Summary of Uttar Puran Parv 67 by Acharya Gunabhadra
उत्तरपुराण – पर्व 67 (श्लोक 1–473) : संक्षिप्त सारांश
भगवान मुनिसुव्रतनाथ की स्तुति के उपरान्त चम्पापुर के राजा हरिवर्मा अनन्तवीर्य मुनिराज से जीव, कर्म, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष का तत्त्वज्ञान सुनकर वैराग्य धारण करते हैं। वे राज्य त्यागकर संयम ग्रहण करते हैं, तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध करते हैं और प्राणत स्वर्ग में देव बनते हैं। तत्पश्चात वे राजगृह के राजा सुमित्र और रानी सोमा के यहाँ मुनिसुव्रतनाथ के रूप में जन्म लेते हैं। राज्य संचालन के बाद वैराग्य उत्पन्न होने पर वे दीक्षा ग्रहण करते हैं, कठोर तप से केवलज्ञान प्राप्त करते हैं, विशाल धर्मसंघ की स्थापना कर धर्मप्रचार करते हैं और अंत में सम्मेदशिखर से मोक्ष प्राप्त करते हैं।
इसके बाद हरिषेण चक्रवर्ती का चरित्र आता है। वे पूर्वभव के पुण्य से चक्रवर्ती बनते हैं, दिग्विजय कर समस्त ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं, किन्तु संसार की नश्वरता का बोध होने पर राज्य त्यागकर संयम धारण करते हैं और उच्च देवगति को प्राप्त होते हैं।
आगे राम और लक्ष्मण के पूर्वभव का वर्णन है। राजकुमार चन्द्रचूल और मन्त्रीपुत्र विजय दुराचार के कारण मृत्युदण्ड के अधिकारी बनते हैं, परन्तु मन्त्री की दूरदर्शिता से वे मुनियों के सम्पर्क में आकर संयम ग्रहण करते हैं। तप के प्रभाव से वे अगले जन्म में अयोध्या के राजा दशरथ के यहाँ क्रमशः लक्ष्मण (नारायण) और राम (बलभद्र) के रूप में जन्म लेते हैं।
मिथिला के राजा जनक द्वारा यज्ञ की रक्षा हेतु राम-लक्ष्मण को आमंत्रित करने के प्रसंग में यज्ञ के वास्तविक स्वरूप पर चर्चा होती है। अतिशयमति मन्त्री स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक यज्ञ अहिंसा, जिनपूजा, दान, आत्मसंयम और सदाचार है; पशुबलि धर्म नहीं है। इसके समर्थन में सगर, मधुपिङ्गल, महाकाल, पर्वत, नारद और राजा वसु की विस्तृत कथा दी गई है, जिसमें महाकाल असुर प्रतिशोधवश हिंसात्मक यज्ञ की परम्परा चलाता है। उसके छल में आकर सगर, वसु, पर्वत और अन्य अनेक लोग अधर्म तथा नरकगति को प्राप्त होते हैं, जबकि नारद सत्य, तर्क और अहिंसा की स्थापना कर धर्म की रक्षा करते हैं तथा अंततः उच्च देवगति प्राप्त करते हैं।
इस प्रकार पर्व 67 का मुख्य संदेश यह है कि सम्यक् ज्ञान, अहिंसा, आत्मसंयम और विवेक ही वास्तविक धर्म एवं मोक्ष का मार्ग हैं, जबकि मिथ्यादर्शन, हिंसा, मोह और कुपरामर्श जीव को पतन एवं दुर्गति की ओर ले जाते हैं।
श्लोक 1 से 11 : हरिवर्मा को तत्त्वज्ञान एवं मोक्षमार्ग का उपदेश
भगवान मुनिसुव्रतनाथ की स्तुति के पश्चात चम्पापुर के राजा हरिवर्मा का वर्णन किया गया है। वे अनन्तवीर्य मुनिराज के दर्शन कर जीव, कर्म, बन्ध, संवर, निर्जरा तथा मोक्ष का यथार्थ स्वरूप जानने की जिज्ञासा प्रकट करते हैं। मुनिराज उन्हें बताते हैं कि कर्मों से बँधा जीव संसारी तथा कर्मों से मुक्त जीव सिद्ध कहलाता है। कर्मों के प्रकार, उनके बन्ध के कारण, संवर-निर्जरा के उपाय तथा मोक्ष के स्वरूप का विस्तार से उपदेश दिया जाता है। इस तत्त्वज्ञान से राजा हरिवर्मा के हृदय में वैराग्य जागृत हो जाता है।
श्लोक 12 से 23 : हरिवर्मा का संयम, तीर्थंकर नामकर्म का बंध और गर्भकल्याणक
राजा हरिवर्मा अपने पुत्र को राज्य सौंपकर बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रह का त्याग करते हैं तथा अनेक राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण कर कठोर तपस्या करते हैं। ग्यारह अंगों का अध्ययन और दर्शनविशुद्धि आदि भावनाओं के प्रभाव से वे तीर्थंकर नामकर्म का बंध करते हैं। समाधिमरण के उपरान्त वे प्राणत स्वर्ग में इन्द्र पद को प्राप्त होते हैं। आयु पूर्ण होने पर वे राजगृह के राजा सुमित्र और रानी सोमा के गर्भ में अवतीर्ण होने के लिए आते हैं। रानी सोलह शुभ स्वप्न देखकर राजा से उनका फल पूछती हैं।
श्लोक 24 से 33 : मुनिसुव्रतनाथ का जन्म, जन्माभिषेक और राज्याभिषेक
राजा सुमित्र रानी के स्वप्नों का फल बताते हैं कि उनके गर्भ से तीर्थंकर का जन्म होगा। देवगण गर्भकल्याणक एवं जन्मकल्याणक का उत्सव मनाते हैं और सुमेरु पर्वत पर बालक का जन्माभिषेक कर उनका नाम मुनिसुव्रतनाथ रखते हैं। वे दिव्य लक्षणों से युक्त होकर बड़े होते हैं और कुमारावस्था पूर्ण होने पर राज्याभिषेक प्राप्त कर धर्मपूर्वक राज्य संचालन करते हैं। एक दिन उनके राजहाथी के असामान्य व्यवहार से एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक प्रसंग आरम्भ होता है।
श्लोक 34 से 43 : हाथी का पूर्वभव, वैराग्य और भगवान की दीक्षा
