulating some spiritual merit (Punya), he was reborn as a Vyantara deity named Anavrita. It is in this same divine realm that he has attained right faith (Samyagdarshana). || 127 ||”
श्लोक ( Shlok ) 128 – 129
इति तद्वचनप्रान्ते गौतमं मगधाधिपः । अन्वयुकिागतः कस्मात्कि पुण्यं कृतवानयम् ॥ १२८ ॥विद्युन्माली भवेऽतीते प्रभाऽस्यान्तेऽप्यनाहता । इत्यनुग्रहबुद्धयैव भगवानेवमब्रवीत् ॥ १२९॥
इस प्रकार जब गौतम स्वामी कह चुके तब राजा श्रेणिकने पुनः उनसे दूसरा प्रश्न किया। उसने पूछा कि हे भगवन् ! यह विद्युन्माली कहाँ से आया है? और इसने पूर्वभवमें कौनसा पुण्य किया है क्योंकि अन्तिम दिनमें भी इसकी प्रभा कम नहीं हुई है। इसके उत्तर में गणधर भगवान् अनुग्रह की बुद्धिसे इस प्रकार कहने लगे ।। १२८-१२९ ।।
“When Gautama Swami had spoken in this manner, King Shrenik asked him another question with great reverence. He inquired, ‘O Worshipful One! From where has this Vidyunmali come? And what spiritual merit (Punya) did he accumulate in his past life, for even in his final days, his radiant splendor has not diminished?’ In response, the venerable Ganadhara, out of a spirit of grace and compassion, began to speak thus. || 128-129 ||”
श्लोक ( Shlok ) 130 – 133
अस्मिन्विदेहे पूर्वस्मिन् वीतशोकाह्वयं पुरम् । विषये पुष्कलावत्यां महापद्मोऽस्य पालकः ॥ १३०॥वनमालास्य देव्यस्याः सुतः शिवकुमारकः । नवयौवनसम्पन्नः सवयोभिः समं वने ॥ १३१ ॥विहृत्य पुनरागच्छन्सम्भ्रमेण समन्ततः । गन्धपुष्पादिमाङ्गल्यद्रव्यसद्वरिवस्यया ॥ १३२ ॥जनानाव्रजतो दृष्ट्वा किमेतदिति विस्मयात् । तनूजं पृच्छति स्मासौ बुद्धिसागरमन्त्रिणः ॥ १३३॥
इसी जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें पुष्कलाषती देशके अन्तर्गत एक वीतशोक नामका नगर है। वहाँ महापद्म नामका राजा राज्य करता था। उसकी रानीकानाम वनमाला था। उन दोनोंके शिवकुमार नामका पुत्र हुआ था। नवयौवनसे सम्पन्न होनेपर किसी दिन वह अपने साथियोंके साथ क्रीड़ा करनेके लिए वनमें गया था। वहाँ क्रीड़ा कर जब वह वापिस का रहा था तब उसने सब ओर बड़े संभ्रमके साथ सुगन्धित पुष्प आदि मङ्गलमय पूजाकी सामग्री लेकर आते हुए बहुत-से आदमी देखे। उन्हें देखकर उसने बड़े आश्चर्य के साथ बुद्धिसागर नामक मन्त्रीके पुत्रसे पूछा कि ‘यह क्या है?’ ।। १३०-१३३ ॥
“In the Purva-Videha region of this very Jambudvipa, within the country of Pushkalavati, there is a city named Vitashoka. A king named Mahapadma ruled there, and the name of his queen was Vanamala. A son named Shivakumar was born to them. Once, having attained early youth, he went to the forest with his companions to play. While returning after his recreation, he saw a great crowd of people coming from all directions in an excited rush, carrying fragrant flowers and other auspicious materials for worship. Seeing them, he asked the minister Buddhisagar’s son with great wonder, ‘What is this?’ || 130-133 ||”
श्लोक 134 से 151
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
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