राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा
श्लोक 1 से 11 — धर्मरुचि मुनिराज का ध्यान और परिचय
भगवान महावीर स्वामी राजगृह नगर में पधारकर विपुलाचल पर्वत पर विराजमान होते हैं। राजा श्रेणिक भगवान की स्तुति के लिए जाते समय वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न धर्मरुचि मुनिराज को देखते हैं। मुनिराज की निश्चल, स्थिर और इन्द्रिय-विजयी मुद्रा देखकर वे उनकी वंदना करते हैं, किंतु उनके मुख पर विकृति देखकर मन में शंका उत्पन्न होती है।
भगवान महावीर के समक्ष पहुँचकर श्रेणिक गौतम गणधर से उन मुनिराज के विषय में पूछते हैं। गणधर बताते हैं कि वे चम्पा नगरी के राजा श्वेतवाहन थे। भगवान महावीर से धर्मोपदेश सुनकर उनमें वैराग्य उत्पन्न हुआ और उन्होंने अपने पुत्र विमलवाहन को राज्य सौंपकर संयम धारण कर लिया। दस धर्मों में विशेष रुचि रखने के कारण वे धर्मरुचि नाम से प्रसिद्ध हुए।
श्लोक 12 से 20— मुनिराज के मन में स्नेह और मान का उदय
एक महीने के उपवास के बाद धर्मरुचि मुनिराज भिक्षा के लिए नगर में जाते हैं। वहाँ तीन व्यक्तियों के बीच उनके राजसी लक्षणों और संन्यास पर चर्चा होती है। एक व्यक्ति उनके लक्षणों को साम्राज्य के योग्य बताता है, जबकि दूसरा स्पष्ट करता है कि उन्होंने राज्य त्यागकर वैराग्य धारण किया है।
तीसरा व्यक्ति मुनिराज के त्याग की निंदा करते हुए कहता है कि उन्होंने अपने छोटे पुत्र को असमर्थ अवस्था में राज्य सौंप दिया, जिससे मंत्री राज्य का अनुचित उपभोग कर रहे हैं। पुत्र के प्रति स्नेह और अपने मान से प्रभावित होकर धर्मरुचि मुनिराज भोजन किए बिना वन में लौट आते हैं। इस प्रकार बाहरी आलोचना उनके मन में अशुभ भावों का कारण बनती है।
श्लोक 21 से 30 — रौद्रध्यान से केवलज्ञान तक
मुनिराज के मन में क्रोध कषाय तीव्र हो जाता है। वे प्रतिकूल मंत्रियों के प्रति हिंसा और दंड का विचार करने लगते हैं तथा संरक्षणानन्द नामक रौद्रध्यान में प्रविष्ट हो जाते हैं। यदि उनकी यह स्थिति बनी रहती, तो वे नरकायु का बंध कर सकते थे।
गौतम गणधर राजा श्रेणिक को शीघ्र जाकर मुनिराज को समझाने का निर्देश देते हैं। वे मुनिराज को क्रोध और मोह त्यागकर संयम में पुनः स्थित होने तथा स्त्री-पुत्र आदि के संबंधों से विरक्त रहने की प्रेरणा देने को कहते हैं। श्रेणिक गणधर के निर्देशानुसार मुनिराज को समझाते हैं। मुनिराज कषायों को शांत कर द्वितीय शुक्लध्यान के द्वारा केवलज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। इन्द्र आदि देव उनकी पूजा के लिए आते हैं और राजा श्रेणिक भी उनके साथ धर्मरुचि केवली की पूजा करते हैं। इसके बाद श्रेणिक भगवान महावीर के पास लौट आते हैं।
श्लोक 31 से 42 — जम्बूकुमार के जन्म एवं केवलज्ञान परंपरा का भविष्य
गणधर गौतम स्वामी राजा श्रेणिक को बताते हैं कि ब्रह्मस्वर्ग का इन्द्र विद्युन्माली ही आगे चलकर जम्बूकुमार के रूप में जन्म लेगा। सेठ अर्हद्दास की पत्नी जिनदासी के गर्भ से जन्म लेने वाला जम्बूकुमार अत्यंत भाग्यशाली, विनीत, तेजस्वी और बाल्यकाल से ही विषय-विकारों से विरक्त होगा। भगवान महावीर के निर्वाण के समय उसे केवलज्ञान प्राप्त होगा। आगे चलकर वह धर्मोपदेश देकर जीवों को संसार के दुःखों से मुक्ति का मार्ग दिखाएगा। उसके आगमन पर राजा कुणिक भी परिवार सहित धर्मश्रवण कर दान, शील और उपवास जैसे धर्माचरण अपनाएगा।
श्लोक 43 से 64 — जम्बूकुमार की वैराग्य भावना एवं ऊँट की कथा
जम्बूकुमार दीक्षा लेने के लिए उत्सुक होता है, परंतु भाई-बन्धुओं के आग्रह पर कुछ समय रुक जाता है। वे उसका विवाह चार श्रेष्ठ कन्याओं से कराने का निश्चय करते हैं। विवाह के बाद उसकी माता जिनदासी यह जानना चाहती है कि क्या उसका पुत्र सांसारिक भोगों में आसक्त होगा। इसी समय विद्युत्प्रभ नामक चोर, जो विद्युच्चोर कहलाता है, सेठ के घर चोरी करने आता है। माता उसे जम्बूकुमार का दीक्षा-संकल्प छुड़ाने का कार्य सौंपती है। जम्बूकुमार की विरक्ति देखकर चोर ऊँट की कथा सुनाता है, जो मधुर घास की आशा में दूसरी घास छोड़कर भूख से मर जाता है। इसके उत्तर में जम्बूकुमार समझाता है कि अनंत काल तक स्वर्ग के सुख भोगने पर भी जीव तृप्त नहीं हुआ, तो क्षणभंगुर सांसारिक सुख उसे कैसे तृप्त कर सकते हैं?