भगवान बताते हैं कि वह हाथी पूर्वजन्म में नरपति नामक राजा था, जिसने मिथ्यात्व, अभिमान और कुपात्र दान के कारण हाथी की योनि प्राप्त की। भगवान के उपदेश से हाथी को जातिस्मरण हो जाता है और उसमें संयम की भावना जागृत होती है। इस घटना से स्वयं मुनिसुव्रतनाथ को भी संसार की नश्वरता का गहन अनुभव होता है। लौकान्तिक देव उनकी स्तुति करते हैं और वे राज्य त्यागकर एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण करते हैं। दीक्षा लेते ही उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हो जाता है और वे कठोर तप में प्रवृत्त हो जाते हैं।
श्लोक 44 से 52 : तप, केवलज्ञान और विशाल धर्मसंघ
दीक्षा के बाद भगवान गोचरचर्या करते हुए तपस्या में निरत रहते हैं। ग्यारह माह की साधना के उपरान्त चम्पक वृक्ष के नीचे शुक्लध्यान द्वारा वे केवलज्ञान प्राप्त करते हैं। देवगण समवसरण की रचना करते हैं जहाँ गणधर, पूर्वधारी मुनि, अवधिज्ञानी, केवलज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी तथा अनेक तपस्वी मुनि उपस्थित होकर धर्म का श्रवण करते हैं। भगवान का धर्मसंघ अत्यन्त विशाल एवं प्रभावशाली बनता है।
श्लोक 53 से 64 : धर्मप्रचार, मोक्ष और हरिषेण चक्रवर्ती का पूर्वभव
भगवान मुनिसुव्रतनाथ दीर्घकाल तक आर्यखण्ड में विहार कर असंख्य जीवों को सम्यग्दर्शन एवं मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं। आयु पूर्ण होने पर वे सम्मेदशिखर पर एक हजार मुनियों सहित प्रतिमायोग धारण कर मोक्ष प्राप्त करते हैं। देवगण निर्वाण महोत्सव सम्पन्न करते हैं और उनकी ज्ञानमहिमा का स्तवन करते हैं। इसके पश्चात हरिषेण चक्रवर्ती के पूर्वभव का वर्णन आरम्भ होता है, जिसमें बताया गया है कि पूर्वभव के तप के प्रभाव से वे स्वर्ग में देव बने और फिर हरिषेण के रूप में जन्म लिया।
श्लोक 65 से 83 : हरिषेण का चक्रवर्ती पद, दिग्विजय और वैराग्य
हरिषेण युवावस्था में अपने पिता पद्मनाभ के साथ जिनेन्द्र भगवान के उपदेश का श्रवण करते हैं। उनके पिता संयम ग्रहण कर लेते हैं और हरिषेण आदर्श श्रावक बनकर राज्य का संचालन करते हैं। समय आने पर उन्हें चक्ररत्न सहित चौदह रत्न प्राप्त होते हैं और वे दिग्विजय कर चक्रवर्ती बनते हैं। समस्त दिशाओं को जीतकर वे सुखपूर्वक राज्य करते हैं। नन्दीश्वर पर्व के अवसर पर चन्द्रग्रहण देखकर उन्हें संसार की अनित्यता का बोध होता है। वे सभा में अनुप्रेक्षाओं का उपदेश देकर ऐश्वर्य की क्षणभंगुरता तथा धर्म की महत्ता का प्रतिपादन करते हैं और वैराग्य धारण करने का निश्चय करते हैं।
श्लोक 84 से 92 : हरिषेण का त्याग और राम-लक्ष्मण के पूर्वभव का प्रारम्भ
हरिषेण अपने पुत्र महासेन को राज्य सौंपकर दीन-दुःखियों को दान देते हैं और श्रीनाग मुनि के पास जाकर दीक्षा ग्रहण करते हैं। कठोर तप, चार प्रकार की आराधना तथा समाधिमरण के फलस्वरूप वे सर्वार्थसिद्धि अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र बनते हैं। इसके बाद आठवें बलभद्र राम और नारायण लक्ष्मण के पूर्वभव का वर्णन प्रारम्भ होता है। रत्नपुर के राजा प्रजापति के पुत्र चन्द्रचूल तथा मन्त्रीपुत्र विजय अत्यधिक स्नेह, अभिमान और दुराचार के कारण उच्छृंखल स्वभाव के हो जाते हैं।
श्लोक 93 से 101 : चन्द्रचूल का अपराध और न्यायप्रिय राजा
चन्द्रचूल अपने मित्र विजय के साथ एक वैश्य कन्या का बलपूर्वक हरण करने का प्रयास करता है। नगर के व्यापारी न्याय की याचना लेकर राजा के पास पहुँचते हैं। प्रजा की पीड़ा और पुत्र के दुराचार को देखकर राजा क्रोधित हो उठते हैं। वे पक्षपात न करते हुए राजकुमार को बन्दी बनाने और शूली पर चढ़ाकर मृत्युदण्ड देने का आदेश देते हैं। नगररक्षक राजकुमार को पकड़कर राजा के समक्ष प्रस्तुत करता है और पुनः श्मशान ले जाने लगता है। इसी समय प्रधान मन्त्री राजा के समक्ष उपस्थित होकर न्याय और दया के समन्वय की भावना से अपना निवेदन प्रारम्भ करता है, जिससे आगे की कथा का आधार तैयार होता है
श्लोक 102 से 112 : मन्त्री का उपदेश और राजा का न्यायसंगत निर्णय
प्रधान मन्त्री ने राजा को समझाया कि बालक जन्म से न तो सदाचारी होता है और न दुराचारी; उसके संस्कारों और शिक्षा का उत्तरदायित्व माता-पिता तथा अभिभावकों पर होता है। जैसे बाल्यावस्था में प्रशिक्षित न किया गया हाथी आगे चलकर वश में नहीं आता, उसी प्रकार अनुशासनहीन बालक भी ऐश्वर्य प्राप्त होने पर उच्छृंखल बन जाता है। मन्त्री ने निवेदन किया कि राजकुमार अभी सुधार योग्य है, इसलिए उसे मृत्युदण्ड देना उचित नहीं होगा। उसने यह भी स्मरण कराया कि राजकुमार राज्य का एकमात्र उत्तराधिकारी है और उसके वध से राज्य तथा प्रजा दोनों को हानि होगी। किन्तु राजा ने स्पष्ट कहा कि न्याय के मार्ग में पुत्र और पराये का कोई भेद नहीं होता। राजा का धर्म दुष्टों का दमन और सज्जनों का संरक्षण करना है। यदि मोह, स्नेह अथवा भय के कारण राजा न्याय से विचलित हो जाए तो समस्त राज्य में अधर्म फैल जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अपना दाहिना हाथ भी दोषपूर्ण हो जाए तो उसे भी त्याग देना चाहिए। राजा के इस अटल न्यायनिष्ठ निर्णय के सामने सभी लोग मौन होकर लौट गए।
श्लोक 113 से 121: मन्त्री की दूरदर्शिता और राजकुमारों का संयम ग्रहण
