Hindi Translation of Uttar puran Parv 69
श्लोक 1 से 11 : राजा पार्थिव का वैराग्य और सिद्धार्थ का राज्यारोहण
भक्त लोगोंके हृदय-कमलमें धारण किया हुआ जिनका नाम भी मुक्तिके लिए पर्याप्त है-मुक्ति देनेमें समर्थ है ऐसे नमिनाथ स्वामी हम सबके लिए शीघ्र ही मोक्ष लक्ष्मी प्रदान करें ॥ १ ॥ इसी जम्बूद्वीप सम्बन्धी भरत क्षेत्रके वत्स देशमें एक कौशाम्बी नामकी नगरी है। उसमें पार्थिव नामका राजा राज्य करता था ॥ २ ॥ वह इक्ष्वाकु वंशके नेत्रके समान था, लक्ष्मीको अपने वक्षःस्थल पर धारण करता था, अतिशय पराक्रमी था और सब दिशाओं पर आक्रमण कर साक्षात् चक्रवर्तीके समान सुशोभित होता था ॥ ३ ॥ उस राजाके सुन्दरी नामकी रानीसे सिद्धार्थ नामका पुत्र हुआ था। एक दिन वह राजा मनोहर नामके उद्यानमें गया था। वहाँ उसने परमावधिज्ञानरूपी नेत्रके धारक मुनिवर नामके मुनिके दर्शन किये और विनयसे नम्र होकर उनसे धर्मका स्वरूप पूछा । मुनिराजने धर्मका यथार्थ स्वरूप बतलाया उसे सुनकर राजाको वैराग्य उत्पन्न हो आया । वह विचार करने लगा कि संसारमें प्राणी मरण-रूपी मूलधन लेकर मृत्युका कर्जदार हो रहा है।॥४-६।। प्रत्येक जन्ममें अनेक दुःखोंको भोगता और उस कर्जकी वृद्धि करता हुआ यह प्राणी दुर्गत हो रहा है-दुर्गतियोंमें पड़कर दुःख उठा रहा है अथवा दरिद्र हो रहा है। जब तक यह प्राणी रत्नत्रय रूपी धनका उपार्जन कर मृत्यु रूपी साहूकारके लिए व्याज सहित धन नहीं दे देगा तब तक उसे स्वास्थ्य कैसे प्राप्त हो सकता है ? वह सुखी कैसे रह सकता है ? ऐसा निश्चय कर वह कर्मरूपी शत्रुओंको नष्ट करनेका उद्यम करने लगा ॥ ७-८ ॥ उत्कृष्ट बुद्धिके धारक राजा पार्थिवने, अनेक शास्त्रोंके सुनने एवं प्रजाका पालन करनेवाले सिद्धार्थ नामके अपने समर्थ पुत्रके लिए राज्य देकर पूज्यपाद मुनिवर नामके मुनिराजके चरण-कमलोंके समीप जिनदीक्षा धारण कर ली सो ठीक ही है क्योंकि सत्पुरुषोंकी ऐसी ही प्रवृत्ति होती है ॥ ९ -१० ॥ प्रतापी सिद्धार्थ भी सम्यग्दर्शन प्राप्त कर तथा अणुव्रत आदि व्रत धारण कर सुखपूर्वक भोग भोगता हुआ प्रजाका पालन करने लगा ॥ ११ ॥
श्लोक 12 से 21 : सिद्धार्थ का संयम और तीर्थंकर-नामकर्म का बंध
इस प्रकार समय व्यतीत हो रहा था कि एक दिन उसने अपने पिता पार्थिव मुनिराजका समाधिमरण सुना । समाधिमरणका समाचार सुनते ही उसकी विषय-सम्बन्धी इच्छा दूर हो गई। उसने शीघ्र ही मनोहर नामके उद्यानमें जाकर महाबल नामक केवली भगवान्से तत्त्वार्थका विस्तारके साथ स्वरूप समझा ॥ १२-१३ ॥ तदनन्तर श्रीदत्त नामक पुत्रके लिए राज्य देकर उसने क्षायिक सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लिया और शान्त होकर संयम धारण कर लिया ॥ १४ ॥ उस पुरुषोत्तमने ग्यारह अङ्ग धारण कर सोलह कारण भावनाओंके द्वारा तीर्थकर नामक पुण्य कर्मका बन्ध किया ॥ १५ ॥ और आयुके अन्तमें समाधिमरण कर अपराजित नामके श्रेष्ठ अनुत्तर विमानमें अतिशय शोभायमान देव हुआ ॥ १६ ॥ वहाँ उसकी तैंतीस सागरकी आयु थी, एक हाथ ऊँचा शरीर था, तथा श्वासोच्छ्वास, आहार, लेश्या आदि भाव उस विमान-सम्बन्धी देवोंके जितने बतलाये गये हैं बह उन सबसे सहित था ॥ १७ ॥ जब इस अहमिन्द्रका जीवनका अन्त आया और वह छह माह बाद यह वहाँ से चलनेके लिए तत्पर हुआ तब जम्बूवृक्षसे सुशोभित इसी जम्बूद्वीपके वङ्ग नामक देशमें एक मिथिला नामकी नगरी थी। वहाँ भगवान् वृषभदेवका वंशज, काश्यपगोत्री विजयमहाराज नामसे प्रसिद्ध सम्पत्तिशाली राजा राज्य करता था ।॥ १८-१९ ॥ जिस प्रकार उदित होता हुआ सूर्य संसारको अनुरक्त-लालवर्णका कर लेता है उसी प्रकार उसने राज्यगद्दी पर आरूढ़ होते ही समस्त संसारको अनुरक्त-प्रसन्न कर लिया था और ज्यों-ज्यों सूर्य स्वयं राग- लालिमासे रहित होता जाता है त्यों-त्यों वह संसारको विरक्त लालिमासे रहित करता जाता है इसी प्रकार वह राजा भी ज्यों-ज्यों विराग-प्रसन्नतासे रहित होता जाता था त्यों-त्यों संसारको विरक्त-प्रसन्नतासे रहित करता जाता था । सारांश यह है कि संसारकी प्रसन्नता और अप्रसन्नता उसीपर निर्भर थी सो ठीक ही है क्योंकि उसने वैसा ही तप किया था और वैसा ही उसका प्रभाव था ।। २० ।। चूंकि पुण्य कर्मके उद्यसे अनेक गुणोंके समूह तथा लक्ष्मीने उस राजाका वरण किया था इसलिए उसमें धर्म, अर्थ, कामरूप तीनों पुरुषार्थ अच्छी तरह प्रकट हुए थे ॥ २१ ॥
श्लोक 22 से 31 : विजय राजा के यहाँ भगवान नमिनाथ का गर्भ और जन्म कल्याणक
उस राजाके राज्यमें यदि ताप-उष्णत्व था तो सूर्यमें ही था अन्यत्र ताप-दुःख नहीं था, क्रोध था तो सिर्फ कामी मनुष्योंमें ही था वहाँ के अन्य मनुष्योंमें नहीं था, विग्रह नाम था तो शरीरोंमें ही था अन्यत्र नहीं, विरागता-वीतरागता यदि थी तो मुनियोंमें ही थी वहाँ के अन्य मनुष्योंमें विरागता-स्नेहका अभाव नहीं था। परार्थ ग्रहण- अन्य कवियोंके द्वारा प्रतिपादित अर्थका ग्रहण करना कुकवियोंमें ही था अन्य मनुष्यों में परार्थग्रहण-दूसरेके धनका ग्रहण करना नहीं था। बन्धन – हरबन्ध, छत्रबन्ध आदिकी रचना काव्योंमें ही थी वहाँ के अन्य मनुष्योंमें बन्धन-पाश आदिसे बाँधा जाना नहीं था। विवाद – शास्त्रार्थ यदि था तो विजयकी इच्छा रखनेवाले विद्वानोंमें ही था वहाँ के अन्य मनुष्योंमें विवाद – कलह नहीं था । शरव्याप्ति-एक