अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 441 से 453 | श्लोक 454 से 463 | श्लोक 464 से 475 | श्लोक 476 से 485 | श्लोक 486 से 502 | श्लोक 503 से 513 | श्लोक 514 से 521
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 522 to 531
श्लोक ( Shlok ) 522 – 527
देशकोऽस्ति न मार्गस्य वनमेतदमानुषम् । नास्ति कश्चिदुपायोऽत्र विहाय जिनभाषितम् ॥ ५२२॥ परिच्छेदो हि पाण्डित्यं शूरस्याहारदेहयोः । इति सन्न्यस्य सद्ध्यानेनासीनं श्रावकं द्विजः ॥ ५२३ ॥ विलोक्य स्वयमप्येतदुपदेशेन ‘शुद्धधीः । स्थित्वा तथैव सम्प्राप्तसमाधिर्जीवितावधौ ॥ ५२४ ॥ सौधर्मकल्पे देवोऽभूद्भुक्त्वा तत्रामरं सुखम् । स्वायुरन्ते स्वपुण्येन श्रेणिकस्य महीपतेः ॥ ५२५ ॥अभयाख्यः सुतो धीमानजनिष्ठास्त्वमीदृशः । अतः परं तपः कृत्वा जिनैर्द्वादशधोदितम् ॥ ५२६ ॥ अवाप्यसि पदं मुक्तेरित्यसौ चावबुध्य तत् । अभिवन्द्य जिनं राज्ञा सह तुष्टोऽविशत्पुरम् ॥ ५२७ ॥
उस समय श्रावकने विचार किया कि चूंकि यह वन मनुष्य रहित है अतः वहाँ कोई मार्गका बतलानेवाला नहीं है। इस समय जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहे हुए उपायको छोड़कर और कोई उपाय नहीं है। ऐसी दशा में आहार तथा शरीरका त्याग कर देना ही शूरवीरकी पण्डिताई है’ ऐसा विचार कर वह संन्यासकी प्रतिज्ञा लेकर उत्तम ध्यानके लिए बैठ गया। श्रावकको बैठा देख उसके उपदेशसे जिसकी बुद्धि निर्मल हो गई है ऐसा ब्राह्मण भी समाधिका नियम लेकर उसी प्रकार बैठ गया। आयु पूर्ण होने पर वह ब्राह्मणसौधर्म स्वर्गमें देव हुआ और वहां देवोंके सुख भोग कर आयुके अन्तमें अपने पुण्यके उदयसे यहां राजा श्रोणिकके तू अभय नामका ऐसा बुद्धिमान् पुत्र उत्पन्न हुआ है। आगे तू श्री जिनेन्द्र-देवका कहा हुआ बारह प्रकारका तपश्चरण कर मुक्तिका पद प्राप्त करेगा। यह सब जानकर अभयकुमार बहुत ही सन्तुष्ट हुआ और श्रीजिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार कर राजा श्रेणिकके साथ नगरमें चला गया ।। ५२२-५२७ ॥
“At that time, the Shravak reflected: ‘Since this forest is devoid of humans, there is no one here to guide us on the path. In this situation, there is no other recourse left except the remedy expounded by Lord Jinendra. Under such circumstances, renouncing both food and the physical body is the true wisdom of a spiritual warrior.’ Having resolved thus, he took the vow of Sanyasa (ascetic renunciation) and sat down for sublime meditation.
Seeing the Shravak seated, the Brahmin—whose intellect had become pure through the Shravak’s teachings—also took the vow of Samadhi (holy death) and sat down in the same manner.
Upon the completion of his lifespan, that Brahmin was reborn as a celestial being (Deva) in the Saudharma heaven. Having enjoyed the celestial pleasures there, at the end of that heavenly lifespan and due to the rise of his merit (Punya), he has now been born here as you—the highly intelligent son named Abhaya of King Shrenik. In the future, you will practice the twelve types of austerities (Tapashcharana) taught by Lord Jinendra and attain the state of liberation (Moksha).’
Knowing all this, Abhayakumar became immensely satisfied. He bowed down in reverence to Lord Jinendra and returned to the city along with King Shrenik.” [522-527]
श्लोक ( Shlok ) 528 – 530
अथान्येधुर्महाराजः श्रोणिकः सदसि स्थितः । अभयं सर्वशास्त्रज्ञं कुमारं वरवाग्मिनम् ॥ ५२८ ॥तन्माहात्म्यप्रकाशार्थ तत्त्वं पप्रच्छ वस्तुनः । सोऽप्यासन्नविनेयत्वाद्वस्तुयाथात्म्यदर्शिधीः ॥ ५२९ ॥ स्वद्विजोत्सपिंभाभारविभासितसभान्तरः । एवं निरूपयामास स्पष्टमृष्टेष्टगीर्गुणः ॥ ५३० ॥
अथानन्तर किसी एक दिन महाराज श्रेणिक राजसभा में बैठे हुए थे वहां उन्होंने समस्त शास्त्रोंके जानने वाले श्रेष्ठ वक्ता अभय कुमारसे उसका माहात्म्य प्रकट करनेकी इच्छासे तत्त्वका यथार्थ स्वरूप पूछा। अभय कुमार भी निकटभव्य होनेके कारण वस्तुके यथार्थ स्वरूपको देखने वाला था तथा स्पष्ट मिष्ट और इष्टरूप वाणीके गुणोंसे सहित था इसलिए अपने दाँतोकी फैलने वाली कान्तिके भारसे सभाके मध्यभागको सुशोभित करता हुआ इस प्रकार निरूपण करने लगा ।। ५२८-५३० ।।
“Thereafter, on a certain day, while King Shrenik was seated in his royal court, he questioned Abhayakumar—the excellent orator who possessed knowledge of all scriptures—regarding the true nature of reality (Tattva), with the desire to manifest his greatness.
Abhayakumar, being a soul on the verge of liberation (Nikata-bhavya), was capable of perceiving the true nature of reality and was endowed with the virtues of clear, sweet, and pleasing speech. Therefore, illuminating the center of the assembly with the radiating luster of his teeth, he began to expound the truth in this manner:” [528-530]
श्लोक ( Shlok ) 531
यस्य जीवादिभावानां याथात्म्येन प्रकाशनम् । तं पण्डितं बुधाः प्राहुः परे नाम्नैव पण्डिताः ॥ ५३१ ।।
आचार्य कहते हैं कि जिसे जीवादि पदार्थोंका ठीक-ठीक बोध होता है विद्वान् लोग उसे ही पण्डित कहते हैं बाकी दूसरे लोग तो नाम मात्र के पण्डित कहलाते हैं ॥ ५३१ ॥
“The Acharya (spiritual master) states that wise scholars consider only that person to be a true Pandit (enlightened scholar) who possesses accurate and precise knowledge of the realities such as the soul (Jiva) and non-soul (Ajiva); all others are scholars in name only.” [531]
श्लोक 532 से 542
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330 | श्लोक 331 से 342 | श्लोक 343 से 352 | श्लोक 353 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 385 | श्लोक 386 से 396 | श्लोक 397 से 413 | श्लोक 414 से 422 | श्लोक 423 से 431 | श्लोक 432 से 440 | श्लोक 441 से 453 | श्लोक 454 से 463 | श्लोक 464 से 475 | श्लोक 476 से 485 | श्लोक 486 से 502 | श्लोक 503 से 513 | श्लोक 514 से 521
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