राजा की अनुमति प्राप्त कर मन्त्री राजकुमार चन्द्रचूल और अपने पुत्र विजय को वनगिरि पर्वत पर ले गया। वहाँ उसने दोनों की धैर्य और मृत्यु के प्रति भावना की परीक्षा ली। राजकुमार ने निर्भीक होकर स्वीकार किया कि यदि मृत्यु का भय होता तो वह ऐसा अपराध कभी न करता। मन्त्री उनकी निर्भीकता और आन्तरिक क्षमता को देखकर उन्हें महाबल गणधर के पास ले गया। मनःपर्ययज्ञान से सम्पन्न गणधर ने भविष्यवाणी की कि यही दोनों जीव आगे चलकर भरत क्षेत्र में बलभद्र और नारायण होंगे। इस शुभ भविष्य को जानकर मन्त्री अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसने दोनों को धर्मोपदेश सुनाया और उनमें वैराग्य जाग्रत कर संयम ग्रहण करा दिया। इस प्रकार मृत्युदण्ड का अवसर उनके जीवन का आध्यात्मिक मोड़ बन गया।
श्लोक 122 से 135 : राजा का संतोष, मन्त्री की नीति और राजकुमारों की दीक्षा
मन्त्री राजा के पास लौटकर पहले संकेत रूप में यह निवेदन करता है कि दोनों कुमारों ने अपने अपराध का दण्ड स्वीकार कर लिया है और मृत्यु के लिए तैयार हो गए थे। यह सुनकर राजा अत्यन्त शोकाकुल हो जाता है। तब मन्त्री उचित अवसर देखकर वास्तविकता बताता है कि दोनों राजकुमारों को वन में स्थित महान् मुनियों का उपदेश प्राप्त हुआ और वे संसार से विरक्त होकर दीक्षित हो गए हैं। यह सुनकर राजा का शोक तत्काल आनन्द में परिवर्तित हो जाता है। वह मन्त्री की बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता की प्रशंसा करता है तथा स्वीकार करता है कि उसने दोनों लोकों का कल्याण करने वाला कार्य किया है। राजा स्वयं वनगिरि जाकर नवदीक्षित मुनियों से क्षमा माँगता है। मुनि विनयपूर्वक कहते हैं कि वास्तव में संयम का मार्ग दिखाने वाले राजा ही उनके उपकारी हैं। इस घटना से प्रभावित होकर राजा भी राज्य त्यागकर अनेक राजाओं सहित संयम ग्रहण कर लेता है तथा आगे चलकर केवलज्ञान प्राप्त करता है।
श्लोक 136 से 152 : पूर्वभव की समाप्ति और राम-लक्ष्मण का जन्म
राजा तप और साधना द्वारा मोह तथा घातिया कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त करते हैं। दूसरी ओर दोनों नवदीक्षित मुनि कठोर तप एवं आराधना में स्थित रहते हैं। एक अवसर पर खड्गपुर के राजा सोमप्रभ के पुत्र पुरुषोत्तम नारायण का भव्य वैभव देखकर चन्द्रचूल मुनि के मन में निदान (भविष्य में वैभव प्राप्त करने की इच्छा) उत्पन्न हो जाती है। जीवन के अंत में दोनों मुनि चार प्रकार की आराधना सहित देवलोक में जन्म लेते हैं। कालान्तर में वे अयोध्या के राजा दशरथ के यहाँ पुनर्जन्म लेते हैं। मन्त्रीपुत्र का जीव राम बलभद्र तथा राजकुमार चन्द्रचूल का जीव लक्ष्मण नारायण बनता है। राम का जन्म रानी सुबाला से तथा लक्ष्मण का जन्म रानी कैकेयी से होता है। दोनों असाधारण तेज, दिव्य लक्षणों और महान् सामर्थ्य से युक्त होते हैं।
श्लोक 153 से 162: राम-लक्ष्मण का यौवन और सगर की कथा
राम और लक्ष्मण दिव्य लक्षणों, अतुल बल और अनुपम तेज से सम्पन्न होकर युवावस्था को प्राप्त होते हैं। इसी प्रसंग में सगर राजा की कथा का उल्लेख किया गया है। सगर ने एक स्वयंवर में मधुपिङ्गल नामक राजकुमार का अपमान किया, जिसके कारण वह वैर भाव लेकर अंततः महाकाल नामक असुर बना। प्रतिशोध की भावना से उसने ब्राह्मण का वेश धारण कर सगर को हिंसात्मक यज्ञ करने के लिए प्रेरित किया। अज्ञानवश सगर ने उस उपदेश को स्वीकार कर प्राणिहिंसा से युक्त यज्ञ किया और उसके परिणामस्वरूप घोर पाप का बंध कर नरकगति को प्राप्त हुआ। इस प्रकार यह प्रसंग मिथ्यादर्शन, हिंसा और दुष्ट सलाह के विनाशकारी परिणामों को स्पष्ट करता है।
श्लोक 163 से 173 : जनक की सभा और यज्ञ पर विचार
सगर के विनाश का समाचार सुनकर राजा दशरथ अयोध्या का शासन सँभालते हैं। इसी समय मिथिला में राजा जनक की पुत्री सीता विवाह योग्य होती हैं। अनेक राजा विवाह प्रस्ताव भेजते हैं, किन्तु जनक उचित समय की प्रतीक्षा करते हैं। एक दिन सभा में प्राचीन यज्ञों की चर्चा होती है और यह प्रश्न उठता है कि यदि यज्ञ से स्वर्ग प्राप्त होता है तो उसे पुनः क्यों न किया जाए। सेनापति कुशलमति सावधानीपूर्वक समझाता है कि हिंसात्मक यज्ञों के पीछे असुरों की प्रेरणा रही है तथा ऐसे कर्म अनेक विघ्न और अनर्थ उत्पन्न करते हैं। वह संकेत करता है कि यदि यज्ञ किया गया तो रावण जैसे पराक्रमी विद्याधर भी उसमें विघ्न डाल सकते हैं।
श्लोक 174 से 181 : राम को आमंत्रित करने का निर्णय
सेनापति आगे बताता है कि नागकुमारों और विद्याधरों के कारण यज्ञ में अनेक बाधाएँ आ सकती हैं। इन सभी विघ्नों से रक्षा करने में यदि कोई समर्थ है तो वह केवल राम और लक्ष्मण हैं। सभा के सभी सदस्य इस विचार का समर्थन करते हैं। राजा जनक निश्चय करते हैं कि यदि राम यज्ञ की रक्षा करेंगे तो सीता का विवाह उन्हीं के साथ किया जाएगा। वे राजा दशरथ के पास सम्मानपूर्वक दूत, पत्र और उपहार भेजते हैं तथा अन्य राजकुमारों को भी आमंत्रित करने की व्यवस्था करते हैं।
श्लोक 182 से 192 : यज्ञ की वास्तविक व्याख्या