श्लोक 65 से 72 — भोगों की अतृप्ति और चंचल सुखों का स्वरूप
विद्युच्चोर जम्बूकुमार को समझाने के लिए एक भील, साँप, हाथी और लोभी गीदड़ की कथा सुनाता है। लोभवश गीदड़ धनुष की ताँत काटने का प्रयास करता है और स्वयं मृत्यु को प्राप्त होता है। इस कथा के माध्यम से चोर लोभ के दुष्परिणाम बताता है। जम्बूकुमार इसके उत्तर में ज्वर से पीड़ित प्यासे मनुष्य का दृष्टांत देता है, जो बहुत जल पीने पर भी तृप्त नहीं हुआ। वह समझाता है कि जब जीव अनंत काल तक स्वर्ग के सुख भोगकर भी तृप्त नहीं हुआ, तो हाथी के कान के समान चंचल वर्तमान विषय-सुखों से उसकी तृप्ति कैसे संभव है? अतः क्षणिक भोगों में स्थायी सुख की अपेक्षा करना व्यर्थ है।
श्लोक 73 से 81— लोभ का त्याग एवं दुर्लभ धर्मरत्नों की प्राप्ति
विद्युच्चोर की कथा के माध्यम से बताया जाता है कि अत्यधिक लोभ मनुष्य के विनाश का कारण बनता है। इसके उत्तर में जम्बूकुमार रत्नों की राशि पाने वाले उस पथिक का दृष्टांत देता है, जो अवसर रहते रत्नों को ग्रहण नहीं करता और बाद में लौटने पर उन्हें प्राप्त नहीं कर पाता। इसी प्रकार संसार में दुर्लभ सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र जैसे धर्मरत्न प्राप्त होने पर भी जो उनका स्वीकार नहीं करता, वह महान अवसर खो देता है। इस प्रसंग का मुख्य संदेश है कि दुर्लभ धर्मलाभ को पहचानकर उसका सदुपयोग करना चाहिए तथा लोभ और प्रमाद से बचना चाहिए।
श्लोक 82 से 93 — विषयासक्ति एवं प्रमाद से आत्मरत्नों की हानि
विद्युच्चोर मांस के लोभ में अपना पहले से प्राप्त भोजन खो देने वाले शृगाल की कथा सुनाता है। जम्बूकुमार इसके उत्तर में निद्रा में प्रमत्त वैश्य का दृष्टांत देता है, जिसके घर से चोर बहुमूल्य रत्न चुरा लेते हैं। वह स्पष्ट करता है कि इसी प्रकार विषय-सुखों में आसक्त जीव के ज्ञान, दर्शन और चारित्र रूपी अमूल्य रत्न राग रूपी चोर चुरा लेते हैं। इसके बाद चोर एक स्त्री और मृदंगवादक की कथा सुनाता है, जिसमें लोभ के कारण मृदंगवादक स्वयं मृत्यु को प्राप्त होता है। इन दृष्टांतों से स्पष्ट होता है कि विषयासक्ति, प्रमाद और अतिलोभ आत्मकल्याण में बाधक हैं तथा विवेकपूर्वक इनका त्याग करना आवश्यक है।
श्लोक 94 से 101 — क्षणिक विषयसुखों के परिणाम एवं संसार से विरक्ति
जम्बूकुमार और विद्युच्चोर के संवाद में ललितांग नामक व्यभिचारी तथा एक रानी की कथा आती है। रानी के साथ गुप्त रूप से रमण करने वाला ललितांग अंततः पकड़े जाने के भय से मल-मूत्र से भरे स्थान में छिपकर घोर दुःख भोगता है। इस दृष्टांत से बताया गया है कि थोड़े से विषयसुख की इच्छा जीव को भयंकर दुःखों और नरक जैसी यातनाओं में डाल सकती है। सांसारिक भोगों का आकर्षण क्षणिक है, किंतु उनके परिणाम अत्यंत दुःखदायी हो सकते हैं। अतः बुद्धिमान जीव को विषयासक्ति से विरक्त होकर आत्मकल्याण की ओर प्रवृत्त होना चाहिए।
श्लोक 102 से 111 — संसाररूपी वन का दृष्टांत एवं वैराग्य की प्रेरणा
जम्बूकुमार संसार के दुःखों को समझाने के लिए संसाररूपी वन, मदोन्मत्त हाथी, जन्मरूपी कुएँ, आयुरूपी लता, शुक्ल-कृष्ण पक्षरूपी चूहों, नरकरूपी सर्पों और विषयसुखरूपी मधु का दृष्टांत देता है। जीव मृत्यु के भय और अनेक संकटों से घिरा हुआ भी क्षणिक सुखों में आसक्त रहता है। आयु निरंतर क्षीण होती रहती है, फिर भी जीव विषयभोगों को सुख मानकर उनमें लीन रहता है। यह दृष्टांत संसार की अनित्यता, जीवन की असुरक्षा और भोगों की क्षणभंगुरता को प्रकट करता है। बुद्धिमान व्यक्ति को परिग्रह का त्याग कर कठिन तपश्चरण एवं आत्मकल्याण में प्रवृत्त होना चाहिए।
इसके पश्चात् सूर्य के उदय का वर्णन अन्यायी राजा तथा उत्तम राजा के रूपक द्वारा किया गया है। सूर्य की उष्णता, गति, कमलों के विनाश अथवा विकास आदि गुणों के माध्यम से दोनों प्रकार के राजाओं की विशेषताओं का काव्यात्मक चित्रण किया गया है।
श्लोक 112 से 122 — जम्बूकुमार का दीक्षा कल्याणक एवं भावी आध्यात्मिक पद
जम्बूकुमार की संसार, शरीर और भोगों से विरक्ति देखकर उसकी माता, चारों कन्याएँ, विद्युत्चोर तथा अन्य परिजन भी वैराग्य धारण करते हैं। राजा कुणिक, जम्बूकुमार के भाई-बन्धु, उसकी सेना और अनावृत देव उसके दीक्षा कल्याणक में सम्मिलित होते हैं। देव-निर्मित पालकी में जम्बूकुमार विपुलाचल पर्वत पर पहुँचकर गौतम स्वामी के समीप वंदना करता है और अनेक लोगों तथा विद्युत्चोर के पाँच सौ साथियों के साथ सुधर्माचार्य से संयम ग्रहण करता है।
आगे जम्बूकुमार की आध्यात्मिक प्रगति का वर्णन है। भगवान महावीर के निर्वाण के बारह वर्ष बाद सुधर्माचार्य और जम्बूकुमार क्रमशः केवली तथा श्रुतकेवली होंगे। सुधर्माचार्य के मोक्ष जाने के बारह वर्ष बाद जम्बूकुमार को केवलज्ञान प्राप्त होगा। वे अपने शिष्य भव के साथ चालीस वर्ष तक धर्मोपदेश देते हुए विहार करेंगे। जम्बूकुमार की इस महिमा को सुनकर अनावृत यक्ष अपने वंश के गौरव को प्रकट करता है और आनन्द नामक नाटक प्रस्तुत करता है।
श्लोक 123 से 133 — अनावृत देव का पूर्वभव एवं विद्युन्माली के पुण्य का वर्णन
