अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 463 to 472
श्लोक ( Shlok ) 463 – 464
दृष्टवन्तौ खगाधीशं यथौचित्यं प्रतुष्य सः । सम्भाष्य सामवाकुसारः पूजयित्वा दिने परे ॥४६३॥अङ्गहारेः सकरणैः रसैर्भावैर्मनोहरैः । नृत्यं तयोर्विलोक्याप्तसम्मदः परितोपितः ॥ ४६४ ॥
वहाँ उन्होंने विद्याधरोंके राजा दमितारिके यथायोग्य दर्शन किये। राजा दमितारिने संतुष्ट होकर उनके साथ शान्तिपूर्ण शब्दोंमें संभाषण किया, उनका आदर-सत्कार किया, दूसरे दिन मनको हरण करनेवाले अङ्गहार, करण, रस और भावोंसे परिपूर्ण उनका नृत्य देखकर बहुत ही हर्ष तथा संतोष-का अनुभव किया ।। ४६३-४६४ ॥
“There, they properly beheld the Vidyādhara King Damitarī. Being highly pleased, King Damitarī conversed with them using peaceful, gentle words and treated them with great honor and hospitality. The next day, after witnessing their dance—which was utterly captivating and completely filled with elegant body movements (aṅgahāra), expressive gestures (karaṇa), emotional essences (rasa), and deep expressions (bhāva)—he experienced immense joy and satisfaction.”463 – 464
श्लोक ( Shlok ) 465
भवन्नृत्यकलां अकल्यां वासु शिक्षयतां सुताम् । मदीयामित्यदात्कन्यामेताभ्यां कनकश्रियम् ॥४६५॥
एक दिन उसने उन दोनोंसे कहा कि ‘हे सुन्दरियो ! आप अपनी सुन्दर नृत्यकला हमारी पुत्रीको सिखला दीजिये’ यह कहकर उसने अपनी कनकश्री नामकी पुत्री उन दोनोंके लिए सौंप दी ।। ४६५ ।।
“One day, he said to both of them, ‘O beautiful maidens! Please teach your exquisite art of dance to my daughter.’ Saying this, he entrusted his daughter, named Kanakaśrī, to their care.” 465
श्लोक ( Shlok ) 466
“आदाय तां यथायोग्यं नर्तयन्तौ नृपात्मजाम् । पेठतुर्गुणसंदृब्धमिति ते भाविचक्रिणः ॥४६६॥
वे दोनों उस राजपुत्रीको लेकर यथायोग्य नृत्य कराने लगे । एक दिन उन्होंने भावी चक्रवर्ती के गुणोंसे गुम्फित निम्न प्रकारका गीत गाया ॥ ४६६ ।।
“Taking charge of the princess, they both began instructing her in dance in the most proper manner. One day, they sang the following song, beautifully woven with the virtues of the future Cakravartī (Universal Emperor).”466
श्लोक ( Shlok ) 467
गुणैः कुलबलादिभिर्भुवि विजित्य विश्वान् मृपान्-मनोजमवि लज्जयन् भववरो विदग्धवनिताविलासललितावलोकालयः वपुःसम्पदा । क्षितेः पतिरनन्तवीर्य इति विश्रुतः पातु वः ॥ ४६७ ॥
‘जिसने अपने कुल बल आदि गुणोंके द्वारा पृथिवी पर समस्त राजाओंको जीत लिया है, जो अपनी शरीर-की सम्पत्तिसे कामदेवको भी लज्जित करता है, संसारमें अत्यन्त श्रेष्ठ है, और जो सुन्दर स्त्रियोंके विलास तथा मनोहर चितवनोंका घर है, ऐसा अनन्तवीर्य इस नामसे प्रसिद्ध पृथिवीका स्वामी तुम सबकी रक्षा करें’ ।। ४६७ ॥
“‘May the world-renowned lord of the earth named Anantavīrya protect you all—he who has conquered all the kings upon this earth through the virtues of his lineage and military might; he who puts even Kāmadeva (the god of love) to shame with the sheer splendor of his physical form; he who is supremely eminent in the universe, and who is the very abode of beautiful women’s playful charms and captivating glances.’”467