राजा दशरथ मन्त्रिपरिषद् से इस प्रस्ताव पर विचार-विमर्श करते हैं। एक मन्त्री यज्ञ का समर्थन करता है, किन्तु अतिशयमति नामक विद्वान मन्त्री उसका खण्डन करता है। वह प्रमाणपूर्वक सिद्ध करता है कि हिंसात्मक यज्ञ धर्म नहीं है, क्योंकि सत्य आगम वही है जो सर्वज्ञ भगवान द्वारा प्रतिपादित हो और जो समस्त जीवों का हित करे। वेद के परस्पर विरोधी कथनों का उल्लेख करते हुए वह बताता है कि हिंसा धर्म का साधन नहीं हो सकती। वह स्पष्ट करता है कि ‘यज्ञ’ का वास्तविक अर्थ देवपूजा, दान, सत्कार, समागम और पुण्यकर्म है, न कि प्राणियों की हत्या। इस प्रकार वह यज्ञ की अहिंसामूलक व्याख्या प्रस्तुत करता है।
श्लोक 193 से 203 : यज्ञ का जैन स्वरूप और आत्मयज्ञ की महिमा
अतिशयमति आगे स्पष्ट करता है कि यज्ञ, याग, पूजा, सपर्या, इज्या, अध्वर और मख आदि सभी शब्द पूजाविधि और पुण्यकर्म के पर्याय हैं। दान, देवपूजा और सदाचार से ही महान् पुण्य की प्राप्ति होती है, न कि हिंसा से। यदि हिंसा ही यज्ञ होती तो हिंसक स्वर्ग और अहिंसक नरक जाते, जो सर्वथा असंगत है। वह बताता है कि भगवान ऋषभदेव द्वारा प्रतिपादित धर्म में वास्तविक यज्ञ बाह्य पशुबलि नहीं, बल्कि क्रोध, काम और लोभ जैसी आन्तरिक अग्नियों में क्षमा, वैराग्य, तप और आत्मसंयम की आहुति देना है। ऐसे आत्मयज्ञ का पालन करने वाले मुनि ही कर्मों का क्षय कर मोक्षरूपी परम पद को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार पर्व का यह भाग जैन दर्शन की अहिंसा, आत्मसंयम और आन्तरिक साधना की सर्वोच्च महिमा का प्रतिपादन करता है।
श्लोक 204 से 211 : आर्ष यज्ञ, जिनपूजा और यज्ञ का वास्तविक स्वरूप
इस प्रसंग में अतिशयमति मन्त्री यज्ञ का वास्तविक जैन स्वरूप स्पष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि तीर्थंकरों, गणधरों तथा अन्य केवलज्ञानियों के उत्तम शरीरों के संस्कार से पूजित अग्नियों में श्रद्धापूर्वक दान, पूजा, अक्षत, गन्ध, पुष्प और फलादि अर्पित करना आर्ष यज्ञ कहलाता है। यह यज्ञ हिंसा रहित, ऋषियों द्वारा प्रतिपादित तथा धर्ममय है। ऐसे यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले गृहस्थ और तपस्वी महान पुण्य अर्जित कर इन्द्र, सामानिक और लौकान्तिक देवों के पद को प्राप्त करते हैं तथा क्रमशः मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं। आगे बताया गया है कि श्रुतज्ञानरूपी वेद के अनुसार विभिन्न अवसरों पर जिनेन्द्र भगवान की पूजा और आराधना करना भी यज्ञ ही है। ऋषियों ने यज्ञ को दो प्रकार का बताया है—एक मुनियों का आत्मयज्ञ, जो प्रत्यक्ष मोक्ष का कारण है, और दूसरा गृहस्थों का देवपूजामय यज्ञ, जो परम्परा से मोक्ष का साधन बनता है। यही प्राचीन, अहिंसामय और लोक-परलोक का कल्याण करने वाला यज्ञ है।
श्लोक 212 से 222 : महाकाल असुर की कथा और सगर का स्वयंवर में जाना
अतिशयमति आगे बताते हैं कि हिंसात्मक यज्ञ की परम्परा ऋषियों द्वारा नहीं, बल्कि सगर के प्रति वैर रखने वाले महाकाल असुर द्वारा प्रारम्भ की गई थी। इसके कारण का वर्णन करते हुए चारणयुगल नगर के राजा सुयोधन, उनकी रानी अतिथि और पुत्री सुलसा की कथा कही जाती है। सुलसा के स्वयंवर में अनेक राजा आमन्त्रित हुए। अयोध्या के राजा सगर भी जाने वाले थे, परन्तु सिर में एक श्वेत बाल देखकर उन्हें वैराग्य उत्पन्न हो गया। उनकी धाय मन्दोदरी और मन्त्री विश्वभू ने उन्हें समझाया कि यह शुभ संकेत है और वे अवश्य स्वयंवर में जाएँ। मन्त्री ने आश्वासन दिया कि वह किसी भी प्रकार सुलसा का विवाह सगर से ही कराएगा। उनके परामर्श से सगर पुनः उत्साहित होकर विशाल सेना सहित चारणयुगल नगर की ओर प्रस्थान करता है।
श्लोक 223 से 231 : विश्वभू मन्त्री की कुटिल योजना
चारणयुगल पहुँचकर मन्दोदरी ने सुलसा के समक्ष राजा सगर के कुल, पराक्रम, सौन्दर्य, ऐश्वर्य और सद्गुणों का विस्तार से वर्णन किया, जिससे सुलसा उनके प्रति आकर्षित हो गई। जब उसकी माता अतिथि को यह ज्ञात हुआ तो उसने सगर की निन्दा करते हुए अपने भानजे मधुपिङ्गल को अधिक योग्य वर बताया और सुलसा को उसी का वरण करने के लिए प्रेरित किया। साथ ही उसने मन्दोदरी का सुलसा से मिलना-जुलना बन्द करा दिया। सगर ने यह बाधा मन्त्री विश्वभू को बताई। तब मन्त्री ने एक षड्यन्त्र रचा। उसने स्वयंवर-विधान नामक एक कृत्रिम ग्रन्थ तैयार कराया, जिसमें वरों के शुभ-अशुभ लक्षण लिखे गए। उस ग्रन्थ को एक सन्दूक में रखकर उद्यान में गुप्त रूप से गाड़ दिया, ताकि अवसर आने पर उसे प्राचीन शास्त्र बताकर प्रस्तुत किया जा सके।
श्लोक 232 से 242 : मधुपिङ्गल का अपमान और सगर का विवाह