राजा श्रेणिक के प्रश्न पर गौतम गणधर बताते हैं कि जम्बूकुमार के वंश में धर्मप्रिय नामक सेठ हुआ, जिसके पुत्र अर्हद्दास ने धन और यौवन के अभिमान में पिता की शिक्षा की अवहेलना कर सातों व्यसनों का सेवन किया। बाद में दुर्गति के भय से उसे पश्चात्ताप हुआ और कुछ पुण्य के प्रभाव से वह अनावृत नामक व्यंतर देव बना। इसी पर्याय में उसने सम्यग्दर्शन धारण किया।
इसके पश्चात् राजा श्रेणिक विद्युन्माली के पूर्वभव और उसके पुण्य के विषय में पूछते हैं। गौतम स्वामी बताते हैं कि पूर्वविदेह क्षेत्र के वीतशोक नगर में राजा महापद्म और रानी वनमाला के पुत्र शिवकुमार का जन्म हुआ था। एक दिन वन से लौटते समय उसने अनेक लोगों को सुगंधित पुष्प एवं पूजन सामग्री लेकर जाते देखा। वह इस दृश्य का कारण जानने के लिए बुद्धिसागर मंत्री के पुत्र से प्रश्न करता है। इस प्रकार विद्युन्माली के पूर्वभव की कथा आरंभ होती है।
श्लोक 134 से 151— सागरदत्त मुनि का वैराग्य एवं तपश्चरण
राजकुमार शिवकुमार को मंत्रीपुत्र बताता है कि सागरदत्त नामक श्रुतकेवली मुनि ने एक मास का उपवास करने के पश्चात् सामसमृद्ध सेठ के यहाँ आहार ग्रहण किया और पंचाश्चर्य प्राप्त किए। उनके पूर्वभव का वर्णन करते हुए बताया जाता है कि वे चक्रवर्ती वज्रदत्त के पुत्र थे। समुद्र में जन्म होने के कारण उनका नाम सागरदत्त रखा गया। एक दिन महल की छत पर उन्होंने मन्दराचल के समान सुंदर बादल को देखा, जो देखते ही देखते नष्ट हो गया। इससे उन्हें यौवन, धन, शरीर और आयु की अनित्यता का बोध हुआ। वे अमृतसागर तीर्थंकर के समीप दीक्षित होकर तप, ज्ञान और अनेक ऋद्धियाँ प्राप्त करते हुए श्रुतकेवली बने। उनकी कथा सुनकर शिवकुमार के मन में भी वैराग्य उत्पन्न हुआ।
श्लोक 152 से 161 — भगदत्त मुनि का उपदेश एवं भवदेव को संयम की प्रेरणा
मगध देश के वृद्ध ग्राम में राष्ट्रकूट वैश्य के दो पुत्र भगदत्त और भवदेव थे। बड़े भाई भगदत्त ने सुस्थित मुनिराज के पास दीक्षा ग्रहण कर ली। गुरु के साथ विहार करते हुए वे अपनी जन्मभूमि पहुँचे, जहाँ उनके भाई-बन्धुओं ने उनका स्वागत किया। भवदेव, जो नागश्री नामक कन्या से विवाहित था, बड़े भाई के दर्शन और उपदेश से प्रभावित हुआ। भगदत्त मुनि ने उसे संसार की विरूपता और धर्म का वास्तविक स्वरूप समझाकर संयम ग्रहण करने की प्रेरणा दी। भवदेव ने पहले नागश्री से छुट्टी लेने की बात कही, परंतु बड़े भाई ने समझाया कि स्त्री आदि के मोह में फँसा जीव आत्मकल्याण नहीं कर सकता।
श्लोक 162 से 171 — भवदेव का दीक्षा-मोह एवं दारुक की कथा
भगदत्त मुनि के आग्रह पर भवदेव ने दीक्षा ग्रहण कर ली और बारह वर्ष तक गुरु के साथ विहार किया। किंतु उसके मन में नागश्री के प्रति मोह बना रहा। एक दिन वह अपनी जन्मभूमि लौटकर नागश्री के विषय में पूछने लगा। गणिनी सुब्रता ने उसके मन का भाव समझकर उसे संयम में स्थिर करने के लिए दारुक नामक दासी-पुत्र की कथा सुनाई। दारुक की माता ने उसे सेठ का जूठा भोजन खाने को विवश किया। ग्लानि होने पर उसने भोजन वमन कर दिया, किंतु भूख लगने पर भी अपने वमन किए हुए भोजन को पुनः ग्रहण नहीं किया। इस दृष्टांत से समझाया गया कि जब सामान्य मनुष्य भी त्यागे हुए अपवित्र भोजन को ग्रहण नहीं करता, तो मुनि को त्यागे हुए विषयभोगों की इच्छा क्यों करनी चाहिए?
श्लोक 172 से 183 — कुत्ते का दृष्टांत एवं विषयासक्ति की निंदनीयता
गणिनी सुब्रता भवदेव को नरपाल राजा के उस कुत्ते की कथा सुनाती हैं, जिसे राजा अत्यंत प्रेम से पालता था, अच्छे भोजन और स्वर्णाभूषणों से सजाता था तथा स्वर्ण पालकी में बैठाकर ले जाता था। एक दिन पालकी में जाते समय कुत्ते की दृष्टि बालक की विष्ठा पर पड़ी और वह उसे खाने के लोभ में पालकी से कूद पड़ा। राजा ने उसे डंडे से पीटकर भगा दिया। इस कथा के माध्यम से बताया गया कि जो मुनि पहले पूजनीय होते हैं, वे भी त्यागी हुई तुच्छ वस्तुओं की इच्छा करने पर अनादर के पात्र बन जाते हैं। अतः संयम धारण करने के बाद विषयभोगों की ओर लौटना साधु के गौरव और आत्मकल्याण दोनों के प्रतिकूल है।
श्लोक 184 से 192 — संसाररूपी कुएँ से मुक्ति एवं गुरु की करुणा
एक पथिक सुगम मार्ग छोड़कर दुर्गम वन में चला जाता है और व्याघ्र के भय से एक भयंकर कुएँ में गिर पड़ता है। वहाँ वह अनेक शारीरिक कष्टों और रोगों से पीड़ित होता है। एक दयालु वैद्य उसे कुएँ से निकालकर औषधि द्वारा स्वस्थ करता है और उचित मार्ग दिखाता है। किंतु पथिक पुनः विषयों में आसक्त होकर उसी कुएँ में गिर पड़ता है। इसी प्रकार गुरु संसाररूपी कुएँ में पड़े जीवों को जैनधर्मरूपी औषधि से सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र प्रदान कर मुक्ति के मार्ग पर लगाते हैं। इसके पश्चात् बताया गया है कि सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र के समीप रहकर भी उनका लाभ न लेने वाले जीव, विकसित चम्पा के पास रहकर भी सुगंध से दूर रहने वाले भ्रमर के समान हैं।
श्लोक 193 से 200 — कुशील आदि की प्रवृत्ति एवं भवदेव का पुनः संयम
