अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 262 to 271
श्लोक ( Shlok ) 262 – 263
स्वयम्प्रभा च तं दृष्ट्वा वाष्पाविलविलोचना । उत्तिष्ठ पुत्र दृष्टोऽसि मत्पुण्याच्चिरजीवितः ॥ २६२॥इति श्रीविजयं दोर्थ्यामुत्थाप्यास्पृश्य तोषिणी । सुखासीनमथापृच्छत्सुताराहरणादिकम् ॥ २६३ ॥
पुत्रको देखकर स्वयंप्रभाके नेत्र हर्षाश्रुओंसे व्याप्त हो गये। वह कहने लगी कि ‘हे पुत्र ! उठ, मैंने अपने पुण्योदयसे तेरे दर्शन पा लिये, तू चिरंजीव रह’ इस प्रकार कहकर उसने श्रीविजयको अपनी दोनों भुजाओंसे उठा लिया, उसका स्पर्श किया और बहुत भारी संतोषका अनुभव किया । अथानन्तर- जब श्रीविजय सुखसे बैठ गये तब उसने सुताराके हरण आदिका समाचार पूछा ।। २६२-२६३ ॥
Upon seeing her son, Svayamprabha’s eyes filled with tears of joy. She began to say, “O son! Arise. It is by the rise of my good fortune (Punyodaya) that I have been blessed with your sight; may you live a long life.” Saying this, she raised Shrivijaya with both her arms, embraced him, and experienced immense comfort and satisfaction.
Thereafter, once Shrivijaya was comfortably seated, she enquired about the news regarding the abduction of Sutara and the related events. [262-263]
श्लोक ( Shlok ) 264
खगः सम्भिन्ननामाऽयं सेवकोऽमिततेजसः । अनेनोपकृतिर्याऽद्य कृता साऽम्ब त्वयापि न ॥२६४॥
श्री विजयने कहा कि यह संभिन नामक विद्याधर अमिततेजका सेवक है। हे माता ! आज इसने मेरा जो उपकार किया है वह तुझने भी नहीं किया ।। २६४ ॥
Shrivijaya said, “This Vidyadhara named Sambhinna is a servant of Amitateja. O Mother! The favor he has done for me today is something that even you have not done.” [264]
श्लोक ( Shlok ) 265 – 267
ममेति शेषमप्याह ततोऽसावप्यनुद्भवम् । तनूजं पुररक्षायै निर्वर्त्याग्रजान्विता ॥ २६५ ॥ रथनूपुरमुद्दिश्य गता गगनवर्त्मना । स्वदेशचरचारोक्त्या विदितामिततेजसा ॥ २६६ ॥ महाविभूत्या प्रत्येत्य मामिका परितुष्यता । प्रवेशिता सकेतूच्चैः पुरमाबद्धतोरणम् ॥ २६७ ॥
ऐसा कहकर उसने जो-जो बात हुई थी वह सब कह सुनाई। तदनन्तर स्वयंप्रभाने छोटे पुत्रको तो नगरकी रक्षाके लिए वापिस लौटा दिया और बड़े पुत्रको साथ लेकर वह आकाशमार्गसे रथनूपुर नगरको चली। अपने देशमें घूमनेवाले गुप्तचरोंके कहनेसे अमिततेजको इस बातका पता चल गया जिससे उसने बड़े वैभवके साथ उसकी अगवानी की तथा संतुष्ट होकर जिसमें बड़ी ऊँची पताकाएँ फहरा रही हैं और तोरण बाँधे गये हैं ऐसे अफ्ने नगरमें उसका प्रवेश कराया ।। २६५-२६७ ।।
Saying this, he narrated everything exactly as it had occurred. Thereafter, Svayamprabha sent her younger son back to protect the city, and taking her eldest son with her, she departed for the city of Rathanupur through the aerial path.
Amitateja learned of this through the reports of spies roaming his kingdom; consequently, he went out to receive her with great grandeur. Highly pleased, he escorted her into his city, which was adorned with towering banners fluttering in the wind and grand ceremonial arches (Toranas). [265-267]
श्लोक ( Shlok ) 268 – 271
प्राघूर्णकविधि विश्वं विधाय विधिवत्तयोः । तदागमनकार्थ च ज्ञात्वा विद्याधराधिपः ॥ २६८ ॥ दूर्त मरीचिनामानमिन्द्राशनिसुतं प्रति । प्रहित्य तन्मुखात्तस्य विदित्वा दुस्सहं वचः ॥ २६९ ॥ आलोच्य मन्त्रिभिः सार्द्धमुच्छेत्तुं तं मदोद्धतम् । मैथुनाय महेच्छाय निजायात्र समागतम् ॥ २७० ॥ युद्धवीर्य प्रहरणावरणं वधमोचनम् । इति विद्यात्रयं शत्रुध्वंसार्थमदितादरात् ॥ २७१ ॥
उस विद्याधरोंके स्वामी अमिततेजने उनका पाहुनेके समान सम्पूर्ण स्वागत-सत्कार किया और उनके आनेका कारण जानकर इन्द्राशनिके पुत्र अशनिघोषके पास मरीचि नाम-का दूत भेजा । उसने दूतसे असह्य वचन कहे। दूतने वापिस आकर वे सब वचन अमिततेजसे कहे।-उन्हें सुनकर अमिततेजने मन्त्रियोंके साथ सलाह कर मदसे उद्धत हुए उस अशनिघोषको नष्ट करने-का दृढ़ निश्चय कर लिया। उच्च अभिप्राय वाले अपने बहनोईको उसने शत्रुओंका विध्वंस करनेके लिए वंशपरम्परागत युद्धवीर्य, प्रहरणावरण और बन्धमोचन नामकी तीन विद्याएँ बड़े आदरसे दीं ।। २६८-२७१ ॥
Amitateja, the lord of those Vidyadharas, extended every form of hospitality and respect to them, treating them as honored guests. Upon learning the reason for their arrival, he dispatched a messenger named Marichi to Ashanighosha, the son of Indrashani.
Ashanighosha spoke unbearable words to the messenger. Returning from his mission, the messenger repeated all those words to Amitateja. Hearing them, Amitateja consulted with his ministers and made a firm resolve to destroy Ashanighosha, who had become arrogant with pride.
With noble intentions, he respectfully bestowed three ancestral sciences (Vidyas) upon his brother-in-law to annihilate the enemies: Yuddhavirya (valour in war), Praharanavarana (shielding against weapons), and Bandhamochana (liberation from captivity). [268-271]
श्लोक 272 से 283
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धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 |श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261
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