शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 142 to 153
श्लोक ( Shlok ) 142 – 143
ततो। वज्रायुधश्च्युत्वा द्वीपेऽस्मिन् प्राग्विदेहगे । विषये पुष्कलावत्यां नगरी पुण्डरीकिणी ॥१४२॥पतिर्धनरथस्तस्य देवी कान्ता मनोहरा । तयोर्मेघरथाख्योऽभूदाधानाद्याप्तसत्क्रियः ॥ १४३॥
इसी जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें पुष्कलावती नामका देश है। उसकी पुण्डरीकिणी नामकी नगरीमें राजा घनरथ राज्य करते थे। उनकी मनोहरा नामकी सुन्दर रानी थी। वज्रायुधका जीव ग्रेवेयकसे च्युत होकर उन्हीं दोनोंके मेघरथ नामका पुत्र हुआ। उसके जन्मके पहले गर्भाधान आदि क्रियाएं हुई थीं ।। १४२-१४३ ॥
In the Purva-Videha region of this very continent of Jambudvipa, there is a land named Pushkalavati. In its city called Pundarikini, King Ghanaratha ruled. He had a beautiful queen named Manohara. Falling from the Graiveyaka heaven, the soul of Vajrayudha was reborn to them as their son, named Megharatha. Prior to his birth, all the sacred rituals, including the conception ceremony (Garbhadhana), were duly performed. || 142-143 ||
श्लोक ( Shlok ) 144
तस्यैवान्योऽहमिन्द्रोऽपि सुतो दृढरथाह्नयः । जातो मनोरमायां ताविव चन्द्रदिवाकरौ ॥ १४४॥
उन्हीं राजा घनरथकी दूसरी रानी मनोरमा थी। दूसरा अहमिन्द्र (सहस्रायुध का जीव) उसीके गर्भसे दृढरथ नामका पुत्र हुआ। ये दोनों ही पुत्र चन्द्र और सूर्य के समान जान पड़ते थे ।। १४४ ॥
King Ghanaratha had another queen named Manorama. The second Ahamindra (the soul of Sahastrayudha) was born from her womb as a son named Dridharatha. Both of these sons appeared as radiant and glorious as the moon and the sun. || 144 ||
श्लोक ( Shlok ) 145
तयोः पराक्रमप्रज्ञाप्रश्रयप्राभवक्षमाः । सत्यत्यागादयोऽन्ये च प्रादुरासन् गुणाः स्थिराः ॥१४५॥
उन दोनोंमें पराक्रम, बुद्धि, विनय, प्रभाव, क्षमा, सत्य, त्याग आदि अनेक स्थायी गुण प्रकट हुए थे ।। १४५ ।।
In both of them, numerous enduring virtues such as valor, wisdom, humility, influence, forgiveness, truthfulness, and selflessness were prominently manifested. || 145 ||
श्लोक ( Shlok ) 146
सुतौ तौ यौवनापूणौं प्राप्तैश्वर्याविव द्विपौ । विलोक्य तद्विवाहार्थं महीशो विहितस्मृतिः ॥१४६॥
दोनों ही पुत्र पूर्ण युवा हो गये और ऐश्वर्य प्राप्त गजराजके समान सुशोभित होने लगे। उन्हें देख राजाका ध्यान उनके विवाहकी ओर गया ॥ १४६ ॥
Both sons reached full youth and began to shine resplendently, looking like majestic elephants in their prime glory. Seeing them, the king’s attention turned toward their marriage. || 146 ||
श्लोक ( Shlok ) 147
ज्येष्ठसूनोविंवाहेन प्रियमिश्रामनोरमे । कनीयसोऽपि सुमतिं विदधे चित्तवल्लभाम् ॥१४७॥
उन्होंने बड़े पुत्रका विवाह प्रियमित्रा और मनोरमाके साथ किया था तथा सुमतिको छोटे पुत्रकी हृदय-बल्लभा बनाया था ।। १४७ ।।
He arranged the marriage of his elder son with Priyamitra and Manorama, and made Sumati the beloved of his younger son’s heart. || 147 ||
श्लोक ( Shlok ) 148
अभवत्प्रियमित्रायां तनूजो नन्दिवर्द्धनः । सुमत्यां वरसेनाख्यः सुतो दृढरथस्य च ॥१४८॥
कुमार मेघरथकी प्रियमित्रा स्त्रीसे नन्दिवर्धन नामका पुत्र हुआ और दृढरथकी सुमति नामकी स्त्रीसे बरसेन नामका पुत्र हुआ ॥ १४८ ॥
From Prince Megharatha’s wife, Priyamitra, a son named Nandivardhana was born; and from Dridharatha’s wife, Sumati, a son named Varasena was born. || 148 ||
श्लोक ( Shlok ) 149
इति स्वपुत्रपौत्रादिसुखसाधनसंयुतः । सिंहविष्टरमध्यास्य शक्रलीलां समावहन् ॥१४९॥
इस प्रकार पुत्र पौत्र आदि सुखके समस्त साधनोंसे युक्त राजा घनरथ सिंहासन पर बैठकर इन्द्रकी लीला धारण करता था ॥ १४९ ॥
In this manner, blessed with sons, grandsons, and all possible means of happiness, King Ghanaratha sat upon his throne, displaying the grand splendor and sport of Indra himself. || 149 ||
श्लोक ( Shlok ) 150 – 153
तदात्र प्रियमित्रायाः सुषेणा नाम चेटिका । कृकवाकुं समानीय ‘घनतुण्डाभिधानकम् ॥१५०॥दर्शयित्वाऽऽह यद्येनं जयेयुः कृकवाकुकाः । परेषां प्रददे तेभ्यो दीनाराणां सहस्त्रकम् ॥१५१॥ इति देव्या कनीयस्याः श्रत्वा तद्गणिकाऽऽनयत् । काञ्चना वज्रतुण्डाख्यं कुक्कुटं योधने तयोः ॥१५२॥अन्योन्यदुःखहेतुत्वादेतयोः पश्यतामपि । हिंसानन्दादिकं द्रष्टुमयोग्यं धर्मवेदिनाम् ॥१५३॥
उसी समय प्रियमित्राकी सुषेणा नामकी दासी घनतुण्ड नामका मुर्गा लाकर दिखलाती हुई बोली कि यदि दूसरोंके मुर्गे इसे जीत लें तो मैं एक हजार दीनार दूँगी। यह सुनकर छोटी स्त्रीकी काञ्चना नामकी दासी एक वज्रतुण्ड नामका मुर्गा ले आई। दोनोंका युद्ध होने लगा, वह युद्धदोनों मुर्गोंके लिए दुःखका कारण था तथा देखने वालोंके लिए भी हिंसानन्द आदि रौद्रध्यान करने वाला था अतः धर्मात्माओंके देखने योग्य नहीं है ।। १५०-१५३ ।।
At that time, Priyamitra’s maidservant, named Sushena, brought a rooster named Ghantunda to display and said, “If anyone else’s rooster can defeat this one, I will give one thousand Dinars (gold coins).” Hearing this, the junior queen’s maidservant, named Kanchana, brought a rooster named Vajratunda. A battle began between the two, which was a source of pain for both roosters, and for the onlookers, it incited Raudra-dhyana (wrathful/cruel meditation) such as Hinsananda (delight in violence); therefore, it is not fit to be watched by righteous and pious souls. || 150-153 ||
श्लोक 154 से 161
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
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अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
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