जो जीव कषाय, विषय, आरम्भ और लौकिक ज्ञान के वशीभूत होकर इन्द्रिय-विषयों में आसक्त रहते हैं, वे कुशील कहलाते हैं। निषिद्ध द्रव्य एवं भावों में लोभ करने वाले संसक्त, ज्ञान-चारित्र में ह्रास पाने वाले अवसन्न और सदाचार से दूर रहने वाले मृगचारी कहलाते हैं। महामोह के कारण ये जीव संसार में बार-बार दुःख भोगते हैं। गणिनी की शिक्षाप्रद कथाओं से भवदेव को अपनी भूल का बोध हुआ। नागश्री की दुर्गति देखकर उसने अपने पूर्व मोह पर पश्चात्ताप किया और पुनः संयम में स्थिर हो गया। आयु के अंत में चारों आराधनाओं का आश्रय लेकर वह माहेन्द्र स्वर्ग में देव हुआ। आगे मुनिराज बताते हैं कि वे स्वयं भगदत्त के जीव हैं और शिवकुमार भवदेव के जीव हैं। इस प्रकार शिवकुमार को वैराग्य की प्रेरणा मिलती है।
श्लोक 201 से 213 — शिवकुमार का कठिन तप एवं विद्युन्माली देव के रूप में जन्म
शिवकुमार दीक्षा लेने के लिए तैयार होता है, परंतु माता-पिता उसे रोक देते हैं। वह प्रासुक आहार के अतिरिक्त भोजन ग्रहण न करने का संकल्प करता है। राजा की घोषणा पर दृढ़वर्मा श्रावक उसे समझाते हैं कि कुटुम्बियों का मोह आत्मसंयम में बाधक है तथा वे उसे प्रासुक भोजन से सेवा देते हैं। शिवकुमार निर्विकार भाव से आहार ग्रहण करता है और बारह वर्ष तक कठिन तप करता है। स्त्रियों के समीप रहते हुए भी उसका चित्त विकाररहित रहता है। आयु के अंत में संन्यास धारण कर वह ब्रह्मस्वर्ग में विद्युन्माली देव के रूप में उत्पन्न होता है। उसकी चार देवियाँ आगे जम्बूकुमार की पत्नियाँ बनकर उसके साथ संयम धारण करेंगी और अंततः मोक्ष प्राप्त करेंगी। यह कथा सुनकर राजा श्रेणिक अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भगवान महावीर तथा गौतम गणधर को नमस्कार करते हैं।
श्लोक 214 से 221— प्रीतिंकर मुनि के पूर्वभव की कथा का आरंभ
दूसरे दिन राजा श्रेणिक भगवान महावीर के समवसरण में पहुँचते हैं और प्रीतिंकर मुनि के असाधारण रूप को देखकर उनके पूर्वभव के पुण्य के विषय में प्रश्न करते हैं। गौतम गणधर बताते हैं कि मगध देश के सुप्रतिष्ठ नगर में राजा जयसेन राज्य करते थे। वहाँ सागरदत्त नामक सेठ अपनी पत्नी प्रभाकरी और दो पुत्रों नागदत्त तथा कुबेरदत्त के साथ रहता था। नागदत्त को छोड़कर परिवार के सभी सदस्य श्रावक धर्म का पालन करते थे। इसी बीच धरणिभूषण पर्वत के प्रियंकर उद्यान में सागरसेन मुनिराज पधारते हैं। राजा जयसेन और अन्य लोग उनकी पूजा-वंदना कर धर्म का स्वरूप जानने के लिए उपस्थित होते हैं।
श्लोक 222 से 231 — सम्यग्दर्शन, पुण्य-पाप एवं सागरदत्त सेठ का संन्यास
सागरसेन मुनिराज उपदेश देते हैं कि सम्यग्दृष्टि जीव दान, पूजा, व्रत और उपवास आदि से पुण्य अर्जित कर स्वर्ग के सुख प्राप्त करते हैं तथा संयम से मोक्ष प्राप्त करते हैं। मिथ्यादृष्टि जीव भी पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग प्राप्त कर सकते हैं और अनुकूल परिस्थितियों में सम्यक् धर्म ग्रहण कर सकते हैं। किंतु तीव्र मिथ्यात्व और भोगासक्ति से युक्त जीव हिंसा, झूठ, चोरी, परस्त्रीगमन तथा परिग्रह द्वारा पाप संचय कर संसार के दुःखों में पड़ते हैं। मुनिराज से अपनी आयु केवल तीस दिन की जानकर सागरदत्त सेठ आष्टाह्निक पूजा करते हैं, अपना पद बड़े पुत्र को सौंपते हैं और बाईस दिन का संन्यास धारण कर देवगति प्राप्त करते हैं। पिता के संन्यास के बाद नागदत्त लोभवश कुबेरदत्त से छिपे धन के विषय में पूछता है, किंतु कुबेरदत्त उसे समझाकर उसकी दुर्भावना दूर कर देता है।
श्लोक 232 से 241 — प्रीतिंकर के जन्म का वरदान एवं पुण्यशाली नामकरण
कुबेरदत्त और नागदत्त परस्पर धन का विभाजन कर जिनमंदिरों का निर्माण, जिनपूजा और पात्रदान आदि पुण्यकार्य करते हैं। एक दिन कुबेरदत्त सागरसेन मुनिराज को आहारदान देकर उनसे पुत्र-लाभ के विषय में पूछता है। मुनिराज बताते हैं कि दोनों भाई महापुण्यशाली और चरमशरीरी पुत्र प्राप्त करेंगे। यह सुनकर दोनों अत्यंत प्रसन्न होते हैं और संकल्प करते हैं कि पुत्र को मुनिराज के चरणों में क्षुल्लक बनाने के लिए समर्पित करेंगे। कुछ समय बाद उनके यहाँ पुत्र उत्पन्न होता है, जिसका नाम प्रीतिंकर रखा जाता है। उसके जन्म से परिवार में हर्ष और आध्यात्मिक आशा का वातावरण बनता है।
श्लोक 242 से 252 — प्रीतिंकर की शास्त्र-शिक्षा एवं समुद्रयात्रा
पाँच वर्ष की आयु में प्रीतिंकर को उसके माता-पिता सागरसेन मुनिराज के सुपुर्द कर देते हैं। मुनिराज उसे धान्यपुर ले जाकर दस वर्ष तक समस्त शास्त्रों की शिक्षा देते हैं। संयम के प्रति उत्सुक होने पर भी गुरु उसे दीक्षा के लिए अभी उपयुक्त समय न होने की बात कहकर रोक देते हैं। गुरु की आज्ञा मानकर प्रीतिंकर माता-पिता के पास लौटता है और मार्ग में शिष्ट पुरुषों को शास्त्रों का उपदेश देता जाता है। वह निश्चय करता है कि पर्याप्त धन अर्जित करने के बाद ही विवाह करेगा। कुछ समय बाद वह नगरवासियों के साथ समुद्रयात्रा पर जाने का निश्चय करता है। गुरु से आशीर्वादस्वरूप पत्र प्राप्त कर उसे आदरपूर्वक अपने पास रखता है और मित्रों के साथ जहाज में बैठकर भूमितिलक नगर की ओर प्रस्थान करता है।
श्लोक 361 से 371 — शृगाल का व्रत और प्रीतिंकर के रूप में जन्म
