चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 366 to 383
श्लोक ( Shlok ) 366 – 369
चिरं वने विहृत्यैवं निवृत्तौ गन्धवारणः । तन्महीशस्य नान्नाशनिघोषो जनघोपतः ॥ ३६६ ॥समुद्घान्तो निवार्योऽन्यैरधावत्स्यन्दनं प्रति । सुदृप्तः सुरमञ्जर्याः स कुमारो विलोक्य तम् ॥ ३६७ ॥विनयोनय निर्णीतक्रियः सम्प्राप्य हेलया । कृत्वा परिश्रमं तस्य द्वात्रिंशत्केलिभिः स्वयम् ॥ ३६८ ॥बीतश्रमस्तमस्पन्दं हेलयालानमापयत् । दृष्ट्वास्य गजविज्ञानं पुरं शंसन् जनोऽविशत् ॥ ३६९ ॥
इस प्रकार वनमें चिरकाल तक क्रीड़ा कर जब सब लोग लौट रहे थे तब राजाका अशनिघोष नामका मदोन्मत्त हाथी लोगोंका हल्ला सुन कर बिगड़ उठा। वह अहंकारसे भरा हुआ था और साधारण मनुष्य उसे वश नहीं कर सकते थे। वह हाथी सुरमञ्जरीके रथकी ओर दौड़ा चला आ रहा था। उसे देख कर जीवन्धर कुमारने हाथीकी बिनय और उन्नय क्रियाका शीघ्र ही निर्णय कर लिया, वे लीला पूर्वक उसके पास पहुँचे, बत्तीस तरहकी क्रीड़ाओंके द्वारा उसे खेद खिन्न कर दिया परन्तु स्वयंको कुछ भी खेद नहीं होने दिया। अन्तमें वह हाथी निश्चेष्ट खड़ा हो गया और उन्होंने उसे आलानसे बाँध दिया। यह सब देख नगरवासी लोग जीवन्धर कुमारके हस्ति-विज्ञानकी प्रशंसा करते हुए नगर में प्रविष्ट हुए ॥ ३६६-३६९ ।।
In this manner, after sporting in the forest for a long time, just as everyone was returning, the king’s infuriated elephant named Ashanighosha became enraged upon hearing the commotion of the crowd. He was filled with pride, and ordinary men could not subdue him. The elephant came charging directly toward Suramanjari’s chariot. Seeing this, Prince Jivandhara quickly assessed the elephant’s aggressive movements and behavioral patterns; he effortlessly approached the beast and, through thirty-two types of playful maneuvers, completely exhausted it without experiencing the slightest fatigue himself. Ultimately, the elephant stood motionless, and the prince bound him securely to the hitching post. Witnessing this feat, the townspeople entered the city, highly praising Prince Jivandhara’s profound knowledge of elephant lore.366 – 369
श्लोक ( Shlok ) 370
तदा प्रभृत्यगात्कामव्यामोहे सुरमञ्जरी । जीवन्धर कुमारात्रलोकनाकुलिताशया ॥ ३७० ॥
जीवन्धर कुमारके देखनेसे जिसका हृदय व्याकुलित हो रहा है ऐसी सुरमञ्जरी उसी समयसे कामसे मोहित हो गई ॥ ३७० ॥
“Seeing Jivandhara Kumara, Suramanjari’s heart became deeply agitated, and from that very moment, she became infatuated with love.”370
श्लोक ( Shlok ) 371 – 372
इङ्गितैश्चेष्टितैस्तस्याः सङ्कथाभिश्च युक्तितः । माता पिता च जीवन्धराभिलाषपरायणाम् ॥ ३७१ ॥विज्ञाय तां निवेद्येतत्तत्पित्रे तदनुज्ञया । विभूतिमत्कुमाराय शुभयोगे वितेरतुः ॥ ३७२ ॥
