Hindi Translation of Uttar puran Parv 61
श्लोक 1 से 11 : धर्मनाथ भगवान् के पूर्वभव एवं अहमिन्द्र पद
जिन धर्मनाथ भगवान्से अत्यन्त निर्मल उत्तमक्षमा आदि दश धर्म उत्पन्न हुए वे धर्मनाथ भगवान् हमलोगोंका अधर्म दूर कर हमारे लिए सुख प्रदान करें ॥ १ ॥ पूर्व धातकीखण्ड द्वीपके पूर्वविदेह क्षेत्रमें नदीके दक्षिण तट पर एक वत्स नामका देश है। उसमें सुसीमा नामका महानगर है ।।२।। वहाँ राजा दशरथ राज्य करता था, वह बुद्धि, बल और भाग्य तीनोंसे सहित था। चूँकि उसने समस्त शत्रु अपने वश कर लिये थे इसलिए युद्ध आदिके उद्योगसे रहित होकर वह शान्तिसे रहता था ।। ३ ।। प्रजाकी रक्षा करनेमें सदा उसकी इच्छा रहती थी और वह बन्धुओं तथा मित्रोंके साथ निश्चिन्ततापूर्वक धर्म-प्रधान सुखोंका उपभोग करता था ॥ ४ ॥ एक बार वैशाख शुक्ल पूर्णिमा के दिन सबलोग उत्सव मना रहे थे उसी समय चन्द्र ग्रहण पड़ा उसे देखकर राजा दशरथका मन भोगोंसे एकदम उदास हो गया ॥ ५ ॥ यह चन्द्रमा सुन्दर है, कुवलयों- नीलकमलों (पक्षमें-महीमण्डल) को आनन्दित करनेवाला है और कलाओंसे परिपूर्ण है। जब इसकी भी ऐसी अवस्था हुई है तब अन्य पुरुषकी क्या अवस्था होगी ॥ ६ ॥ ऐसा मानकर उसने महारथ नामक पुत्रके लिए राज्यभार सौंपा और स्वयं परिग्रहरहित होनेसे भारहीन होकर संयम धारण कर लिया ।। ७ ।। उसने ग्यारह अङ्गोंका अध्ययन कर सोलह कारण-भावनाओंका चिन्तवन किया, तीर्थंकर नामक पण्य प्रकृतिका बन्ध किया और आयुके अन्तमें समाधिमरण कर अपनी बुद्धिको निर्मल बनाया ।॥ ८ ।। अब वह सर्वार्थसिद्धिमें अहमिन्द्र हुआ, तैंतीस सागर उसकी स्थिति थी, एक हाथ ऊँचा उसका शरीर था, चार सौ निन्यानवें दिन अथवा साढ़े सोलह माहमें एक बार कुछ श्वास लेता था ॥ ६ ॥ लोक नाड़ीके अन्त तक उसके निर्मल अवधिज्ञानका विषय था, उतनी ही दूर तक फलने-वाली विक्रिया तेज तथा बलरूप सम्पत्तिसे सहित था ।॥ १० ॥ तीस हजार वर्षमें एक बार मानसिक आहार लेता था, द्रव्य और भाव सम्बन्धी दोनों शुक्तलेश्याओंसे युक्त था ।।११।।
श्लोक 12 से 23 : धर्मनाथ भगवान् का गर्भ, जन्म एवं प्रारम्भिक जीवन
इस प्रकार वह सर्वार्थ-सिद्धिमें प्रवीचार रहित उत्तम सुखका अनुभव करता था। वह पुण्यशाली जब वहाँसे चयकर मनुष्य लोकमें जन्म लेनेके लिए तत्पर हुआ ।। १२ ।। तब इस जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रमें एक रत्नपुर नामका नगर था उसमें कुरुवंशी काश्यपगोत्री महातेजस्वी और महालक्ष्मीसम्पन्न महाराज भानु राज्य करते थे उनकी महादेवीका नाम सुप्रभा था, देवोंने रत्नवृष्टि आदि सम्पदाओंके द्वारा उसका सम्मान बढ़ाया था। रानी सुप्रभाने वैशाख शुक्त त्रयोदशीके दिन रेवती नक्षत्रमें प्रातःकालके समय सोलह स्वप्न देखे ।। १३-१५ ।। जागकर उसने अपने अवधिज्ञानी पतिसे उन स्वप्नोंका फल मालूम किया और ऐसा हर्षका अनुभव किया मानो पुत्र ही उत्पन्न हो गया हो ॥ १६ ॥ उसी समय अन्तिम अनुत्तरविमानसे – सर्वार्थसिद्धिसे चयकर वह अहमिन्द्र रानीके गर्भमें अवतीर्ण हुआ। इन्द्रोंने आकर गर्भकल्याणकका उत्सव किया ॥ १७ ॥ नव माह बीत जाने पर माघ शुक्ला त्रयोदशीके दिन गुरुयोगमें उसने अवधिज्ञानरूपी नेत्रोंके धारक पुत्रको उत्पन्न किया ॥ १८ ॥ उसी समय इन्द्रोंने सुमेरु पर्वत पर ले जाकर बहुत भारी सुवर्ण-कलशोंमें भरे हुए क्षीरसागरके जलसे उनका अभिषेक कर आभूषण पहिनाये तथा हर्षसे धर्मनाथ नाम रक्खा ॥ १९ ॥ जब अनन्तनाथ भगवान्के बाद चार सागर प्रमाण काल बीत चुका और अन्तिम प्रलयका आधा भाग जब धर्मरहित हो गया तब धर्मनाथ भगवान्का जन्म हुआ था, उनकी आयु भी इसी अन्तरालमें शामिल थी। उनकी आयु दशलाख वर्षकी थी, शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान थी, शरीरकी ऊँचाई एक सौ अस्सी हाथ थी । जब उनके कुमारकालके अढ़ाईलाख वर्ष बीत गये तब उन्हें राज्यका अभ्युदय प्राप्त हुआ था ।। २०-२३ ।।
श्लोक 24 से 41 : राज्य, वैराग्य एवं दीक्षा
वे अत्यन्त ऊँचे थे, अत्यन्त शुद्ध थे, दर्शनीय थे, उत्तम आश्रय देने वाले थे, और सबका पोषण करनेवाले थे अतः शरद्ॠतुके मेघके समान थे ॥ २४ ॥ अथवा किसी उत्तम हाथीके समान थे क्योंकि जिस प्रकार उत्तम हाथी भद्र जातिका होता है उसी प्रकार वे भी भद्र प्रकृति थे, उत्तम हाथी जिस प्रकार बहु दान – बहुत मदसे युक्त होता है उसी प्रकार वे भी बहु दान – बहुत दानसे युक्त थे, उत्तम हाथी जिस प्रकार सुलक्षण – अच्छे-अच्छे लक्षणोंसे सहित होता है उसी प्रकार वे भी सुलक्षण – अच्छे सामुद्रिक चिह्नोंसे सहित थे, उत्तम हाथी जिस प्रकार महान् होता है उसी प्रकार वे भी महान् – श्रेष्ठ थे, उत्तम हाथी जिस प्रकार सुकर- उत्तम सूँड़से सहित होता है उसी प्रकार वे भी सुकर – उत्तम हाथोंसे सहित थे, और उत्तम हाथी जिस प्रकार सुरेभ – उत्तम शब्दसे सहित होता है उसी प्रकार वे भी सुरेभ – उत्तम मधुर शब्दोंसे सहित थे ।। २५ ।। वे दुर्जनोंका निग्रह और सज्जनोंका अनुग्रह करते थे सो द्वेष अथवा इच्छाके वश नहीं करते थे किन्तु गुण और दोषकी अपेक्षा करते थे अतः निग्रह करते हुए भी वे प्रजाके पूज्य थे ॥ २६ ॥ उनकी समस्त संसारमें फैलने-वाली कीर्ति यदि लता नहीं थी तो वह कवियोंके प्रवचनरूपी जलके सेकसे आज भी क्यों बढ़ रही है ॥ २७ ॥ सुखसे संभोग करनेके योग्य तथा अपने गुणोंसे अनुरक्त पृथिवी उनके लिए उत्तम नायिकाके समान इच्छानुसार फल देने वाली थी ।। २८ ।। जब अन्य भव्य जीव इन धर्मनाथ भगवान्के प्रभावसे अपने कर्मरूपी शत्रुओंको नष्ट कर निर्मल सुख प्राप्त करेंगे तब इनके सुखका वर्णन कैसे किया जा सकता है ? ॥ २९ ॥
जब पाँच लाख वर्ष प्रमाण राज्यकाल बीत गया तब किसी एक दिन उल्कापात देखनेसे इन्हें वैराग्य उत्पन्न हो गया। विरक्त होकर वे इस प्रकार चिन्तवन करने लगे- ‘मेरा यह शरीर कैसे, कहाँ और किससे उत्पन्न हुआ है ? किमात्मक है, किसका पात्र है और आगे चलकर क्या होगा’ ऐसा विचार न कर मुझ मूर्खने इसके साथ चिरकाल तक संगति की। पापका संचय कर उसके उदद्यसे मैं आज तक दुःख भोगता रहा। कर्मसे प्रेरित हुए मुझ दुर्मतिने दुःखको ही सुख