सागरसेन मुनिराज के उपदेश से शृगाल को अपने पूर्वकर्मों का बोध होता है। मांस के लोभ के कारण मुनिराज उसे रात्रिभोजन-त्याग का व्रत ग्रहण करने की प्रेरणा देते हैं। शृगाल श्रद्धापूर्वक व्रत स्वीकार कर मद्य-मांस का भी त्याग कर देता है और शुद्ध आहार लेने लगता है। एक दिन प्यास से व्याकुल होने पर भी वह सूर्यास्त के कारण पानी नहीं पीता और व्रत की रक्षा करता है। विशुद्ध परिणामों से शरीर त्यागकर वह धनमित्रा के गर्भ से प्रीतिंकर नामक पुत्र के रूप में जन्म लेता है। अपने पूर्वभव के व्रत का प्रभाव जानकर वह संसार से विरक्त होता है और व्रत-महिमा की प्रशंसा करता है।
श्लोक 372 से 381 — व्रत का महत्त्व और धर्म-पुण्य का फल
आचार्य बताते हैं कि व्रतहीन मनुष्य संसार में दुःख और अविश्वास का पात्र बनता है, जबकि व्रती व्यक्ति फलयुक्त वृक्ष के समान सबका विश्वास और सम्मान प्राप्त करता है। व्रत इस जन्म के साथ-साथ परभव में भी शुभ फल देता है। पापमय प्रवृत्तियों से निवृत्त होना ही व्रत का वास्तविक स्वरूप है। छोटा-सा व्रत भी स्वर्ग और मोक्ष का कारण बन सकता है, जिसका उदाहरण प्रीतिंकर है। सुख-दुःख के वास्तविक कारण धर्म और पाप हैं—धर्म से सुख तथा पाप से दुःख की प्राप्ति होती है।
श्लोक 382 से 391— प्रीतिंकर का संयम और श्रेणिक का प्रश्न
जो व्यक्ति केवल वर्तमान जीवन के हित-अहित का विचार करता है, वह भी बुद्धिमान कहलाता है; अतः जो आगामी जन्मों का भी विचार करता है, वह अधिक विवेकी है। इसलिए जिनेन्द्रदेव द्वारा बताए गए व्रतों को धारण कर स्वर्ग और मोक्ष के लिए प्रयत्न करना चाहिए। प्रीतिंकर अपनी सम्पत्ति पुत्र प्रियंकर को सौंपकर भगवान महावीर के समीप संयम ग्रहण करता है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के मार्ग से वह घातिया कर्मों का नाश कर अनन्तचतुष्टय तथा अंततः मोक्ष प्राप्त करेगा। यह सुनकर श्रेणिक प्रसन्न होते हैं। अगले दिन वे शेष अवसर्पिणी और आगामी उत्सर्पिणी काल का विवरण पूछते हैं।
श्लोक 392 से 401 — पंचम काल और कल्कि राजा का वर्णन
गणधर बताते हैं कि चतुर्थ काल के अंत से तीन वर्ष और साढ़े आठ माह शेष रहने पर भगवान महावीर निर्वाण प्राप्त करेंगे। इसके बाद इक्कीस हजार वर्ष का दुःषमा पंचम काल होगा। इस काल में मनुष्यों की आयु, शरीर, आचरण और सदाचार में ह्रास होगा तथा पाप और वर्णसंकरता बढ़ेगी। पंचम काल के एक हजार वर्ष बीतने पर पाटलिपुत्र में चतुर्मुख नामक कल्कि राजा उत्पन्न होगा। वह सत्तर वर्ष की आयु और चालीस वर्ष के राज्यकाल वाला होगा तथा अनेक पाखंडी साधुओं को अपने अधीन कर पृथ्वी पर शासन करेगा।
श्लोक 402 से 412 — दिगम्बर मुनियों के प्रति कल्कि का अत्याचार
कल्कि राजा अपने मंत्रियों से पूछता है कि क्या कोई साधु अब भी उसकी आज्ञा नहीं मानता। मंत्री बताते हैं कि दिगम्बर मुनि धनरहित, इच्छारहित और अहिंसा-व्रत के पालन हेतु वस्त्ररहित रहते हैं। वे हाथ में आहार ग्रहण करते हैं, तप और ध्यान में लीन रहते हैं तथा भूख-प्यास आदि परीषह सहन करते हैं। वे किसी से अनधिकृत वस्तु नहीं लेते और किसी के प्रति राग-द्वेष नहीं रखते। यह सुनकर कल्कि उनके प्रथम आहार-ग्रास को कर के रूप में वसूलने का आदेश देता है। अधिकारी जब मुनियों से ग्रास माँगते हैं, तो मुनि भोजन किए बिना मौन खड़े रहते हैं। कर्मचारी इसे राजा की आज्ञा की अवहेलना बताकर उसे सूचित करते हैं।
श्लोक 413 से 421 — धर्म की रक्षा और जिनशासन की प्रभावना
क्रोधित कल्कि स्वयं मुनियों से आहार का ग्रास छीनने का प्रयास करता है। उसी समय सम्यग्दृष्टि असुर उसके अन्याय को सहन न कर उसे मार देता है। कल्कि मरकर रत्नप्रभा पृथ्वी में जाता है और लोभ-कषाय के कारण दीर्घकाल तक दुःख भोगता है। ग्रंथ में धर्म को प्राणियों की माता, पिता, रक्षक और मोक्षमार्ग का आधार बताया गया है। धर्म का विनाश सज्जनों के विनाश का कारण बनता है, इसलिए धर्म की रक्षा आवश्यक है। तप, धर्मोपदेश, अन्य मतों के अभिमान का निराकरण, काव्य-रचना, विद्वत्ता और शूरवीरता आदि से जिनशासन की प्रभावना करने की प्रेरणा दी गई है।
श्लोक 422 से 430 — जिनशासन की महिमा और अजितंजय
जिनशासन की प्रभावना करने वाले व्यक्ति को जिनागम में अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना गया है। केवल विद्वत्ता, तर्कशास्त्र या तप की उपाधियाँ पर्याप्त नहीं, यदि उनसे जिनधर्म की प्रभावना न हो। जिनशासन को प्रकाशित करने वाला व्यक्ति धर्म की उत्पत्ति और वृद्धि का कारण बनता है। आगे कल्कि का पुत्र अजितंजय अपनी पत्नी बालना के साथ देव की शरण ग्रहण करता है और सम्यग्दर्शन रूपी रत्न स्वीकार करता है। देव द्वारा जिनधर्म का माहात्म्य देखकर पाखंडी लोग अपना मिथ्या अभिमान छोड़ देते हैं और कुछ समय तक जिनधर्म पुनः अच्छी तरह प्रवर्तित होता है।
श्लोक 431 से 441 — अवसर्पिणी के अंतिम धर्मात्मा और अतिदुःषमा काल