कुछ समय बाद मन्त्री ने योजना के अनुसार वही सन्दूक भूमि से निकलवाकर उसे प्राचीन ग्रन्थ घोषित किया। सभा में उसका वाचन कराया गया, जिसमें लिखा था कि जिन वरों की आँखें विशेष प्रकार की हों अथवा जिनमें कुछ अशुभ लक्षण हों, उन्हें स्वयंवर में सम्मानित नहीं करना चाहिए। मधुपिङ्गल में वे लक्षण होने के कारण वह स्वयं को अपमानित अनुभव कर सभा से बाहर चला गया। उसके हटते ही सगर और उसके समर्थक अत्यन्त प्रसन्न हुए। दूसरी ओर मधुपिङ्गल के बन्धु और सज्जन लोग इस छल से दुःखी हुए। इसके बाद राजा सुयोधन ने जिनेन्द्र भगवान की पूजा सम्पन्न कर सुलसा को स्वयंवर मण्डप में लाया। सुलसा ने सभी राजाओं की उपेक्षा करते हुए सगर के गले में वरमाला डाल दी। उपस्थित सज्जनों ने इस विवाह की प्रशंसा की और सगर कुछ समय पश्चात् सुलसा को लेकर अयोध्या लौट आए।
श्लोक 243 से 254 : मधुपिङ्गल का निदान और महाकाल असुर का जन्म
सगर और सुलसा सुखपूर्वक जीवन बिताने लगे, जबकि मधुपिङ्गल ने लज्जा और विरक्ति के कारण संयम धारण कर लिया। एक दिन गोचर के समय किसी निमित्तज्ञानी ने उसके राजलक्षणों का उल्लेख करते हुए कहा कि वह छलपूर्वक राज्य से वंचित किया गया है। यह सुनकर मधुपिङ्गल के मन में तीव्र क्रोध उत्पन्न हुआ। उसने तप का उपयोग आत्मशुद्धि के स्थान पर प्रतिशोध के लिए करने का निश्चय किया और निदान बाँध लिया कि अगले जन्म में वह सगर के सम्पूर्ण वंश का विनाश करेगा। इसी अशुभ भावना के कारण मृत्यु के पश्चात् वह महाकाल नामक असुर बना। विभंगावधिज्ञान से उसे पूर्वभव का स्मरण हुआ और उसने सगर तथा उसके मन्त्री से प्रतिशोध लेने का निश्चय किया। वह उन्हें प्रत्यक्ष मारना नहीं चाहता था, बल्कि ऐसा महापाप कराना चाहता था जिससे वे स्वयं दुर्गति को प्राप्त हों।
श्लोक 255 से 273 : वसु, पर्वत और नारद का पूर्वचरित्र
उसी समय भरतक्षेत्र के स्वस्तिकावती नगर में राजा विश्वावसु, उनके पुत्र वसु तथा विद्वान् ब्राह्मण क्षीरकदम्ब का वर्णन आता है। क्षीरकदम्ब के आश्रम में उनका पुत्र पर्वत, राजकुमार वसु और ब्राह्मणकुमार नारद साथ-साथ शिक्षा ग्रहण करते थे। तीनों विद्या में प्रवीण थे, किन्तु पर्वत स्वभाव से मन्दबुद्धि और विपरीत अर्थ ग्रहण करने वाला था। एक दिन वे अपने गुरु के साथ वन में गए, जहाँ श्रुतधर मुनिराज अपने शिष्यों को निमित्तज्ञान का उपदेश दे रहे थे। परीक्षा के रूप में उन्होंने तीनों विद्यार्थियों के भविष्य के विषय में प्रश्न किया। मुनियों ने बताया कि वसु रागवश हिंसामय धर्म का आश्रय लेकर नरक जाएगा; पर्वत महाकाल के प्रभाव से हिंसात्मक अथर्ववेद का प्रचार करेगा और अनेक लोगों को मिथ्यामार्ग में लगाएगा; जबकि नारद धर्मध्यान में स्थित होकर आगे चलकर राजा बनेगा, संयम धारण करेगा और अन्तिम अनुत्तर विमान में जन्म लेगा। यह सब सुनकर क्षीरकदम्ब अत्यन्त दुःखी हुए, किन्तु उन्होंने इसे कर्मों का परिणाम मानकर धैर्य धारण किया।
श्लोक 274 से 281 : वसु का राज्यारोहण और स्फटिक सिंहासन
एक वर्ष बाद राजा विश्वावसु राज्य अपने पुत्र वसु को सौंपकर तपोवन चले गए। वसु न्यायपूर्वक राज्य करने लगा। एक दिन वन में उसने देखा कि पक्षी आकाश में उड़ते हुए किसी अदृश्य वस्तु से टकराकर नीचे गिर रहे हैं। कारण जानने के लिए उसने बाण चलाया, जो भी उसी स्थान से टकराकर गिर पड़ा। समीप जाकर उसने देखा कि वहाँ आकाश के समान पारदर्शी एक विशाल स्फटिक स्तम्भ विद्यमान है। वह उसे अपने साथ ले आया और उसके चार पायों का एक अद्भुत सिंहासन बनवाया। उस सिंहासन पर बैठने पर ऐसा प्रतीत होता था मानो राजा वसु आकाश में विराजमान हों। प्रजा उसकी इस विलक्षण विभूति को सत्य और पुण्य के प्रभाव का फल मानकर उसकी प्रशंसा करने लगी।
श्लोक 282 से 292 : नारद की सूक्ष्म दृष्टि और पर्वत की ईर्ष्या
इधर एक दिन नारद और पर्वत वन में समिधा और पुष्प लेने गए। मार्ग में नारद ने केवल पदचिह्न देखकर बता दिया कि मयूरों के समूह में एक नर और सात मादाएँ हैं। आगे चलकर उसने हाथिनी के चिह्न देखकर कहा कि वह बाईं आँख से कानी है। जब दोनों बातें सत्य सिद्ध हुईं तो पर्वत आश्चर्यचकित होने के स्थान पर ईर्ष्या से भर गया। उसने समझा कि गुरु नारद को विशेष ज्ञान देते हैं और उससे पक्षपात करते हैं। घर पहुँचकर उसने अपनी माता से गुरु के विरुद्ध शिकायत की। माता भी पुत्र के मोह में पड़कर दुःखी हो गई और उसके मन में भी गुरु के प्रति संदेह उत्पन्न हो गया।
श्लोक 293 से 304 : नारद की युक्ति और गुरु का निष्पक्ष निर्णय
भोजन के पश्चात् ब्राह्मणी ने क्षीरकदम्ब से पर्वत की शिकायत कही। तब विद्वान् ब्राह्मण ने स्पष्ट किया कि वे सभी शिष्यों को समान रूप से शिक्षा देते हैं; अन्तर केवल ग्रहण करने की क्षमता का होता है। सत्य प्रमाणित करने के लिए उन्होंने नारद से वन की घटनाएँ बताने को कहा। नारद ने विनम्रतापूर्वक समझाया कि उसने सभी निष्कर्ष सूक्ष्म निरीक्षण और तर्क से निकाले थे। मयूर के पंखों की स्थिति, हाथिनी के पदचिह्न, टूटी हुई लताओं, मूत्र के चिह्न, स्त्री के पैरों के निशान, वस्त्र के तन्तु और अन्य संकेतों के आधार पर उसने क्रमशः हाथिनी के काने होने, उसके साथ गर्भवती स्त्री के होने तथा अन्य बातों का अनुमान किया था। उसकी बातें सुनकर क्षीरकदम्ब ने ब्राह्मणी को समझाया कि ज्ञान परिश्रम, विवेक और सूक्ष्म अवलोकन से प्राप्त होता है, पक्षपात से नहीं। इस प्रकार पर्वत की भ्रान्ति दूर करने का प्रयास किया गया और कथा में विवेक, तर्क तथा सम्यक् ज्ञान की महत्ता का प्रतिपादन किया गया।