श्लोक ( Shlok ) 468
तदा तब्छूतिमात्रेण मदनाविष्टविग्रहा । स्तूयते यः स को ब्रूतमित्यप्राक्षीन्नृपात्मजा ॥ ४६८ ॥
उस गीतके सुनते ही जिसके शरीरमें कामदेवने प्रवेश किया है ऐसी राजपुत्रीने उन दोनोंसे पूछा कि ‘जिसकी स्तुति की जा रही है वह कौन है?’ यह कहिये ।। ४६८ ॥
“The moment she heard that song, Love (Kāmadeva) entered the body of the princess. Thus smitten, she asked both of them, ‘Please tell me, who is this person whose praises are being sung?'”468
श्लोक ( Shlok ) 469 – 470
प्रभाकरीपुराधीशोऽजनिस्तिमितसागरात् । महामणिरिव क्ष्माभृन्मौलिचूडामणीयितः ॥ ४६९ ॥कान्ताकल्पलतारो हरम्यकल्पमहीरुहः । कामिनीभ्रमरीभोग्यमुखाम्भोजविराजितः ॥ ४७० ॥
उत्तरमें उन्होंने कहा कि ‘वह प्रभाकरीपुरीका अधिपति है, राजा स्तिमितसागरसे उत्पन्न हुआ है, महामणिके समान राजाओंके मस्तक पर स्थित चूड़ामणिके समान जान पड़ता है, स्त्रीरूपी कल्प-लताके चढ़नेके लिए मानो कल्पवृक्ष ही है, और स्त्रीरूपी भ्रमरीके उपभोग करनेके योग्य मुखकमलसे सुशोभित है’ ।।४६९-४७०।।
“In reply, they said, ‘He is the sovereign of the city of Prabhākarīpurī, born to King Stimitasāgara. He appears like a crest-jewel (cūḍāmaṇi) resting upon the heads of other kings, just as a magnificent gem sits atop a crown. For the wish-fulfilling creeper-plant (kalpa-latā) of women to climb upon, he acts as the wish-fulfilling tree (kalpavṛkṣa) itself; and he is adorned with a lotus-like face (mukha-kamala) perfectly suited to be savored by women, who are like foraging female bees (bhramarī).'”469 – 470
श्लोक ( Shlok ) 471 – 472
इति ‘तद्द्वयतद्रूपलावण्याद्यनुवर्णनात् । द्विगुणीभूतसम्प्रीतिरित्युवाच खगात्मजा ॥ ४७१ llकिमसौ लभ्यते द्रष्टुं कन्यके सुष्ठु लभ्यते । त्वयेत्यनन्तवीर्यस्य रूपं साक्षात्प्रदर्शितम् ॥ ४७२ ॥
इस प्रकार उन दोनोंके द्वारा अत्यन्तवीर्य के रूप तथा लावण्य आदिका वर्णन सुनकर जिसकी प्रीति दूनी हो गई है ऐसी विद्याधरकी पुत्री कनकश्री बोली ‘क्या वह देखनेको मिल सकता है?’। उत्तरमें उन्होंने कहा कि ‘हे कन्ये ! तुझे अच्छी तरह मिल सकता है’। ऐसा कहकर उन्होंने अनन्तवीर्यका साक्षात् रूप दिखा दिया ॥ ४७१-४७२ ॥
“Hearing the description of Anantavīrya’s extraordinary form, grace, and beauty in this manner, the affection of the Vidyādhara princess Kanakaśrī multiplied twofold. She eagerly asked, ‘Can he be seen? Will I ever get to meet him?’ In reply, they said, ‘O maiden! You can certainly meet him perfectly.’ Saying this, they revealed the physical, living presence of Anantavīrya right before her eyes.”471 – 472
श्लोक 473 से 481
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85
धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 |श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462
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