राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152 – 154
द्वीपेऽस्मिन् भारते क्षेत्रे विषये मगधाह्वये । वृद्धग्रामे सुतौ जातौ रेवत्यां नरजन्मनः ॥ १५२ ॥ज्येष्ठोऽत्र राष्ट्रकूटस्य भगदत्तस्ततः परः । भवदेवस्तयोर्ध्यायान् संयमं प्रत्यपद्यत ॥ १५३ ॥सुस्थिताख्यगुरुं प्राप्य तेनामा विनयान्वितः । नानादेशान् विहृत्यायात् स्वजन्मग्राममेव सः ॥ १५४॥
इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्र सम्बन्धी मगधदेशमें एक वृद्ध नामका ग्राम था । उसमें राष्ट्रकूट नामका वैश्य रहता था। उसकी रेवती नामक स्त्रीसे दो पुत्र हुए थे। एक भगदत्त और दूसरा भवदेव । उनमें बड़े पुत्र भगदत्तने सुस्थित नामक मुनिराजके पास जाकर दीक्षा धारण कर ली। तदनन्तर उन्हीं गुरुके साथ बड़ी विनयसे अनेक देशों में विहार कर वह अपनी जन्मभूमिमें आया ।। १५२-१५४ ।।
“In the Magadha country belonging to the Bharata-kshetra of this very Jambudvipa, there was a village named Vriddha. A Vaishya named Rashtrakuta lived there. From his wife named Revati, two sons were born—one named Bhagadatta and the other Bhavadeva. Among them, the elder son, Bhagadatta, approached a sage named Susthita and took initiation (Diksha). Thereafter, traveling through many lands with great humility alongside the same preceptor, he returned to his birthplace. || 152-154 ||”
श्लोक ( Shlok ) 155
तदा तद्वान्धवाः सर्वे समागत्य ससम्मदाः । मुनिं प्रदक्षिणीकृत्य सम्पूज्यानन्तुमुद्यताः ॥ १५५ ॥
उस समय उनके सब भाई-बन्धु बड़े हर्षसे उनके पास आये और उन मुनिकी प्रदक्षिणा तथा पूजाकर उन्हें नमस्कार करनेके लिए उद्यत हुए ॥ १५५ ॥
“At that time, all his kinsmen approached him with great joy and, after circumambulating and worshipping the sage, prepared themselves to bow down before him in reverence. || 155 ||”
श्लोक ( Shlok ) 156 – 158
ग्रामे दुर्मर्षणो नाम तस्मिन्नेत्र गृहाधिपः । तस्य नागवसुर्भार्या नागश्रीरनयोः सुता ॥ १५६ ॥ताभ्यां सा भवदेवाय प्रादायि विधिपूर्वकम् । अग्रजागमनं श्रुत्वा सद्यः सब्जातसम्मदः ॥ १५७ ॥भवदेवोऽप्युपागत्य भगदत्तमुनीश्वरम् । विनयात्प्रप्रणम्यास्त तत्कृताशासनादितः ॥ १५८ ॥
उसी नगर में एक दुर्मर्षण नामका गृहस्थ रहता था । उसकी स्त्रीका नाम नागवसु था। उन दोनोंके नागश्री नामकी पुत्री उत्पन्न हुई थी। उन दोनोंने अपनी पुत्री, भगदत्त मुनिराजके छोटे भाई भवदेवके लिए विधिपूर्वक प्रदान की थी। बड़े भाईका आगमन सुनकर भवदेव बहुत ही हर्षित हुआ। वह भी उनके समीप गया और विनयके साथ बार-बार प्रणाम कर वहीं बैठ गया। उस समय मुनिराजके उपदेशसे उसके परिणाम बहुत ही आर्द्र हो रहे थे ।।१५६-१५८ ।।
“In that same city lived a householder named Durmarshana. The name of his wife was Nagavasu, and a daughter named Nagashri was born to them. The couple had formally betrothed their daughter to Bhavadeva, the younger brother of the sage Bhagadatta. Upon hearing of his elder brother’s arrival, Bhavadeva was filled with immense joy. He too went near him, bowed down repeatedly with great humility, and sat down there. At that time, listening to the discourse of the sage, his heart and thoughts became profoundly softened with devotion. || 156-158 ||”
श्लोक ( Shlok ) 159
आख्याय धर्मयाथात्म्यं वैरूप्यमपि संसृतेः । गृहीतपाणिरेकान्ते संयमो गृह्यर्ता त्वया ॥ १५९ ॥
धर्मका यथार्थ स्वरूप और संसारकी विरूपता बतलाकर मुनिराज भगदत्तने अपने छोटे भाई भवदेवका हाथ पकड़कर एकान्तमें कहा कि तू संयम ग्रहण कर ले ।। १५९ ॥
“Revealing the true nature of righteousness (Dharma) and the transience of the worldly cycle, the sage Bhagadatta took his younger brother Bhavadeva by the hand and said to him in private, ‘You should embrace self-restraint (Sanyam).’ || 159 ||”
श्लोक ( Shlok ) 160
इत्याह तं मुनिः सोऽपि प्रत्यवादीदिदं वचः । नागश्रीमोक्षणं कृत्वा कर्तास्मि भवतोदितम् ॥ १६० ॥
इसके उत्तर में भवदेवने कहा कि मैं नागश्रीसे छुट्टी लेकर आपका कहा करूँगा ।। १६० ।।
“In response, Bhavadeva said, ‘I shall take leave of Nagashri and then carry out your bidding.’ || 160 ||”
श्लोक ( Shlok ) 161
इति तन्मुनिराकर्ण्य जगादाजनने जनः । भार्यादिपाशसंलनः करोत्यात्महितं कथम् ॥ १६१ ॥
यह सुनकर मुनिराजने कहा कि इस संसारमें स्त्री आदिकी पाश में फँसा हुआ यह प्राणी आत्माका हित कैसे कर सकताहै ? ।। १६१ ।।
“Hearing this, the sage said, ‘Entangled in the snares of women and worldly attachments in this transience, how can a living being ever accomplish the true welfare of their own soul?’ || 161 ||”
श्लोक 162 से 171
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151
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