श्लोक 305 से 321 नारद की सूक्ष्म बुद्धि एवं पर्वत की मूढ़ता का परीक्षण
क्षीरकदम्ब ब्राह्मण ने अपनी पत्नी के मन में पुत्र पर्वत और शिष्य नारद की वास्तविक योग्यता का विश्वास उत्पन्न करने के लिए दोनों की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने आटे के दो बकरे बनाकर दोनों को दिए और आदेश दिया कि जहाँ कोई देखने वाला न हो, वहाँ ले जाकर उनकी पूजा करें, उनके कान काटें और उन्हें वापस ले आएँ। पर्वत ने बिना किसी विचार के वन में जाकर यह मान लिया कि वहाँ कोई नहीं है। उसने दोनों कान काट दिए और प्रसन्नतापूर्वक पिता के पास लौटकर अपने कार्य की सफलता का वर्णन किया। उसके लिए गुरु की आज्ञा का बाह्य पालन ही पर्याप्त था, उसने उसके गूढ़ आशय पर विचार नहीं किया।
नारद जब वन पहुँचे तो उन्होंने गम्भीरतापूर्वक विचार किया कि संसार में ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ कोई देखने वाला न हो। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, देवगण, वन के जीव तथा स्वयं अपनी आत्मा सब कुछ देख रहे हैं। इसलिए गुरु की आज्ञा का वास्तविक पालन करना सम्भव नहीं है। उन्होंने यह भी विचार किया कि नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव—इन चारों दृष्टियों से किसी भी प्रकार की हिंसा उचित नहीं है। अतः उन्होंने बकरे को बिना क्षति पहुँचाए ही वापस लौटा दिया। नारद की इस सूक्ष्म दृष्टि से क्षीरकदम्ब अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने समझाया कि केवल एक पक्ष पर आधारित एकान्तवाद सत्य नहीं होता, जबकि स्याद्वाद वस्तु की यथार्थता को अनेक दृष्टियों से स्वीकार करता है। उन्होंने उदाहरण देकर कहा कि दयालु पिता से भी निर्दयी पुत्र उत्पन्न हो सकता है, इसलिए केवल कारण देखकर ही परिणाम का निर्णय नहीं किया जा सकता।
क्षीरकदम्ब ने नारद की प्रखर बुद्धि, विवेक, करुणा और तत्त्वज्ञान की प्रशंसा करते हुए उन्हें समस्त शास्त्रों का व्याख्याता और उपाध्याय पद के योग्य घोषित किया। दूसरी ओर उन्होंने पर्वत को समझाया कि केवल शास्त्र पढ़ लेने से लाभ नहीं, जब तक विवेक और धर्म का यथार्थ निर्णय न हो। परन्तु पर्वत ने इस शिक्षा को स्वीकार करने के स्थान पर नारद के प्रति और अधिक ईर्ष्या और द्वेष धारण कर लिया।
श्लोक 322 से 332 क्षीरकदम्ब का संयम ग्रहण एवं यज्ञ की वास्तविक व्याख्या
समय आने पर क्षीरकदम्ब ने संसार का परित्याग कर संयम धारण करने का निश्चय किया। उन्होंने राजा वसु से निवेदन किया कि उनके पश्चात् उनकी पत्नी और पुत्र पर्वत का यथोचित पालन किया जाए। राजा वसु ने श्रद्धापूर्वक यह उत्तर दिया कि यह कार्य तो उनका कर्तव्य है और वे इसमें कोई कमी नहीं आने देंगे। क्षीरकदम्ब ने प्रसन्न होकर दीक्षा ग्रहण की और अन्त में समाधिमरण द्वारा उत्तम स्वर्ग में उत्पन्न हुए।
पिता के पश्चात् पर्वत भी शास्त्रों का अध्यापन करने लगा, किन्तु उसकी बुद्धि का दोष यथावत् बना रहा। दूसरी ओर नारद अपनी यथार्थ व्याख्याओं और गहन ज्ञान के कारण विद्वानों में विशेष सम्मान प्राप्त करने लगे। एक अवसर पर ‘अजैर्होतव्यम्’ इस वैदिक वाक्य के अर्थ को लेकर विद्वानों में विवाद उत्पन्न हुआ। नारद ने गुरु परम्परा के अनुसार स्पष्ट किया कि ‘अज’ का अर्थ तीन वर्ष पुराना, अंकुर उत्पन्न करने की शक्ति खो चुका जौ है। उसी से निर्मित पदार्थों द्वारा अग्नि में आहुति देना ही यज्ञ है। इसके विपरीत पर्वत ने ‘अज’ का अर्थ बकरा या पशु मानते हुए पशुबलि को ही यज्ञ का अंग सिद्ध करने का प्रयास किया। इस प्रकार उसने शब्द के वास्तविक अर्थ को छोड़कर हिंसा का समर्थन किया और धर्म के स्वरूप को विकृत कर दिया।
श्लोक 333 से 343 पर्वत का तिरस्कार और महाकाल से भेंट
पर्वत की हिंसापरक व्याख्या सुनकर साधु एवं विद्वान अत्यन्त दुःखी हुए। उन्होंने कहा कि यह व्यक्ति केवल ईर्ष्या और द्वेषवश धर्म का स्वरूप बिगाड़ रहा है तथा प्राणियों की हत्या को धर्म सिद्ध करना चाहता है। ऐसे व्यक्ति के साथ धर्मचर्चा करना भी उचित नहीं है। सभा में उपस्थित सभी लोगों ने पर्वत की निन्दा की और उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया। अपमानित होकर वह वन की ओर चला गया। उसी समय पूर्वजन्म का मधुपिङ्गल असुर महाकाल ब्राह्मण का वेश धारण कर उसी वन में विचरण कर रहा था। वृद्ध, निर्बल और तपस्वी का रूप धारण करके वह अपने प्रतिशोध की पूर्ति के लिए उपयुक्त साधन खोज रहा था। उसकी सम्पूर्ण वेशभूषा छल और कपट से भरी हुई थी।
महाकाल ने पर्वत को देखा और अत्यन्त विनम्रता से उससे परिचय किया। पर्वत ने भी सरलता से अपना समस्त जीवन-वृत्तान्त उसे सुना दिया। महाकाल ने तत्काल समझ लिया कि यही व्यक्ति उसके प्रतिशोध की योजना को पूर्ण करने का सर्वोत्तम साधन बन सकता है।
श्लोक 344 से 353 महाकाल द्वारा हिंसात्मक यज्ञ का निर्माण
महाकाल ने पर्वत को विश्वास में लेते हुए स्वयं को उसके पिता का धर्मभाई बताया और उसके प्रति सहानुभूति प्रकट की। उसने कहा कि वह उसके अपमान का प्रतिशोध लेने में सहायता करेगा। इसके बाद महाकाल ने अपनी मायावी बुद्धि से अथर्ववेद के नाम पर साठ हजार नई ऋचाओं की रचना की। इन मन्त्रों में शान्ति, पुष्टि तथा अभिचार के नाम पर पशुहिंसा को धर्म सिद्ध किया गया। उसने पर्वत को यह मिथ्या शिक्षा दी कि यज्ञ में पशुओं की बलि देने से इच्छित फल तथा स्वर्ग की प्राप्ति होती है। दोनों ने मिलकर निश्चय किया कि वे अयोध्या जाकर इस नवीन हिंसात्मक यज्ञ का प्रचार करेंगे और राजा सगर को अपने प्रभाव में लेकर अपने उद्देश्य को पूरा करेंगे।
श्लोक 354 से 370 राजा सगर का मोह और हिंसात्मक यज्ञ का आरम्भ
महाकाल ने अपने असुरों को आदेश दिया कि वे सगर के राज्य में रोग और उपद्रव फैलाएँ। राज्य में संकट उत्पन्न होते ही पर्वत ने राजा सगर के सामने उपस्थित होकर दावा किया कि वह विशेष यज्ञ द्वारा इन सबका निवारण कर सकता है। उसने राजा को विश्वास दिलाया कि पशुओं की सृष्टि ही यज्ञ के लिए हुई है और उनकी बलि देने से पाप नहीं, बल्कि महान् पुण्य और स्वर्ग की प्राप्ति होती है। राजा उसके छलपूर्ण तर्कों में फँस गया और यज्ञ के लिए असंख्य पशुओं तथा अन्य सामग्री की व्यवस्था करा दी।
यज्ञ आरम्भ हुआ। महाकाल अपनी मायावी शक्ति से यज्ञ में मारे गए पशुओं को स्वर्ग जाते हुए दिखाने लगा। इससे जनता को भ्रम हो गया कि पशुबलि वास्तव में स्वर्ग का साधन है। अनेक लोग स्वयं भी यज्ञ में मरने की इच्छा करने लगे। यज्ञ की समाप्ति पर पर्वत ने राजा की आज्ञा से श्रेष्ठ अश्व और रानी सुलसा तक की आहुति दे दी। रानी के वियोग से राजा अत्यन्त दुःखी हुआ और उसके मन में पहली बार यह संशय उत्पन्न हुआ कि कहीं यह सब पाप तो नहीं है। सत्य जानने के लिए वह यतिवर मुनि के पास पहुँचा। मुनिराज ने स्पष्ट कहा कि यह सम्पूर्ण कर्म अधर्म है और इसका फल सातवें नरक की प्राप्ति है। उन्होंने यह भी कहा कि सातवें दिन वज्रपात होगा, वही इस सत्य का प्रमाण होगा। राजा ने यह बात पर्वत को बताई, परन्तु पर्वत ने मुनियों को झूठा कहकर राजा का संशय दूर करने का प्रयास किया और यज्ञ पुनः प्रारम्भ करा दिया।
श्लोक 371 से 390 तपस्वियों द्वारा अहिंसा का उपदेश
सातवें दिन महाकाल ने अपनी माया से सुलसा तथा अन्य बलि दिए गए प्राणियों को देवस्वरूप में आकाश में दिखाया। वे राजा से कहने लगे कि यज्ञ के कारण उन्हें स्वर्ग मिला है। राजा इस छल को सत्य मान बैठा और उसके मोह के कारण घोर कर्मबन्ध हुआ। तत्पश्चात् वज्रपात हुआ और राजा सगर अपने सहयोगियों सहित सातवें नरक में चला गया। बाद में महाकाल ने यही छल विश्वभू मन्त्री के साथ भी किया, जिसके परिणामस्वरूप उसने भी हिंसात्मक यज्ञ आरम्भ कर दिया। जब नारद और अन्य तपस्वियों को इसका समाचार मिला तो वे अयोध्या पहुँचे। उन्होंने मन्त्री को समझाया कि अर्थ और काम के लिए लोग हिंसा करते हैं, परन्तु धर्म के लिए कभी भी प्राणियों का वध नहीं किया जाता। प्राचीन ऋषियों ने वेद में अहिंसा को ही धर्म का मूल बताया है।
उन्होंने आग्रह किया कि कर्मबन्ध का कारण बनने वाले इस हिंसात्मक यज्ञ का तत्काल परित्याग किया जाए और वास्तविक धर्म का अनुसरण किया जाए।
श्लोक 391 से 401 नारद और पर्वत का दार्शनिक विवाद
विश्वभू मन्त्री ने प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले कथित स्वर्गफल का आधार लेकर यज्ञ का समर्थन किया। तब नारद ने स्पष्ट किया कि यह सब किसी मायावी शत्रु की रचना है, जिससे लोगों को भ्रमित किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि यदि हिंसा धर्म मानी जाएगी तो दान, शील, तप और अहिंसा सब व्यर्थ सिद्ध हो जाएँगे। पर्वत ने अपने गुरु और ज्ञान का अभिमान करते हुए महाकाल द्वारा बताए गए मत का समर्थन किया तथा राजा वसु को निर्णायक मानने का प्रस्ताव रखा।
नारद ने यह स्वीकार किया कि राजा वसु से निर्णय कराया जा सकता है, परन्तु उन्होंने पहले ही चेतावनी दी कि यदि हिंसा को धर्म कहा जाएगा तो समस्त धर्मशास्त्रों की नींव ही नष्ट हो जाएगी।
श्लोक 402 से 411 हिंसा के विरुद्ध नारद के तर्क
नारद ने अत्यन्त तर्कपूर्ण ढंग से सिद्ध किया कि यदि हिंसा धर्म है तो शिकारी और मछुआरे भी पुण्यात्मा माने जाने चाहिए, जबकि तपस्वी और सत्याचारी अधोगति को प्राप्त होंगे। यह निष्कर्ष स्वयं असंगत है। उन्होंने कहा कि यदि पशुओं की हत्या यज्ञ में पुण्य और अन्यत्र पाप है तो यह भी अनुचित है, क्योंकि हत्या से होने वाला दुःख दोनों स्थानों पर समान है। कर्म का नियम किसी स्थान विशेष से नहीं बदलता।
उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि यदि ब्रह्मा ने पशुओं को केवल यज्ञ के लिए बनाया है तो उनका अन्य कार्यों में उपयोग भी अनुचित होना चाहिए। साथ ही उन्होंने सृष्टिवाद की भी तार्किक समीक्षा करते हुए प्रश्न किया कि यदि ब्रह्मा नवीन सृष्टि करता है तो असम्भव वस्तुएँ क्यों नहीं बना देता, और यदि केवल प्रकट करता है तो पहले उन्हें किसने छिपा रखा था।
इस प्रकार नारद ने युक्ति, अनुभव और धर्मशास्त्र—तीनों के आधार पर हिंसात्मक यज्ञ का पूर्ण खण्डन किया।
श्लोक 412 से 426 राजा वसु को निर्णायक बनाने की तैयारी
नारद के तर्कों की सभा में व्यापक प्रशंसा हुई और यह निश्चय किया गया कि अंतिम निर्णय राजा वसु देंगे। सभी लोग उनके नगर की ओर चल पड़े। उधर पर्वत की माता ने राजा वसु को स्मरण कराया कि उसके गुरु क्षीरकदम्ब ने पर्वत को उनकी संरक्षण में छोड़ा था। उसने प्रार्थना की कि यदि पर्वत इस वाद में हार गया तो उसका जीवन संकट में पड़ जाएगा। गुरु के प्रति कृतज्ञता के कारण राजा वसु ने पहले ही वचन दे दिया कि वह पर्वत की विजय कराएगा।
अगले दिन विशाल राजसभा में राजा वसु आकाश में स्थित स्फटिक सिंहासन पर विराजमान हुए। सभा में अनेक विद्वान, मन्त्री और तपस्वी उपस्थित हुए तथा धर्म-विवाद प्रारम्भ हुआ।
श्लोक 427 से 443 राजा वसु का पतन और सत्य की विजय
राजा वसु ने बिना निष्पक्ष विचार किए पर्वत के पक्ष का समर्थन किया और कहा कि राजा सगर यज्ञ के प्रभाव से ही स्वर्ग गया है। इस प्रकार उन्होंने हिंसात्मक यज्ञ को धर्म घोषित कर दिया।
उनके असत्य भाषण के साथ ही प्रकृति में अनेक भयंकर अपशकुन प्रकट हुए। पृथ्वी फट गई, नदियाँ उलटी बहने लगीं, रक्तवर्षा होने लगी और देवताओं ने आकाश से चेतावनी दी कि धर्म का विनाश मत करो।
फिर भी राजा वसु अपने मत पर अड़े रहे। परिणामस्वरूप उनका सिंहासन पृथ्वी में धँस गया और वे अन्ततः सातवें नरक में चले गए। महाकाल ने पुनः माया रचकर लोगों को भ्रमित करने का प्रयास किया, किन्तु समाज में इस घटना को लेकर मतभेद उत्पन्न हो गया।
विश्वभू मन्त्री ने बाद में भी यज्ञ जारी रखा, जबकि अनेक विवेकी राजाओं ने इस हिंसात्मक मार्ग की निन्दा करते हुए जिनधर्म के अहिंसामय मार्ग का अनुसरण किया।
श्लोक 444 से 461 महाकाल का रहस्योद्घाटन और मिथ्यामार्ग का परिणाम
नारद के प्रयासों से धर्म की मर्यादा सुरक्षित रही। उनके सम्मान में उन्हें गिरितट नगर प्रदान किया गया। तपस्वी भी अहिंसा की रक्षा के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे। विद्याधर दिनकरदेव ने महाकाल के यज्ञ में विघ्न डालने का प्रयास किया, परन्तु महाकाल ने जिनप्रतिमाओं की आड़ लेकर अपनी माया से उसे निष्फल कर दिया। अन्ततः यज्ञ सम्पन्न हुआ और विश्वभू तथा पर्वत दोनों मृत्यु के बाद नरकगति को प्राप्त हुए।
महाकाल ने अन्त में अपना वास्तविक परिचय देते हुए स्वीकार किया कि वह पूर्वजन्म का मधुपिङ्गल है और प्रतिशोध की भावना से उसने सम्पूर्ण हिंसात्मक यज्ञ की परम्परा चलाई। उसने अपने पाप का प्रायश्चित्त स्वीकार किया तथा कहा कि जिनेन्द्र भगवान द्वारा प्रतिपादित अहिंसा ही वास्तविक धर्म है। ग्रन्थकार बताते हैं कि मोहवश किया गया पापकर्म छोड़ देना ही वास्तविक प्रायश्चित्त है। अनेक विवेकी लोगों ने मुनियों के उपदेश से मिथ्या मार्ग स्वीकार नहीं किया, जबकि मोहग्रस्त लोग उसी हिंसात्मक मार्ग में फँसे रहे।
श्लोक 462 से 471 दशरथ की सभा और मिथ्यामार्ग का निष्कर्ष
द्वितीय मन्त्री के द्वारा सुनाई गई इस कथा की सभा में अत्यधिक प्रशंसा हुई। सेनापति महाबल ने सुझाव दिया कि अब यज्ञ-विवाद छोड़कर राम और लक्ष्मण के पराक्रम पर विचार करना चाहिए। राजा दशरथ ने पुरोहित से जनक के यज्ञ में दोनों कुमारों की सफलता के विषय में पूछा। पुरोहित ने भविष्यवाणी की कि दोनों कुमार महान् ऐश्वर्य प्राप्त करेंगे तथा भविष्य में वे आठवें बलभद्र और नारायण बनकर रावण का वध करेंगे। यह सुनकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुए।
अन्त में ग्रन्थकार स्पष्ट निष्कर्ष देते हैं कि महाकाल ने क्रोध और प्रतिशोधवश शास्त्रविरुद्ध हिंसात्मक यज्ञ का प्रचार किया। इसी मिथ्या मार्ग के कारण राजा वसु, पर्वत, विश्वभू और अन्य अनेक लोग नरकगति को प्राप्त हुए। जो लोग दूसरों को पापकर्म में प्रवृत्त करते हैं, उनके लिए घोर दुर्गति निश्चित है।
श्लोक 472 से 473 नारद की सिद्धि एवं पर्व का उपसंहार
राजा सगर, रानी सुलसा और विश्वभू मन्त्री मोहवश हिंसात्मक कर्मों में प्रवृत्त होकर अधोगति को प्राप्त हुए। यह उदाहरण बताता है कि यदि राजा जैसे समर्थ व्यक्ति भी विवेक खो दें तो उनका भी पतन निश्चित है। इसके विपरीत नारद ने अपने गुरु की शिक्षाओं का निष्ठापूर्वक पालन किया, शास्त्रार्थ में सत्य की स्थापना की, अहिंसा धर्म का प्रचार किया और महान् तप द्वारा जीवन को सफल बनाया। अन्ततः वे सर्वार्थसिद्धि स्वर्ग को प्राप्त हुए।
इसी उपसंहार के साथ भगवद्गुणभद्राचार्यकृत उत्तरपुराण का सड़सठवाँ पर्व, जिसमें मिथ्यामार्ग और हिंसात्मक यज्ञ की उत्पत्ति तथा उसके दुष्परिणामों का विस्तृत वर्णन किया गया है, पूर्ण होता है।
पर्व 68
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द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
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