नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 95 to 111
श्लोक ( Shlok ) 95 – 97
धर्मावान्धकवृष्टेश्च सुभद्रायाश्च तुग्वराः । समुद्रविजयोऽक्षोभ्यस्ततः स्तिमितसागरः ॥ ९५ ॥हिमवान् विजयो विद्वानचलो धारणाह्वयः । पुरणः पूरितार्थीच्छो नवमोऽप्यभिनन्दनः ॥ ९६ ॥वसुदेवोऽन्तिमश्चैवं दशाभूवन् शशिप्रभाः । कुन्ती माङ्गी च सोमे वा सुते प्रादुर्बभूवतुः ॥ ९७ ॥
अन्धकवृष्टिकी रानीका नाम सुभद्रा था । उन दोनों के धर्मके समान गम्भीर समुद्रविजय १, स्तिमितसागर २, हिमवान् ३, विजय ४, विद्वान् अचल ५, धारण ६, पूरण ७, पुरितार्थीच्छ ८, अभिनन्दन १ और वसुदेव १० ये चन्द्रमाके समान कान्तिवाले दश पुत्र हुए तथा चन्द्रिकाके समान कान्तिवाली कुन्ती और माद्री नामकी दो पुत्रियाँ हुईं ॥ ९५-९७ ॥
The name of Andhakavrishti’s queen was Subhadra. Just like Righteousness (Dharma) personified, they had ten sons possessing a radiance like that of the moon: Samudravijaya, Stimitasagara, Himavan, Vijaya, the learned Achala, Dharana, Purana, Puritarthichha, Abhinandana, and Vasudev; they also had two daughters possessing a radiance like that of moonlight, named Kunti and Madri. [95-97]
श्लोक ( Shlok ) 98 – 99
समुद्रविजयादीनां नवानां सुरतप्रदाः । शिवदेव्यनु तस्य धृतीश्वराथ स्वयम्प्रभा ॥ ९८ ॥सुनीताख्या च शीता च प्रियावाक् च प्रभावती । कालिङ्गी सुप्रभा चेति बभूवुर्भुवनोत्तमाः ॥ ९९ ॥
समुद्रविजय आदि पहलेके नौ पुत्रोंके क्रमसे संभोग सुखको प्रदान करनेवाली शिवदेवी, धृतीश्वरा, स्वयंप्रभा, सुनीता, सीता, प्रियावाक्, प्रभावती, कालिङ्गी और सुप्रभा नामकी संसारमें सबसे उत्तम स्त्रियाँ थीं ।॥ ९८-९९॥
The first nine sons, beginning with Samudravijaya, had as their wives Shivadevi, Dhritishvara, Svayamprabha, Sunita, Sita, Priyavak, Prabhavati, Kalingi, and Suprabha, respectively. These women, who bestowed the bliss of conjugal union upon them, were the most excellent and supreme in the world. [98-99]
श्लोक ( Shlok ) 100
पद्मावत्या द्वितीयस्य वृष्टेश्च तनयास्त्रयः । उग्रदेवमहाद्युक्तिसेनान्ताश्च गुणान्विताः ॥ १०० ॥
राजा शूरवीरके द्वितीय पुत्र नरवृष्टिकी रानीका नाम पद्मावती था और उससे उनके उग्रसेन, देवसेन तथा महासेन नामके तीन गुणी पुत्र उत्पन्न हुए ।। १०० ।।
The name of the queen of Naravrishti—the second son of King Shuravira (Vira)—was Padmavati, and from her were born his three virtuous sons named Ugrasena, Devasena, and Mahasena. [100]
श्लोक ( Shlok ) 101 – 103
गान्धारी च सुता प्रादुरभवन् शुभदायिनः । अथ कौरवमुख्यस्य हस्तिनाख्यपुरेशिनः ॥ १०१ ॥शक्तिनाममहीशस्य शतक्याश्च पराशरः । तस्य मत्स्यकुलोत्पनराजपुत्र्यां सुतोऽभवत् ॥ १०२ ॥सत्यवत्यां सुधीर्व्याप्तः पुनर्व्याससुभद्रयोः । धृतराष्ट्रो महान् पाण्डुविंदुरश्च सुतास्त्रयः ॥ १०३ ॥
इनके सिवाय एक गन्धारी नामकी पुत्री भी हुई। ये सब पुत्र-पुत्रियाँ अत्यन्त सुख देने-वाले थे । इधर हस्तिनापुर नगर में कौरव वंशी राजा शक्ति राज्य करता था। उसकी शतकी नामकी रानीसे पराशर नामका पुत्र हुआ। उस पराशरके मत्स्य कुलमें उत्पन्न राजपुत्री रानी सत्यवतीसे बुद्धिमान् व्यास नामका पुत्र हुआ। व्यासकी स्त्रीका नाम सुभद्रा था इसलिए तदनन्तर उन दोनोंके धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर ये तीन पुत्र हुए ।। १०१-१०३ ।।
Apart from these, there was also a daughter named Gandhari. All these sons and daughters were providers of immense happiness. Meanwhile, in the city of Hastinapur, King Shakti of the Kaurava lineage was ruling. From his queen named Shataki, a son named Parashara was born. From that Parashara and Queen Satyavati, a princess born into the Matsya clan, a wise son named Vyasa was born. The name of Vyasa’s wife was Subhadra, and thereafter, to those two were born three sons: Dhritarashtra, Pandu, and Vidura. [101-103]
श्लोक ( Shlok ) 104 – 111
अथात्रैत्य विहारार्थं कदाचिद्वज्रमालिनि । नभोयायिनि विस्मृत्य गते हस्ताङ्गुलीयकम् ॥ १०४ ॥विलोक्य पाण्डुभूपालो गहने तत्समग्रहीत् । स्मृत्वा खगं विवृत्यैत्य मुद्रिकां तामितस्ततः १०५ ॥अन्विच्छन्तं विलोक्याह पाण्डुः किं मृग्यते त्वया । इति तद्वचनं श्रुत्वा विद्याधन्मम मुद्रिका ॥ १०६ ॥विनष्टेत्यवदत्तस्य पाण्डुश्चैतामदर्शयत् । पुनः किमनया कृत्यमिति तस्यानुयोजनात् ॥ १०७ ॥भद्वैषा कामरूपस्य साधनीत्यब्रवीत्खगः । तद्येवं कानिचिद् भ्रातदिनान्येषास्तु मत्करे ॥ १०८ ॥प्रभावमस्याः पश्यामीत्यथितस्तेन सोऽप्यदात् । पाण्डुश्च तत्कृतादृश्यनिजरूपेण सङ्गमम् ॥ १०९ ॥कुन्त्या सहाकृतोत्पन्नस्तत्र कर्णाह्वयः सुतः । ततः परैरविदितं मञ्जूषाख्यं सकुण्डलम् ॥ ११० ॥सरत्नकवचं लेख्यपत्रकेण सहार्भकम् । ‘कुन्तीपरिजनः कालिङ्गयाः प्रवाहे मुमोच तम् ॥ १११ ॥
अथानन्तर- किसी एक समय वज्रमाली नामका विद्याधर क्रीड़ा करनेके लिए हस्तिनापुरके वनमें आया था। वह वहाँ अपने हाथकी अंगूठी भूलकर चला गया। इधर राजा पाण्डु भी उसी वनमें घूम रहे थे। इन्हें वह अंगूठी दिखी तो इन्होंने उठा ली। जब उस विद्याधरको अंगूठीका स्मरण आया तब वह लौटकर उसी वनमें आया तथा यहाँ वहाँ उसकी खोज करने लगा। उसे ऐसा करते देख पाण्डुने कहा कि आप क्या खोज रहे हैं ? पाण्डुके वचन सुनकर विद्याधरने कहा कि मेरीअंगूठी गिर गई है। इसके उत्तरमें पाण्डुने उसे अंगूठी दिखा दी। पश्चात् पाण्डुने उस विद्याधरसे पूछा कि इससे क्या काम होता है ? उत्तर में विद्याधरने कहा कि हे भद्र ! यह अंगूठी इच्छानुसार रूप बनानेवाली है। यह सुन कर पाण्डुने प्रार्थना की कि हे भाई ! यदि ऐसा है तो यह अंगूठी कुछ दिन तक मेरे हाथमें रहने दो, मैं इसका प्रभाव देखूँगा । पाण्डुकी इस प्रार्थना पर उस विद्याधरने वह अंगठी उन्हें दे दी। पाण्डुने उस अंगूठीके द्वारा किये अपने अदृश्य रूपसे कुन्तीके साथ समागम किया जिससे उसके कर्ण नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। कुन्तीके परिजनोंने दूसरोंको विदित न होने पावे इस तरह छिपा कर उस बालकको एक संदूकचीमें रक्खा, उसे कुण्डल तथा रत्नोंका कवच पहिनाया और एक परिचायक पत्र साथ रखकर यमुना नदीके प्रवाहमें छोड़ दिया ।। १०४-१११ ।।
Thereafter, at one time, a Vidyadhara named Vajramali came to the forest of Hastinapur for recreation. He left the place, inadvertently forgetting his ring there. Meanwhile, King Pandu was also wandering in that same forest. When he spotted the ring, he picked it up. When the Vidyadhara remembered the ring, he returned to the forest and began searching for it here and there. Seeing him do so, Pandu asked, “What are you searching for?” Hearing Pandu’s words, the Vidyadhara replied, “My ring has fallen.” In response, Pandu showed him the ring. Afterward, Pandu asked the Vidyadhara, “What purpose does this serve?” The Vidyadhara answered, “O noble one! This ring has the power to change one’s form at will.” Hearing this, Pandu requested, “O brother! If that is the case, let this ring remain in my hand for a few days; I wish to see its power.” Upon Pandu’s request, the Vidyadhara gave the ring to him. By rendering himself invisible through that ring, Pandu united with Kunti, as a result of which a son named Karna was born to her. So that it would not become known to others, Kunti’s relatives secretly placed the infant in a small chest, adorned him with earrings and an armor of gems, and, along with an identifying letter, cast him into the current of the Yamuna River. [104-111]
श्लोक 112 से 124
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