मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 426 | श्लोक 427 से 443 | श्लोक 444 से 461 | श्लोक 462 से 471
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 472 to 473
श्लोक ( Shlok ) 472
व्यामोहात्सुलसाप्रियस्ससुलसः सार्द्धं स्वयं मन्त्रिणा शत्रुच्छद्मविवेकशून्यहृदयः सम्पाद्य हिंसाक्रियाम् ।नष्टो गन्तुमधः क्षितिं दुरितिनामक्रूरनाशं सुधा दुःकर्माभिरतस्य किं हि न भवेदन्यस्य चेदृग्विधम् ॥४७२॥
मोहनीय कर्मके उद्यसे जिसका हृदय शत्रुओंका छल समझनेवाले विवेकसे शून्य था ऐसा राजा सगर रानी सुलसा और विश्वभू मन्त्रीके साथ स्वयं हिंसामय क्रियाएँ कर अधोगतिमें जानेके लिए नष्ट हुआ सो जब राजाकी यह दशा हुई तब जो अन्य साधारण मनुष्य अपने क्रूर परिणामोंको नष्ट न कर व्यर्थ ही दुष्कर्ममें तल्लीन रहते हैं उनकी क्या ऐसी दशा नहीं होगी ? अवश्य होगी ॥ ४७२ ।।
“Due to the rise (Udaya) of Deluding Karma (Mohaniya Karma), King Sagara’s heart was entirely devoid of the discernment needed to see through the deception of his enemies. Consequently, along with Queen Sulasa and Minister Vishvabhu, he personally engaged in violent rituals and destroyed his own spiritual future, descending into the lower realms (Adhogati).
When such was the tragic fate of a king, will the same fate not befall ordinary men who fail to destroy their own cruel dispositions and remain futilely engrossed in wicked deeds? It most certainly will. || 472 ||”
श्लोक ( Shlok ) 473
स्वाचार्यवर्यमनुसृत्य हितानुशासी वादे समेत्य बुधसंसदि साधुवादम् ।श्रीनारदो विहितभूरितपाः कृतार्थः सर्वार्थसिद्धिमगमत्सुधियामधीशः ॥ ४७३ ॥
जिसने अपने श्रेष्ठ आचार्य-गुरुका अनुसरण कर हितका उपदेश दिया, विद्वानोंकी सभा में शास्त्रार्थ कर जिसने साधुवाद-उत्तम प्रशंसा प्राप्त की, जिसने बहुत भारी तप किया और जो विद्वानोंमें श्रेष्ठ था ऐसा श्रीमान् नारद कृतकृत्य होकर सर्वार्थसिद्धि गया ॥ ४७३ ।।
“He who faithfully followed his exalted preceptor (Acharya-Guru) and imparted beneficial teachings; he who earned high praise and acclaim (Sadhu-vada) by debating scriptural philosophy in the assemblies of the learned; he who performed immense austerities and stood supreme among the wise—that glorious Narada, having fulfilled his life’s purpose (Kritakritya), ascended to the highest heaven of Sarvarthasiddhi. || 473 ||”
इत्यार्षे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे दुर्मार्गप्रवर्तनप्रपञ्चव्यावर्णनं नाम सप्तषष्टं पर्व ॥ ६७ ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीत, त्रिषष्टि लक्षण महापुराण संग्रहमें मिथ्या-मार्गकी प्रवृत्तिके विस्तारका वर्णन करनेवाला सदसठवाँ पर्व समाप्त हुआ ।
“Thus ends the sixty-seventh chapter, which describes in detail the expansion and propagation of the false path, contained within the Trishashti-Lakshana Mahapurana Sangraha—popularly known as the Arsha—composed by the venerable Acharya Gunabhadra. || 67 ||”
राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ तीर्थंकर पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ तीर्थकर पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ तीर्थकर, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125
मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 254 | श्लोक 255 से 273 | श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 304 | श्लोक 305 से 321 | श्लोक 322 से 332 | श्लोक 333 से 343 | श्लोक 344 से 353 | श्लोक 354 से 370 | श्लोक 371 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 426 | श्लोक 427 से 443 | श्लोक 444 से 461 | श्लोक 462 से 471
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