राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 391| श्लोक 392 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 421 | श्लोक 422 से 430 | श्लोक 431 से 441
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 442 to 453
श्लोक ( Shlok ) 442
एकविंशतिरब्दानां सहस्त्राण्यल्पवृष्टयः । जलदाः कालदोषेण कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ४४२ ॥
कालदोषके कारण मेघोंने इक्कीस हजार वर्ष तक थोड़ी थोड़ी वर्षा की सो ठीक ही है क्योंकि कालका कोई उल्लंघन नहीं कर सकता ॥ ४४२ ॥
“Due to the flaws of the era (Kala-dosha), the clouds showered only a meager amount of rain for twenty-one thousand years. This is indeed fitting, for no one can ever violate the laws of Time. ॥ 442 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 443
क्रमाद्धीबलकायायुरादिड्रासो भविष्यति । प्रान्ते षोडशवर्षायुजींविनो हस्तदेहकाः ॥ ४४३ ॥
मनुष्योंकी बुद्धि बल काय और आयु आदिका अनुक्रमसे ह्रास होता जावेगा। इस कालके अन्तिम समयमें मनुष्योंकी आयु सोलह वर्षकी और शरीरकी ऊँचाई एक हाथकी रह जावेगी ॥ ४४३ ॥
“The intellect, strength, body, and lifespan of human beings will progressively decline in sequential order. By the final phase of this era, the lifespan of humans will be reduced to a mere sixteen years, and their physical height will remain only one hand high. ॥ 443 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 444 – 446
अस्थिराद्यशुभान्येव प्रफलिष्यन्ति नामसु । कृष्णा रूक्षतनुच्छाया दुर्भगा दुस्वराः खलाः ॥४४४॥दुरीक्ष्या विकटाकारा दुर्बला विरलद्विनाः । निमग्नवक्षोगण्डाक्षिदेशाश्चिपुटनासिकाः ॥ ४४५ ॥ त्यक्तसर्वसदाचाराः श्रुत्पिपासादिबाधिताः । सरोगा निष्प्रतीकारा दुःखास्वादैकवेदिनः ॥ ४४६ ॥
उस समय नामकर्मकी प्रकृतियोंमें से अस्थिर आदि अशुभ प्रकृतियाँ ही फल देंगी। उस समयके मनुष्य काले रङ्गके होंगे, उनके शरीरकी कान्ति रूखी होगी, वे दुर्भग, दुःस्वर, खल, दुःखसे देखनेके याग्य, विकट आकार-वाले, दुर्बल तथा विरल दाँतोंवाले होंगे। उनके वक्षःस्थल, गाल और नेत्रोंके स्थान, भीतरको धँसे होंगे, उनकी नाक चपटी होगी, वे सब प्रकारका सदाचार छोड़ देंगे, भूख प्यास आदिसे पीड़ितरहेंगे, निरन्तर रोगी होंगे, रोगका कुछ प्रतिकार भी नहीं कर सकेंगे और केवल दुःखके स्वादका ही अनुभव करनेवाले होंगे ॥ ४४४-४४६ ॥
“At that time, among the sub-categories of body-forming karma (Nama-karma), only the inauspicious types such as unstable body-structure (Asthira) will bear fruit. The humans of that era will be dark-complexioned, their bodily luster will be dry and dull, and they will be ill-fated, harsh-voiced, wicked, miserable to look at, hideously deformed, feeble, and possess sparse, widely separated teeth. Their chests, cheeks, and eye sockets will be deeply sunken, and their noses will be flat. They will completely abandon all forms of righteous conduct, remain perpetually tormented by hunger and thirst, suffer from constant illnesses without any means of remedy, and will experience nothing but the raw taste of sheer misery. ॥ 444-446 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 447
एवं गच्छति कालेऽस्मिन्नेतस्य परमावधौ । निश्शेषशोषमेताम्बु शरीरमिव संक्षयम् ॥ ४४७ ॥
इस प्रकार समय बीतने पर जब अतिदुःषमा कालका अन्तिम समय आवेगा तब समस्त पानी सूख जावेगा, और शरीरके समान ही नष्ट हो जावेगा ॥ ४४७ ॥