पंचम काल में क्रमशः बीस कल्कि राजा होंगे। अंतिम कल्कि जलमन्थन होगा, जिसके बाद कोई राजा नहीं रहेगा। इसी काल के अंत में वीरांगज मुनि, सर्वश्री आर्यिका, अग्निल श्रावक और फल्गुसेना श्राविका अंतिम धर्मात्मा होंगे। पंचम काल के अंत से साढ़े आठ माह पूर्व ये चारों धर्मात्मा शरीर त्यागकर प्रथम स्वर्ग जाएंगे। उसी दिन राजा और अग्नि का भी नाश होगा तथा धर्म का समूल विनाश हो जाएगा। इसके बाद अतिदुःषमा काल प्रारम्भ होगा, जिसमें मनुष्यों की आयु, शरीर और जीवन-स्थितियाँ अत्यंत निम्न हो जाएँगी। वस्त्रों के अभाव में वे पत्ते पहनेंगे और अंततः नग्न होकर फल आदि खाकर जीवन बिताएँगे।
श्लोक 442 से 453 — अतिदुःषमा काल का अंत और अवसर्पिणी की समाप्ति
अतिदुःषमा काल में वर्षा अत्यंत अल्प होगी और मनुष्यों की बुद्धि, बल, शरीर तथा आयु का क्रमशः ह्रास होगा। अंत में मनुष्य की आयु सोलह वर्ष और शरीर की ऊँचाई एक हाथ रह जाएगी। लोग रोग, भूख-प्यास और अनेक शारीरिक कष्टों से पीड़ित होंगे। काल के अंतिम चरण में जल सूख जाएगा, पृथ्वी फटकर रूखी हो जाएगी और अधिकांश प्राणियों का विनाश हो जाएगा। कुछ मनुष्य गंगा, सिंधु और विजयार्ध पर्वत के निकट जीवित रहेंगे। इसके बाद मेघ सात-सात दिन तक विभिन्न प्रकार के जल की वर्षा करेंगे, पृथ्वी समतल हो जाएगी और अवसर्पिणी काल समाप्त होगा।
श्लोक 454 से 470 — उत्सर्पिणी काल में सृष्टि का पुनर्विकास
उत्सर्पिणी का प्रारम्भ भी इक्कीस हजार वर्ष के अतिदुःषमा काल से होगा। इस काल में प्रजा की वृद्धि प्रारम्भ होगी। मेघ जल और दूध की वर्षा करेंगे, जिससे पृथ्वी की रूक्षता दूर होगी। अमृत-वर्षा से औषधियाँ, वृक्ष, पौधे और घास फिर उत्पन्न होंगे। रसाधिक मेघों की वर्षा से छह रसों की उत्पत्ति होगी और बिलों में छिपे मनुष्य बाहर आकर जीवनयापन करेंगे। समय के साथ जीवों के शरीर, बल, आयु और जीवन-स्थितियों में सुधार होगा। आगे दुःषमा काल में सोलह कुलकर उत्पन्न होंगे, जिनके समय में शुभ भाव, भूमि, जल और धान्य की वृद्धि होगी। मनुष्यों में मैत्री, सत्य, दया, संतोष, विनय और क्षमा जैसे सद्गुण विकसित होंगे।
श्लोक 471 से 481 — उत्सर्पिणी के तीर्थंकर और महापुरुष
उत्सर्पिणी के तृतीय काल में तीर्थंकरों की उत्पत्ति होगी। ग्रंथ में भावी चौबीस तीर्थंकरों के नामों का उल्लेख है, जिनमें श्रेणिक आदि का वर्णन आता है। पहले तीर्थंकर महापद्म होंगे और उनके बाद तेईस अन्य तीर्थंकर होंगे। इन तीर्थंकरों के चरणों की इन्द्रगण पूजा करेंगे। इसी काल में बारह चक्रवर्ती भी उत्पन्न होंगे, जो उत्कृष्ट ऐश्वर्य और लक्ष्मी के धारक होंगे। यह वर्णन भविष्य के कालचक्र में तीर्थंकरों तथा महापुरुषों की उत्पत्ति और धर्म के पुनः विस्तार को दर्शाता है।
श्लोक 482 से 491 — चक्रवर्ती, बलभद्र, नारायण और काल-परिवर्तन
इस काल में होने वाले बारह चक्रवर्तियों के नाम बताए गए हैं। साथ ही नौ बलभद्रों और नौ नारायणों की उत्पत्ति का वर्णन है। नारायणों के प्रतिपक्ष में नौ प्रतिनारायण भी होंगे, जिनके नाम अन्य ग्रंथों से जानने को कहा गया है। इसके बाद सुषम-दुःषम काल आएगा, जिसमें मनुष्यों की ऊँचाई और आयु अत्यधिक होगी। काल के आगे बढ़ने पर जघन्य भोगभूमि जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होंगी। इस प्रकार उत्सर्पिणी के विभिन्न कालों में जीवों की आयु, शरीर, सुख-सुविधा और जीवन-व्यवस्था क्रमशः बदलती रहेगी।
श्लोक 492 से 508 — कल्पकाल, कर्मभूमि और भोगभूमि का विवरण
इसके बाद पंचम काल में मध्यम भोगभूमि और छठे काल में उत्तम भोगभूमि जैसी स्थितियों का वर्णन है। भरतक्षेत्र के अतिरिक्त अन्य कर्मभूमियों में भी कालचक्र की ऐसी ही प्रवृत्ति होती है। एक उत्सर्पिणी और एक अवसर्पिणी मिलकर कल्पकाल बनाते हैं। विदेह क्षेत्रों में मनुष्यों की आयु, ऊँचाई और महापुरुषों की उत्पत्ति के विशेष नियम बताए गए हैं। कर्मभूमि और भोगभूमि में जन्म लेने वाले जीवों, उनकी गतियों तथा जीवन-स्थितियों का भी वर्णन किया गया है। गणधर श्रेणिक के प्रश्नों के उत्तर में काल, क्षेत्र, जीव और महापुरुषों की इस व्यापक व्यवस्था को स्पष्ट करते हैं।
श्लोक 509 से 522 — भगवान महावीर का निर्वाण और गणधर-परम्परा
भगवान महावीर अनेक देशों में विहार करते हुए पावापुर पहुँचेंगे। वहाँ मनोहर वन में मणिमयी शिला पर विराजमान होकर वे शुक्लध्यान में लीन होंगे। तीनों योगों का निरोध कर चौथे शुक्लध्यान द्वारा चारों अघातिया कर्मों का क्षय करेंगे और एक हजार मुनियों के साथ मोक्ष प्राप्त करेंगे। उसी दिन गौतम गणधर को केवलज्ञान होगा। गौतम के निर्वाण के समय जम्बू स्वामी केवलज्ञान प्राप्त कर भरतक्षेत्र के अंतिम केवली होंगे। उनके बाद नन्दी, नन्दिमित्र, अपराजित, गोवर्धन और भद्रबाहु श्रुतकेवली होंगे। आगे ग्यारह मुनियों की परम्परा का उल्लेख है, जो द्वादशांग के अर्थ और दशपूर्व के ज्ञाता होंगे।
श्लोक 523 से 533 — श्रुतज्ञान की परम्परा और धर्मनिष्ठ महापुरुष
गणधर आगे उन आचार्यों और मुनियों का वर्णन करते हैं, जो जैनधर्म के प्रकाशक तथा श्रुतज्ञान के धारक होंगे। उनके बाद अनेक आचार्य क्रमशः ग्यारह अंगों और आचारांग के ज्ञाता होंगे। जिनेन्द्रदेव के उपदेश से निकले पवित्र शास्त्रों की परम्परा इन तपस्वियों द्वारा आगे बढ़ेगी। जिनसेन, वीरसेन आदि आचार्य भी श्रुतज्ञान के कुछ अंशों का निरूपण करेंगे और यह परम्परा पंचम काल के अंत तक चलती रहेगी। इसके बाद अनेक धर्मनिष्ठ राजाओं और महापुरुषों के नाम गिनाए गए हैं, जो तीर्थंकरों की सेवा-भक्ति करने वाले तथा धर्म-संबंधी प्रश्नों में रुचि रखने वाले होंगे।