प्रकारके तृणका विस्तार नदियोंमें ही था वहाँ के मनुष्यों में शरव्याप्ति-वाणों का विस्तार नहीं था। अनवस्थिति – अस्थिरता यदि थी तो ज्यौतिष्क देवोंमें ही थी-वे ही निरन्तर गमन करते रहते थे वहाँ के मनुष्यों में अनवस्थिति- अस्थिरता नहीं थी। क्रूरता यदि थी तो दुष्ट ग्रहोंमें ही थी वहाँ के मनुष्योंमें करता – दुष्टता – निर्देयता नहीं थी और पिशाचता-पिशाच जाति यदि थी तो देवोंमें ही थी वहाँ के मनुष्यों में पिशाचता – नीचता नहीं थी ॥ २२-२४ ॥ विजय-महाराजकी महादेवीका नाम वप्पिला था, देवोंने रत्नवृष्टि आदिसे उसकी पूजा की थी, श्री, ही, धृति आदि देवियाँ उसकी सेवा करती थीं। शरद् ऋतुकी प्रथम द्वितीया अर्थात् आश्विन कृष्ण द्वितीयाके दिन अश्विनी नक्षत्र और रात्रिके पिछले पहर जब कि भगवान्का स्वर्गावतरण हो रहा था तब सुखसे सोई हुई महारानीने पहले कहे हुए सोलह स्वप्न देखे ।। २५-२६ ॥ उसी समय उसने अपने मुखमें प्रवेश करता हुआ एक हाथी देखा। देखते ही उसकी निद्रा दूर हो गई और प्रातः-कालके बाजोंका शब्द सुननेसे उसके हर्षका ठिकाना नहीं रहा ॥ २७ ॥ उसने देशावधि ज्ञानरूपी नेत्रको धररण करनेवाले राजासे इन स्वप्नोंका फल पूछा और राजाने भी कहा कि तुम्हारे गर्भमें भावी तीर्थंकरने अवतार लिया है ॥ २८ ॥ उसी समय इन्द्रोंने आकर अपने नियोगके अनुसार भगवान्का स्वर्गावतरण महोत्सव-गर्भकल्याणकका उत्सव किया और तदनन्तर सब साथ ही साथ अपने अपने स्थानपर चले गये ।। २९ ।। वप्पिला महादेवीने आषाढ़ कृष्ण दशमीके दिन स्वाति नक्षत्रके योगमें समस्त लोकके स्वामी महाप्रतापी जेष्ठपुत्रको उत्पन्न किया ॥ ३० ॥ देवोंने उसी समय आकर जन्मकल्याणकका उत्सव किया और मोह शत्रुको भेदन करनेवाले जिन-बालकका नमिनाथ नाम रक्खा ।। ३१ ।।
श्लोक 32 से 41: नमिनाथ का राज्यकाल और देवों द्वारा भविष्यवाणी
भगवान् मुनिसुव्रतनाथ तीर्थंकरकी तीर्थ-परम्परामें जब साठ लाख वर्ष बीत चुके थे तब नमिनाथ तीर्थंकरका जन्म हुआ था ।। ३२ ।। भगवान् नमिनाथकी आयु दश हजार वर्षकी थी, शरीर पन्द्रह धनुष ऊँचा था और कान्ति सुवर्णके समान थी। जब उनके कुमारकालके अढ़ाई हजार वर्ष बीत गये तब उन्होंने अभिषेकपूर्वक राज्य प्राप्त किया था ॥ ३३-३४ ॥ इस प्रकार राज्य करते हुए भगवान्को पाँच हजार वर्ष बीत गये। एक दिन जब कि आकाश वर्षा-ऋतुके बादलोंके समूहसे व्याप्त हो रहा था तब महान् अभ्युदयके धारक भगवान् नमिनाथ दूसरे सूर्यके समान हाथीके कन्धेपर आरूढ़ होकर वन-विहारके लिए गये ॥ ३५-३६ ॥ उसी समय आकाशमार्गसे आये हुए दो देवकुमार हस्तकमल जोड़कर नमस्कार करते हुए इस प्रकार प्रार्थना करने लगे ।॥ ३७ ॥ वे कहने लगे कि इसी जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्रमें एक वत्सकावती नामका देश है। उसकी सुसीमा नगरी में अपराजित विमानसे अबतार लेकर अपराजित नामके तीर्थङ्कर उत्पन्न हुए हैं। उनके केवलज्ञानकी पूजाके लिए सब इन्द्र आदि देव आये थे ॥ ३८-३९ ॥ उनकी सभामें प्रश्न हुआ कि क्या इस समय भरतक्षेत्रमें भी कोई तीर्थङ्कर है ? सर्वदर्शी अपराजित भगवान् ने उत्तर दिया कि इस समय वङ्गदेशके मिथिलानगर में नमिनाथ स्वामी अपराजित विमानसे अवतीर्ण हुए हैं वे अपने पुण्योदयसे तीर्थंकर होनेवाले हैं ।॥ ४०-४१ ॥
श्लोक 42 से 51: संसार की नश्वरता का चिंतन और वैराग्य
इस समय वे देवोंके द्वारा लाये हुए भोगोंका अच्छी तरह उपभोग कर रहे हैं- गृहस्थावस्थामें विद्यमान हैं। हे देव ! हम दोनों अपने पूर्व जन्ममें धातकीखण्ड द्वीपके रहनेवाले थे वहाँ तपञ्चरण कर सौधर्म नामक स्वर्गमें उत्पन्न हुए हैं। दूसरे दिन हमलोग अपराजित केवलीकी पूजाके लिए गये थे। वहाँ उनके वचन सुननेसे पूजनीय आपके दर्शन करनेके लिए कौतुकवश यहाँ आये हैं ।॥ ४२-४३ ॥ जिन्हें निकट-कालमें ही केवलज्ञानकी प्राप्ति होनेवाली है ऐसे भगवान् नमिनाथ देवोंकी उक्त समस्त बातोंको हृदयमें धारण कर नगर में लौट आये ॥ ४४ ॥ वहाँ वे विदेह क्षेत्रके अपराजित तीर्थकर तथा उनके साथ अपने पूर्वभवके सम्बन्धका स्मरण कर संसारमें होनेवाले भावोंका बार-बार विचार करने लगे ॥ ४५ ॥ वे विचार करने लगे कि इस आत्माने अपने आपको अपने आपके ही द्वारा अनादि-कालसे चले आये बन्धनोंसे अच्छी तरह जकड़ कर शरीर-रूपी जेलखानेमें डाल रक्खा है और जिस प्रकार पिंजड़ेके भीतर पापी पक्षी दुःखी होता है अथवा आलान – खम्भेसे बँधा हुआ हाथी दुःखी होता है उसी प्रकार यह आत्मा निरन्तर दुःखी रहता है। यह यद्यपि नाना दुःखोंको भोगता है तो भी उन्हीं दुःखोंमें राग करता है। रति नोकषायके अत्यन्त तीव्र उदयसे यह इन्द्रियोंके विषयमें आसक्त रहता है और विष्ठाके कीड़ाके समान अपवित्र पदार्थोंमें तृष्णा बढ़ाता रहता है ॥ ४८॥ यह प्राणी मृत्यसे डरता है किन्तु उसी ओर दौड़ता है, दुःखोंसे छूटना चाहता है किन्तु उनका ही सञ्चय करता है। हाय-हाय, बड़े दुःखकी बात है कि आर्त और रौद्र ध्यानसे उत्पन्न हुई तृष्णासे इस जीवकी बुद्धि विपरीत हो गई है। यह बिना किसी विश्रामके चतुर्गतिरूप भवमें भ्रमण करता है और पापके उदयसे दुःखी होता रहता है। इष्ट अर्थका विघात करनेवाली, दृढ़ और अनादि कालसे चली आई इस मूर्खताको भी धिक्कार हो ।॥ ४९ -५० ।। इस प्रकार वैराग्यके संयोगसे वे भोग तथा रागसे बहुत दूर जा खड़े हुए। उसी समय सारस्वत आदि समस्त वीतराग देवोंने – लौकान्तिक देवोंने उनकी पूजा की ।। ५१ ।।