मानकर कभी शाश्वत – स्थायी सुख प्राप्त नहीं किया। मैं व्यर्थ ही अनेक भवोंमें भ्रमण कर थक गया । ये ज्ञान दर्शन आदि मेरे गुण हैं यह मैंने कल्पना भी नहीं की किन्तु इसके विरुद्ध बुद्धिके विपरीत होनेसे रागादिको अपना गुण मानता रहा। स्नेह तथा मोहरूपी ग्रहोंसे प्रसा हुआ यह प्राणी बार-बार परिवारके लोगों तथा धनका पोषण करता हुआ पाप उपाजेन करता है और पापके संचयसे अनेक दुर्गतियोंमें भटकता है’। इस प्रकार भगवान्को स्वयं बुद्ध जानकर लौकान्तिक देव आये और बड़ी भक्तिके साथ इस प्रकार स्तुति करने लगे कि हे देव ! आज आप कृतार्थ-कृतकृत्य हुए ।। ३०-३६ ।। उन्होंने सुधर्म नामके ज्येष्ठ पुत्रके लिए राज्य दिया, दीक्षा-कल्याणकके समय होने वाले अभिषेकका उत्सव प्राप्त किया, नागदत्ता नामकी पालकी में सवार होकर ज्येष्ठ देवोंके साथ शालवनके उद्यानमें जाकर दो दिनके उपवासका नियम लिया और माघशुक्ला त्रयोदशीके दिन सायंकालके समय पुष्य नक्षत्रमें एकहजार राजाओंके साथ मोक्ष प्राप्त करानेवाली दीक्षा धारण कर ली ॥ ३७-३९ ॥ दीक्षा लेते ही उन्हें मनःपर्यय ज्ञान उत्पन्न हो गया। वे दूसरे दिन आहार लेनेके लिए पताकाओंसे सजी हुई पाटलिपुत्र नामकी नगरी में गये ।। ४० ।। वहाँ सुवर्णके समान कान्तिवाले धन्यषेण राजाने उन उत्तम पात्रके लिए दान देकर पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ॥ ४१ ॥
श्लोक 42 से 52 : केवलज्ञान, धर्मप्रवर्तन और मोक्ष
तदनन्तर छद्मस्थ अवस्थाका एक वर्ष बीत जाने पर उन्होंने उसी पुरातन वनमें सप्तच्छद वृक्षके नीचे दो दिनके उपवासका नियम लेकर योग धारण किया और पौषशुक्ल पूर्णिमाके दिन सायंकालके समय पुष्य नक्षत्रमें कवलज्ञान प्राप्त किया। देवोंने चतुर्थ कल्याणककी उत्तम पूजा की ॥४२-४३॥ वे अरिष्टसेनको आदि लेकर तैंतालीस गणधरोंके स्वामी थे, नौ सौ ग्यारह पूर्वधारियोंसे आवृत थे, चालीस हजार सात सौ शिक्षकोंसे सहित थे, तीन हजार छह सौ तीन प्रकारके अवधिज्ञानियोंसे युक्त थे, चार हजार पाँच सौ केवलज्ञानी उनके साथ थे, सात हजार विक्रियाऋद्धिके धारक उनकी शोभा बढ़ा रहे थे, चार हजार पाँच सौ मनःपर्ययज्ञानी उन्हें घेरे रहते थे, दो हजार आठ सौ वादियोंके समूह उनकी वन्दना करते थे, इस तरह सब मिलाकर चौंसठ हजार मुनि उनके साथ रहते थे, सुव्रताको आदि लेकर बासठ हजार चार सौ आर्यिकाएँ उनकी पूजा करती थीं, वे दो लाख श्रावकोंसे सहित थे, चार लाख श्राविकाओंसे आवृत थे, असंख्यात देव-देवियों और संख्यात तिर्यञ्चोंसे सेवित थे ।।४४-४९ ।। इस प्रकार बारह सभाओंकी सम्पत्तिसे सहित तथा धर्मकी ध्वजासे सुशोभित भगवान्ने धर्मका उपदेश दिया ॥ ५० ॥ अन्त में विहार बन्द कर वे पर्वतराज सम्मेदशिखर पर पहुँचे और एक माहका योग निरोध कर आठ सौ नौ मुनियोंके साथ ध्यानारूढ़ हुए । तथा ज्येष्ठशुक्ला चतुर्थीके दिन रात्रिके अन्त भागमें सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती और व्युपरतक्रियानिवर्ती नामक शुक्लध्यानको पूर्ण कर पुष्य नक्षत्रमें मोक्ष-लक्ष्मीको प्राप्त हुए ॥ ५१-५२ ॥
