नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 154 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 223 to 243
श्लोक ( Shlok ) 223
निर्गमेऽथ कुमारस्य विषण्णा नागरास्तदा । गत्वा विज्ञापयामासुस्तदृत्तान्तं महीपतेः ॥ २२३ ॥
इस तरह कुमार वसुदेवके निकलनेसे नगरनिवासी लोग दुःखी होने लगे इसलिए एक दिन उन्होंने यह समाचार महाराज समुद्रविजयके पास जाकर निवेदन किया ॥ २२३ ॥
Because of Prince Vasudeva’s excursions in this manner, the residents of the city began to feel distressed. Therefore, one day, they approached King Samudravijaya and submitted this news to him. || 223 ||
श्लोक ( Shlok ) 224 – 228
श्रुत्वावधार्य तद्राजा सहजस्नेहनिर्भरः । प्रकाशप्रतिषेधेन कदाचिद्विमुखो भवेत् ॥ २२४ ॥कुमार इति सञ्चिन्त्य तमाहूय मिथोऽब्रवीत् । ‘कुमार तव कामस्य छायाद्येयमिवान्यथा ॥ २२५ ॥वृथाटनं परित्याज्यं शीतवातादिषु त्वया । विहर्तुं परिवाञ्च्छा चेत्परितो राजमन्दिरम् ॥ २२६ ॥धारागृहे वने रम्ये हयें विहितपर्वते । मन्त्रिसामन्तयोधाग्रमहामात्रात्मजैः समम् ॥ २२७ ॥ यथेष्टे विचरेत्येतत् श्रुत्वा सोऽपि तथाचरत् । आददत्यमृतं वाप्तवचनं शुद्धबुद्धयः ॥ २२८ ॥
नगर-निवासियोंकी बात सुनकर भाईके स्नेहसे भरे हुए महाराज समुद्रविजयने विचार किया कि यदि इसे स्पष्ट ही मना किया जाता है तो संभव है यह विमुख हो जावेगा । इसलिए उन्होंने कुमार वसुदेवको एकान्तमें बुलाकर कहा कि ‘हे कुमार ! तुम्हारे शरीरकी कान्ति आज बदली-सी मालूम होती है इसलिए तुम्हें ठण्डी हवा आदिमें यह व्यर्थका भ्रमण छोड़ देना चाहिए । यदि भ्रमणकी इच्छा ही है तो राजभवनके चारों ओर धारागृह, मनोहर-वन, राज-मन्दिर, तथा कृत्रिम पर्वत आदि पर जहाँ इच्छा हो मन्त्रियों, सामन्तों, प्रधान योद्धाओं अथवा महामन्त्रियोंके पुत्रों आदिके साथ भ्रमण करो।’ महाराज वसुदेवकी बात सुनकर कुमार वसुदेव ऐसा ही करने लगे सो ठीक ही है क्योंकि शुद्ध बुद्धिवाले पुरुष आप्तजनोंके वचनोंको अमृत जैसा ग्रहण करते हैं ।। २२४-२२८ ।।
Upon hearing the words of the city residents, King Samudravijaya, filled with deep brotherly affection, reflected: “If I forbid him directly, it is possible he might turn away from me in resentment.” Therefore, calling Prince Vasudeva aside to a private place, he said, “O Prince! The luster of your body appears somewhat changed today; hence, you should give up this unnecessary wandering in the cold winds. If you still desire to stroll, then wander as you please around the royal palace—in the fountain houses (dharagriha), the charming gardens, the royal pavilions, or upon the artificial pleasure-hills—accompanied by ministers, feudatory chiefs, leading warriors, or the sons of the prime ministers.”
