अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 364 to 371
श्लोक ( Shlok ) 364 – 365
तृतीये पुष्कराख्यातद्वीपेऽपरसुराचलात् । प्रतीच्यां वीतशोकाख्यं सरिद्विषयमध्यगम् ॥ ३६४ ।। पुरं चक्रध्वजस्तस्य पतिः कनकमालिका । देवी कनकपद्मादिलते जाते तयोः सुते ॥ ३६५ ॥
कि तीसरे पुष्करवर द्वीपमें पश्चिम मेरुपर्वतसे पश्चिमकी ओर सरिद् नामका एक देश है। उसके मध्यमें वीतशोक नामका नगर है। उसके राजाका नाम चक्रध्वज था, चक्रध्वजकी स्त्रीका नाम कनकमालिका था। उन दोनोंके कनकलता और पद्मलता नामकी दो पुत्रियाँ उत्पन्न हुई ।। ३६४-३६५ ।।
“In the third continent, Pushkaravara, to the west of the western Mount Meru, lies a country named Sarid. In the center of that country is a city named Vitashoka. The name of its king was Chakradhvaja, and his wife’s name was Kanakamalika. To the two of them, two daughters were born, named Kanakalata and Padmalata. (364–365)”
श्लोक ( Shlok ) 366 – 368
विद्युन्मत्याश्च तस्यैव देव्याः पद्मावती सुता । याति काले सुखं तेषां कदाचित्काललब्धितः ॥ ३६६ ॥ प्रपीतामितसेनाख्यागणिनीवाग्रसायना । सुते कनकमाला च कल्पेऽजनिषतादिमे ॥ ३६७ ॥ सुराः पद्मावती वीक्ष्य गणिकां कामुकद्वयम् । प्रसाध्यमानां तश्चित्ताऽभूत्तत्र सुरलञ्जिका ॥ ३६८॥
उसी राजाकी एक विद्युन्मति नामकी दूसरी रानी थी उसके पद्मावती नामकी पुत्री थी। इस प्रकार इन सबका समय सुखसे बीत रहा था। किसी दिन काललब्धिके निमित्तसे रानी कनकमाला और उसकी दोनों पुत्रियोंने अमितसेना नामकी गणिनीके वचनरूपी रसायनका पान किया जिससे वे तीनों ही मरकर प्रथम स्वर्गमें देव हुए। इधर पद्मावतीने देखा कि एक वेश्या दो कामियोंको प्रसन्न कर रही है उसे देख पद्मावतीने भी वैसे ही होनेकी इच्छा की। मरकर वह स्वर्ग में अप्सरा हुई ।। ३६६-३६८ ।।
“That same King had another queen named Vidyunmati, who had a daughter named Padmavati. In this manner, time was passing happily for all of them. One day, due to the arrival of the spiritually mature time (Kaal-labdhi), Queen Kanakamala and her two daughters drank the nectar-like words of the chief nun (Ganini) Amitasena; as a result, upon their death, all three of them were reborn as deities in the first heaven.
Meanwhile, Padmavati witnessed a courtesan pleasing two lovers at the same time, and upon seeing this, she desired to become just like her. Consequently, upon her death, she was reborn as a celestial nymph (Apsara) in heaven. (366–368)”
श्लोक ( Shlok ) 369 – 370
कनकमालैत्य त्वमभूर्मणिकुण्डली । सुताद्वयं च तद्रत्नपुरेऽभूतां नृपात्मजौ ॥ ३६९ ॥ स्वश्च्युत्वाऽनन्तमत्याख्या सुरवेश्याप्यजायत । तद्धेतोर्वतते युद्धमद्य तद्राजपुत्रयोः ॥ ३७० ॥
तदनन्तर कनकमालाका जीव, वहाँ से चयकर मणिकुण्डली नामका राजा हुआ है और दोनों पुत्रियोंके जीव रत्नपुर नगर में राजपुत्र हुए हैं। जिस अप्सराका उल्लेख ऊपर आ चुका है वह स्वर्ग से चय कर अनन्तमति हुई है। इसी अनन्तमतिको लेकर आज तुम दोनों राजपुत्रोंका युद्ध हो रहा है ।। ३६९- ३७० ॥
“Thereafter, the soul of Kanakamala, having descended from that heaven, has been reborn as King Manikundali, while the souls of her two daughters have been reborn as princes in the city of Ratnapura. The celestial nymph (Apsara) who was mentioned above has descended from heaven and has been reborn as Anantamati. It is over this very Anantamati that you two princes are preparing to fight a war today. (369–370)”
श्लोक ( Shlok ) 371
इति जैनीमिमां वाणीमाकर्ण्यन्यायकारिणौ । युवामज्ञातधर्माणौ निषेद्धमहमागतः ॥ ३७१ ॥
इस प्रकार जिनेन्द्रदेवकी कही हुई वाणी सुनकर, अन्याय करने वाले और धर्मको न जाननेवाले तुम लोगोंको रोकनेके लिए मैं यहाँ आया हूँ ।। ३७१ ।।
“Having thus heard the words spoken by the Lord Jinendra, I have come here to restrain you all, who are acting unjustly and remain ignorant of the true Dharma. (371)”
श्लोक 372 से 382
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85
धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 |श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |