पुष्पदन्त पुराण का वर्णन पर्व 55 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51
English translation of Uttar Puran parv 55- shlok 52 to 62
श्लोक ( Shlok ) 52 – 59
विदर्भनाममुख्याष्टाशीतिसप्तद्धिसंयुतः । शून्यद्वयेन्द्रियैकोक्तश्रतकेवलिनायकः ॥ ५२ ॥खद्वयेन्द्रियपञ्चेन्द्रियैकशिक्षकरक्षकः । शून्यद्वयाब्धिकर्मोक्त त्रिज्ञानधरसेवितः ॥ ५३ ॥ शुन्यत्रयमुनिप्रोक्तकेवलज्ञानलोचनः । खत्रयञ्येकनिर्णीत विक्रियद्धिविवेष्टितः ॥ ५४ ॥ शून्यद्वयेन्द्रियद्धर्युक्तमनः पर्ययबोधनः । शून्यद्वयतु॑षट्प्रोक्तवादिवन्याङ्घ्रिमङ्गलः ॥ ५५ ॥पिण्डितर्षिद्विलक्षेशः खचतुष्काष्टवह्निमान् । घोषार्याद्यायिकोपेतो द्विलक्षश्रावकान्वितः ॥ ५६ ॥ श्राविकापञ्श्ञ्चलक्षार्थ्यः सङ्ख्यातीतमरुङ्गणः । तिर्यक्सङ्ख्यातसम्पन्नो गणैरित्येभिरर्चितः ॥ ५७ ॥ विहृत्य विषयान् प्राप्य सम्मेदं रुद्धयोगकः । मासे भाद्रपदेऽष्टम्यां शुक्ले मूले पराहके ॥ ५८ ॥ सहस्त्रमुनिभिः सार्द्ध मुक्तिं सुविधिराप्तवान् । निलिम्पाः परिनिर्वाणकल्याणान्ते दिवं ययुः ॥ ५९ ॥
वे सात ऋद्धियोंको धारण करनेवाले विदर्भ आदि अट्ठासी गणधरोंसे सहित थे, पन्द्रह सौ श्रुतकेवलियोंके स्वामी थे; एक लाख पचपन हजार पाँच सौ शिक्षकोंके रक्षक थे, आठ हजार चार सौ अवधि-ज्ञानियोंसे सेवित थे, सात हजार केवलज्ञानियों और तेरह हजार विक्रिया ऋद्धिके धारकोंसे वेष्टित थे, सात हजार पाँच सौ मनःपर्ययज्ञानियों और छह हजार छह सौ वादियोंके द्वारा उनके मङ्गलमय चरणोंकी पूजा होती थी, इस प्रकार वे सब मिलाकर दो लाख मुनियोंके स्वामी थे, घोषार्याको आदि लेकर तीन लाखअस्सी हजार आर्यिकाओंसे सहित थे, दो लाख श्रावकोंसे युक्त थे, पाँच लाख श्राविकाओंसे पूजित थे, असंख्यात देवों और संख्यात तिर्यश्चोंसे सम्पन्न थे। इस तरह बारह सभाओंसे पूजित भगवान् पुष्पदन्त आर्य देशोंमें बिहार कर सम्मेदशिखर पर पहुँचे और योग निरोध कर भाद्रशुक्त अष्टमीके दिन मूल नक्षत्रमें सायंकालके समय एक हजार मुनियोंके साथ मोक्षको प्राप्त हो गये । देव आये और उनका निर्वाण-कल्याणक कर स्वर्ग चले गये ।। ५२-५९ ॥
“He was accompanied by eighty-eight Gandharas (chief disciples), led by Vidarbha, who possessed the seven supernatural powers (Riddhis). He was the master of 1,500 Shrutakevalis (those with complete scriptural knowledge) and the protector of 155,500 teachers (Shikshakas). He was served by 8,400 possessors of Avadhi-jnana (clairvoyance) and surrounded by 7,000 Kevalis (omniscient beings) and 13,000 possessors of Vikriya-riddhi (power of transformation).
His auspicious feet were worshipped by 7,500 possessors of Manah-paryaya-jnana and 6,600 Vadi-munis (master debaters). In total, He was the lord of 200,000 monks. He was accompanied by 380,000 nuns (Aryikas), led by Ghosha, joined by 200,000 laymen (Shravakas), and worshipped by 500,000 laywomen (Shravikas). He was attended by innumerable celestial beings and a finite number of animals (Tiryanchas).
