चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 543 to 552
श्लोक ( Shlok ) 543 – 544
एवं विनोदैरन्यैश्च काले याते निरन्तरम् । सुखेन केनचिद् भोगनिवेंगे सति हेतुना ॥ ५४३ ॥राज्यभारं परित्यज्य तपोभारं समुद्वहन् । जीवितान्ते तनुं त्यक्त्वा सहस्त्रारे सुरोऽभवः ॥ ५४४ ॥
इस प्रकारके अन्य कितने ही विनोदोंसे जयद्रथका काल निरन्तर सुखसे बीत रहा था कि एक दिन उसे किसी कारणवश भोगोंसे वैराग्य हो गया फलस्वरूप राज्यका भार छोड़कर उसने तपश्चरणका भार धारण कर लिया और जीवनके अन्त में शरीर छोड़कर सहस्त्रार स्वर्गमें देव पर्याय प्राप्त कर ली ।। ५४३-५४४ ।।
With many such amusements, Jayadratha’s time was passing in continuous happiness when one day, for some reason, he developed detachment toward worldly pleasures. Consequently, relinquishing the burden of the kingdom, he took upon himself the rigor of ascetic penance. At the end of his life, leaving his mortal body, he attained the divine state of existence in the Sahasrara heaven. (543-544)
श्लोक ( Shlok ) 545
तत्राष्टादशवार्थ्यायुर्दिग्यभोगाभितर्पितः । ततश्चुत्वेह सम्भूतः शुभाशुभविपाकतः ॥ ५४५ ॥
वहाँ वह अठारह सागरकी आयु तक दिव्य भोगोंसे सन्तुष्ट रहा । तदनन्तर वहाँ से च्युत होकर पुण्य पापके उदय से यहाँ उत्पन्न हुआ है ।। ५४५ ।।
There, he remained satisfied with divine pleasures for a lifespan of eighteen sagaras (an immense cosmic time period). Thereafter, falling from that heavenly realm upon the fruition of his merits and demerits, he has been reborn here. (545)
श्लोक ( Shlok ) 546 – 548
चेटकेन हतो हंसः स काष्ठाङ्गारिकोऽभवत् । तेनैव त्वत्पिता युद्धे हतः प्राक्तव जन्मनः ॥ ५४६ ॥ मन्दसानशिशोः पित्रोविप्रयोगकृतैनसः । फलात्षोडशवर्षाणि वियोगस्तव बन्धुभिः ॥ ५४७ ॥ सह सञ्जत इत्येतद्विद्याधरनिरूपितम् । श्रुत्वा कल्याणबन्धुस्त्वं ममेत्येनमपूजयत् ॥ ५४८ ॥
जिस सेवकने हंसको मारा था वह काष्ठाङ्गारिक हुआ है और उसीने तुम्हारा जन्म होनेके पहले ही युद्धमें तुम्हारे पिताको मारा है। तुमने हंसके बच्चेको सोलह दिन तक उसके माता-पितासे जुदा रक्खा था उसी पापके फलसे तुम्हारा सोलह वर्ष तक भाई-बन्धुओंके साथ वियोग हुआ है। इस प्रकार विद्याधरकी कही कथा सुनकर जीवन्धरकुमार कहने लगे कि तू मेरा कल्याणकारी बन्धु है ऐसा कह कर उन्होंने उसका खूब सत्कार किया ।। ५४६-५४८ ।।
“The servant who had killed the swan has been reborn as Kashthangarika, and it is he who killed your father in battle even before your birth. Because you kept the baby swan separated from its parents for sixteen days, it is as a consequence of that very sin that you suffered separation from your kinsmen and relatives for sixteen years.” Hearing the story related by the Vidyadhara in this manner, Prince Jivandhara said, “You are my benevolent brother,” and saying so, he honored and welcomed him grandly. (546-548)
श्लोक ( Shlok ) 549
तस्मादागत्य हेमाभनगरं प्राप्य सम्मदात् । कामभोगसुखं स्वैरमिष्टैरनुभवन् स्थितः ॥ ५४९ ॥
तदनन्तर वे बड़ी प्रसन्नतासे सबके साथ हेमाभनगर आये और इष्ट जनोंके साथ इच्छानुसार कामभोगका सुख भोगते हुए रहने लगे ।। ५४९ ।।
Thereafter, with great joy, they all came to Hemabhnagar and began living happily with their loved ones, enjoying worldly and sensual pleasures to their heart’s content. (549)
श्लोक ( Shlok ) 550 – 552
इदं प्रकृतमत्रान्यत्संविधानमुदीर्यते । नन्दाज्यस्य पुरात्स्वस्मान्निर्याणानन्तरे दिने ॥ ५५० ॥ गन्धर्वदत्ता सम्पृष्टा स्नेहितैर्मधुरादिभिः । वदास्माकं विवेत्सि त्वं कुमारौ क्व गताविति ॥ ५५१ ॥साप्याह सुजने देशे हेमाभनगरे सुखम् । वसतस्तत्र का चिन्ता युष्माकमिति सादरम् ॥ ५५२ ॥
सुधर्माचार्य राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक ! यह तुझे प्रकृत बात बतलाई। अब इसीसे सम्बन्ध रखनेवाली कथा कही जाती है। जिस दिन नन्दाढ्य राजपुर नगरसे निकल गया उसके दूसरे ही दिन मधुर आदि मित्रोंने गन्धर्वदत्तासे पूछा कि दोनों कुमार कहाँ गये हैं ? तू सब जानती है, बतला । इसके उत्तरमें गन्धर्वेदत्ताने बड़े आदरसे कहा कि आप लोग उनकी चिन्ता क्यों करते हैं वे दोनों भाई सुजन देशके हेमाभ नगर में सुखसे रहते हैं ।॥ ५५०-५५२ ।।
Acharya Sudharma says to King Shrenika, “O Shrenika! This is the relevant account I have narrated to you. Now, a story connected to this very matter is being told. The very next day after Nandadhya departed from Rajpura city, Madhura and other friends asked Gandharvadatta, ‘Where have the two princes gone? You know everything, please tell us.’ In response, Gandharvadatta said with great respect, ‘Why do you worry about them? Both the brothers are living happily in Hemabh Nagar of the Sujana country.'” (550-552)
श्लोक 553 से 571
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542
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