Summary of Uttar Puran Parv 55 by Acharya Gunabhadra
संक्षिप्त सारांश:
आचार्य गुणभद्राचार्य रचित ‘उत्तरपुराण’ के 55वें पर्व में नौवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदन्त (सुविधिनाथ) के जीवन चरित्र और उनके पूर्व भवों का वर्णन है। संपूर्ण पर्व का सारांश निम्नलिखित शीर्षकों के माध्यम से स्पष्ट किया गया है:
1. राजा महापद्म और वैराग्य (पूर्व भव)
भगवान सुविधिनाथ का जीव अपने पूर्व भव में पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी का प्रतापी राजा महापद्म था। वह प्रजावत्सल और नीतिवान शासक था, जिसके राज्य में प्रजा अत्यंत सुखी थी। एक दिन ‘भूतहित’ जिनराज के दर्शन और उनके उपदेश से राजा को आत्मज्ञान हुआ। संसार को दुखों का कारण मानकर उन्होंने अपने पुत्र धनद को राज्य सौंपा और दीक्षा धारण कर ली। सोलहकारण भावनाओं के चिंतन से उन्होंने तीर्थंकर नामकर्म का बंध किया और प्राणत स्वर्ग में इन्द्र हुए।
2. भगवान पुष्पदन्त का अवतरण और नामकरण
स्वर्ग से च्युत होकर भगवान का जीव काकन्दी नगरी के राजा सुग्रीव और रानी जयरामा के यहाँ अवतरित हुआ। मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा को भगवान का जन्म हुआ। इन्द्रों ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक किया। उनकी देह की कान्ति कुन्द पुष्प के समान श्वेत थी और उनके दाँत अत्यंत सुंदर (पुष्प के समान) थे, इसलिए इन्द्र ने उनका नाम ‘पुष्पदन्त’ और श्रेष्ठ विधि के प्रदाता होने के कारण ‘सुविधिनाथ’ रखा।
3. राज्य भोग और नश्वरता का बोध
भगवान का शरीर 100 धनुष ऊँचा और आयु 2 लाख पूर्व थी। उन्होंने लंबे समय तक राज्य सुखों का उपभोग किया। एक दिन आकाश में उल्कापात (टूटते तारे) को देखकर उन्हें संसार की क्षणभंगुरता का बोध हुआ। उन्होंने विचार किया कि यह शरीर और संसार इन्द्रजाल के समान मायावी हैं, केवल आत्मा ही शाश्वत सत्य है। इस बोध के साथ ही उन्होंने विरक्त होकर राज्य त्यागने का निर्णय लिया।
4. दीक्षा और केवलज्ञान की प्राप्ति
लौकान्तिक देवों की प्रार्थना पर भगवान ने पुत्र सुमति का राज्याभिषेक किया और 1,000 राजाओं के साथ निर्ग्रन्थ दीक्षा अंगीकार की। चार वर्ष की कठोर तपस्या और मौन साधना के बाद, कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। इन्द्रों ने उनके लिए दिव्य समवशरण की रचना की, जहाँ से उन्होंने भव्य जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश दिया।
5. संघ व्यवस्था और निर्वाण गमन
भगवान सुविधिनाथ के संघ में विदर्भ आदि 88 गणधर और 2 लाख मुनिराज थे। उन्होंने आर्य देशों में विहार कर धर्म की प्रभावना की। अंत में, वे सम्मेद शिखर पर्वत पर पहुँचे और 1,000 मुनियों के साथ योग निरोध किया। भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के दिन भगवान ने समस्त कर्मों का क्षय कर निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया।
यह पर्व संदेश देता है कि चक्रवर्ती जैसा वैभव और स्वर्ग के सुख भी आत्मा को पूर्ण तृप्ति नहीं दे सकते। वास्तविक सुख की प्राप्ति केवल वैराग्य, आत्म-चिंतन और तप के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने में ही निहित है।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 55
श्लोक 1 से 11 राजा महापद्म का वैभव और न्यायप्रिय शासन – – राजा महापद्म की राज्य-विभूति और गुण वर्णन
