मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42 | श्लोक 43 से 52 | श्लोक 53 से 62 | श्लोक 63 से 71
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 66- shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
स्थास्नुबुद्धया विमुग्धत्वादन्वभूवमिमांश्चिरम् । न चेदुल्काप्रपातोऽयं भूयो भ्रान्तिर्भवार्णवे ॥ ७२ ॥
वह विचार करने लगा कि मैंने मूर्खतावश इन भोगोंको स्थायी समझकर चिरकाल तक इनका उपभोग किया । यदि आज यह उल्कापात नहीं होता तो संसार-सागरमें मेरा भ्रमण होता ही रहता ।। ७२ ।।
“He began to ponder, ‘Out of sheer foolishness, I considered these worldly pleasures to be permanent and indulged in them for a very long time. If this meteor had not fallen today, my wandering through the ocean of worldly existence (Samsara) would have surely continued indefinitely.’ || 72 ||”
श्लोक ( Shlok ) 73
इत्यारोप्य सुते राज्यं शिवगुप्तजिनेश्वरम् । प्रपद्य परमं पित्सु ‘रयासीत्संयमद्वयम् ॥ ७३ ॥
ऐसा विचार कर उसने पुत्रके लिए राज्य सौंप दिया और स्वयं शिवगुप्त जिनेश्वरके पास जाकर परमपद पानेकी इच्छासे निश्चय और व्यवहारके भेदसे दोनों प्रकारका संयम धारण कर लिया ।। ७३ ।।
“Reflecting thus, he handed over the kingdom to his son, approached Lord Shivagupta Jineshvara, and, with the desire to attain the supreme spiritual state (Parama-pada), embraced both forms of self-restraint—absolute (Nishchaya) and practical (Vyavahara). || 73 ||”
श्लोक ( Shlok ) 74
समुत्कृष्टाष्टशुद्धीद्धता रुद्धाशुभाश्रवः । क्रमात्कालान्तमासाद्य सुसमाहितमानसः ॥ ७४ ॥
अत्यन्त उत्कृष्ट आठ प्रकारकी शुद्धियोंसे उसका तप देदीप्यमान हो रहा था, उसने अशुभ कर्मोंका आस्त्रव रोक दिया था और क्रम-क्रमसे आयुका अन्त पाकर अपने परिणामोंको समाधियुक्त किया था ॥ ७४ ॥
“His penance shone brilliantly due to the highly supreme eight kinds of purities (Shuddhis). He had completely stopped the influx (Asrava) of inauspicious karmas, and as his lifespan gradually drew to its close, he anchored his consciousness in a state of deep meditative immersion (Samadhi). || 74 ||”
श्लोक ( Shlok ) 75
निजराज्येन संक्रीतं स्वहस्तप्राप्तमच्युतम् । तुतोष कल्पमालोक्य जितक्र यो हि तुष्यति ॥ ७५ ॥
वह अपने राज्यसे खरीदे एवं अपने हाथसे – पुरुषार्थसे प्राप्त हुए अच्युत स्वर्गको देखकर बहुत ही सन्तुष्ट हुआ सो ठीक ही है क्योंकि अल्प मूल्य देकर अधिक मूल्यकी वस्तुको खरीदनेवाला मनुष्य सन्तुष्ट होता ही है ।। ७५ ।।
“He felt immensely satisfied upon beholding the Achyuta heaven (Achyuta Svarga), which he had bought with his own kingdom and acquired through his own hand—that is, through his supreme spiritual effort (Purushartha). This is indeed fitting, for a person who acquires a highly valuable object by paying a very small price is bound to feel completely satisfied. || 75 ||”
श्लोक ( Shlok ) 76 – 78
द्वाविंशत्यब्धिमेयायुः प्रान्तेऽसावच्युताधिपः । द्वीपेऽत्र भरते काशी वाराणस्यां महीभुजः ॥ ७६ ॥इक्ष्वाकोः पद्मनाभस्य रामायाश्चाभवत्सुतः । पद्माभिधानः पद्मादिप्रशस्ताशेषलक्षणः ॥ ७० ॥त्रिंशद्वर्षसहस्त्रायुर्द्वाविंशतिधनुस्तनुः । सुरसम्प्रार्थ्यकान्त्यादिः कार्तस्वरविभास्वरः ॥ ७८ ॥