सुरमञ्जरी के माता-पिताने, उसकी इंगितोंसे, चेष्टाओंसे तथा बातचीतसे युक्ति पूर्वक यह जान लिया कि इसकीजीवन्धर कुमारमें लग रही है। तदनन्तर उन्होंने जीवन्धर कुमारके माता-पितासे निवेदन किया और उनकी आज्ञानुसार शुभ योगमें ऐश्वर्यको धारण करने वाले जीवन्धर कुमारके लिए वह कन्या समर्पण कर दी ।। ३७१-३७२ ।।
Through her gestures, body language, and speech, Suramanjari’s parents cleverly discerned that her heart was set on Prince Jivandhara. Thereafter, they made a proposal to the parents of Prince Jivandhara, and with their approval, they gave away their daughter in marriage to the glorious Prince Jivandhara during an auspicious astrological alignment.371 – 372
श्लोक ( Shlok ) 373 – 377
ततः समुचितप्रेम्णा स कामं सुखमन्वभूत् । तत्र तच्छौर्य’ सौभाग्यसङ्कथां सन्ततं जनैः ॥ ३७३ ॥क्रियमाणां दुरात्माऽसौ काष्ठाङ्गारिकभूपतिः । कोपादशक्नुवन्सोढुं मगन्धगजबाधनम् ॥ ३७४॥कृत्वा जीवन्धरस्तस्य परिभूतिं व्यधादधीः । पथ्यामलकशुण्ठ्यादिदानग्रहणकर्मणः ॥ ३७५ ॥निजजात्यनुरूपाद्यो विमुखः सुष्ठु गर्वितः । राजपुत्रोचिते वृत्ते विषक्तोऽयं वराटजः ॥ ३७५ ॥ कृतान्तवदनं सद्यः प्रापयेमं कुचेष्टितम् । इत्याख्यध्वण्डदेण्डाख्यं मुख्यं तत्पुररक्षिणम् ॥ ३७७ ॥
इसके बाद जीवन्धर कुमार उचित प्रेम करते हुए सुरमञ्जरीके साथ इच्छानुसार सुखका उपभोग करने लगे । तदनन्तर नगरके लोग निरन्तर जीवन्धर कुमारकी शूर-वीरता और सौभाग्यशीलता की कथा करने लगे परन्तु उसे दुष्ट काष्ठाङ्गारिक राजा सहन नहीं कर सका इसलिए उसने क्रोधमें आकर लोगोंसे कहा कि इस मूर्ख जीवन्धरने मेरे गन्धवारण हाथी को बाधा पहुँचा कर उसका तिरस्कार किया है। यह वैश्यका पुत्र है इसलिए हरड, आँवला, शोंठ आदि चीजों का क्रय-विक्रय करना इसका काम है परन्तु यह अपनी जातिके कार्योंसे तो विमुख रहता है और अहंकारसे चूर हो कर राजपुत्रोंके करने योग्य कार्यमें आसक्त होता है। इसलिए खोटी चेष्टा करने वाले इस दुष्टको शीघ्र ही यमराजके मुखमें भेज दो। इस प्रकार उसने चण्ड दण्ड नामक, नगरके मुख्य रक्षकको आज्ञा दी ।। ३७३-३७७ ॥
Thereafter, Prince Jīvandhara, cherishing Suramañjarī with fitting affection, began to enjoy every happiness according to his desire. In due course, the people of the city continually extolled the valour, heroism, and good fortune of Prince Jīvandhara. But the wicked King Kāṣṭhāṅgārika could not endure such praise. Filled with anger, he said to the people:
“This foolish Jīvandhara has insulted my royal elephant, Gandhavāraṇa, by obstructing and overpowering it. He is the son of a merchant; buying and selling such commodities as harad, āmalakī, dry ginger, and the like is the work suited to his station. Yet he has turned away from the duties of his own class and, intoxicated with pride, has become engrossed in pursuits befitting only princes. Therefore, send this wicked man, who indulges in such improper conduct, without delay into the jaws of Yama, the Lord of Death.”
