राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 453 to 456
श्लोक ( Shlok ) 453
दशास्ये साम सामोक्त्या समीप्सौ सामवायिके । परुषोक्तिर्मयीत्यस्य धीशौर्ये पश्य कीदृशे ॥ ४५३ ॥
स्त्रीका अपहरण करनेवाले रावणके लिए तो इन्होंने शान्तिके वचन कहला भेजे हैं और जो मिलकर इनके साथ रहना चाहता है ऐसे मेरे लिए ये कठोर शब्द कहला रहे हैं। इनकी बुद्धि और शूरवीरता तो देखो कैसी है ? ॥ ४५३ ॥
“To Ravana, who abducted a woman, they have sent words of peace, yet for me—who wishes to unite and dwell with them—they send such harsh words. Just look at the nature of their intellect and bravery!” [453]
श्लोक ( Shlok ) 454 – 456
इमां तद्गर्वदुर्भाषां श्रुत्वा राघवसेविना । चौर्येण परदाराणां नेतुरुन्मार्गगामिनः ॥ ४५४ ॥दोषद्वयानुरूपं त्वं दण्डं द्रक्ष्यसि चाचिरात् । किं तेन तव चेत्पथ्यमिच्छेरुच्छिद्य दुर्मदम् ॥ ४५५ ॥दत्त्वा गजं कुरूपासं स्वामिनो वृद्धिमेष्यति । अवश्यमचिरेणेति दूतेनोद्दीपितः क्रुधा ॥ ४५६ ॥
गर्वसे भरी हुई बालिकी इस नीच भाषाको सुनकर रामचन्द्रके दूतने कहा कि रावण चोरीसे परस्त्री हर कर ले गया है सो उस उन्मार्गगामीको दोनों अपराधोंके अनुरूप जो दण्ड दिया जावेगा उसे आप शीघ्र ही देखेंगे । अथवा इससे आपको क्या प्रयोजन ? यदि आपको महामेघ हाथी देना इष्ट है तो इस दुष्ट अहंकारको छोड़-कर वह हाथी दे दो और स्वामीकी सेवा करो। ऐसा करनेसे आप अवश्य ही शीघ्र वृद्धिको प्प्राप्त होंगे। इस प्रकार कह कर दूतने बालिको क्रोधसे प्रज्वलित कर दिया ॥ ४५४-४५६ ॥
“Hearing this ignoble language from the pride-filled Bali, Ramachandra’s messenger said, ‘Ravana stealthily abducted another man’s wife; therefore, you shall soon witness the punishment that will be inflicted upon that deviant in accordance with both of his offenses. Or rather, what concern is that of yours? If you desire to give the Mahamegha elephant, then abandon this wicked arrogance, surrender that elephant, and serve my master. By doing so, you will surely attain rapid prosperity.’ Speaking in this manner, the messenger kindled Bali’s rage, leaving him burning with anger.” [454-456]
श्लोक ( Shlok ) 457 – 459
बाली कालानुकारी तं प्रत्याह परुषं वचः । वारणाशां त्यजत्वस्ति चेदाशा नास्ति वा रणम् ॥ ४५७ ॥यातु मत्पादसेवां स मयामा यातु वारणम् । तदा तस्याशुभां वाणीं तद्विनाशविधायिनीम् ॥ ४५८ ॥श्रुत्या दूतोऽभ्युपेत्यैषद्बलिनं बालिनोऽन्तकम् । प्रातिकूल्येन बाली वः कृत्रिमः शत्रुरुत्थितः ॥४५९॥
तब यमराजका अनुकरण करनेवाला बालि उत्तर में निम्न प्रकार कठोर वचन कहने लगा। उसने कहा कि ‘यदि राम-चन्द्रको जीनेकी आशा है तो हाथीकी आशा छोड़ दें, यदि जीनेकी आशा नहीं है तो युद्धमें मेरे सामने आवें और उन्हें हाथी पर बैठनेकी ही इच्छा है तो मेरे चरणोंकी सेवाको प्राप्त हों फिर मेरे साथ इस हाथी पर बैठ कर गमन करें।’ इस प्रकार बालि का विनाश करनेवाली उसकी अशुभ वाणी को सुनकर वह दूत उसी समय बालि को नष्ट करनेवाले बलवान् रामचन्द्रके पास वापिस आ गया और कहने लगा कि बालि प्रतिकूलतासे आपका कृत्रिम शत्रु प्रकट हुआ है ।। ४५७-४५९ ।।
“Then Bali, emulating Yama (the god of death), spoke the following harsh words in response. He said, ‘If Ramachandra hopes to live, he must abandon all hope of getting the elephant; if he has no desire to live, let him face me in battle. And if he simply wishes to ride an elephant, let him surrender to the service of my feet, and then he may travel seated upon this elephant along with me.’
Hearing these ominous words of Bali that spelled his own doom, the messenger immediately returned to the powerful Ramachandra—the destroyer of Bali—and said, ‘By his defiance, Bali has openly revealed himself as your manufactured enemy.'” [457-459]
श्लोक ( Shlok ) 460 – 462
पारिपन्थिकवन्मार्गो दुर्गस्तस्मिन् विरोधिनि । इत्यब्रवीत्तो रामः सुग्रीवप्रमुर्ख बलम् ॥ ४६० ॥ लक्ष्मणं नायकं कृत्वा प्राहिणोत्खादिरं वनम् । गत्वा वैद्याधरं सैन्यं बालिनोऽभ्यागतं बलम् ॥ ४६१॥जघानेव वनं वज्रं प्रज्वलच्छस्वसन्तति । स्वयं सर्वबलेनामा योद्धं बाली तदागमत् ॥ ४६२ ॥
उस विरोधीके रहते हुए आपका मार्ग चोरोंके मार्गके समान दुर्गम है अर्थात् जब तक आप उसे नष्ट नहीं कर देते हैं तब तक आपका लङ्काका मार्ग सुगम नहीं है। इस प्रकार जब दूत कह चुका तब रामचन्द्रने लक्ष्मणको नायक बनाकर सुग्रीव आदिकी सेना खदिर-वनमें भेजी। जिसमें शस्त्रोंके समूह देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसी विद्याधरोंकी सेनाने सामने आई हुई बालिकी सेनाको उस तरह काट डाला जिस तरह कि वज्र बनको काट डालता है- नष्ट कर देता है। जब सेना नष्ट हो चुकी तब बालि अपनी सम्पूर्ण शक्ति अथवा समस्त सेनाके साथ स्वयं युद्ध करनेके लिए आया ।। ४६०-४६२ ।।
“‘As long as that adversary remains, your path is as treacherous and inaccessible as a trail of thieves; that is to say, until you destroy him, your path to Lanka cannot be made easy.’
When the messenger had spoken thus, Ramachandra appointed Lakshmana as the commander and dispatched the army of Sugriva and others to the Khadira forest. There, the army of Vidyadharas, with their array of weapons gleaming brilliantly, cut down the oncoming forces of Bali just as a thunderbolt decimates a forest. Once his army was destroyed, Bali himself came forward to wage war with his entire strength and all his remaining forces.” [460-462]
श्लोक 463 से 472
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