In this manner, worshipped by the twelve assemblies, Lord Pushpadanta (Suvidhinatha) wandered through the Aryan lands and reached Sammeta Shikhar. There, after performing Yoga-nirodha (cessation of all activities), on the evening of the eighth day (Ashtami) of the bright fortnight of the month of Bhadrapada, under the Mula constellation, He attained Moksha (liberation) along with one thousand monks. The gods arrived, celebrated His Nirvana-Kalyanaka, and returned to heaven.”52 – 59
श्लोक ( Shlok ) 60
दुर्ग मार्ग परेषां सुगममभिगमात्स्वस्य शुद्धं व्यधायः प्राप्तुं स्वर्गापवर्गों सुविधिमुपशमं चेतसा बिभ्रतां तम् । भक्तानां मोक्षलक्ष्मीपतिमतिविकसत्पुष्पदन्तं भदन्तं भास्वन्तं दन्तकान्त्या प्रहसितवदनं पुष्पदन्तं ननामः ॥ ६० ॥
जिन्होंने स्वयं चलकर मोक्षका कठिन मार्ग दूसरोंके लिए सरल तथा शुद्ध कर दिया है, जिन्होंने चित्तमें उपशम भावको धारण करनेवाले भक्तोंके लिए स्वर्ग और मोक्षका मार्ग प्राप्त करने-की उत्तम विधि बतलाई है, जो मोक्ष-लक्ष्मीके स्वामी हैं, जिनके दाँत खिले हुए पुष्पके समान हैं, जो स्वयं देदीप्यमान हैं और जिनका मुख दाँतोंकी कान्तिसे सुशोभित है ऐसे भगवान् पुष्पदन्तको हम नमस्कार करते हैं ।॥६०॥
“We bow before Lord Pushpadanta, who—by walking the difficult path of liberation Himself—has made it simple and pure for others. He has shown the supreme method (Vidhi) for attaining the realms of Heaven and Liberation to those devotees who hold the spirit of tranquility (Upashama) in their hearts. He is the Lord of the Lakshmi of Liberation (Moksha-Lakshmi); His teeth are like blossoming flowers, and He is self-luminous, His face graced by the brilliant luster of His teeth.”60
श्लोक ( Shlok ) 61
शान्तं वपुः श्रवणहारि वचश्चरित्रं सर्वोपकारि तव देव ततो भवन्तम् । संसारमारवमहास्थलरुद्रसान्द्र-छायामहीरुहमिमे सुविधिं श्रयामः ॥ ६१ ॥
हे देव ! आपका शरीर शान्त है, वचन कानोंको हरनेवाले हैं, चरित्र सबका उपकार करनेवाला है और आप स्वयं संसाररूपी विशाल रेगिस्तानके बीचमें ‘सघन’-छायादार वृक्षके समान हैं अतः हम सब आपका ही आश्रय लेते हैं ॥ ६१ ॥
“O Lord! Your body is the embodiment of tranquility, Your words are enchanting to the ears, and Your life story (conduct) is a source of universal benevolence. You are like a ‘dense, shady tree’ in the midst of the vast desert of this worldly existence (Samsara). Therefore, we all seek refuge in You alone.”61
श्लोक ( Shlok ) 62
योऽजायत क्षितिभृदत्र महादिपद्मः पश्चादभूद्दिवि चतुर्दशकल्पनाथः । प्रान्ते बभूव भरते सुविधिर्नृपेन्द्र-स्तीर्थेश्वरः स नवमः कुरुताच्छ्रियं वः ॥ ६२ ॥
जो पहले महापद्म नामक राजा हुए, फिर स्वर्गमें चौदहवें कल्पके इन्द्र हुए और तदनन्तर भरतक्षेत्रमें महाराज सुविधि नामक नौवें तीर्थकर हुए ऐसे सुविधिनाथ अथवा पुष्पदन्त हम सबको लक्ष्मी प्रदान करें ।। ६२ ।।
“He who was first the King named Mahapadma, then became the Indra of the fourteenth heaven (Kalpa), and subsequently became the ninth Tirthankara, Lord Suvidhinatha, in the Bharat-kshetra (the Indian region)—may that Lord Suvidhinatha, also known as Pushpadanta, bestow upon us the wealth of spiritual prosperity (Lakshmi).”62
इत्यार्षे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे पुष्पदन्तपुराणा-वसति पञ्चपञ्चाशत्तमं पर्व ॥ ५५ ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, भगवद् गुणभद्राचार्य प्रणीत, त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहमें पुष्पदन्त पुराणको पूर्ण करनेवाला पचपनवाँ पर्व समाप्त हुआ ।
“Thus ends the fifty-fifth chapter, which completes the Pushpadanta Purana, within the collection known as the Trishashti-Lakshana Mahapurana. This great work was composed by the venerable Acharya Gunabhadra and is celebrated under the authoritative name of Arsha.”
शीतल पुराण का वर्णन
पर्व 56 – श्लोक 1 से 11
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