Having spoken thus, he commanded Caṇḍadaṇḍa, the chief guardian of the city, to carry out his order. ॥373–377॥
श्लोक ( Shlok ) 378 – 383
स सन्नद्धबलोऽधावदभि जीवन्धरं क्रुधा । स कुमारोऽपि तज्ज्ञात्वा ससहायो युयुत्सया ॥ ३७८ ॥ तमभ्येत्य तदेवास्मै ददौ भङ्गमभङ्गुरः । पुनः कुपितवान्काष्ठाङ्गारिकः स्वबलं बहु ॥ ३७९ ॥प्राहिणोराग्निरीक्ष्यार्द्रचित्तो जीवन्धरो वृथा । क्षुद्रप्राणिविघातेन किमनेन दुरात्मकम् ॥ ३८० ॥काष्ठाङ्गारिकमेवैनमुपायैः प्रशमं नये । इति यक्षं निजं मित्रमस्मरत्सोऽप्युपागतः ॥ ३८१ ॥ज्ञातजीवन्धराकूतस्तत्सर्व शान्तिमानयत् । ततो विजयगिर्याख्यं समारोप्य गजाधिपम् ॥ ३८२ ॥कुमारं तदनुज्ञानात्स्वावासमनयत्सुहृत् । स्वगेहदर्शनं नाम सद्भावः सुहृदां स हि ॥ ३८३ ॥
चण्डदण्ड भी सेना तैयार कर क्रोधसे जीवन्धर कुमारके सम्मुख दौड़ा। इधर जीवन्धर कुमारको भी इसका पता लग गया इसलिए वे भी मित्रोंको साथ ले युद्ध करनेकी इच्छासे उसके सम्मुख गये और स्वयं सुरक्षित रह कर उसे उसी समय पराजित कर दिया ।। इससे काष्ठाङ्गारिक और भी कुपित हुआ। और उसने बहुत-सी सेना भेजी। उस सेनाको देख कर जीवन्धर कुमार दयार्द्धचित्त होकर विचार करने लगे कि इन क्षुद्र प्राणियोंको व्यर्थ मारनेसे क्या लाभ है? मैं किन्हीं उपायोंसे इस दुष्ट काष्ठाङ्गारिकको ही शान्त करता हूँ। ऐसा विचार कर उन्होंने अपने मित्र सुदर्शन यक्षका उपकार किया और उसने भी आकर तथा जीवन्धर कुमारका अभिप्राय जान कर सब उपद्रव शान्त कर दिया ।। तदनन्तर वह यक्ष, जीवन्धर कुमारकी सम्मतिसे उन्हें विजयगिरि नामक हाथी पर बैठा कर अपने घर ले गया सो ठीक ही है क्योंकि मित्रके लिए अपना घर दिखलाना मित्रोंका सद्भाव रहना ही है ।। ३७८-३८३ ।।
Caṇḍadaṇḍa, too, assembled an army and, filled with wrath, rushed toward Prince Jīvandhara. Meanwhile, Prince Jīvandhara learned of the impending attack. Accompanied by his friends and eager to engage in battle, he advanced to confront him. Remaining secure and unharmed himself, he swiftly defeated Caṇḍadaṇḍa on the battlefield.
This made Kāṣṭhāṅgārika even more furious, and he dispatched a much larger army. On beholding that army, Prince Jīvandhara’s heart was moved with compassion, and he reflected:
“What purpose would be served by needlessly slaying these insignificant creatures? By some means, I shall instead subdue this wicked Kāṣṭhāṅgārika himself.”
Having thus resolved, he remembered the favour owed to him by his friend, the Yakṣa Sudarśana. The Yakṣa promptly appeared, and, having understood Prince Jīvandhara’s intention, he brought all the disturbances and hostilities to an end.
Thereafter, with Prince Jīvandhara’s consent, the Yakṣa seated him upon an elephant named Vijayagiri and took him to his own abode. And rightly so—for among true friends, showing one’s home to a friend is itself a sign of sincere affection and enduring goodwill. ॥378–383॥
श्लोक 384 से 391
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365
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