श्लोक 534 से 543 — भगवान महावीर के पूर्वभव
भगवान महावीर के जीव के अनेक पूर्वभवों का वर्णन किया गया है। वे कभी पुरूरवा नामक भील, कभी विभिन्न ब्राह्मण, देव, राजा, नारायण, सिंह और चक्रवर्ती आदि रूपों में उत्पन्न हुए। अनेक भवों में स्वर्ग, नरक और तिर्यंच गतियों का अनुभव किया। सिंह की पर्याय में समीचीन धर्म धारण कर निर्मल परिणाम प्राप्त किए। आगे पुण्य और धर्म के प्रभाव से विभिन्न उच्च गतियों तथा ऐश्वर्यपूर्ण भवों को प्राप्त करते हुए अंततः अच्युत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान से च्युत होकर वर्धमान तीर्थंकर हुए। यह वर्णन अनेक भवों में कर्मों के परिणाम और धर्म के प्रभाव से आत्मा की आध्यात्मिक प्रगति को दर्शाता है।
श्लोक 544 से 551 — वर्धमान जिनेन्द्र की स्तुति और सच्चे दान का स्वरूप
आचार्य गुणभद्र भगवान वर्धमान स्वामी के पंचकल्याणक, महाऋद्धि और मोक्षलक्ष्मी की महिमा का स्मरण करते हुए मंगलकामना करते हैं। गौतम गणधर के उपदेश से सभा और राजा श्रेणिक ज्ञान-दर्शन की वृद्धि करने वाला संतोष प्राप्त करते हैं। आचार्य भगवान की स्तुति करते हुए कहते हैं कि यह स्तवन किसी सांसारिक लाभ की आकांक्षा से नहीं, बल्कि जिनेन्द्र की स्तुति के प्रति श्रद्धा से किया जा रहा है। सर्वज्ञ और हितोपदेश देने वाले भगवान ही स्तुति के योग्य हैं। भगवान का उपदेश जीवों को संसार से मुक्त होने का मार्ग देता है, इसलिए वे वास्तविक और श्रेष्ठ दाता हैं।
श्लोक 552 से 561 — जिनधर्म, पुण्य और वीतरागता की महिमा
भगवान का शासन विषय-भोगों में आसक्त रहने वालों के विपरीत वैराग्य और मोक्षमार्ग की प्रेरणा देता है। भगवान द्वारा बताया गया वही पुण्य सार्थक है, जो ज्ञान आदि के माध्यम से निर्वाण का साधन बने; केवल भोगों और बंधन को बढ़ाने वाला पुण्य परम लक्ष्य नहीं है। समवसरण में भगवान के दर्शन और दिव्यध्वनि से शिष्य आनंद प्राप्त करते हैं। आचार्य भगवान की वीतरागता, सर्वज्ञता, अनन्तवीर्य और निष्काम करुणा की प्रशंसा करते हैं। भगवान बिना किसी व्यक्तिगत इच्छा के अपने उपदेश से जीवों को संसार-सागर से पार कराने वाले अकारण बन्धु हैं।
श्लोक 562 से 571 — केवलज्ञान, रत्नत्रय और परमात्मस्वरूप
भगवान के चार घातिया कर्मों का नाश होने से उनका उपयोगरूपी आत्मगुण पूर्ण रूप से प्रकट हो चुका है। मोहनीय कर्म के क्षय से सम्यग्दर्शन तथा ज्ञानावरण और दर्शनावरण के क्षय से सर्वज्ञता की पूर्णता प्रकट होती है। व्यवहार रत्नत्रय के माध्यम से निश्चय रत्नत्रय की सिद्धि होती है। भगवान का शरीर विकाररहित और वाणी पदार्थों के यथार्थ स्वरूप को प्रकट करने वाली है। वे मोह से रहित होने के कारण कर्मबंधन के वास्तविक कारणों से मुक्त हैं। आचार्य भगवान के शुद्ध, शक्तिशाली, धैर्यवान और परमात्मस्वरूप की वंदना करते हैं।
श्लोक 572 से 578 — जिनेन्द्र स्तुति और पर्व का समापन
इन्द्र भगवान के चरणों में विनयपूर्वक झुकता है, जो पूर्व पुण्य और जिनभक्ति के प्रभाव को दर्शाता है। भगवान का शरीर प्रशमभाव से परिपूर्ण है, उनका केवलज्ञान अनन्त है और दिव्यध्वनि निश्चय तथा व्यवहार नयों से युक्त है। उनकी वाणी, विहार और उपदेश बिना किसी राग-द्वेष या व्यक्तिगत इच्छा के जीवों के कल्याण में सहायक हैं। आचार्य गुणभद्र भगवान वर्धमान स्वामी तथा गौतम गणधर के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। अंत में राजा श्रेणिक भगवान और गणधर की स्तुति कर हर्षपूर्वक नगर लौट जाते हैं। अंतिम श्लोक में पुराण के पाठ, श्रवण और लेखन का उल्लेख करते हुए उत्तरपुराण का छिहत्तरवाँ पर्व समाप्त होता है।
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
अथान्येधुर्महावीरः सुरासुरपरिष्कृतः । विहृत्य विविधान् देशान् पुनस्तत्पुरमागतः ॥ १ ॥
अथानन्तर – सुर-असुरोंसे घिरे हुए भगवान् महावीर अनेक देशोंमें विहार कर किसी दिन फिर उसी राजगृह नगरमें आ पहुँचे ॥ १ ॥
“Thereafter, surrounded by gods and demons, Lord Mahavira wandered through many lands and, one day, arrived back at that very city of Rajagriha. || 1 ||”
श्लोक ( Shlok ) 2 – 4
गणैर्द्वादशभिः पूज्यः स्थितः स विपुलाचले । गच्छंस्तं श्रेणिकः स्तोतुं वृक्षमूलशिलातले ॥ २ ॥मुनि धर्मरुचि नाना निस्तरङ्गमिवोदधिम् । प्रदीपमिव निष्कम्पं साम्बुं वाम्भोदमुनतम् ॥ ३ ॥जितेन्द्रियसमाहारं पर्यक्कविहितासनम् । ईषग्निरुद्धनिःश्वासं मनाङ्मीलितलोप्चनम् ॥ ४ ॥
बारह सभाओंसे पूज्य वे भगवान् विपुलाचल पर्वत पर विराजमान हुए। राजा श्रेणिक उनकी स्तुतिके लिए गया, जाते समय उसने एक वृक्षके नीचे शिलातल पर विराजमान धर्मरुचि नामके मुनिराजको देखा। वे मुनिराज निस्तरङ्ग समुद्रके समान निश्चल थे, दीपकके समान निष्कम्प थे और जल सहित मेघके समान उन्नत थे, उन्होंने इन्द्रियोंके व्यापारको जीत लिया था, वे पर्यङ्कासनसे विराजमान थे, श्वासोच्छ्वासको उन्होंने थोड़ा रोक रक्खा था, और नेत्र कुछ बन्द कर लिये थे ॥ २-४ ॥
