राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 332 to 341
श्लोक ( Shlok ) 332
पुरं प्रविश्य सद्रत्नैः स महीशमपूजयत् । सोऽपि सम्भाव्य तं स्थानमानादिभिरतोषयत् ॥ ३३२ ॥
प्रीतिङ्करने नगरमें प्रवेश कर समीचीन रत्नोंकी भेंट देकर राजाकी पूजा की और राजाने भी योग्य स्थान तथा मान आदि देकर उसे संतुष्ट किया ॥ ३३२ ॥
“Upon entering the city, Pritingar worshiped the king by offering him precious gems, and the king also pleased him by granting him a suitable place and respect.”332
श्लोक ( Shlok ) 333 – 336
अथान्येद्युः कुमारस्य ज्यायसीं प्रियमित्रिकाम् । मातरं स्वतनूजस्य प्राप्ये परिणयोत्सवे ॥ ३३३ ॥ आत्मस्नुषामलङ्कर्तुं रत्नाभरणसंहतिम् । गृहीत्वा रथमारुह्य महादर्शनकर्मणे ॥ ३३४ ॥यान्तीं द्रष्टुं समायाता रथ्यायां मूकिका स्वयम् । वीक्ष्य स्वभूषासन्दोहं स्पष्टमङ्गुलिसन्ज्या ॥ ३३५ ॥मदीयमेतदित्युक्त्वा जनान् सा तां रथस्थिताम् । रुध्वा स्थितवती सापि प्राहैषा ग्रहिलेति ताम् ॥३३६॥
अथानन्तर किसी दूसरे दिन प्रीतिङ्कर कुमारकी बड़ी माँ प्रियमित्रा अपने पुत्रके विवाहोत्सवमें अपनी पुत्रवधूको अलंकृत करनेके लिए रत्नमय आभूषणोंका समूह लेकर तथा ‘रथपर सवार होकर सबको दिखलानेके लिए जा रही थी। उसे देखनेके लिए वह गूँगी कन्या स्वयं मार्गमें आई और अपने आभूषणोंका समूह देखकर उसने अँगुलीके इशारेसे सबको बतला दिया कि यह आभूषणोंका समूह मेरा है। तदनन्तर वह कन्या रथमें बैठी हुई प्रियमित्राको रोककर खड़ी हो गई। इसके उत्तर में रथपर बैठी हुई प्रियमित्राने सबको समझा दिया कि यह कन्या पगली है ॥ ३३३-३३६ ।।
“Thereafter, on another day, Priyamitra—the elder mother of Prince Pritingar—was traveling in a chariot to show everyone a collection of studded gem ornaments she was bringing to adorn her daughter-in-law for her son’s wedding festival. Seeing this, the mute girl herself came onto the path and, upon recognizing her own collection of ornaments, pointed her finger to show everyone that the jewelry belonged to her. Subsequently, the girl stood blocking Priyamitra, who was seated in the chariot. In response, Priyamitra, sitting in the chariot, convinced everyone that the girl was insane.”333 – 336
श्लोक ( Shlok ) 337
तद्ज्ञाश्च मन्त्रतन्त्रादिविधिभिः सुप्रयोजितैः । परीक्ष्येयं न भूतोपसृष्टेति व्यक्तमब्रुवन् ॥ ३३७ ॥
तब मन्त्र-तन्त्रादिके जाननेवाले लोगोंने विधिपूर्वक मन्त्र-तन्त्रादिका प्रयोग किया और परीक्षा कर स्पष्ट बतला दिया कि न यह पागल है और न इसे भूत लगा है ॥ ३३७ ॥
“Then, people well-versed in mantras and tantras systematically applied their spells and rituals, and after a thorough examination, explicitly stated that she was neither insane nor possessed by a ghost.”337
श्लोक ( Shlok ) 338 – 340
कुमारोऽपि तदाकर्ण्य न बिभेतु कुमारिका । राजाभ्याशं समभ्येतु तत्राहं चास्म्युपस्थितः ॥ ३३८ ॥इत्यस्याः प्राहिणोत्पत्रं गुढं तद्वीक्ष्य तत्तथा । श्रद्धायाह्वायिता राज्ञः समीपमगमन्मुदा ॥ ३३९ ॥तदाभरणवृत्तान्तपरिच्छेदाय भूपतिः । धर्माध्यक्षान्समाहूय विचाराय न्ययोजयत् ॥ ३४० ॥
यह सुनकर प्रीतिङ्कर कुमारने उस कन्याके पास गुप्त रूपसे इस आशयका एक पत्र भेजा कि हे कुमारि ! तू बिलकुल भय मत कर, राजाके पास आ, मैं भी वहाँ उपस्थित रहूंगा। पत्र देखकर तथा विश्वास कर वह कन्या बड़े हर्षसे राजाके समीप गई। राजाने भी उसके आभूषणोंका वृत्तान्त जाननेके लिए धर्माधिकारियोंको बुलाकर नियुक्त किया ।। ३३८-३४०।।
“Upon hearing this, Pritinkar Kumar secretly sent a letter to the maiden to this effect: ‘O maiden! Do not fear at all, come to the king; I shall also be present there.’ Having seen the letter and trusting it, the maiden went to the king with great joy. The king, too, summoned and appointed the judicial officers (dharmadhikaris) to uncover the truth regarding her ornaments. // 338-340 //”
श्लोक ( Shlok ) 341
वसुन्धराञ्च तत्रैव ‘कृत्वा सन्निहितां तदा । राजा कुमारमप्राक्षीद्वेत्तीदं किं भवानिति ॥ ३४१ ॥
राजाने वसुन्धरा कन्याको समीप ही आड़में बिठलाकर कुमार प्रीतिङ्करसे पूछा कि क्या आप इसका कुछ हाल जानते हैं ? ।। ३४१ ।।
“The king seated the maiden Vasundhara nearby behind a screen (in concealment) and asked Prince Pritinkar, ‘Do you know anything about her situation?’ // 341 //”
श्लोक 342 से 360
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549 | चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 691
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331
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