पुराण का प्रारंभ भगवान सुविधिनाथ (पुष्पदन्त) की स्तुति से होता है। पूर्वविदेह के पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी में राजा महापद्म राज्य करते थे। वे एक कुशल गोपालक के समान अपनी प्रजा का पालन करते थे और पृथ्वी उन्हें रत्नों के रूप में उपहार देती थी। उनके राज्य में कोई दण्ड का पात्र नहीं था क्योंकि समस्त प्रजा गुणवान थी। राजा महापद्म नीतिवान, पराक्रमी और अपार पुण्य के धारी थे, वे अपनी प्रजा का पालन एक ग्वाले की भाँति स्नेहपूर्वक करते थे, जिन्होंने चिरकाल तक सुखपूर्वक राज्य का उपभोग किया और उन्होंने अपनी राज्य-लक्ष्मी का उपयोग सदैव परोपकार और सज्जनों के हित में किया।
श्लोक 12 से 22 वैराग्य, तप और स्वर्ग गमन – आत्मबोध, प्रव्रज्या और स्वर्ग में इन्द्र पद की प्राप्ति
एक दिन वनपाल से भूतहित जिनराज के आगमन का समाचार सुनकर राजा महापद्म उनके दर्शन हेतु गए। भगवान का उपदेश सुनकर उन्हें आत्मज्ञान हुआ और वे संसार की असारता पर विचार करने लगे। मोह का त्याग कर उन्होंने अपने पुत्र धनद को राज्य सौंपा और दीक्षा धारण कर ली। कठोर तप और सोलहकारण भावनाओं के बल पर उन्होंने ‘तीर्थंकर नामकर्म’ का बंध किया। देह त्याग कर वे प्राणत स्वर्ग (दसवें स्वर्ग) में इन्द्र हुए, जहाँ उन्होंने बीस सागर की आयु तक दिव्य सुख भोगे।
श्लोक 23 से 31 भगवान पुष्पदन्त का काकन्दी नगरी में अवतरण और वैभव
स्वर्ग से च्युत होकर भगवान का जीव भरतक्षेत्र की काकन्दी नगरी के राजा सुग्रीव और रानी जयरामा के यहाँ अवतरित हुआ। रानी ने फाल्गुन कृष्ण नवमी को सोलह मंगलकारी स्वप्न देखे। मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा के दिन भगवान का जन्म हुआ। इन्द्रों ने सुमेरु पर्वत पर उनका अभिषेक किया और उनकी कुन्द के पुष्प जैसी धवल कान्ति के कारण उनका नाम ‘पुष्पदन्त’ (या सुविधिनाथ) रखा। उनकी आयु दो लाख पूर्व और शरीर की ऊँचाई सौ धनुष थी।
श्लोक 32 से 42 राज्य भोग और उल्कापात से वैराग्य
भगवान सुविधिनाथ ने पचास हजार पूर्व और अट्ठाईस पूर्वांग तक राज्य सुख का उपभोग किया। एक दिन आकाश में उल्कापात (तारा टूटना) देखकर उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ। उन्होंने विचार किया कि यह उल्का नहीं, अपितु उनके मोह रूपी अंधकार को नष्ट करने वाली दीपक की लौ है। उन्होंने आत्म-चिंतन किया कि यह आत्मा शरीर से पृथक है और संसार इन्द्रजाल के समान असत्य है। मोह के कारण ही जीव नश्वर पदार्थों को अपना समझकर दुःख भोगता है।
श्लोक 43 से 51 दीक्षा कल्याणक और केवलज्ञान प्राप्ति
वैराग्य होने पर लौकान्तिक देवों ने उनकी स्तुति की। भगवान ने पुत्र सुमति को राज्य भार सौंपकर ‘सूर्यप्रभा’ पालकी में सवार होकर पुष्पक वन में दीक्षा ली। दीक्षा के साथ ही उन्हें मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त हुआ। चार वर्ष की छद्मस्थ अवस्था के बाद, नागवृक्ष के नीचे ध्यान लगाते हुए उन्होंने घातिया कर्मों का नाश किया और केवलज्ञान (अनन्तचतुष्टय) प्राप्त किया। इन्द्रों ने उनके लिए समवशरण की रचना की, जहाँ से उन्होंने दिव्यध्वनि के माध्यम से तत्व का उपदेश दिया।
श्लोक 52 से 62 संघ विस्तार, निर्वाण और उपसंहार
भगवान के संघ में विदर्भ आदि 88 गणधर और दो लाख मुनि थे। उनके संघ में आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ लाखों की संख्या में थे। भगवान ने आर्य देशों में विहार कर धर्म की प्रभावना की और अंततः सम्मेद शिखर पर्वत पर पहुँचे। वहाँ एक हजार मुनियों के साथ योग निरोध कर भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। कवि अंत में प्रार्थना करते हैं कि महापद्म से सुविधिनाथ तक की यात्रा करने वाले भगवान पुष्पदन्त हमें अक्षय लक्ष्मी और मोक्षमार्ग प्रदान करें।
पर्व 56
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