“Revered by the twelve assemblies, the Lord seated Himself upon Mount Vipulachala. King Shrenika went to offer his prayers to Him, and on his way, he saw a sage named Dharmaruchi seated on a stone slab beneath a tree. That king of ascetics was as still as a waveless ocean, as steady as a flickerless lamp, and as majestic as a rain-bearing cloud. He had conquered the actions of his senses, sat in the lotus posture (paryankasana), held his breath slightly, and kept his eyes half-closed. || 2–4 ||”
श्लोक ( Shlok ) 5 – 7
ध्यायन्तं वीक्ष्य वन्दित्वा साशङ्को विकृताननात् । ततो गत्वा निनं प्राप्य स्तुत्वा मुकुलिताञ्जलिः ॥ ५ ॥गौतमञ्च मया दृष्टः कश्चिदेकस्तपोधनः । ध्यायन्साक्षादिव ध्यातिस्तद्रूपेण व्यवस्थिता ॥ ६ ॥स को मे कौतुकं तस्मिन् ब्रूहि नाथेत्यभाषत । अनुयुक्तो गणी तेन प्रोवाच वचसां पतिः ॥ ७ ॥
इस प्रकार ध्यान करते हुए मुनिराजको देखकर श्रेणिकने उनकी वन्दना की परन्तु मुनिराजका मुख कुछ विकृत हो रहा था इसलिए उसे देखकर श्रेणिकको कुछ शङ्का उत्पन्न हो गई। वहाँ से चलकर वह भगवान् महावीर जिनेन्द्रके समीप पहुँचा । वहाँ उसने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की फिर गौतमगणधरकी स्तुति कर उनसे पूछा कि हे प्रभो ! मैंने मार्गमें एक तपस्वी मुनिराज देखे हैं वे ऐसा ध्यान कर रहे हैं मानो उनका रूप धारण कर साक्षात् ध्यान ही विराजमान हो । हे नाथ! वे कौन हैं? यह जाननेका मुझे बड़ा कौतुक हो रहा है सो कृपा कर कहिये । इस प्रकार राजा श्रेणिकके द्वारा पूछे जाने पर वचनोंके स्वामी श्रीगणधर भगवान् इस प्रकार कहने लगे ॥ ५-७ ॥
“Seeing the great sage meditating in this manner, King Shrenika bowed down to him in reverence. However, the sage’s face appeared somewhat distorted, which aroused a lingering doubt in Shrenika’s mind. Proceeding from there, he arrived in the presence of Lord Mahavira Jinendra. There, he offered his prayers with folded hands, and after also praising Gautama Gandhara, he asked him, ‘O Lord! On my way here, I beheld an ascetic sage who was meditating so profoundly that it seemed as though Meditation itself had taken a physical form and sat there. O Master! Who is he? I am filled with great curiosity to know this, so please be kind enough to tell me.’ Upon being questioned thus by King Shrenika, the master of speech, Lord Gandhara, began to speak as follows. || 5–7 ||”
श्लोक ( Shlok ) 8 – 11
अस्त्यत्र विषयोऽङ्गाख्यः सङ्गतः सर्ववस्तुभिः । नगरी तत्र चम्पाख्या तत्पतिः श्वेतवाहनः ॥ ८ ॥श्रुत्वा धर्म जिनादस्मात्त्रिनिर्वेगाहिताशयः । राज्यभारं समारोप्य सुते विमलवाहने ॥ ९ ॥संयमं बहुभिः सार्धमन्त्रैव प्रतिपन्नवान् । चिरं मुनिगणैः साकं विहृत्याखण्डसंयमः ॥ १० ॥धर्मेषु रुचिमातन्वन् दशस्वप्यनिशं जनैः । प्राप्तधर्मरुचिख्यातिः सख्यं यत्सर्वजन्तुषु ॥ ११ ॥
इसी भरत क्षेत्रके अङ्ग देशमें सर्व वस्तुओंसे सहित एक चम्पा नामकी नगरी है। उसमें राजा श्वेतवाहन राज्य करता था। इन्हीं भगवान् महावीर स्वामी से धर्मका स्वरूप सुनकर उसका चित्त तीनों प्रकारके वैराग्यसे भर गया जिससे इसने विमलवाहन नामक अपने पुत्रके लिए राज्य-का भार सौंपकर बहुत लोगोंके साथ संयम धारण कर लिया। बहुत दिन तक मुनियोंके समूहके साथ विहारकर अखण्ड संयमको धारण करते हुए वे मुनिराज यहाँ आ विराजमान हुए हैं। ये दश धर्मोमें सदा प्रेम रखते थे इसीलिए लोगोंके द्वारा धर्मरुचिके नाम से प्रसिद्ध हुए हैं सो ठीक ही है क्योंकि मित्रता वही है जो सर्वं जीवोंमें होती है ॥ ८-११॥
“In the Anga region of this very Bharata-kshetra, there is a city named Champa, endowed with all kinds of wealth and prosperities. King Shvetavahana ruled there. Hearing the true nature of Dharma from Lord Mahavira Swami himself, his mind became filled with the three types of detachment (vairagya). Consequently, entrusting the burden of the kingdom to his son named Vimalavahana, he embraced ascetic restraint (sanyam) along with many others. Having wandered for many days with groups of monks while maintaining flawless self-restraint, that great sage has arrived and seated himself here. He always maintained a deep love for the ten virtues of Dharma; hence, he became rightly famous among the people by the name ‘Dharmaruchi’. This is indeed fitting, for true friendship is that which extends toward all living beings. || 8–11 ||”
श्लोक 12 से 20
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602 | श्लोक 603 से 613 | श्लोक 614 से 624 | श्लोक 625 से 631 | श्लोक 632 से 643
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महापुराण हिन्दी-भाषानुवाद
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