पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 80 से 92 | श्लोक 93 से 105 | श्लोक 106 से 114 | श्लोक 115 से 124 | श्लोक 125 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 152
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 73- shlok 153 to 161
श्लोक ( Shlok ) 153 – 159
सुलोचनाद्याः षट्त्रिंत्सहस्त्राण्यायिका विभोः । श्रावका लक्षमेकं तु त्रिगुणाः श्राविकास्ततः ॥ १५३ ॥देवा देव्योऽप्यसङ्ख्याताः सङ्ख्यातास्तिर्यगङ्गिनः । एवं द्वादशभिर्युक्तो गणैर्धर्मोपदेशनम् ॥ १५४ ॥ कुर्वाणः पञ्चभिर्मासैविरहीकृतसप्ततिः । संवत्सराणां मासं स संहृत्य विहृतिक्रियाम् ॥ १५५ ॥ पटत्रिंशन्मुनिभिः सार्धं प्रतिमायोगमास्थितः । श्रावणे मासि सप्तम्यां सितपक्षे दिनादिमे ॥ १५६ ॥ भागे विशाखनक्षत्रे ध्यानद्वयसमाश्रयात् । गुणस्थानद्वये स्थित्वा सम्मेदाचलमस्तके ॥ १५७ ॥ तत्कालोचितकार्याणि वर्तयित्वा यथाक्रमम् । निःशेष कर्मनिर्णाशानिवाणे निश्चलं स्थितः ॥ १५८ ॥ कृतनिर्वाणकल्याणाः सुरेन्द्रास्तं ववन्दिरे । वन्दामहे वयञ्चैनं नन्दितुं सुन्दरैर्गुणैः ॥ १५९ ॥
सुलोचनाको आदि लेकर छत्तीस हजार आर्यिकाएँ थीं, एक लाख श्रावक थे, तीन लाख श्राविकाएँ थीं, असंख्यात देव-देवियाँ थीं और संख्यात तिर्यञ्च थे। इस प्रकार बारह सभाओंके साथ धर्मोपदेश करते हुए भगवान् ने पांच माह कम सत्तर वर्ष तक विहार किया । अन्त में जब उनकी आयुका एक माह शेष रह गया तब वे विहार बन्दकर सम्मेदाच्चलकी शिखर पर छत्तीस मुनियोंके साथ प्रतिमायोग धारण कर विराजमान हो गये । श्रावणशुक्ला सप्तमीके दिन प्रातःकालके समय विशाखा नक्षत्रमें शुक्ल ध्यानके तीसरे और चौथे भेदोंका आश्रय लेकर वे अनुक्रमसे तेरहवें तथा चौदहवें गुणस्थानमें स्थित रहे फिर यथाक्रमसे उस समयके योग्य कार्य कर समस्त कर्मोंका क्षय हो जानेसे मोक्षमें अविचल विराजमान हो गये। उसी समय इन्द्रोंने आकर उनके निर्वाण कल्याणकका उत्सव कर उनकी वन्दना की। आचार्य गुणभद्र कहते हैं कि उनके निर्मल गुणोंसे समृद्ध होनेके कारण हम भी इन भगवान् पार्श्वनाथको नमस्कार करते हैं ।। १५३-१५९ ।।
There were thirty-six thousand Aryikas (nuns) led by Sulochana, one lakh Shravakas (laymen devotees), three lakh Shravikas (laywomen devotees), countless (Asankhyata) gods and goddesses, and countable (Sankhyata) Tiryanchas (animals and birds). In this manner, imparting divine sermons among the twelve assemblies (Barah Sabha), the Lord wandered across the lands (Vihara) for seventy years less five months.
In the end, when only one month of his lifespan remained, he ceased his wanderings and took his seat atop the summit of Sammedachala (Mount Sammed Shikharji), adopting the Pratima-Yoga (unshakeable static meditation) alongside thirty-six monks. On the morning of Shravana Shukla Saptami, under the Vishakha Nakshatra (constellation), anchoring himself in the third and fourth stages of Shukla-Dhyana (pure meditation), he sequentially traversed the thirteenth and fourteenth Gunasthanas (stages of spiritual development). Then, executing the final spiritual actions suited for that exact moment, he shed all remaining karmas completely and became immovably seated in the state of Moksha (liberation). At that very moment, the Indras arrived to celebrate his Nirvana-Kalyanaka (the auspicious event of liberation) and offered their deep obeisance. Acharya Gunabhadra states: Being enriched by his immaculate, pure virtues, we too bow down with deep reverence to Lord Parshvanath. || 153-159 ||
श्लोक ( Shlok ) 160
आदिमध्यान्तगम्भीराः सन्तोऽम्भोनिधिसन्निभाः । उदाहरणमेतेषां पार्थो गण्यः क्षमावताम् ॥ १६० ॥
जो समुद्रके समान आदि मध्य और अन्तमें गम्भीर रहते हैं. ऐसे सज्जनोंका यदि कोई उदाहरण हो सकता है तो क्षमावानोंमें गिनती करनेके योग्य भगवान् पार्श्वनाथ ही हो सकते हैं ।॥ १६० ॥
If there can be any true exemplar of noble souls who—much like the vast ocean—remain deep, serene, and unshakeable at their beginning, middle, and end, it can only be Lord Parshvanath, who reigns supreme among the most forgiving. || 160 ||
श्लोक ( Shlok ) 161
त्वज्जन्माभिषवोत्सवे सुरगिरौ स्वोच्छ्वासनिःश्वासजैः
स्वर्गेशान्भृशमानयस्त्वमनिलैरान्दोललीलां मुहुः ।
किं कुर्यात्तव तादृशोऽयममरस्त्वत्क्षान्तिलब्धोदयः
पाठीनो जलधेरिवेत्यभिनुतः पार्थो जिनः पातु नः ॥ १६१ ॥
‘भगवन् ! जन्माभिषेकके समय सुमेरुपर्वत पर अपने उच्छास और निःश्वाससे उत्पन्न वायुके द्वारा आपने इन्द्रोंकोभी अच्छी तरह बार-बार झुला झुला दिया था फिर भला यह शम्बर जैसा क्षुद्रदेव आपका क्या कर सकता है ? जिस प्रकार मच्छ समुद्रमें उछल-कूदकर उसे पीड़ित करता है परन्तु स्वयं उसी समुद्रसे जीवित रहता है- उससे अलग होते ही छटपटाने लगता है उसी प्रकार इस क्षुद्रदेवने आपको पीड़ा पहुँचाई है तो भी यह अन्त में आपकी ही शान्तिसे अभ्युदयको प्राप्त हुआ है’ इस प्रकार जिनकी स्तुति की गई वे पार्श्वनाथ स्वामी हम सबकी रक्षा करें ।। १६१ ।।
“O Lord! At the time of Your Janmabhisheka (birth-anointment) atop Mount Sumeru, the mere wind generated from Your gentle inhalations and exhalations vibrated so powerfully that it caused even the mighty Indras to sway back and forth repeatedly. Given such immense power, what harm could a petty deity like Shambara possibly inflict upon You?
Just as a small fish leaps and splashes within the vast ocean, seemingly disturbing it, yet owes its very life to that same ocean—and begins to gasp for breath the moment it is separated from it—in the exact same manner, this trivial deity attempted to inflict pain upon You. Yet, in the end, it was only through Your sublime peace that he attained his spiritual elevation.”
May Lord Parshvanath, who was glorified with these profound hymns of praise, protect us all. || 161 ||
श्लोक 162 से 170
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