श्लोक 52 से 65 : दीक्षा, केवलज्ञान और धर्मसंघ की स्थापना
कर्मोंका क्षयोपशम होनेसे उनके प्रशस्त संज्वलनका उदय हो गया अर्थात् प्रत्याख्यानावरण क्रोध मान माया लोभका क्षयोपशम और संज्वलन क्रोध मान माया लोभका मन्द उदय रह गया जिससे रत्नत्रयको प्राप्त कर उन्होंने सुप्रभ नामक पुत्रको अपना राज्य-भार सौंप दिया ॥ ५२ ॥ तदनन्तर देवोंके द्वारा किये हुए अभिषेकके साथ-साथ दीक्षा-कल्याणकका उत्सव प्राप्त कर वे उत्तरकुरु नामकी मनोहर पालकी पर सवार हो चैत्रवन नामक उद्यानमें गये। वहाँ उन्होंने बेलाका नियम लेकर आषाढ़कृष्ण दशमीके दिन अश्विनी नक्षत्रमें सायंकालके समय एक हजार राजाओंके साथ संयम धारण कर लिया और उसी समय संयमी जीवोंके प्राप्त करनेके योग्य चतुर्थ- मनःपर्ययज्ञान भी प्राप्त कर लिया ।। ५३-५५ ।। पारणाके लिए भगवान् वीरपुर नामक नगर में गये वहाँ सुवर्णके समान कान्तिवाले राजा दत्तने उन्हें आहार दान देकर पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ॥ ५६ ॥ तदनन्तर जब छद्मस्थ अवस्थाके नव वर्ष बीत गये तब वे एक दिन अपने ही दीक्षावनमें मनोहर बकुल वृत्तके नीचे वेलाका नियम लेकर ध्यानारूढ़ हुए। वहीं पर उन्हें मार्गशीर्ष शुक्लपक्षकी के बीसरी नन्दा तिथि अर्थात् एकादशीके दिन सायंकालके समय समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाला केवलज्ञान उत्पन्न हुआ उसी समय इन्द्र आदि देवोंने चतुर्थ – ज्ञानकल्याणका उत्सव किया ॥ ५७-५९ ॥ सुप्रभार्यको आदि लेकर उनके सत्रह गणधर थे । चार सौ पचास समस्त पूर्वोके जानकार थे, बारह हजार छह सौ अच्छे व्रतोंको धारण करने वाले शिक्षक थे, एक हजार छह सौ अवधिज्ञानके धारकोंकी संख्या थी, इतने ही अर्थात् एक हजार छह सौ ही केवल ज्ञानी थे, पन्द्रह सौ विक्रियाऋद्धिके धारक थे, बारह सौ पचास परिग्रह रहित मनःपर्ययज्ञानी थे और एक हजार वादी थे। इस तरह सब मुनियोंकी संख्या बीस हजार थी । मङ्गिनीको आदि लेकर पैंतालीस हजार आर्यिकाएं थीं, एक लाख श्रावक थे, तीन लाख श्राविकाएं थीं, असंख्यात देव देवियां थीं और संख्यात तिर्यश्व थे ।। ६०-६५।।
श्लोक 66 से 82 : मोक्ष, स्तुति और जयसेन चक्रवर्ती का पूर्वचरित
