चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 584 to 602
श्लोक ( Shlok ) 584 – 585
प्राप्य तन्निजभृत्यादीन्पुरः प्रस्थाप्य कस्यचित् । मदागतिर्न वाच्येति प्रतिपाद्य पृथक् पृथक् ॥ ५८४ ॥ वैश्यवेषं समादाय विद्यामुद्राप्रभावतः । पुरं प्रविश्य कस्मिंश्चिदापणे समवस्थितः ॥ ५८५ ॥
राजपुर नगरके समीप जाकर उन्होंने अपने सेवक आदि सब लोगोंको अलग-अलग यह कहकर कि ‘किसीसे मेरे आनेकी खबर नहीं कहना’ पहले ही नगर में भेज दिया और स्वयं विद्यामयी अँगूठीके प्रभावसे वेश्यका वेष रखकर नगर में प्रविष्ट हो किसीकी दूकान पर जा बैठे ।। ५८४-५८५ ।।
Approaching the vicinity of Rajpura city, he sent his servants and all others ahead into the city, instructing each of them individually, “Do not disclose the news of my arrival to anyone.” He himself, assuming the guise of a merchant through the power of a magical ring, entered the city and sat down at someone’s shop. (584-585)
श्लोक ( Shlok ) 586 – 587
तत्र तत्सन्निधानेन नानारत्नादिभाण्डकम् । अपूर्वलाभसंवृत्तं दृष्ट्वा सागरदत्तकः ॥ ५८६ ॥षणिगादेशनिर्दिष्टो दैवशैरयमित्यसौ । दत्तवान्विमलां तस्मै सुतां ‘स्वां कमलोद्भवाम् ॥ ५८७ ॥
वहाँ उनके समीप बैठ जानेसे सागरदत्त सेठको अनेक रत्न आदिके पिटारे तथा और भी अपूर्व वस्तुओं का लाभ हुआ । यह देख उसने विचार किया कि ‘निमित्तज्ञानीने जिसके लिए कहा था यह वहीपुरुष है, ऐसा विचार कर उसने अपनी स्त्री कमलासे उत्पन्न हुई विमला नामकी पुत्री उन्हें समर्पित कर दी ॥ ५८६-५८७ ॥
Because he sat near him there, the merchant Sagaradatta gained numerous caskets of jewels and other unprecedented goods. Seeing this, he reflected, “This is the very man the astrologer had spoken of.” With this thought, he presented his daughter named Vimala, born of his wife Kamala, to him in marriage. (586-587)
श्लोक ( Shlok ) 588 – 596
दिनानि कानिचित्तत्र संवसन् सुखमन्यदा । परिव्राजकवेषेण काष्ठाङ्गारिकसंसदम् ॥ ५८८ ॥प्रविश्य तं समालोक्य कताशीर्वादसक्रियः । शृणु राजन्नहं भोक्तुं याचे त्वामतिथिर्गुणी ॥ ५८९ ॥मां भोजयेत्युवाचैतच्छ्रुत्वा सम्प्रतिपन्नवान् । मदुद्योगफलस्यैतन्निमित्तं कुसुमं परम् ॥ ५९० ॥इत्यग्रासनमास्थाय भुक्त्वा तस्मात्स निर्गतः । वशीकरणचूर्णादिप्रत्यक्षफलमौषधम् ॥ ५९१ ॥मत्करे विद्यते यस्मै रुचिर्गृह्णात्वसाविदम् । इति राजकमभ्येत्य पृथक्पृथगघोषयत् ॥ ५९२ ॥तच्छ्रुत्वा पश्य नैर्लज्ज्यमस्य वार्धक्यमीदृशम् । वशीकरणचूर्णाअनादिबन्धनमप्यदः ॥ ५९३ ॥इति तद्वचनात्सर्वैः कृत्वा हासं द्विजोत्तम । कन्यका गुणमालाख्या पुरेऽस्मिन्नस्ति विश्रुता ॥ ५९४ ॥जीवन्धरेण मध्चूर्णवासस्य न कृता स्तुतिः । इति नृद्वेषिणी जाता तां स्वचूर्णाअनादिभिः ॥५९५ ॥वशीकुरुष्व तद्वीक्ष्य तव मन्त्रौषधादिकम् । मौल्येन बहुना सर्वमाददिष्यामहे वयम् ॥ ५९६ ॥
