मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 44 to 52
श्लोक ( Shlok ) 44
समभावनया तृप्यन् तृप्तोऽपि तनुसंस्थितेः । कदाचित्पारणाकाले प्रायाद्राजगृहं पुरम् ॥ ४४ ॥
यद्यपि वे समभावसे ही तृप्त रहते थे तथापि किसी दिन पारणाके समय राजगृह नगरमें गये ॥ ४४ ॥
“Although he remained perpetually satisfied in a state of absolute equanimity (Samabhava), yet, on a certain day at the time of breaking his fast (Parana), he entered Rajagriha city. ॥44॥”
श्लोक ( Shlok ) 45
प्रदाय प्रासुकाहारं तस्मै चामीकरच्छबिः । नृपो वृषभसेनाख्यः पञ्चाश्वर्यमवापिवान् ॥ ४५ ॥
वहाँ सुवर्णके समान कान्तिवाले वृषभसेन नामक राजाने उन्हें प्रासुक आहार देकर पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ॥ ४५ ॥
“There, a king named Vrishabhasena, whose radiant complexion resembled pure gold, offered him pure and faultless food (Prasuka Ahar), thereby attaining the five wonders (Panchashcharya). ॥45॥”
श्लोक ( Shlok ) 46 – 47
मासोनवत्सरे याते छानस्थ्ये स्वतपोवने । चम्पकद्रुममूलस्थो विहितोपोषितद्वयः ॥ ४६ ॥स्वदीक्षापक्षनक्षत्रसहिते नवमीदिने । सायाद्धे केवलज्ञानं सद्ध्यानेनोदपादयत् ॥ ४७ ॥
इस प्रकार तञ्चपरण करते हुए जब छद्मस्थ अवस्थाके ग्यारह माह बीत चुके तब वे अपने दीक्षा लेनेके वनमें पहुँचे । वहाँ उन्होंने चम्पक वृक्षके नीचे स्थित हो कर दो दिनके उपवासका नियम लिया और दीक्षा लेनेके मास पक्ष नक्षत्र तथा तिथिमें ही अर्थात् वैशाख कृष्ण नवमी के दिन श्रवण नक्षत्रमें शामके समय उत्तम ध्यानके द्वारा केवलज्ञान उत्पन्न कर लिया ॥ ४६-४७ ॥
“In this manner, while practicing severe penance, when eleven months of his un-enlightened state (Chhadmastha-avastha) had passed, he returned to the forest where he had taken initiation. There, taking his stance beneath a Champaka tree, he took the vow of a two-day fast. Then, during the very same month, fortnight, constellation, and lunar day of his initiation—that is, on the evening of the ninth day of the dark fortnight of the month of Vaishakha, under the Shravana constellation—he attained Infinite Omniscience (Kevalajnana) through supreme meditation. ॥46–47॥”
श्लोक ( Shlok ) 48
तदैवागत्य देवेन्द्रास्तत्कल्याणं व्यधुर्मुदा । मानस्तम्भादिविन्यासविविधद्धिविभूषितम् ॥ ४८ ॥
उसी समय इन्द्रोंने आकर बड़े हर्षसे ज्ञानकल्याणकका उत्सव किया और मानस्तम्भ आदिकी रचना तथा अनेक ऋद्धियों – सम्पदा-ओंसे विभूषित समवसरणकी रचना की ॥ ४८ ॥
“At that very moment, the Indras arrived and celebrated the Knowledge-Welfare festival (Jnana-Kalyanaka) with immense joy, and constructed the Samavasarana (divine preaching assembly) adorned with the Manastambha (pillar of pride-destruction) and numerous extraordinary spiritual opulences and wealth. ॥48॥”
श्लोक ( Shlok ) 49 – 52
मल्लिप्रभृतयोऽभूवन्नष्टादशगणेशिनः । द्वादशाङ्गधराः पञ्चशतानि परमेष्ठिनः ॥ ४९ ॥शिक्षकास्तस्य सद्वन्याः सहस्राण्येकविंशतिः । भर्तुरष्टशतं प्रान्तसहस्त्रमवधीक्षणाः ॥ ५० ॥ तावन्तः केवलज्ञानाः विक्रियद्धिसमृद्धयः । द्विशतद्विसहस्त्राणि चतुर्थज्ञानधारिणः ॥ ५१ ॥ ‘सहस्रार्द्ध सहस्रं तु वादिनां द्विशताधिकम् । सहस्त्रं पिण्डितास्त्रिशत्सहस्त्राणि मुनीश्वराः ॥ ५२ ॥
उन परमेष्ठीके मल्लिको आदि ले कर अठारह गणधर थे, पांच सौ द्वादशांगके जानने वाले थे, सज्जनोंके द्वारा वन्दना करनेके योग्य इक्कीस हजार शिक्षक थे, एक हजार आठसौ अवधिज्ञानी थे, इतने ही केवलज्ञानी थे, दो हजार दो सौ विक्रिया ऋद्धिके धारक थे, एक हजार पांचसौ मनःपर्ययज्ञानी थे, और एक हजार दो सौ वादी थे। इस प्रकार सब मिलाकर तीस हजार मुनिराज उनके साथ थे ॥ ४९-५२ ॥
“That Supreme Divinity (Paramesthi) had eighteen Ganadharas (chief disciples), led by Mallika. There were five hundred scholars who possessed complete knowledge of the Dwadashanga (the twelve primary scriptures). There were twenty-one thousand teachers (Shikshakas) worthy of being revered by virtuous souls. There were one thousand eight hundred sages endowed with Avadhijnana (clairvoyant knowledge), and an equal number (1,800) of Kevalajnanis (omniscient beings). There were two thousand two hundred possessors of Vikriya-riddhi (the mystical power of transformation), one thousand five hundred endowed with Manahparyaya-jnana (mind-reading knowledge), and one thousand two hundred master debaters (Vadis). In this manner, counting all together, there were thirty thousand monks (Munirajas) assembly with him. ॥49–52॥”
श्लोक 53 से 64
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43
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