श्लोक 53 से 61 : धर्मनाथ भगवान् की स्तुति एवं सुमित्र राजा का पराभव
उसी समय सब ओरसे देवोंने आकर निर्वाण कल्या-णकका उत्सव किया तथा वन्दना की ॥ ५३ ॥ जो पहले भवमें शत्रुओंको जीतनेवाले दशरथ राजा हुए, फिर अहमिन्द्रताको प्राप्त हुए तथा जिनके द्वारा कहे हुए दश धर्म पापोंके साथ युद्ध करनेमें दश रथोंके समान आचरण करते हैं वे धर्मनाथ भगवान् तुम सबकी रक्षा करें ।॥ ५४ ॥ जिन्होंने समस्त घातिया कर्म नष्ट कर दिये हैं, जिनका केवलज्ञान अत्यन्त निश्चल है, जिन्होंने श्रेष्ठ धर्मका प्रतिपादन किया है, जो तीनों शरीरोंके नष्ट हो जानेसे अत्यन्त निर्मल है, जो स्वयं अनन्त सुखसे सम्पन्न है और जिन्होंने समस्त आत्माओंको शान्त कर दिया है ऐसे धर्मनाथ जिनेन्द्र तुम सबके लिए अनन्त सुख प्रदान करें ।॥ ५५॥ अथानन्तर इन्हीं धर्मनाथ भगवान् के तीर्थमें श्रीमान् सुदर्शन नामका बलभद्र तथा सभामें सबसे बलवान् पुरुषसिंह नामका नारायण हुआ ॥ ५६ ॥ अतः यहाँ उनका तीन भवका चरित कहता हूं। इसी राजगृह नगरमें राजा सुमित्र राज्य करता था, वह बड़ा अभिमानी था, बड़ा मल्ल था, उसने बहुत मल्लोंको जीत लिया था इसलिए परीक्षक लोग उनकी पूजा किया करते थे- उसे पूज्य मानते थे, वह सदा दूसरोंको तृणके समान तुच्छ मानता था, और दुष्ट हाथीके समान मदोन्मत्त था ।। ५७-५८ ॥ किसी समय मदसे उद्धत तथा मल्लयुद्धको जानने वाला राजसिंह नामका राजा उसका गर्व शान्त करनेके लिए राजगृह नगरी में आया ।॥ ५९ ॥ उसने बहुत देर तक युद्ध करनेके बाद रङ्गभूमिमें स्थित राजा सुमित्र को हरा दिया जिससे वह दाँत उखाड़े हुए हाथी-के समान बहुत दुःखी हुआ ।। ६० ।। मान भङ्ग होनेसे उसका हृदय एकदम टूट गया, वह राज्या भार धारण करनेमें समर्थ नहीं रहा अतः उसने राज्य पर पुत्रको नियुक्त कर दिया सो ठीक ही है; क्योंकि मान ही मानियोंके प्राण हैं ॥ ६१ ॥
श्लोक 62 से 71 : सुमित्र और नरवृषभ के पूर्वभव
निर्वेद भरा हुआ राजा सुमित्र कृष्णाचार्य के पास पहुँचा और उनके द्वारा कहे हुए धर्मोपदेशको सुनकर दीक्षित हो गया सो ठीक ही है क्योंकि मनस्वी मनुष्योंको यही योग्य है ॥ ६२ ॥ यद्यपि उसने क्रम-क्रमसे सिंहनिष्क्रीडित आदि कठिन तप किये तो भो उसके हृदयमें अपने पराजयका संक्लेश बना रहा अतः अन्तमें उसने ऐसा विचार किया कि यदि मेरी इस तपश्चर्याका फल अन्य जन्ममें प्राप्त हो तो मुझे ऐसा महान् बल और पराक्रम प्राप्त होवे जिससे मैं शत्रुओंको जीत सकूँ ॥ ६३-६४ ॥ ऐसा निदान कर वह संन्याससे मरा और माहेन्द्र स्वर्गमें सात सागरकी स्थिति वाला देव हुआ। वह वहाँ भोगोंको भोगता हुआ चिरकाल तक सुखसे स्थित रहा ।॥ ६५ ॥ तदनन्तर इसी जम्बूद्वीपमें मेरुपर्वतके पूर्वकी ओर वीतशोकापुरी नामकी नगरी है उसमें ऐश्वर्यशाली नरवृषभ नामका राजा राज्य करता था। उसने बाह्याभ्यन्तर प्रकृतिके कोपसे रहित राज्य भोगा, बहुत भारी सुख भोगे और अन्तमें विरक्त होकर समस्त राज्य त्याग दिया और दमवर मुनिराजके पास दिगम्बर दीक्षा धारण कर ली ॥ ६६-६७ ॥ अपनी विशाल आयु कठिन तपसे बिताकर वह सहस्त्रार स्वर्गमें अठारह सागरकी स्थितिवाला देव हुआ ।॥ ६८ ॥ प्राणप्रिय देवाङ्गनाओंको निरन्तर देखनेसे उसने अपने टिपकार रहित नेत्रोंका फल प्राप्त कियाऔर आयुके अन्तमें शान्तचित्त होकर इसी जम्बूद्वीपके खगपुर नगरके इक्ष्वाकुवंशी राजा सिंहसेन-की विजया रानीसे सुदर्शन नामका पुत्र हुआ ॥ ६९-७० ॥ इसी राजाकी अम्बिका नामकी दूसरी रानीके सुमित्रका जीव नारायण हुआ। वे दोनों भाई पैंतालीस धनुष ऊँचे थे और दश लाख वर्ष-की आयुके धारक थे ।।॥ ७१ ॥
श्लोक 72 से 81 : मधुक्रीड़ प्रतिनारायण के साथ युद्ध
एक दूसरेके अनुकूल बुद्धि, रूप और बलसे सहित उन दोनों भाइयोंने समस्त शत्रुओं पर आक्रमण कर आत्मीय लोगोंको अपने गुणोंसे अनुरक्त बनाया था ॥ ७२ ॥ यद्यपि उन दोनोंकी लक्ष्मी अविभक्त थी- परस्पर बाँटी नहीं गई थी तो भी उनके लिए कोई दोष उत्पन्न नहीं करती थी सो ठीक ही है क्योंकि जिनका चित्त शुद्ध है उनके लिए सभी वस्तुएँ शुद्धताके लिए ही होती हैं ।॥ ७३ ॥
अथानन्तर इसी भरतक्षेत्र के कुरुजांगल देशमें एक हस्तिनापुर नामका नगर है उसमें मधुक्रीड़ नामका राजा राज्य करता था। वह सुमित्रको जीतनेवाले राजसिंहका जीव था। उसने समस्त शत्रुओं के समूहको जीत लिया था, वह तेजसे बढ़ते हुए बलभद्र और नारायणको नहीं सह सका इसलिए उस बलवान्ने कर-स्वरूप अनेकों श्रेष्ठ रत्न माँगनेके लिए दण्डगर्भ नामका प्रधानमंत्री भेजा ॥ ७४-७६ ।। जिस प्रकार हाथीके कण्ठका शब्द सुनकर सिंह क्रुद्ध हो जाते हैं उसी प्रकार सूर्यके समान तेजके धारक दोनों भाई प्रधानमंत्रीके शब्द सुनकर क्रुद्ध हो उठे ॥ ७७ ॥ और कहने लगे कि वह मूर्ख खेलनेके लिए साँपों भरा हुआ कर माँगता है सो यदि वह पास आया तो उसके लिए वह कर अवश्य दिया जावेगा ॥ ७८ ॥ इस प्रकार क्रोधसे वे दोनों भाई कठोर शब्द कहने लगे और उस मंत्रीने शीघ्र ही जाकर राजा मधुक्रीड़को इसकी खबर दी ॥ ७९ ॥ राजा मधुक्रीड़ भी उनके दुर्वचन सुनकर क्रोधसे लाल शरीर हो गया और उनके साथ युद्ध करनेके लिए बहुत बड़ी सेना लेकर चला ।। ८० ।। युद्ध करनेमें चतुर नारायण भी उसके सामने आया, उसपर आक्रमण किया, चिर-काल तक उसके साथ युद्ध किया और अन्तमें उसीके चलाये हुए चक्रले शीघ्र ही उसका शिर काट डाला ॥ ८१ ॥
श्लोक 82 से 90 : बलभद्र का मोक्ष और मघवा चक्रवर्ती का पूर्वभव
दोनों भाई तीन खण्डके अधीश्वर बनकर राज्यलक्ष्मीका उपभोग करते रहे। उनमें नारायण, आयुका अन्त होने पर सातवें नरक गया ॥ ८२ ॥ उसके शोकसे बलभद्रने धर्म-नाथ तीर्थकरकी शरणमें जाकर दीक्षा ले ली और पापोंके समूहको नष्ट कर परम पद प्राप्त किया ॥ ८३ ॥ देखो, दोनों ही भाई शत्रुसेनाको नष्ट करने वाले थे, अभिमानी थे, शूर वीर थे, पुण्यके फलका उपभोग करनेवाले थे, और तीन खण्डके स्वामी थे फिर भी इस तरह दुष्ट कर्मके द्वारा अलग-अलग कर दिये गये । मोहके उदयसे पापका फल नारायणको ही प्राप्त हुआ इसलिए पामों-की अधीनताको धिक्कार है ।॥ ८४ ॥ पुरुषसिंह नारायण, पहले प्रसिद्ध राजगृह नगर में सुमित्र नामका राजा था, फिर माहेन्द्र स्वर्गमें देव हुआ, वहाँसे च्युत होकर इस खगपुर नगरमें पुरुषसिंह नामका नारायण हुआ और उसके पश्चात् भयंकर सातवें नरकमें नारकी हुआ ॥ ८५ ॥ मधुक्रीड़ प्रतिनारायण पहले मदोन्मत्त हाथियोंको वश करने वाला राजसिंह नामका राजा था, फिर मार्ग-भ्रष्ट होकर चिरकाल तक संसाररूपी वनमें भ्रमण करता रहा, तदनन्तर धर्ममार्गका अवलम्बन कर हस्तिनापुर नगरमें मधुक्रीड हुआ और उसके पश्चात् दुर्गतिको प्राप्त हुआ ।॥ ८६ ॥ सुदर्शन बलभद्र, पहले प्रसिद्ध वीतशोक नगरमें नरवृषभ नामक राजा था, फिर चिरकाल तक घोर तपश्चरण कर सहस्त्रार स्वर्गमें देव हुआ, फिर वहाँसे चय कर खगपुर नगरमें शत्रुओंका पक्ष नष्ट करनेवाला बलभद्र हुआ और फिर क्षमाका घर होता हुआ मरणरहित होकर क्षायिक सुखको प्राप्त हुआ ।। ८७ ।।
इन्हीं धर्मनाथ तीर्थंकरके तीर्थमें तीसरे मघवा चक्रवर्ती हुए इसलिए तीसरे भवसे लेकर उनका पुराण कहता हूँ ।॥ ८८ ॥ श्रीवासुपूज्य तीर्थंकरके तीर्थमें नरपति नामका एक बड़ा राजा था वह भाग्योदयसे प्राप्त हुए भोगोंको भोग कर विरक्त हुआ और उत्कृष्ट तपञ्चरण कर मरा। अन्त में पुण्योदयसे मध्यम ग्रैवेयकमें अहमिन्द्र हुआ ॥८९-९०॥
श्लोक 91 से 101 : मघवा चक्रवर्ती का वैराग्य और केवलज्ञान
सत्ताईस सागर तक मनोहर दिव्य भोगों-को भोगकर वह वहाँसे च्युत हुआ और धर्मनाथ तीर्थंकरके अन्तरालमें कोशल नामक मनोहर देशकी अयोध्यापुरीके स्वामी इक्ष्वाकुवंशी राजा सुमित्रकी भद्रारानीसे मघवान् नामका पुण्यात्मा पुत्र हुआ । यही आगे चलकर भरत क्षेत्रका स्वामी चक्रवर्ती होगा। उसने पाँच लाख वर्षकी कल्याणकारी उत्कृष्ट आयु प्राप्त की थी। साढ़े चालीस धनुष ऊँचा उसका शरीर था, सुवर्णके समान शरीरकी कान्ति थी। वह प्रतापी छह खण्डोंसे सुशोभित पृथिवीका पालनकर चौदह महा-रत्नोंसे विभूषित एवं नौ निधियोंका नायक था। वह मनुष्य, विद्याधर और इन्द्रोंको अपने चरण-युगल में झुकाता था। चक्रवर्तियोंकी विभूतिके प्रमाणमें कही हुई – छ्यानबे हजार देवियोंके साथ इच्छानुसार दश प्रकारके भोगोंको भोगता हुआ वह अपने मनोरथ पूर्ण करता था। किसी एक दिन मनोहर नामक उद्यानमें अकस्मात् अभयघोष नामक केवली पधारे। उस बुद्धिमान्ने उनके दर्शन कर तीन प्रदक्षिणाएँ दीं, वन्दना की, धर्मका स्वरूप सुना, उनके समीप तत्त्वोंके सद्भावका ज्ञान प्राप्त किया, विषयोंसे अत्यन्त विरक्त होकर प्रियमित्र नामक पुत्रके लिए साम्राज्य पदकी विभूति प्रदान की और बाह्याभ्यन्तर परिग्रहका त्यागकर संयम धारण कर लिया ॥ ९१-९९ ॥ वह शुद्ध सम्यग्दर्शन तथा निर्दोष चरित्रका धारक था, शास्त्रज्ञान रूपी सम्पत्तिसे सहित था, उसने द्वितीय शुक्लध्यानके द्वारा ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन तीन घातिया कर्मोंका विघात कर दिया था ।॥ १०० ॥ अब वे नौ केवललब्धियोंके स्वामी हो गये तथा धर्मनाथ तीर्थ-करके समान धर्मका उपदेश देकर अनेक भव्य जीवोंको अतिशय श्रेष्ठ मोक्ष पदवी प्राप्त कराने लगे ।। १०१ ।।