विवाहके बाद जीवन्धर कुमार कुछ दिन तक सागरदत्त सेठके यहाँ सुखसे रहे। तदनुसार किसी अन्य समय परिव्राजकका वेष रखकर काष्ठाङ्गारिककी सभा में गये । वहाँ प्रवेश कर तथा काष्ठाङ्गारको देखकर उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा कि ‘हे राजन् ! सुनो, मैं एक गुणवान् अतिथि हूँ, तुझसे भोजन चाहता हूँ, मुझे खिला दे’। यह सुनकर काष्ठाङ्गारिकने उसे भोजन कराना स्वीकृत कर लिया। ‘यह निमित्त, मेरे उद्योग रूपी फलको उत्पन्न करनेके लिए मानो फूल ही है’ ऐसा विचार कर उन्होंने अगली आसन पर आरूढ़ होकर भोजन किया और भोजनोपरान्त वहाँसे चल दिया। तदनन्तर उन्होंने राजाओंके समूहमें जाकर अलग-अलग यह घोषणा कर दी कि ‘मेरे हाथमें प्रत्यक्ष फल देनेवाला वशीकरण चूर्ण आदि उत्तम ओषधि है जिसकी इच्छा हो वह ले ले’ । उनकी यह घोषणा सुनकर सब लोग हँसी करते हुए कहने लगे कि देखो इसकी निर्लज्जता । इसका ऐसा तो बुढ़ापा है फिर भी वशीकरण चूर्ण, अञ्जन तथा बन्धक आदिकी औषधियाँ रखे हुए है। इस प्रकार कहते हुए उन लोगोंने हँसी कर कहा कि ‘हे ब्राह्मण ! इस नगरमें एक गुणमाला नामकी प्रसिद्ध कन्या है। ‘जीवन्धरने मेरे चूर्णकी सुगन्धिकी प्रशंसा नहीं की है’ इसलिए वह पुरुष मात्रसे द्वेष रखने लगी है। तू अपने चूर्ण तथा अञ्जन आदिसे पहले उसे वशमें कर ले, बादमें यह देख हम सब लोग तेरे मन्त्र तथा औषधि आदिको बहुत भारी मूल्य देकर खरीद लेंगे’ ।। ५८८-५९६ ।।
After the wedding, Prince Jivandhara lived happily at the house of the merchant Sagaradatta for a few days. Subsequently, on another occasion, he assumed the guise of a wandering ascetic (Parivrajaka) and went to the court of Kashthangarika. Entering the court and looking at Kashthangarika, he offered a blessing and said, “O King! Listen, I am a worthy guest and desire food from you; please feed me.” Hearing this, Kashthangarika agreed to feed him.
Reflecting that “this omen is like a flower blossom signaling the arrival of the fruit of my efforts,” the prince sat on the seat provided before him, partook of the meal, and departed from there after eating. Following this, he went among the assemblies of kings and made a public announcement in various places: “I possess excellent medicines, such as a captivating powder (vashikaran churn) that yields immediate results. Whoever desires it may take it.”
