राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 454 to 470
श्लोक ( Shlok ) 454 – 457
इतोऽतिदुष्षमोत्सपिंण्याः पूर्वोक्तप्रमाणभाक् । वर्तिष्यति प्रजावृद्धयै ततः क्षीरपयोधराः ॥ ४५४ ॥ तावद्दिननिबन्धेन निविराममहर्दिवम् । पयः पयांसि दास्यन्ति धात्री त्यक्ष्यति रूक्षताम् ॥ ४५५ ॥ तन्निबन्धनवर्णादिगुणं चावाप्स्यति क्रमात् । तथैवामृतमेघाश्च तावद्दिवसगोचराः ॥ ४५६ ॥ दृष्टिमापातयिष्यन्ति निष्पत्स्यन्तेऽत्र पूर्ववत् । ओषध्यस्तरवो गुल्मतृणादीन्यप्यनन्तरम् ॥ ४५७
इसके आगे उत्सर्पिणी कालका अतिदुःषमा काल चलेगा, वह भी इक्कीस हजार वर्षका होगा। इसमें प्रजाकी वृद्धिहोगी। पहले ही तीर जातिके मेघ सात-सात दिन बिना विश्राम लिये जल और दूधकी वर्षा करेंगे जिससे पृथिवी रूक्षता छोड़ देगी और उसीसे पृथिवी अनुक्रमसे वर्णादि गुणोंको प्राप्त होगी। इसके बाद अमृत जातिके मेघ सात दिन तक अमृतकी वर्षा करेंगे जिससे औषधियाँ, वृक्ष, पौधे और घास पहलेके समान निरन्तर होंगे ।। ४५४-४५७ ॥
“Moving forward from this point, the Ati-Dushama (extreme misery) era of the Utsarpini (ascending cycle of time) will commence, which will also last for twenty-one thousand years. During this era, the human population will steadily multiply. First, the clouds of the Teera class will continuously pour down rain consisting of pure water and milk for seven days each without rest, causing the earth to shed its harsh aridity; by virtue of this very rain, the earth will progressively reclaim its natural qualities of vibrant color, fragrance, and taste. Immediately following this, the clouds of the Amrita class will shower celestial nectar (Amrita) for seven days, whereby medicinal herbs, trees, plants, and grasses will flourish continuously just as they did in the times of old. ॥ 454-457 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 458 – 459
ततो रसाधिकाम्भोदवर्षणात्षडूसोद्भवः । यस्यामादौ बिलादिभ्यो निर्गत्य मनुजास्तदा ॥ ४५८ ॥ तेषां रसोपयोगेन जीविष्यन्त्याप्तसम्मदाः । वृद्धिर्गलति कालेऽस्मिन् क्रमात्प्राग्हासमात्मनाम् ॥ ४५९ ॥
तदनन्तर रसाधिक जातिके मेघ रसकी वर्षा करेंगे जिससे छह रसोंकी उत्पत्ति होगी। जो मनुष्य पहले बिलोंमें घुस गये थे वे अब उनसे बाहर निकलेंगे और उन रसोंका उपयोग कर हर्षसे जीवित रहेंगे। ज्यों-ज्यों कालमें वृद्धि होती जावेगी त्यों-त्यों प्राणियोंके शरीर आदिका ह्रास दूर होता जावेगा – उनमें वृद्धि होने लगेगी ।। ४५८-४५९ ।।
“Immediately following that, the clouds of the Rasadhika class will shower essence (Rasa), which will give rise to the six primary flavors. The humans who had previously sought refuge inside the caves and burrows will now step out of them, and by consuming those nourishing essences, they will survive in great joy. As time advances further, the physical degeneration of living beings will completely dissolve, and their strength, lifespan, and stature will begin to steadily increase. ॥ 458-459 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 460 – 466
तन्वादीनां पुनर्दुष्षमासमायाः प्रवेशने । आयुर्विशतिवर्षाणि नराणां परमं मतम् ॥ ४६० ॥ साधारत्नित्रयोत्सेधदेहानां वृद्धिमीयुषाम् । प्राक्प्रणीतप्रमाणेऽस्मिन् काले विमलबुद्धयः ॥ ४६१ ॥ षोडशाविर्भविष्यन्ति क्रमेण कुलधारिणः । प्रथमस्य मनागूना तनुश्चतुररत्निषु ॥ ४६२ ॥ अन्त्यस्यापि तनुः सप्तारत्निभिः सम्मिता भवेत् । आदिमः कनकस्तेषु द्वितीयः कनकप्रभः ॥ ४६३ ॥ ततः कनकराजाख्यश्चतुर्थः कनकध्वजः । २कनकः पुङ्गवान्तोऽस्मान्नलिनो नलिनप्रभः ॥ ४६४ ॥ ततो नलिनराजाख्यो नवमो नलिनध्वजः । पुङ्गवान्तश्च नलिनः पद्मः पद्मप्रभाह्रयः ॥ ४६५ ॥ पद्मराजस्ततः पद्मध्वजः पद्मादिपुङ्गवः । महापद्मश्च विज्ञेयाः प्रज्ञापौरुषशालिनः ॥ ४६६ ॥
तदनन्तर दुःषमा नामक कालका प्रवेश होगा उस समय मनुष्योंकी उत्कृष्ट आयु बीस वर्षकी और शरीरकी ऊँचाई साढ़ेतीन हाथकी होगी। इस कालका प्रमाण भी इक्कीस हजार वर्षका ही होगा। इसमें अनुक्रमसे निर्मल बुद्धिके धारक सोलह कुलकर उत्पन्न होंगे। उनमेंसे प्रथम कुलकरका शरीर चार हाथमें कुछ कम होगा और अन्तिम कुलकरका शरीर सात हाथ प्रमाण होगा । कुलकरोंमें सबसे पहला कुलकर कनक नामका होगा, दूसरा कनकप्रभ, तीसरा कनकराज, चौथा कनकध्वज, पाँचवाँ कनकपुंगव, छठा नलिन, सातवाँ नलिनप्रभ, आठवाँ नलिनराज, नौवाँ नलिनध्वज, दशवाँ नलिनपुंगव, ग्यारहवाँ पद्म, बारहवाँ पद्मप्रभ, तेरहवाँ पद्मराज, चौदहवाँ पद्मध्वज, पन्द्रहवाँ पद्मपुंगव और सोलहवाँ महापद्म नामका कुलकर होगा। ये सभी बुद्धि और बलसे सुशोभित होंगे ॥ ४६०-४६६ ॥
“Immediately following that, the era known as Dushama (the fifth era of the ascending cycle) will set in. At that time, the maximum lifespan of human beings will be twenty years, and their physical height will be three and a half hands. The duration of this era will also be exactly twenty-one thousand years. In this era, a succession of sixteen Kulkaras (patriarchs/lawgivers) possessing pure intellect will be born. Among them, the physical stature of the first Kulkara will be slightly less than four hands, and the body of the final Kulkara will measure seven hands in height. Among these lawgivers, the first Kulkara will be named Kanaka, the second Kanakaprabha, the third Kanakaraja, the fourth Kanakadhwaja, the fifth Kanakapungava, the sixth Nalina, the seventh Nalinaprabha, the eighth Nalinaraja, the ninth Nalinadhwaja, the tenth Nalinapungava, the eleventh Padma, the twelfth Padmaprabha, the thirteenth Padmaraja, the fourteenth Padmadhwaja, the fifteenth Padmapungava, and the sixteenth will be named Mahapadma. All of them will be brilliantly adorned with supreme intellect and strength. ॥ 460-466 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 467
एतेषां क्रमशः काले शुभभावेन वर्धनम् । महीसलिलकालानां धान्यादीनाञ्च सङ्गतम् ॥ ४६७ ॥
इनके समय में क्रमसे शुभ भावोंकी वृद्धि होनेसे भूमि, जल तथा धान्य आदिकी वृद्धि होगी ॥ ४६७।।
“During their respective eras, due to the progressive growth of auspicious thoughts and pure intentions (Shubha-bhava) within the souls of living beings, there will be a corresponding and steady increase in the vitality of the earth, water, and grain crops. ॥ 467 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 468 – 469
मनुष्याणामनाचारत्यागो योग्यानभोजनम् । काले परिभिते मैत्री लज्जा सत्यं दया दमः ॥ ४६८ ॥सन्तुष्टिविनयक्षान्ती रागद्वेषाद्यतीव्रता । इत्यादि साधुवृत्तञ्च वह्निपाकेन भोजनम् ॥ ४६९ ॥
मनुष्य अनाचारका त्याग करेंगे, परिमित समयपर योग्य भोजन करेंगे। मैत्री, लज्जा, सत्य, दया, दमन, संतोष, विनय, क्षमा, रागद्वेष आदिकी मन्दताः आदि सज्जनोचित चारित्र प्रकट होंगे और लोग अग्निमें पकाकर भोजन करेंगे ॥ ४६८-४६९ ॥
“Human beings will completely renounce all forms of misconduct and will partake of wholesome food at appropriate, disciplined intervals. Noble virtues befitting righteous individuals will manifest within them, including friendliness (Maitri), humility (Lajja), truthfulness (Satya), compassion (Daya), self-restraint (Damana), contentment (Santosha), modesty (Vinaya), forgiveness (Kshama), and a significant lessening of attachment and aversion (Raga-Dvesha). Furthermore, people will once again cook and prepare their meals using fire. ॥ 468-469 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 470
द्वितीयकाले वर्तेत तृतीयस्य प्रवर्तने । सप्तारत्निप्रमाणाङ्गाः खद्वयेकाब्दायुषो नराः ॥ ४७० ॥
यह सब कार्य दूसरे कालमें होंगे। इसके बाद तीसरा काल लगेगा। उसमें लोगोंका शरीर सात हाथ ऊँचा होगा और आयु एक सौ बीस वर्षकी होगी ॥ ४७० ।।
“All of these developments will take place during the second era (of this ascending cycle). Following this, the third era will commence. In that era, the physical height of people will reach seven hands, and their lifespan will be one hundred and twenty years. ॥ 470 ॥”
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