श्लोक 102 से 112 : मघवा का मोक्ष और सनत्कुमार चक्रवर्ती का उदय
अन्तमें शुक्लध्यानके तृतीय और चतुर्थ भेदके द्वारा उन्होंने अघाति चतुष्कका क्षय कर दिया और पुण्य-पाप कर्मोंसे विर्निमुक्त होकर अविनाशी मोक्ष प्राप्त किया ॥ १०२ ॥ तीसरा चक्रवर्ती मघवा पहले वासुपूज्य स्वामीके तीर्थमें नरपति नामका राजा था, फिर उत्तम शान्तिसे युक्त श्रेष्ठ चारित्रके प्रभावसे बड़ी ऋद्धिका धारक अहमिन्द्र हुआ, फिर समस्त पुण्यसे युक्त मघवा नामका तीसरा चक्रवर्ती हुआ और तत्पश्चात मोक्षके श्रेष्ठ सुखको प्राप्त हुआ ।॥ १०३ ॥
अथानन्तर – मघवा चक्रवर्तीके बाद ही अयोध्या नगरीके अधिपति, सूर्य वंशके शिरोमणि राजा अनन्तवीर्यकी सहदेवी रानीके सोलहवें स्वर्गसे आकर सनत्कुमार नामका पुत्र हुआ। वह चक्रवर्तीकी लक्ष्मीका प्रिय वल्लभ था ॥ १०४-१०५ ।। उसकी आयु तीन लाख वर्षकी थी, और शरीरकी ऊँचाई पूर्व चक्रवर्तीके शरीरकी ऊँचाईके समान साढ़े व्यालीस धनुष थी। सुवर्णके समान कान्तिवाले उस चक्रवर्तीने समस्त पृथिवीको अपने अधीन कर लिया था ।।१०६।। दश प्रकारके भोगके समागमसे उसकी समस्त इन्द्रियाँ सन्तृप्त हुई थीं। वह याचकोंके संकल्पको पूर्ण करनेवाला मानो बड़ा भारी कल्पवृक्ष ही था ॥ १०७ ॥ हिमवान् पर्वतसे लेकर दक्षिण समुद्र तककी पृथिवीके बीच जितने राजा थे उन सबके ऊपर आधिपत्यको विस्तृत करता हुआ वह बहुत भारी लक्ष्मीका उपभोग करता था ।। १०८ ।।
इस प्रकार इधर इनका समय सुखप्ते व्यतीत हो रहा था उधर सौधर्म इन्द्रकी सभामें देवोंने सौधर्मेन्द्रसे पूछा कि क्या कोई इस लोकमें सनत्कुमार इन्द्रके रूपको जीतनेवाला है ? सौधर्मेन्द्रने उत्तर दिया कि हाँ, सनत्कुमार चक्रवर्ती सर्वाङ्ग सुन्दर है। उसके समान रूपवाला पुरुष भी किसीने स्वप्नमें भी नहीं देखा है। सौधर्मेन्द्रके वचन सुनकर दो देवोंको कौतूहल उत्पन्न हुआ और वे उसका रूप देखनेकी इच्छासे पृथिवीपर आये । जब उन्होंने सनत्कुमार चक्रवर्तीको देखा तब ‘सौधर्मेन्द्रका कहना ठीक है’ ऐसा कहकर वे बहुत ही हर्षित हुए ॥ १०९-११२ ॥
श्लोक 113 से 121 : सनत्कुमार का वैराग्य और संयम जीवन
उन देवोंने सनत्कुमार चक्रवर्तीको अपने आनेका कारण बतलाकर कहा कि हे बुद्धिमन् ! चक्रवर्तिन् ! चित्तको सावधानकर सुनिये – यदि इस संसारमें आपके लिए रोग, बुढ़ापा, दुःख तथा मरणकी सम्भावना नहोतो आप अपने सौन्दर्यसे तीर्थङ्करको भी जीत सकते हैं-११३-११४ ॥ ऐसा कहकर वे दोनों देव शीघ्र ही अपने स्थानपर चले गये । राजा सनत्कुमार उन देवोंके वचनोंप्ते ऐसा प्रतिबुद्ध हुआ मानो काललब्धिने ही आकर उसे प्रतिबुद्ध कर दिया हो ।॥ ११५ ॥ वह चिन्तवन करने लगा कि मनुष्योंके रूप, यौवन, सौन्दर्य, सम्पत्ति और सुख आदि बिजलीरूप लताके विस्तारसे पहले ही नष्ट हो जानेवाले हैं ।॥ ११६ ॥ मैं इन नश्वर सम्पत्तियोंको छोड़कर पापोंका जीतनेवाला बनूँगा और शीघ्र ही इस शरीरको छोड़कर अशरीर अवस्थाको प्राप्त होऊँगा ॥ ११७ ॥ ऐसा विचारकर उन्होंने देवकुमार नामक पुत्रके लिए राज्य देकर शिवगुप्त जिनेन्द्रके समीप अनेक राजाओंके साथ दीक्षा ले ली ।। ११८ ।। वे अहिंसा आदि पाँच महाव्रतोंसे पूज्य थे, ईर्या आदि पाँच समितियोंका पालन करते थे, छह आवश्यकोंसे उन्होंने अपने आपको वश कर लिया था, इन्द्रियोंकी सन्ततिको रोक लिया था, वस्त्रका त्यागकर रखा था, वे पृथिवीपर शयन करते थे, कभी दातौन नहीं करते थे; खड़े-खड़े एक बार भोजन करते थे। इस प्रकार अट्ठाईस मूलगुणों से अत्यन्त शोभायमान थे ॥११९-१२०।। तीन कालमें योगधारण करना, वीरासन आदि आसन लगाना तथा एक करवट से सोना आदि शास्त्रोंमें कहे हुए उत्तरगुणोंका निरन्तर यथायोग्य आचरण करते थे ॥ १२१ ॥
श्लोक 122 से 130 : सनत्कुमार की साधना, केवलज्ञान और मोक्ष
वे पृथिवीके समान क्षमाके धारक थे, पानीके समान आश्रित मनुष्योंके सन्तापको दूर करते थे, पर्वतके समान अकम्प थे, परमाणुके समान निःसङ्ग थे, आकाशके समान निर्लेप थे, समुद्रके समान गम्भीर थे, चन्द्रमाके समान सबको आह्लादित करते थे, सूर्यके समान देदीप्यमान थे, तपाये हुए सुवर्णके समान भीतर-बाहर शुद्ध थे, दर्पणके समान समदर्शी थे, कछुवेके समान सङ्कोची थे, साँपके समान कहीं अपना स्थिर निवास नहीं बनाते थे, हाथीके समान चुपचाप गमन करते थे, शृगालके समान सामने देखते थे, उत्तम सिंहके समान शूरवीर थे और हरिणके समान सदा विनिद्र-जागरूक रहते थे। उन्होंने सब परिषह जीत लिये थे, सब उपसर्ग सह लिये थे और विक्रिया आदि अनेक ऋद्धियां प्राप्त कर ली थीं ।। १२२-१२६ ॥ उन्होंने क्षपकश्रेणीपर आरूढ़ होकर दो शुक्तध्यानोंके द्वारा घातिया कर्मोंको नष्टकर केवलज्ञान उत्पन्न किया था ।। १२७ ॥ तदनन्तर अनेक देशोंमें विहारकर अनेक भव्य जीवोंको समीचीन धर्मका उपदेश दिया और कुमार्गमें चलनेवाले मनुष्योंके लिए दुर्गम मोक्षका समीचीन मार्ग सबको बतलाया ।। १२८ ॥ जब उनकी आयु अन्तर्मुहूर्तकी रह गई तब तीनों योगोंका निरोध कर उन्होंने समस्त कर्मों के क्षयसे प्राप्त होनेवाला अविनाशी मोक्षपद प्राप्त किया ।। १२९ ।। जिन्होंने अपने जिनेन्द्रके समान शरीरसे सनत्कुमार इन्द्रको जीत लिया, जिन्होंने अपने पराक्रमके बलसे दिशाओंके समूह पर आक्रमण किया और धर्मचक्र द्वारा पापोंका समूह नष्ट किया वे श्रीसनत्कुमार भगवान् तुम सबके लिए शीघ्र ही लक्ष्मी प्रदान करें ।॥ १३० ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, भगवद्गुणभद्राचार्य विरचित त्रिषष्टिलक्षण महापुराणके संग्रहमें तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन करनेवाला इकसठवाँ पर्व समाप्त हुआ ।
पर्व 62
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60
उत्तरपुराण सारांश
पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 |
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
आदिपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47
आदिपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47
Download PDF
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena