अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
कश्चिच्छ्रीविजयाधीशं साशीर्वादः कदाचन । उपेत्य राजंश्चित्तं त्वं प्रणिधेहि ममोदिते ॥ १७२ ॥
किसी दिन कोई एक पुरुष श्रीविजय राजाके पास आया और आशीर्वाद देता हुआ बोला कि हे राजन् ! मेरी बात पर चित्त लगाइये ॥ १७२ ।।
“One day, a certain man came to King Shrivijaya and, while offering his blessings, said, ‘O King! Please lend your mind (attention) to my words.'”172
श्लोक ( Shlok ) 173
पोदनाधिपतेर्मूनि पतितेऽतोऽद्धि सप्तमे । महाशनिस्ततश्चिन्त्यः प्रतीकारोऽस्य सत्वरम् ॥१७३ ॥
आज से सातवें दिन पोदनपुरके राजाके मस्तक पर महावज्र गिरेगा, अतः शीघ्र ही इसके प्रतीकारका विचार कीजिये ।। १७३ ।।
“On the seventh day from today, a great thunderbolt will fall upon the head of the King of Podanpura; therefore, quickly consider a remedy (or countermeasure) for this.”173
श्लोक ( Shlok ) 174
इत्यब्रवीत्तदाकर्ण्य युवराजोऽरुणेक्षणः । वद किं पतिता सर्वविदस्ते मस्तके तदा ॥ १७४ ॥
यह सुनकर युवराज कुपित हुआ, उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गईं। वह उस निमित्तज्ञानीसे बोला कि यदि तू सर्वज्ञ है तो बता कि उस समय तेरे मस्तक पर क्या पड़ेगा ? ॥ १७४ ॥
“Hearing this, the crown prince became furious, his eyes turning red with anger. He spoke to that astrologer (seer), ‘If you are all-knowing, then tell me, what will fall upon your own head at that time?'” 174
श्लोक ( Shlok ) 175
इति नैमित्तिकं दृष्ट्वा प्राक्षीत्सोऽप्याह मूत्रि मे । रत्नवृष्टिः पतेत्साकमभिषेकेण हीत्यदः ॥ १७५ ॥
निमित्तज्ञानीने भी कहा कि उस समय मेरे मस्तक पर अभिषेकके साथ रत्नवृष्टि पड़ेगी ॥ १७५ ॥
“The astrologer (seer) replied, ‘At that time, a shower of gems along with a royal anointment (coronation) will fall upon my head.'”175
श्लोक ( Shlok ) 176
सावष्टम्भं वचः श्रुत्वा तस्य राजा सविस्मयः । भद्र त्वयाऽऽस्यतामस्मिन्नासने किञ्चिदुच्यते ॥ १७६ ॥
उसके अभिमानपूर्ण वचन सुनकर राजाको आश्चर्य हुआ। उसने कहा कि हे भद्र ! तुम इस आसन पर बैठो, मैं कुछ कहता हूँ ॥ १७६ ॥
“Hearing his prideful words, the king was astonished. He said, ‘O gentle sir! Please sit upon this seat, I have something to say.'”176
श्लोक ( Shlok ) 177
किंगोत्रः किंगुरुर्ब्रीहि किंशास्त्रः किंनिमित्तकः । किंनाम किंनिमित्तोऽयमादेश इति पृष्टवान् ॥ १७७ ॥
कहो तो सही, आप-का गोत्र क्या है ? गुरु कौन है, क्या-क्या शास्त्र आपने पढ़े हैं, क्या-क्या निमित्त आप जानते हैं, आपका क्या नाम है ? और आपका यह आदेश किस कारण हो रहा है? यह सब राजाने पूछा ।। १७७ ॥
“The king asked, ‘Do tell, what is your lineage (gotra)? Who is your guru, which scriptures have you studied, and which omens do you know? What is your name? And what is the reason behind this prediction of yours?'”177
श्लोक ( Shlok ) 178
कुण्डलाख्यपुरे राजा नाम्ना सिंहरथो महान् । पुरोहितः सुरगुरुस्तस्य शिष्यो विशारदः ॥ १७८ ॥
निमित्तज्ञानी कहने लगा कि कुण्डलपुर नगरमें सिंहरथ नामका एक बड़ा राजा है। उसके पुरोहितका नाम सुरगुरु है और उसका एक शिष्य बहुत ही विद्वान् है ॥ १७८ ॥
“The astrologer (seer) began to say, ‘In the city of Kundalpur, there is a great king named Simharatha. The name of his priest is Suraguru, and he has a disciple who is highly learned.'” 178
श्लोक ( Shlok ) 179
तच्छिष्येण निमित्तानि प्रव्रज्य हलिना सह । मयाऽष्टाङ्गान्यधीतानि सोपदेशश्रुतानि च ॥ १७९ ॥
किसी एक दिन बलभद्र के साथ दीक्षा लेकर मैंने उसके शिष्यके साथ अष्टाङ्ग निमित्तज्ञानका अध्ययन किया है और उपदेशके साथ उनका श्रवण भी किया है ॥ १७९ ॥
“One day, having taken initiation (diksha) alongside Balabhadra, I studied the eight-fold science of omens (Ashtanga Nimittagyana) with his disciple and also listened to his discourses with deep concentration.”179
श्लोक ( Shlok ) 180
अष्टाङ्गानि निमित्तानि कानि किंलक्षणानि चेत् । शृणु श्रीविजयायुष्मन् यथाप्रश्नं ब्रवीमि ते ॥१८०॥
अष्टाङ्ग निमित्त कौन हैं और उनके लक्षण क्या हैं ? यदि यह आप जानना चाहते हैं तो हे आयुष्मन् विजय ! तुम सुनो, मैं तुम्हारे प्रश्नके अनुसार सब कहता हूँ ।। १८० ।।
“What are the eight types of omens (Ashtanga Nimitta) and what are their characteristics? If you wish to know this, O long-lived (Ayushman) Vijaya, then listen! I shall explain everything in accordance with your question.”180
श्लोक ( Shlok ) 181
अन्तरिक्षस भौमाङ्गस्वरव्यञ्जनलक्षणः । छिन्नस्वप्नविभेदेन प्रोक्तान्यागमवेदिभिः ॥ १८१ ॥
आगमके जानकार आचार्योंने अन्तरिक्ष, भौम, अङ्ग, स्वर, व्यञ्जन, लक्षण, छिन्न और स्वप्न इनके भेदसे आठ तरहके निमित्त कहे हैं ।॥ १८१ ॥
“The spiritual masters (Acharyas) who are well-versed in the scriptures have stated that there are eight types of omens, classified as: celestial (antariksha), terrestrial (bhauma), bodily movements (anga), sounds (svara), bodily marks (vyanjana), physical characteristics (lakshana), severed signs (chinna), and dreams (svapna).” 181
श्लोक 182 से 191
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