इस प्रकार समीचीन धर्मका उपदेश करते हुए भगवान् नमिनाथने नम्रीभूत बारह सभाओंके साथ आर्य क्षेत्रमें सब ओर विहार किया । जब उनकी आयुका एक माह बाकी रह गया तब वे विहार बन्द कर सम्मेदशिखर पर जा विराज-मान हुए। वहाँ उन्होंने एक हजार मुनियोंके साथ प्रतिमा योग धारण कर लिया और वैशाखकृष्ण चतुर्दशीके दिन रात्रिके अन्तिम समय अश्विनी नक्षत्रमें मोक्ष प्राप्त कर लिया ॥ ६६-६८ ॥ उसी समय देवोंने आकर सबके स्वामी श्री नमिनाथ तीर्थंकरका पञ्चम – निर्वाणकल्याणकका उत्सव किया और तदनन्तर पुण्यरूपी पदार्थको प्राप्त हुए सब देव अपने-अपने स्थानको चले गये ।। ६९ -॥ जिनका शरीर सुवर्णके समान देदीप्यमान था, जिन्होंने घातिया कर्मोंके साथ युद्ध किया था, समस्त अहितोंको जीता था अथवा विजय प्राप्त की थी, नम्रीभूत देव जय-जय करते हुए जिनकी स्तुति करते थे, जो विद्वान् शिष्योंके स्वामी थे और अन्त में जिन्होंने शरीर नष्ट कर दिया था- मोक्ष प्राप्त किया था वे श्री नमिनाथ स्वामी हम सबके संसार-सम्बन्धी बहुत भारी भयको नष्ट करें ।॥ ७० ॥ जो तीसरे भवमें कौशाम्बी नगरमें सिद्धार्थ नामके प्रसिद्ध राजा थे, वहाँ पर घोर तपश्चरण कर जो अनुत्तरके चतुर्थ अपराजित विमानमें देव हुए और वहाँ से आकर जो मिथिला नगरीमें इन्द्रोंके द्वारा वन्दनीय तीनों जगत्के हितकारी वचनोंको प्रकट करनेके लिए नमिनाथ नामक इक्कीसवें तीर्थंकर हुए, जिन्होंने देवों सहित समस्त इन्द्रोंसे नमस्कार कराया था, जिनपर चमर ढोरे जा रहे थे और जिनपर उड़ते हुए भ्रमरोंसे सुशोभित पुष्पवृष्टियोंका समूह पड़ा करता था ऐसे श्री नमिनाथ भगवान् चरण-कमलके मकरन्द-रसको पान करनेवाले शिष्य रूपी भ्रमरोंके लिए निरन्तर संतोष प्रदान करते रहें ।॥७१-७२॥ तीनों जगत्को जीतनेसे जिसका गर्व बढ़ रहा है ऐसे मोहका माहात्म्य मर्दन करनेसे जिन्हें मोक्ष-लक्ष्मी प्राप्त हुई है ऐसे श्री नमिनाथ भगवान् हम सबके लिए भी मोक्ष-लक्ष्मी प्रदान करें ।॥ ७३ ॥ अर्थानन्तर- इसी जम्बूद्वीपके उत्तर भागमें एक ऐरावत नामका बड़ा भारी क्षेत्र है उसके श्रीपुर नॅगरमें लक्ष्मीमान् वसुन्धर नामका राजा रहता था ॥ ७४ ॥ किसी एक दिन पद्मावती स्त्रीके वियोगसे उसका मन अत्त्यन्त विरक्त हो गया जिससे वह अत्यन्त सुन्दर मनोहर नामके वनगें गया । वहाँ उसने वरचर्म नामके सर्वज्ञ भगवान्से धर्मके सद्भावका निर्णय किया फिर विनयन्धर नामके पुत्रके लिए अपना सब भार सौंपकर अनेक राजाओंके साथ, संयम धारण कर लिया । तदनन्तर कठोर तपश्चरण कर समाधि मरण किया जिससे महाशुक्र स्वर्गमें देव हुआ ।। ७५-७७ ।। वहाँ पर उसकी सोलह सागरकी आयु थी, दिव्य भोगोंका अनुभव कर वह वहाँ से च्युत हुआ और इन्हीं नमिनाथ तीर्थंकरके तीर्थमें वत्स देशकी कौशाम्बी नगरीके अधिपति, इक्ष्वाकुवंशी राजा विजयकी प्रभाकरी नामकी देवीसे कान्तिमान् पुत्र हुआ ।॥ ७८-७९ ॥ वह सर्व लक्षणोंसे युक्त था, जयसेन उसका नाम था, तीन हजार वर्षकी उसकी आयु थी. साठ हाथकी ऊँचाई थी, तपाये हुए सुवर्णके समान कान्ति थी, वह चौदह रत्नोंका स्वामी था, नौ निधियाँ सदा उसकी सेवा करती मैं, ग्यारहवाँ चक्रवर्ती था और दश प्रकारके भोग भोगता हुआ सुखसे समय बिताता था। किसी !क दिन वह ऊँचे राजभवनकी छत पर अन्तःपुरवर्ती जनोंके साथ लेट रहा था।। ८०-८२।।
श्लोक 83 से 92: जयसेन का वैराग्य, संयम और अहमिन्द्र पद
पौर्णमासीके न्द्रिमाके समान वह समस्त दिशाओंको देख रहा था कि इतनेमें ही उसे उल्कापात दिखाई दिया । से देखते ही विरक्त होता हुआ वह इस प्रकार विचार करने लगा कि देखो यह प्रकाशमान वस्तु अभी तो ऊपर थी और फिर शीघ्र ही अपनी दो पर्यायें छोड़कर कान्तिरहित होती हुई नीचे बली गई ॥ ८३-८४ ॥ ‘मेरा तेज भी बहुत ऊँचा है, तथा बलवान् है’ इस तरहके मदको धारण करता हुआ जो मूढ़ प्राणी अपनी आत्माके लिए हितकारी परलोक सम्बन्धी कार्यका आचरण नहीं करता है और उसके विपरीत नश्वर तथा संतुष्ट नहीं करनेवाले विषयोंमें आसक्त रहता है वह प्रमादी मनुष्य भी इसी उल्काकी गतिको प्राप्त होता है अर्थात् तेज रहित होकर अधोगतिको जाता है ॥ ८५-८६ ॥ ऐसा विचार कर सरल बुद्धिके धारक चक्रवर्तीने काल आदि लब्धियोंकी अनुकूलतासे चक्र आदि समस्त साम्राज्यको छोड़नेका निश्चय कर लिया। वह अपने बड़े पुत्रोंके लिए राज्य देने लगा परन्तु उन्होंने तप धारण करनेकी उदात्त इच्छासे राज्य लेनेकी इच्छा नहीं की तब उसने छोटेपुत्रके लिए राज्य दिया और अनेक राजाओंके साथ वरदत्त नामके केवली भगवान्से संयम धारण कर लिया । वह कुछ ही समय में श्रुत बुद्धि तप विक्रिया और औषध आदि ऋद्धियोंसे विभूषित हो गया ।॥ ८७-८९ ।। चारण ऋद्धि भी उसे प्राप्त हो गई। अन्त में वह सम्मेदशिखरके चारण नामक ऊँचे शिखरपर प्रायोपगमन संन्यास धारण कर आत्माकी आराधना करता हुआ जयन्त नामक अनुत्तर विमानमें अहमिन्द्र हुआ और वहाँ उत्तम पुण्यकर्मके अनुभागले उत्पन्न हुए सुखका चिरकालके लिए अनुभव करने लगा ॥ ९०- ९१ ॥ जयसेनका जीव पहले भवमें वसुन्धर नामका राजा था फिर समीचीन तपञ्चरण प्राप्त कर सोलह सागरकी आयुवाला देव हुआ, वहाँसे चय कर जयसेन नामका चक्रवर्ती हुआ और फिर जयन्त विमानमें सुखका भाण्डार स्वरूप अहमिन्द्र हुआ ।। ९२ ।।
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध भगवद्गुणभद्राचार्य प्रणीत त्रिषष्टि लक्षण महापुराणके संग्रहमें नमिनाथ -तीर्थंकर तथा जयप्तेन चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन करनेवाला उनहत्तरवाँ पर्व समाप्त हुआ।
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पर्व 70
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena