चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 603 से 613 | श्लोक 614 से 624 | श्लोक 625 से 631 | श्लोक 632 से 643 | श्लोक 644 से 651 | श्लोक 652 से 663
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 664 to 671
श्लोक ( Shlok ) 664
ते तत्सन्देशमाकर्ण्य कुमारोऽयं नृपात्मजः । सत्यमेवेति सम्भाव्य बहवस्तेन सङ्गताः ॥ ६६४ ॥
सामन्त लोग जीवन्धर कुमारका सन्देश सुनकर कहने लगे कि यह सचमुच ही राजपुत्र है । इस तरह सन्मान कर बहुतसे सामन्त उनके साथ आ मिले ।। ६६४ ॥
Upon hearing the message of Prince Jivandhara, the feudatories remarked, “He is truly the prince.” Honoring him in this manner, many of the feudatories came forward and joined forces with him. (664)
श्लोक ( Shlok ) 665
ततः सन्नद्धसैन्यः संस्तस्य गत्वोपरि स्वयम् । युध्वा नानाप्रकारेण चिरं निर्जित्य तङ्गलम् ॥ ६६५ ॥
तदनन्तर- अपनी सेना तैयार कर जीवन्धर कुमारने स्वयं ही उस पर चढ़ाई की और चिरकाल तक नाना प्रकारका युद्ध कर उसकी सेनाको हरा दिया ।। ६६५ ।।
Thereafter, preparing his army, Prince Jivandhara personally launched an attack upon him, and after fighting various types of warfare for a long time, routed his army. (665)
श्लोक ( Shlok ) 666 – 668
गिर्यन्तविजयं गन्धगजं समदमूर्जितम् । समारूढः प्ररूढाशं काष्ठाङ्गारिकमुद्धतम् ॥ ६६६ ॥ उपर्यंशनि वेगाख्यविख्यातकरिणः स्थितम् । हत्वा चकार चक्रेण तनुशेषं रुषा द्विषम् ॥ ६६७ ॥ विलोक्य तद्वले भङ्ग भयादुपगते सति । तदाकार्षीत्समाश्वासं विधायाभयघोषणाम् ॥ ६६८ ॥
जीवन्धर कुमार, मदोन्मत्त तथा अतिशय बलवान् विजयगिरि नामक हाथी पर सवार थे और जिसकी आज्ञा बहुत समयसे जमी हुई थी ऐसा उद्धत काष्ठाङ्गारिक अशनिबेग नामक प्रसिद्ध हाथी पर आरूढ़ था। जीवन्धर कुमारने क्रोधमें आकर चक्रसे शत्रु काष्ठाङ्गारिकको मार गिराया, यह देख उसकी सेना भयसे भागने लगी तब जीवन्धर कुमारने अभय घोषणा कर सबको आश्वासन दिया ॥ ६६६-६६८ ।।
Prince Jivandhara was mounted on the fiercely intoxicated and exceedingly powerful elephant named Vijayagiri, while the arrogant Kashtangarika, whose authority had been established for a long time, rode the famous elephant named Ashanivega. In a fit of rage, Prince Jivandhara struck down the enemy Kashtangarika with a discus (chakra). Seeing this, his army began to flee in terror, whereupon Prince Jivandhara made a proclamation of amnesty (refuge from fear) and reassured everyone. (666-668)
श्लोक ( Shlok ) 669
बन्धून्सर्वान् समाहूय ‘विनेयानवलोक्य तान् । तत्कालोचितसम्भाषणादिभिः ह्लादमानयत् ॥६६९॥
तदनन्तर कुमारने अपने सब भाई-बन्धुओंको बुलाया और सबको नम्र देखकर उस कालके योग्य सम्भाषण आदिके द्वारा सबको हर्ष प्राप्त कराया ॥ ६६९ ॥
Thereafter, the prince summoned all his brothers and kinsmen, and seeing them all filled with humility, filled everyone with joy through conversation and gestures highly appropriate for the occasion. (669)
श्लोक ( Shlok ) 670 – 671
जिनपूजां विनिर्वृत्य कृतमङ्गलसत्क्रियः । यक्षेण भूभुजैः सर्वैश्वाप्तराज्याभिषेचनः ॥ ६७० ॥ रत्नवत्या च सम्प्राप्य स विवाहमहोत्सबम् । कृत्वा गन्धर्वदत्ताया महत्याः पट्टबन्धनम् ॥ ६७१ ॥
इसके बाद जिनेन्द्र भगवान्की पूजा कर उत्तम माङ्गलिक क्रियाएँ की गई और फिर यक्ष तथा सब राजाओंने मिलकर जीवन्धर कुमारका राज्याभिषेक किया। तदनन्तर रत्नवतीके साथ विवाहका महोत्सव प्राप्त कर गन्धर्वदत्ताको महारानीका पट्टबन्ध बाँधा ।। ६७०-६७१ ।।
Following this, after offering worship to Lord Jinendra, supreme auspicious rituals were performed, and then the Yaksha, along with all the kings, collectively performed the coronation ceremony of Prince Jivandhara. Thereafter, having celebrated the grand marriage festival with Ratnavati, he bound the royal diadem upon Gandharvadatta, consecrating her as the Chief Queen (Maharani). (670-671)
श्लोक 672 से 682
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602 | श्लोक 603 से 613 | श्लोक 614 से 624 | श्लोक 625 से 631 | श्लोक 632 से 643 | श्लोक 644 से 651 | श्लोक 652 से 663
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