नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 82 to 93
श्लोक ( Shlok ) 82
तदाकर्ण्य नृपाः केचित्पूजयन्ति स्म देवताः । अहिंसादिव्रतान्यन्ये जगृहुर्गुरुसन्निधौ ॥ ८२ ॥
उन भेरियोंका शब्द सुनकर कितने ही राजा लोग देवताओंकी पूजा करने लगे और कितने ही गुरुओंके पास जाकर अहिंसा आदि व्रत ग्रहण करने लगे ।। ८२ ॥
Upon hearing the sound of those battle drums, many kings began to worship the deities, while many others approached their spiritual masters (gurus) to take vows of non-violence (ahimsa) and other sacred precepts. (82)
श्लोक ( Shlok ) 83 – 86
परे निस्तारकेष्वर्थान्वितरन्ति स्म सात्त्विकाः । ‘आमुञ्चत तनुत्राणं गृह्णीतासिलतां शिताम् ॥ ८३ ॥आरोपयत चापौघान् सन्नह्यन्तं गजाग्रिमाः । हरयो नद्धपर्याणाः क्रियन्तामधिकारिषु ॥ ८४ ॥समर्थन्तां कलत्राणि युज्यन्तां वाजिभी रथाः । भोगोपभोगवस्तूनि भुज्यन्तामनिवारितम् ॥ ८५ ॥वन्दिमागधवृन्देन वन्द्यन्तां निजविक्रमाः । इति केचिज्जगुर्भूत्यान् नृपाः सङ्गामसम्मुखाः ॥ ८६ ॥
युद्धके सम्मुख हुए कितने ही राजा अपने भृत्योंसे कह रहे थे कि ‘तुम लोग कवच धारण करो, पैनी तलवार लो, धनुष चढ़ाओ और हाथी तैयार करो । घोड़ों पर जीन कस कर तैयार करो, स्त्रियाँ अधिकारियोंके लिए सौंपो, रथोंमें घोड़े जोत दो, निरन्तर भोग-उपभोग की वस्तुओंका सेवन किया जाय और बन्दी तथा मागध लोग अपने पराक्रमकी वन्दना करें -स्तुति करें’ ।। ८३-८६ ॥
Confronting the imminent war, many kings were commanding their servants, saying, “Put on your armor, take up your sharp swords, string the bows, and ready the elephants! Saddle the horses and make them ready, entrust the women to the care of the officials, and yoke the horses to the chariots! Let us continuously enjoy the objects of pleasure and consumption, and let the bards and panegyrists sing praises and herald our valor!” (83–86)
श्लोक ( Shlok ) 87 – 88
पतिभक्तया निसर्गात्मपौरुषेण विरोधिनाम् । मात्सर्येण यशोहेतोः शूरलोकसमीप्सया ॥ ८७ ॥निजान्वयाभिमानेन परैश्च रणकारणैः । समजायन्त राजानः प्राणव्ययविधायिनः ॥ ८८ ॥
उस समय कितने ही राजा, स्वामीकी भक्तिसे, कितने ही स्वाभाविक पराक्रमसे, कितने ही शत्रुओं पर जमी हुई ईर्ष्यासे, कितने ही यश पानेकी इच्छासे, कितने ही शूरवीरोंकी गति पानेके लोभसे, कितने ही अपने वंशके अभिमानसे और कितने ही युद्ध सम्बन्धी अन्य-अन्य कारणोंसे प्राणोंका नाश करनेके लिए तैयार हो गये थे ।॥ ८७-८८ ॥
At that time, many kings were ready to lay down their lives—some out of devotion to their master, some out of their own inherent valor, some out of deep-seated malice toward their enemies, some out of a desire for glory, some out of the longing to attain the ultimate destiny of brave warriors, some out of pride in their lineage, and many others due to various other reasons related to warfare. (87–88)
श्लोक ( Shlok ) 89
वसुदेवसुतोऽप्याप्तगर्वः सर्वविभूषणः । कुङ्कुमाङ्कितगात्रत्वादिव सिन्दूरितद्विपः ॥ ८९ ॥
उस समय श्रीकृष्ण भी बड़ा गर्व कर रहे थे, सब आभूषण पहिने थे और शरीर पर केशर लगाये हुए थे जिससे ऐसे जान पड़ते थे मानो सिन्दूर लगाये हुए हाथी हों ।। ८९ ।।
At that time, Shri Krishna too was exuding great pride. Adorned in all his ornaments and with his body smeared with saffron, he looked like a majestic elephant coated in vermilion. (89)
श्लोक ( Shlok ) 90
जय जीवेति वन्दारुवृन्देन कृतमङ्गलः । नवो वाम्भोधरश्चारुचातकध्वनिलक्षितः ॥ ९० ॥
‘आपकी जय हो’, ‘आप चिरंजीव रहे’इस प्रकार बन्दीजन उनका मङ्गलपाठ पढ़ रहे थे जिससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो चातकोंकी सुन्दर ध्वनिसे युक्त नवीन मेघ ही हो ॥९०॥
With the bards reciting auspicious chants of “Victory to you!” and “May you live forever!”, he appeared like a fresh, rain-bearing cloud accompanied by the beautiful calls of the chataka birds. (90)
श्लोक ( Shlok ) 91– 93
सज्जनावर्ज्य निर्णिक्तसौवर्णोरुगलन्तिका । जलैराचम्य शुद्धाच्छक्षिप्रपूर्णजलाञ्जलिः ॥ ९१ ॥गन्धपुष्पादिभिर्विघ्नविनायकमनायकम् । भक्तया जिनेन्द्रमभ्यर्च्य भव्यकल्पमहीरुहम् ॥ ९२ ॥अभिवन्द्याप्तसामन्तैः समन्तात्परिवारितः । प्रतिपक्षमपक्षेप्तुं न्यक्षेणाभिमुखं ययौ ॥ ९३ ॥
उन्होंने सज्जनोंके द्वारा धारण की हुई पवित्र सुवर्णमय झारीके जलसे आचमन किया, शुद्ध जलसे शीघ्र ही पूर्ण जलाञ्जलि दी और फिर गन्ध पुष्प आदि द्रव्योंके द्वारा विघ्न्नोंका नाश करने वाले, स्वामी रहित (जिनका कोई स्वामी नहीं) तथा भव्य जीवोंका मनोरथ पूर्ण करनेके लिए कल्पवृक्षके समान श्री जिनेन्द्रदेवकी भक्तिपूर्वक पूजा की, उन्हें नमस्कार किया । तदनन्तर चारों ओर गुरुजनों और सामन्तोंको अथवा प्रामाणिक सामन्तोंको रखकर स्वयं ही शत्रुको नष्ट करनेके लिए उसके सामने चल पड़े ।। ९१-९३ ॥
He performed achamana (ceremonial sipping of water) with the sacred water from a golden pitcher held by virtuous men, and swiftly offered a palmful of pure water (jalanjali). Then, using fragrant flowers and other ritual substances, he devoutly worshipped and bowed down to Lord Jinendra—the destroyer of obstacles, who has no master above Him, and who, like a wish-fulfilling tree (kalpavriksha), fulfills the desires of the liberated souls (bhavya jivas).
Thereafter, keeping his elders, preceptors, and trusted chieftains all around him, he himself marched forward to confront and destroy the enemy. (91–93)
श्लोक 94 से 101
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