वहाँ बाईस सागरकी उसकी आयु थी। वह अच्युतेन्द्र आयुके अन्तमें वहाँ से च्युत होकर कहाँ उत्पन्न हुआ इसका वर्णन करते हैं- इसी जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्रमें एक काशी नामक देश है। उसकी वाराणसी नामकी नगरीमें इक्ष्वाकुवंशीय पद्मनाभ नामका राजा राज्य करता था । उसकी स्त्रीके पद्म आदि समस्त लक्षणोंसे सहिण पद्म नामका पुत्र हुआ था। तीस हजार वर्षकी उसकी आयु थी, बाईस धनुष ऊँचा शरीर था, वह सुवर्णके समान देदीप्यमान था, और उसकी कान्ति आदिकी देव लोग भी प्रार्थना करते थे ।।७६-७८।।
“There, his lifespan lasted for twenty-two Sagaras (ocean-like cosmic measures of time). The text now describes where he was reborn after descending from that realm at the end of his celestial life as Achyutendra:
In the Bharata Kshetra of this very Jambudvipa, there lies a country named Kashi. In its capital city called Varanasi, a king named Padmanabha belonging to the Ikshvaku dynasty ruled. To his queen, a son named Padma was born, who was endowed with all the auspicious bodily marks, including that of the lotus (Padma). His lifespan was thirty thousand years, his body stood twenty-two Dhanushas (bow-lengths) tall, he shone radiantly like pure gold, and even the celestial beings longingly admired his divine luster and beauty. || 76-78 ||”
श्लोक ( Shlok ) 79
पुण्योदयात्क्रमेणाप्य चक्रित्वं विक्रमार्जितम् । दशाङ्गभोगान्निः सङ्गमभङ्गा नम्वभूच्चिरम् ॥ ७९ ॥
पुण्यके उदय से उसने क्रमपूर्वक अपने पराक्रम के द्वारा अर्जित किया हुआ चक्रवर्तीपना प्राप्त किया था तथा चिरकाल तक बाधा रहित दश प्रकारके भोगोंका आसक्तिके बिना ही उपभोग किया था ।। ७९ ।।
“Through the rise of his meritorious karma (Punya), he progressively attained the status of a Chakravarti (universal monarch), which he had rightfully earned through his own valor. For a very long time, he enjoyed the ten kinds of worldly pleasures without any affliction and completely free from inner attachment. || 79 ||”
श्लोक ( Shlok ) 80
पृथिवीसुन्दरीमुख्यास्तस्याष्टौ पुत्रिकाः सतीः । सुकेतुखचराधीश ‘पुत्रेभ्योऽदात्प्रसन्नवान् ॥ ८० ॥
उसके पृथिवीसुन्दरीको आदि लेकर आठ सती पुत्रियाँ थीं जिन्हें उसने बड़ी प्रसन्नताके साथ सुकेतु नामक विद्याधरके पुत्रोंके लिए प्रदान किया था ।॥ ८० ॥
“He had eight virtuous daughters, foremost among whom was Prithivisundari, whom he most joyfully gave in marriage to the sons of the Vidyadhara named Suketu. || 80 ||”
श्लोक ( Shlok ) 81
एवं सुखेन “कालेऽस्य याति सत्यम्बुदोऽम्बरे । प्रेक्ष्यः प्रमोदमुत्पाद्य सद्योऽसौ बिकृतिं ययौ ॥ ८१ ॥
इस प्रकार चक्रवर्ती पद्मका काल सुखसे व्यतीत हो रहा था। एक दिन आकाशमें एक सुन्दर बादल दिखाई दिया जो चक्रवर्तीको हर्ष उत्पन्न कर शीघ्र ही नष्ट हो गया ।॥ ८१ ॥
“In this manner, the time of Chakravarti Padma was passing in serene happiness. One day, a beautiful cloud appeared in the sky, which, after bringing a momentary surge of joy to the universal monarch, vanished in an instant. || 81 ||”
श्लोक 82 से 92
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