“In this manner, as time passes and the absolute final phase of the Ati-Dushama (extreme misery) era arrives, all water will dry up completely, and just like the human body, it will perish entirely. ॥ 447 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 448
‘अतिरौक्ष्या घरा तत्र भाविनी स्फुटिता स्फुटम् । विनाशचिन्तयेवांघ्रिपाश्च प्रम्लानयष्टयः ॥४४८।।
पृथिवी अत्यन्त रूखी-रूखी होकर जगह-जगह फट जावेगी, इन सब चीजोंके नाश हो जानेकी चिन्तासे ही मानो सब वृक्ष सूखकर मलिनकाय हो जायेंगे ॥ ४४८ ॥
“The earth will become exceedingly dry and parched, fracturing and splitting open in various places; it will be as though all the trees, out of sheer anxiety over the total destruction of these things, wither away and turn into lifeless, decaying forms. ॥ 448 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 449 – 450
प्रलयः प्राणिनामेवं प्रायेणोपजनिष्यते । सुरसिन्धोश्च सिन्धोश्च खेचराद्रेश्च वेदिकाः । ४४९ ॥श्रित्वा नदीसमुद्भूतमीनमण्डूककच्छपान् । कृत्वा कर्कटकादींश्च निजाहारान्मनुष्यकाः ॥ ४५० ॥
प्रायः इस तरह समस्त प्राणियोंका प्रलय हो जावेगा। गङ्गा सिन्धु नदी और विजयार्ध पर्वतकी वेदिकापर कुछ थोड़ेसे मनुष्य विश्राम लेंगे और वहाँ नदीके मुखमें उत्पन्न हुए मछली, मेंढक, कछुए और केंकड़ा आदिको खाकर जीवित रहेंगे। उनमेंसे बहत्तर कुलों में उत्पन्न हुए कुछ दुराचारी दीन-हीन जीव छोटे-छोटे बिलोंमें घुसकर ठहर जावेंगे ।। ४४९-४५० ॥
“In this manner, almost all living beings will face absolute annihilation (Pralaya). Only a few rare humans will take refuge along the banks of the Ganga and Indus rivers, and at the perimeter of the Vijayardha Mountain; they will sustain their lives by eating the fish, frogs, turtles, crabs, and other creatures born at the mouths of those rivers. Among them, certain wretched and wicked souls born into seventy-two specific lineages will crawl into and remain inside small caves and burrows to survive. ॥ 449-450 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 451 – 453
विष्ट्वा क्षुद्रबिलादीनि द्वासप्ततिकुलोद्भवाः । हीना दीना दुराचारास्तदा स्थास्यन्ति केचन ॥ ४५१ ॥ सरसं विरसं तीक्ष्णं रूक्षमुष्णं विषं विषम् । क्षारं मेघाः क्षरिष्यन्ति सप्त सप्तदिनान्यलम् ॥ ४५२ ॥ ततो धरण्या वैषम्यविगमे सति सर्वतः । भवेवित्रा समा भूमिः समाप्तात्रावसर्पिणी ॥ ४५३ ॥
“Immediately following that, the clouds will sequentially pour down rain for seven days each, consisting of sweet (water), tasteless fluid, piercing acid, coarse oil, boiling water, lethal poison, and caustic saltwater. Thereafter, all the irregularities (the rugged high-and-low terrains) of the earth will be utterly obliterated, the ground everywhere will become as smooth and uniform as the pristine Chitra-earth, and at this exact juncture, the ultimate boundary of the Avasarpini (descending cycle of time) will reach its absolute conclusion. ॥ 451-453 ॥”
श्लोक 454 से 470
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549 | चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 691
राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 360 | श्लोक 361 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 391| श्लोक 392 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 421 | श्लोक 422 से 430 | श्लोक 431 से 441
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