Hearing the words of King Samudravijaya, Prince Vasudeva began to do exactly as suggested. This is indeed fitting, for men of pure intellect accept the words of their revered elders just like nectar. || 224-228 ||
श्लोक ( Shlok ) 229 – 243
विहरमाणं तं वाचाटश्चेटकोऽपरम् । नान्ना निपुणमत्याख्यो यथेष्टाचरणोत्सुकः ॥ २२९ ॥ राज्ञा त्वं प्रतिषिद्धोऽसि सोपायं निर्गमं प्रति । इत्यवादीदसौ चाह किमर्थमिति चेटकम् ॥ २३० ॥ सोऽब्रवीतव निर्याणकाले रूपविलोकनात् । परे शिथिलचारित्रा मन्मथेनाकुलीकृताः ॥ २३१ ॥वीतलज्जा विमर्यादा विपरीतविचेष्टिताः । पीतासवसमाः कन्याः सधवा विधवाश्च ताः ॥ २३२ ॥ काश्चित्यस्विनसर्वाङ्गाः काश्चिदर्द्धात्तलोचनाः । काश्चित्सन्त्यक्तसंयाताः काश्चित्त्यक्तार्द्धभोजनाः ॥ २३३ ॥अवमत्य गुरून् काश्चित्काश्चिन्निर्भर्त्य रक्षकान् । भर्तृन विगणय्यान्याः पुत्रांश्चान्याश्च पुत्रकान् ॥२३४॥मत्वा मर्कटकान् काश्चित्समुत्क्षिप्य समाकुलाः । कम्बलं परिधायान्या विचिन्त्योत्कृष्टवाससी ॥ २३५॥अङ्गरागं समालोच्य काश्चिदालिप्य कर्दमम् । लोचने स्वे समालोच्य ललाटेभ्यस्तकज्जलाः ॥ २३६ ॥ “स्वाः स्वास्तथाविधाः सर्वाः सवैरुद्विग्नमानसैः । निरीक्ष्य पौरैर्वाक्येन ज्ञापितोऽयं नरेश्वरः ॥ २३७ ॥तवेदृशीमुपायेन व्यवस्थां पर्यकल्पयत् । इति संश्रुत्य तेनोक्त कुमारस्तत्परीक्षितुम् ॥ २३८ ॥ राजगेहाद्विनिर्गन्तुकामो दौवारिकैस्तदा । तवामजस्य ‘भो देव निर्देशोऽस्माकमीदृशः ॥ २३९ ॥ बहिस्त्वया न गन्तव्यमिति रुद्धः स्थितोऽन्यदा । समुद्रविजयादीनामनुक्त्वाऽयशसो भयात् ॥ २४० ॥ ‘वसुदेवोऽमुतो गत्वा विद्यासंसाधनच्छलात् । श्मशानभूमावेकाकी महाज्वाले हुताशने ॥ २४१॥ निपत्याकीर्तिभीर्मातुरिति पत्रं विलिख्य तत् । कण्ठे निबध्य वाहस्य मुक्त्वा तत्रैव तं स्वयम्॥ २४२ ॥ वह्नि प्रदक्षिणीकृत्य दह्यमानशवान्वितम् । अगादलक्षमार्गः स रात्रावेव द्रुतं ततः ॥ २४३ ॥
कुमार इस प्रकार राजमन्दिरके आसपास ही भ्रमण करने लगे। एक दिन जिसे बहुत बोलनेकी आदत थी और जो स्वेच्छानुसार आचरण करनेमें उत्सुक रहता था ऐसा निपुणमति नामका सेवक कुमार वसुदेवसे कहने लगा कि इस उपायसे महाराजने आपको बाहर निकलनेसे रोका है। कुमारने भी उस सेवकसे पूछा कि महाराजने ऐसा क्यों किया है ? उत्तरमें वह कहने लगा कि जब आप बाहर निकलते हैं तब आपका सुन्दर रूप देखनेसे नगरकी स्त्रियोंका चारित्र शिथिल हो जाता है, वे कामसे आकुल हो जाती हैं, लज्जा छोड़ देती हैं, विपरीत चेष्टाएँ करने लगती हैं, कन्याएँ सधवाएँ और विधवाएँ सभी मदिरा पी हुईंके समान हो जाती हैं, कितनी ही स्त्रियोंका सब शरीर पसीनासे तरबतर हो जाता है; कितनी ही स्त्रियोंके नेत्र आधे खुले रह जाते हैं, कितनी ही स्त्रियाँ पहननेके वस्त्र छोड़ देती हैं, कितनी ही भोजन छोड़ देती हैं, कितनी ही गुरुजनोंका तिरस्कार कर बैठती हैं, कितनी ही रक्षकोंको ललकार देती हैं, कितनी ही अपने पतियोंकी उपेक्षा कर देती हैं, कितनी ही पुत्रोंकी परवाह नहीं करती हैं, कितनी ही पुत्रोंको बन्दर समझ कर दूर फेंक देती हैं, कितनी ही कम्बलको ही उत्तम वस्त्र समझकर पहिन लेती हैं, कितनी कीचड़को अङ्गराग समझकर शरीर पर लपेट लेती हैं और कितनी ही ललाटको नेत्र समझ कर उसीपर कज्जल लगा लेती हैं। अपनी-अपनी समस्त स्त्रियोंकी ऐसी विपरीत चेष्टा देख समस्त नगर-निवासी बड़े दुःखी हुए और उन्होंने शब्दों द्वारा महाराजसे इस बातका निवेदन किया। महाराजने भी इस उपायसे आपकी ऐसी व्यवस्था की है। निपुणमति सेवककी बात सुनकर उसकी परीक्षा करनेके लिए कुमार वसुदेव ज्यों ही राजमन्दिरसे बाहर जाने लगे त्यों ही द्वारपालोंने यह कहते हुए “मना कर दिया कि ‘देव ! हम लोगोंको आपके बड़े भाईकी ऐसी ही आज्ञा है कि कुमारको बाहर नहीं जाने दिया जावे ।’ द्वारपालोंकी उक्त बात सुनकर कुमार वसुदेव उस समय तो रुक गये परन्तु दूसरे ही दिन समुद्रविजय आदिसे कुछ कहे बिना ही अपयशके भयसे विद्या सिद्ध करनेके बहाने अकेले ही श्मशानमें गये और वहाँ जाकर माताके नाम एक पत्र लिखा कि ‘वसुदेव अकीर्तिके भयसे महाज्वालाओं वाली अग्निमें गिरकर मर गया है।’ यह पत्र लिखकर घोड़ेके गलेमें बाँध दिया, उसे वहीं छोड़ दिया और स्वयं जिसमें मुर्दा जल रहा था ऐसी अग्निकी प्रदक्षिणा देकर रात्रिमें ही बड़ी शीघ्रतासे किसी अलक्षित मार्गसे चले गये ॥ २२९-२४३ ॥
Thus, the prince restricted his strolls to the vicinity of the royal palace. One day, a servant named Nipunamati, who was a habitual chatterbox and fond of acting as he pleased, said to Prince Vasudeva, “The King has used this clever trick to stop you from going outside.” The prince asked the servant, “Why did the King do such a thing?”
In reply, the servant said, “When you ride out, the sight of your exquisite beauty causes the moral conduct of the city’s women to waver. They become overwhelmed with desire, cast away all modesty, and begin to behave erratically. Unmarried maidens, married women, and widows alike act as though they are intoxicated with wine. The bodies of many women break out in profuse sweat; the eyes of many remain half-closed; some drop their garments, while others abandon their food. Many go as far as to insult their elders, defy their guards, neglect their husbands, and pay no heed to their sons—some even mistake their infants for monkeys and fling them away! Some wrap themselves in coarse blankets, thinking them to be fine garments; others smear mud on their bodies, mistaking it for fragrant paste; and some even apply collyrium (kajal) to their foreheads, mistaking them for their eyes! Seeing such bizarre and contrary behavior from their respective women, all the city residents became deeply distressed and reported the matter to the King in plain words. Consequently, the King devised this scheme to restrict you.”
Upon hearing the servant Nipunamati’s words, and wishing to test their truth, Prince Vasudeva attempted to step outside the royal palace. Instantly, the gatekeepers stopped him, saying, “O Lord! We have strict orders from your elder brother not to allow the prince to go outside.”
Hearing the gatekeepers’ words, Prince Vasudeva desisted at that moment. However, on the very next day, driven by the fear of infamy and without saying a word to Samudravijaya or anyone else, he went alone to the cremation ground under the pretext of mastering mystical invocations (vidya). Arriving there, he wrote a letter addressed to his mother, stating: “Out of fear of dishonor, Vasudeva has cast himself into the blazing flames of a funeral pyre and perished.” Having written this letter, he tied it around the neck of his horse and left the animal there. He then circumambulated a burning funeral pyre, and under the cover of night, swiftly departed unnoticed through an unseen path. || 229-243 ||
श्लोक 244 से 252
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