राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 392 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 421 | श्लोक 422 से 430 | श्लोक 431 से 441 | श्लोक 442 से 453 | श्लोक 454 से 470 | श्लोक 471 से 481
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 482 to 491
श्लोक ( Shlok ) 482 – 484
भरतो दीर्घदन्तश्च मुक्तदन्तस्तृतीयकः । गुरुदन्तश्चतुर्थस्तु श्रीषेणः पञ्चमो मतः ॥ ४८२ ॥ षष्ठः श्रीभूतिशब्दाख्यः श्रीकान्तः सप्तमः स्मृतः । पश्नोऽष्टमो महापश्नो विचित्रादिश्च वाहनः ॥४८३॥ दशमोऽस्मात्परः ख्यातश्चक्री विमलवाहनः । अरिष्टसेनः सर्वान्त्यः सम्पन्नः सर्वसम्पदा ॥ ४८४ ॥
उनके नाम इस प्रकार होंगे-पहला भरत, दूसरा दीर्घदन्त, तीसरा मुक्तदन्त, चौथा गूददन्त, पाँचवाँ श्रीषेण, छठवाँ श्रीभूति, सातवाँ श्रीकान्त, आठवाँ पद्म, नौवाँ महापद्म, दशवाँ विचित्र-वाहन, ग्यारहवाँ विमलवाहन और बारहवाँ सब सम्पदाओंसे सम्पन्न अरिष्टसेन ॥ ४८२-४८४ ॥
“Their names will be as follows: the first will be Bharata, the second Dirghadanta, the third Muktadanta, the fourth Gudadanta, the fifth Shrishena, the sixth Shribhuti, the seventh Shrikanta, the eighth Padma, the ninth Mahapadma, the tenth Vichitra-vahana, the eleventh Vimalavahana, and the twelfth will be Arishtasena, who will be endowed with all forms of supreme wealth and opulence. ॥ 482-484 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 485 – 486
सीरिणोऽपि नवैवात्र तत्राद्यश्चन्द्रनामकः । महाचन्द्रो द्वितीयः स्यात्चतश्चक्रधरो भवेत् ॥ ४८५ ॥ हरिचन्द्राभिधः सिंहचन्द्रश्चन्द्रो वरादिकः । पूर्णचन्द्रः सुचन्द्रश्च श्रीचन्द्रः केशवाचितः ॥ ४८६ ॥
नौ बलभद्र भी इसी कालमें होंगे। उनके नाम क्रमानुसार इस प्रकार हैं १ चन्द्र, २ महाचन्द्र, ३ चक्रधर, ४ हरिचन्द्र, ५ सिंहचन्द्र, ६ वरचन्द्र, ७पूर्णचन्द्र, ८ सुचन्द्र और नौवाँ नारायणके द्वारा पूजित श्रीचन्द्र ॥४८५-४८६॥
“Nine Balabhadras (Baladevas) will also manifest within this very same era. In chronological order, their names are as follows: (1) Chandra, (2) Mahachandra, (3) Chakradhara, (4) Harichandra, (5) Simhachandra, (6) Varachandra, (7) Purnachandra, (8) Suchandra, and the ninth will be Shrichandra, who will be revered by Narayana. ॥ 485-486 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 487 – 489
केशवाश्च नवैवात्र तेष्वाद्यो नन्दिनामकः । नन्दिमित्रो द्वितीयः स्यानन्दिषेणस्ततः परः ॥ ४८७ ॥नन्दिभृतिश्चतुर्थस्तु प्रतीतः पञ्चमो बलः । षष्ठो महाबलस्तेषु सप्तमोऽतिबलाह्वयः ॥ ४८८ ॥अष्टमोऽभूत् त्रिपृष्ठाख्यो द्विपृष्ठो नवमो विभुः । तद्वैरिणापि तावन्त एव विज्ञेयसन्ज्ञकाः ॥ ४८९ ॥
नौ नारायण भी इसी कालमें होंगे उनके नाम इस प्रकार होंगे। पहला नन्दी, दूसरा नन्दिमित्र, तीसरा नन्दिषेण, चौथा नन्दिभूति, पाँचवाँ सुप्रसिद्धबल, छठवाँ महाबल, सातवाँ अतिबल, आठवाँ त्रिपृष्ठ और नौवाँ द्विपृष्ठ नामक विभु होगा। इन नारायणोंके शत्रु नौ प्रतिनारायण भी होंगे। उनके नाम अन्य ग्रन्थोंसे जान लेना चाहिए ।। ४८७-४८९ ॥
“Nine Narayanas (Vasudevas) will also manifest within this very same era, and their names will be as follows: the first will be Nandi, the second Nandimitra, the third Nandishena, the fourth Nandibhuti, the fifth the highly celebrated Suprasiddhabala, the sixth Mahabala, the seventh Atibala, the eighth Triprishta, and the ninth will be the all-powerful lord named Dwiprishta. There will also be nine Pratinarayanas (Anti-heroes) who will act as the bitter adversaries of these Narayanas. Their names should be learned from other scriptural texts. ॥ 487-489 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 490 – 491
ततस्तत्कालपर्यन्ते भवेत्सुषमदुष्षमा । आदौ तस्या मनुष्याणां पञ्चचापशतोच्छ्रितिः ॥ ४९० ॥साधिका पूर्वकोव्यायुःस्थितिर्यातेषु केषुचित् । वर्षेषु निर्विशेषान्त्र जघन्यार्यजनस्थितिः ॥ ४९१ ॥
तदनन्तर इस कालके बाद सुषम-दुष्षम काल आवेगा उसकेप्रारम्भमें मनुष्योंकी ऊँचाई पाँचसौ धनुष होगी और कुछ अधिक एक करोड़ वर्षकी आयु होगी । इसके बाद कुछ वर्ष व्यतीत हो जानेपर यहाँपर जघन्यभोगभूमिके आर्य जनोंके समान सब स्थिति आदि हो जावेंगी ।। ४९०-४९१ ।।
“Immediately after this era, the Sushama-Dushama (the fourth era of the ascending cycle, characterized by happiness mixed with misery) will arrive. At its commencement, the physical height of human beings will be five hundred dhanushas, and their lifespan will be slightly over one crore purva years. Following this, after a few years have elapsed, all environmental conditions, lifespans, and societal structures here will transform to mirror those of the noble inhabitants of the Jaghanya-bhogabhumi (the lowest level of the land of spontaneous enjoyment). ॥ 490-491 ॥”
श्लोक 492 से 508
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549 | चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 691
राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 360 | श्लोक 361 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 391| श्लोक 392 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 421 | श्लोक 422 से 430 | श्लोक 431 से 441 | श्लोक 442 से 453 | श्लोक 454 से 470 | श्लोक 471 से 481
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