Hearing his announcement, everyone mocked him and began to say, “Look at his shamelessness! Despite being so old, he carries around love-charms, aphrodisiac powders, collyrium, and binding herbs.” Mocking him in this manner, they said, “O Brahmin! There is a famous maiden named Gunamala in this city. Because she believes that ‘Jivandhara did not praise the fragrance of my powder,’ she has developed an aversion to all men. Win her over first using your powders and collyrium; seeing that, all of us will purchase your mantras and medicines by paying a very high price.” (588-596)
श्लोक ( Shlok ) 597
इत्युक्तस्तैः सकोपो वा युष्मज्जीवन्धरो विधीः । चूर्णवासादिभेदं किं स जानाति परीक्षितुम् ॥ ५९७ ॥
इस प्रकार लोगोंके कहने पर वह ब्राह्मण क्रोधित-सा होकर कहने लगा कि तुम्हारा जीबन्धर मूर्ख होगा, वह चूर्णोकी सुगन्धि आदिके भेदकी परीक्षा करना क्या जाने ।। ५९७ ॥
Hearing the people speak in this manner, the Brahmin became seemingly enraged and began to say, “Your Jivandhara must be a fool! What could he possibly know about examining and discerning the distinct qualities of a powder’s fragrance?” (597)
श्लोक ( Shlok ) 598
इत्युक्तवांस्ततः सर्वे सकोपा विप्रमब्रुवन् । यथेष्टं किं ब्रवीष्येवं नृसारमविवेचयन् ॥ ५९८ ॥
इसके उत्तरमें सब लोग क्रोधित होकर उस ब्राह्मणसे कहने लगे कि ‘जीवन्धर मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं’ इसका विचार किये बिना ही तू उनके प्रति इच्छानुसार यह क्या बक रहा है ॥ ५९८ ॥
In response, everyone became angry and said to that Brahmin, “Without considering that ‘Jivandhara is the foremost among men,’ what is this nonsense you are uttering against him according to your whim?” (598)
श्लोक ( Shlok ) 599
आत्मस्तवोऽन्यनिन्दा च मरणान्न विशिष्यते । इति लोकप्रसिद्धं किं न श्रुतं दुःश्रुतोद्धत ॥ ५९९ ॥
हे मिथ्याशास्त्रसे उद्दण्ड ! क्या तूने यह लोक-प्रसिद्ध कहावत नहीं सुनी है कि अपनी प्रशंसा और दूसरेकी निन्दामें मरणसे कुछ विशेषता (अंतर) नहीं हैं अर्थात् मरणके ही समान है ॥५९९॥
“O you who are arrogant due to false scriptures! Have you not heard the world-renowned proverb that there is little difference between self-praise combined with the slander of others and death itself—meaning, it is just like dying?” (599)
श्लोक ( Shlok ) 600 – 602
इत्यसौ तैरधिक्षिप्तः किं न सन्ति प्रशंसकाः । युष्मद्विधा ममापीति सम्भाव्यात्मानमुद्धतः ॥ ६०० ॥घटदासीं विधास्यामि गुणमालां मुहूर्ततः । ममेति सङ्गरं कृत्वा प्रस्थितस्तन्नहं प्रति ॥ ६०१ ॥तन्त्र तचेटिकामेकामाहूय स्वामिनीं निजम् । ज्ञापयेति स्थितः कश्चिद्विप्रो द्वारीत्यधू बुधत् ॥ ६०२ ॥
इस प्रकार उन लोगोंके द्वारा निन्दित हुआ ब्राह्मण कहने लगा कि तो क्या आप जैसे लोग मेरी भी प्रशंसा करनेवाले नहीं हैं ? ‘मैं भी कोई पुरुष हूँ’ इस तरह अपनी प्रशंसा कर उस उद्धत ब्राह्मणने प्रतिज्ञा की कि ‘मैं क्षणभर में गुणमालाको अपनी घटदासी बना लूँगा’। ऐसी प्रतिज्ञा कर वह गुणमालाके घरकी ओर चल पड़ा। वहाँ जाकर तथा एक दासीको बुलाकर उसने कहा कितुम अपनी मालकिनसे कहो कि द्वार पर कोई ब्राह्मण खड़ा है ।। ६००-६०२ ॥
Being thus reproached by the people, the Brahmin began to say, “So, are people like you not going to praise me either? ‘I, too, am a man of substance’!” Praising himself in this manner, the arrogant Brahmin made a vow, saying, “I will turn Gunamala into my household maidservant in a mere fraction of a moment.” Having made such a vow, he set off toward Gunamala’s house. Arriving there and calling out to a maidservant, he said, “Go and tell your mistress that a Brahmin is standing at the door.” (600-602)
श्लोक 603 से 613
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583
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