नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 69- shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42 – 43
देवोपनीतभोगानां भोक्ता सम्प्रति साध्विति । तपः प्राग्धातकीखण्डे कृत्वा सौधर्मनामनि ॥ ४२ ॥सम्भूयेतौ द्वितीयेऽह्नि गत्वा तद्वचनश्रुतेः । भवन्तमीक्षितुं पूज्यमावामैव सकौतुकौ ॥ ४३ ॥
इस समय वे देवोंके द्वारा लाये हुए भोगोंका अच्छी तरह उपभोग कर रहे हैं- गृहस्थावस्थामें विद्यमान हैं। हे देव ! हम दोनों अपने पूर्व जन्ममें धातकीखण्ड द्वीपके रहनेवाले थे वहाँ तपञ्चरण कर सौधर्म नामक स्वर्गमें उत्पन्न हुए हैं। दूसरे दिन हमलोग अपराजित केवलीकी पूजाके लिए गये थे। वहाँ उनके वचन सुननेसे पूजनीय आपके दर्शन करनेके लिए कौतुकवश यहाँ आये हैं ।॥ ४२-४३ ॥
“At this moment, He is thoroughly enjoying the worldly pleasures brought to Him by the celestial beings—He is currently in the stage of a householder (grihasthavastha).’ O Lord! In our previous birth, the two of us were residents of the Dhatakikhanda continent. Having performed severe austerities there, we were reborn in the heaven named Saudharma. The other day, we went to worship the omniscient Lord Aparajita (Aparajita Kevali). Upon hearing His words there, out of sheer curiosity and devotion, we have come here to behold You, who are most venerable.” || 42-43 ||
श्लोक ( Shlok ) 44
इति सोऽपि समासन्नकेवलावगमोदयः । चित्ते विधाय तत्सर्व महीशः प्राविशत्पुरम् ॥ ४४ ॥
जिन्हें निकट-कालमें ही केवलज्ञानकी प्राप्ति होनेवाली है ऐसे भगवान् नमिनाथ देवोंकी उक्त समस्त बातोंको हृदयमें धारण कर नगर में लौट आये ॥ ४४ ॥
Lord Naminatha—who was destined to attain Kevalajnana (omniscience) in the very near future—kept all these words of the deities close to His heart and returned to the city. || 44 ||
श्लोक ( Shlok ) 45
तत्र स्वभवसम्बन्धं स्मृत्वा तीर्थकरं च तम् । आजवं जवसंजातसद्भावं भावयन्मुहुः ॥ ४५ ॥
वहाँ वे विदेह क्षेत्रके अपराजित तीर्थकर तथा उनके साथ अपने पूर्वभवके सम्बन्धका स्मरण कर संसारमें होनेवाले भावोंका बार-बार विचार करने लगे ॥ ४५ ॥
There, remembering the omniscient Lord Aparajita of the Videha region and recalling His own past-life connection with Him, He began to contemplate deeply and repeatedly upon the transient nature of worldly existences (bhavas). || 45 ||
श्लोक ( Shlok ) 46 – 48
अनादिबन्धनैर्गाढं वध्वात्मात्मानमात्मना । कायकारागृहे स्थित्वा पापी पक्षीव पक्षरे ॥ ४६ ॥कुञ्जरो वार्पितालानो कलयत्पलमात्मनः । नाना दुःखानि भुञ्जानो भूयस्तैरेव रक्षितः ॥ ४७ ॥इन्द्रियार्थेषु संसक्तो रतितीव्रतरोदयात् । अशुचिष्वेवसम्वृद्धतृष्णोऽवस्करकीटवत् ॥ ४८ ॥
वे विचार करने लगे कि इस आत्माने अपने आपको अपने आपके ही द्वारा अनादि-कालसे चले आये बन्धनोंसे अच्छी तरह जकड़ कर शरीर-रूपी जेलखानेमें डाल रक्खा है और जिस प्रकार पिंजड़ेके भीतर पापी पक्षी दुःखी होता है अथवा आलान – खम्भेसे बँधा हुआ हाथी दुःखी होता है उसी प्रकार यह आत्मा निरन्तर दुःखी रहता है। यह यद्यपि नाना दुःखोंको भोगता है तो भी उन्हीं दुःखोंमें राग करता है। रति नोकषायके अत्यन्त तीव्र उदयसे यह इन्द्रियोंके विषयमें आसक्त रहता है और विष्ठाके कीड़ाके समान अपवित्र पदार्थोंमें तृष्णा बढ़ाता रहता है ॥४६ – ४८॥
He began to contemplate: “This soul, by its own actions, has tightly bound itself with fetters that have existed since time immemorial, casting itself into the prison-house of the physical body. Just as a wretched bird suffers inside a cage, or an elephant suffers when bound to its tethering post (alana), this soul remains in continuous misery.
Even though it experiences manifold sufferings, it still develops attachment (raga) toward those very miseries. Due to the intensely sharp rise of Rati No-Kashaya (the minor passion of worldly liking/pleasure), it remains deeply attached to the objects of the senses, constantly increasing its thirst for impure things, much like a maggot living in filth.” || 46-48 ||
श्लोक ( Shlok ) 49 – 50
बिभ्यन्मृत्योस्तमाधावन् वर्ज्यदुःखस्तदर्जयत् । विपर्यस्तमतिः कष्टमार्तरौद्राहिताशया ॥ ४९ ॥भवे भ्राम्यत्यविश्राम्यन् प्रताम्यन् पापपाकतः । दृढां निरूढां धिङ्यूढिमभीष्टार्थविघातिनीम् ॥ ५० ॥
यह प्राणी मृत्यु से डरता है किन्तु उसी ओर दौड़ता है, दुःखोंसे छूटना चाहता है किन्तु उनका ही सञ्चय करता है। हाय-हाय, बड़े दुःखकी बात है कि आर्त और रौद्र ध्यानसे उत्पन्न हुई तृष्णासे इस जीवकी बुद्धि विपरीत हो गई है। यह बिना किसी विश्रामके चतुर्गतिरूप भवमें भ्रमण करता है और पापके उदयसे दुःखी होता रहता है। इष्ट अर्थका विघात करनेवाली, दृढ़ और अनादि कालसे चली आई इस मूर्खताको भी धिक्कार हो ।॥ ४९ -५० ।।
“This living being fears death, yet runs headlong toward it; it wishes to be liberated from sufferings, yet continuously accumulates the very causes of those sufferings. Alas, what a tragedy! The intellect of this soul has become completely inverted by the insatiable thirst born out of Arta (mournful/anxious) and Raudra (wrathful/cruel) concentration of mind (dhyana).
Without a single moment of rest, it wanders through the cycle of existence across the four realms of life (chatur-gati), remaining perpetually miserable due to the fruition of its past sins (papa). Fie upon this deep-seated, beginningless ignorance that utterly destroys one’s true spiritual well-being!” || 49-50 ||
श्लोक ( Shlok ) 51
इति निर्वेद संयोगाद्भोगरागातिदूरगः । सारस्वतादिसर्वापरागामरसमन्वितः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार वैराग्यके संयोगसे वे भोग तथा रागसे बहुत दूर जा खड़े हुए। उसी समय सारस्वत आदि समस्त वीतराग देवोंने – लौकान्तिक देवोंने उनकी पूजा की ।। ५१ ।।
In this manner, through the profound emergence of detachment (vairagya), He withdrew Himself completely, standing far apart from worldly enjoyments and attachments. At that very moment, all the desireless deities led by Sarasvata—the Laukantika gods—arrived and worshipped Him. || 51 ||
श्लोक 52 से 65
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