चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 73 to 81
श्लोक ( Shlok ) 73
शिवभूतेरभूङ्गायां सोमिष्टा सोमशर्मणः । सुना तुम्वशमांख्यश्चित्रसेनास्य च प्रिया ॥ ७३ ॥
शिवभूत की स्त्रीका नाम सोमिला था जो कि सोमशर्मा ब्राह्मणकी पुत्री थी और उसी नगरने एक देवशर्मा नामका ब्राह्मण-पुत्र था उसे चित्रसेना व्याही गई थी ॥ ७३ ॥
The name of Shivabhuti’s wife was Somila, who was the daughter of a Brahmin named Somasharma; and Chitrasena was married to a Brahmin’s son named Devasharma, who lived in that very same city. [73]
श्लोक ( Shlok ) 74 – 81
अग्निभूतौ गतप्राणे तन्जस्तत्पदेऽभवत् । विधवा चित्रसेनापि पोप्यत्वं सह सूनुभिः ॥ ७४ ॥शिवभूतेः समापन्ना देवस्य कुटिला गतिः । सोमिला चित्रसेनायास्तत्सुतानां च पोषणम् ॥ ७५ ॥पापिष्टाऽसहमानाऽसौ तजिता शिवभूतिना । कध्वा जीवत्यमा चित्रसेनयायं स चेत्यसत् ॥ ७६ ॥अकरोडूषणं धिग्धिङ्नाकार्य नाम योषिताम् । चित्रसेनापि मामेषा रुपैवादूषयन्मृपा ॥ ७७ ॥निग्रहीष्यामि मृत्वैनां निदानमकरोदिति । अन्यदामन्त्रणे पूर्व शिवगुप्तमुनीश्वरम् ॥ ७८ ॥सोमिलाभोजयतस्यै शिवभूनिः स्म कुप्यति । तत्तपोधनमाहात्म्यकथनेन तया पतिः ॥ ७९ ॥प्रसादितस्ततः साधु तद्दानं सोऽन्वमन्युत । स कालान्तरमाश्रित्य लोकान्तरगतः सुतः ॥ ८० ॥जातोत्र विषये ‘वङ्गे कान्ते कान्तपुरेशिनः । सुवर्णवर्मणो विद्युल्लेखायाश्च महाबलः ॥ ८१ ॥
कितने ही दिन बाद जब अग्निभूति ब्राह्मण मर गया तब उसके स्थानपर उसका पुत्र शिवभूति ब्राह्मण अधिरूढ हुआ। इधर चित्रसेना विधवा हो गई इसलिए अपने पुत्रोंके साथ शिवभूतिके घर आकर रहने लगी सो ठीक ही है क्योंकि कर्मोंकी गति बड़ी टेढ़ी है। शिवभूति, अपनी बहिन चित्रसेना और उसके पुत्रोंका जो भरण-पोषण करता था वह पापिनी सोमिलाको सह्य नहीं हुआ। इसलिए शिवभूतिने उसे ताड़ना दी तब उसने क्रोधित होकर मिथ्या दोष लगाया कि यह मेरा भर्ता चित्रसेनाके साथ जीवित रहता है अर्थात् इसका उसके साथ अनुराग है। यहाँ आचार्य कहते हैं कि स्त्रियोंको कोई भी कार्य अकार्य नहीं है अर्थात वे बुरासे बुरा कार्य कर सकती हैं इसलिए इन स्त्रियोंको बार-बार धिक्कार हो । चित्रसेनाने भी क्रोधमें आकर निदान किया कि इसने मुझे मिध्या दोष लगाया है। इसलिए मैं मरनेके बाद इसका निग्रह करूंगी – बदला लूँगी। तदनन्तर किसी एक दिन सोमिलाने शिवगुप्त नामक मुनिराजको पड़गाहकर आहार दिया जिससे शिवभूतिने सोमिलाके प्रति बहुत ही क्रोध प्रकट किया परन्तु उन मुनिराजका माहात्म्य कह कर सोमिलाने शिवभूतिको प्रसन्न कर लिया और उसने भी उस दानकी अच्छी तरह अनुमोदना की। समय पाकर वह शिवभूति मरा और अत्यन्त रमणीय वङ्ग देशके कान्तपुर नगर में वहाँ के राजा सुवर्णवर्मा तथा रानी विद्युल्लेखाके महाबल नामका पुत्र हुआ ।। ७४-८१ ॥
Many days later, when the Brahmin Agnibhuti died, his son, the Brahmin Shivabhuti, took his place. Meanwhile, Chitrasena became a widow, and therefore, she came to live at Shivabhuti’s house along with her sons. And this is indeed fitting, for the ways of karma are highly twisted. The fact that Shivabhuti maintained and supported his sister Chitrasena and her sons became intolerable to the wicked Somila. Consequently, when Shivabhuti reprimanded her for this, she grew furious and falsely accused him, saying, “My husband lives for Chitrasena,” implying that he had an illicit affection for her. Here, the Acharya remarks that no act is forbidden to women—meaning they are capable of committing the worst of evils—therefore, fie upon such women again and again!
Chitrasena also grew angry and made a solemn vow (Nidana): “She has falsely accused me. Therefore, after my death, I will subdue her and take my revenge.” Thereafter, on a certain day, Somila formally requested and offered alms (food) to a monk named Shivagupta. Shivabhuti expressed great anger toward Somila for this, but by explaining the spiritual greatness of the monk, Somila appeased Shivabhuti, and he, too, thoroughly praised and approved of that charity. In due course of time, Shivabhuti died and was reborn in Kantapur, a city in the exceedingly beautiful Vanga country, as Mahabala—the son of King Suvarnavarma and Queen Vidyullekha. [74-81]
श्लोक 82 से 94
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