चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 502 to 512
श्लोक ( Shlok ) 502 – 503
तदुपद्रवमाकर्ण्य प्रच्छन्नैर्हरिविक्रमः । विपत्तिनिग्रहेणासां कन्यायाः प्रतिपत्स्यते ॥ ५०२ ॥कदाचिदिति सञ्चिन्त्य निर्भय वनराजकम् । तस्या निजतनूजाभिः सहवासं चकार सः ॥ ५०३ ॥
वनराजके पिता हरिविक्रमने गुप्त रीतिसे कन्याका यह उपद्रव सुनकर विचार किया कि ये दूतियाँ इसे तंग करती हैं इसलिए संभव है कि कदाचित् यह कन्या आत्मघात कर ले इसलिए उसने वनराजको डाँटकर वह कन्या अपनी पुत्रियोंके साथ रख ली ।। ५०२-५०३ ।।
“Upon hearing about this distress of the maiden through secret means, Vanaraja’s father, Harivikrama, thought to himself that since these messengers were harassing her, it was possible she might commit suicide. Therefore, after scolding Vanaraja, he placed the maiden in the company of his own daughters. ।। 502-503 ।।”
श्लोक ( Shlok ) 504
दृढमित्रादयः सर्वे तदा सम्प्राप्य बान्धवाः । सन्नद्धबलसम्पन्नास्तस्थुरावेष्ट्य तत्पुरम् ॥ ५०४ ॥
इधर दृढ़मित्र आदि सब भाई-बन्धुओंने मिलकर सेना तैयार कर ली और उस सेनाके द्वारा वनराजका नगर घेरकर सब आ डटे ।। ५०४ ।।
“Meanwhile, Dridhamitra and all the other brothers and kinsmen collectively raised an army, and using that force, they surrounded Vanaraja’s city and stood ready for battle. ।। 504 ।।”
श्लोक ( Shlok ) 505 – 507
युयुत्सवो विपक्षाश्च जीवन्धरकुमारकः । तद्दृष्ट्वा स्पष्टकारुण्यो युद्धं बहुजनान्तकृत् ॥ ५०५ ॥ किमनेनेति यक्षेशं स्वं सुदर्शनमस्मरत् । अनुस्मरणमात्रेण यक्षोप्यानीय कन्यकाम् ॥ ५०६ ॥कुमारायार्पयामास कस्याप्यकृतपीडनम् । संसाधयन्ति कार्याणि सोपायं पापभीरवः ॥ ५०७ ॥
उधरसे विरोधी दलके लोग भी युद्ध करनेकी इच्छासे बाहर निकले। यह देख दयालु जीवन्धर कुमारने विचार किया कि युद्ध अनेक जीवोंका विघात करनेवाला है इसलिए इससे क्या लाभ होगा ? ऐसा विचार कर उन्होंने उसी समय अपने सुदर्शन यक्षका स्मरण किया । स्मरण करते ही यक्षने किसीको कुछ पीड़ा पहुँचाये बिना ही वह कन्या जीवन्धर कुमारके लिए सौंप दी सो ठीक ही है क्योंकि पापसे डरनेवाले पुरुष योग्य उपायसे ही कार्य सिद्ध करते हैं ।। ५०५-५०७ ॥
“From the other side, the opposing faction also came out wishing to fight. Seeing this, the compassionate Jivandhara Kumar reflected, ‘A war causes the destruction of countless living beings, so what good can come of it?’ Thinking thus, he instantly remembered his Sudarshana Yaksha. The moment he was remembered, the Yaksha handed the maiden over to Jivandhara Kumar without causing the slightest harm to anyone. This is indeed fitting, for men who fear sin achieve their objectives only through righteous means. ।। 505-507 ।।”
श्लोक ( Shlok ) 508 – 510
ते सर्वे सिद्धसाध्यत्वाद्युद्धं संहार्य सम्मुखम् । नगरस्यागमन्नेतान्नन्वसौ वनराजकः ॥ ५०८ ॥युयुत्सया ययौ वीक्ष्य तं यक्षो दुष्टचेतसम् । परिगृह्य हठात्सद्यः कुमाराय समर्पयत् ॥ ५०९ ॥वन्दीकत्य कुमारोऽपि वनराजं निविष्टवान् । ससेनः सरसि श्रीमान्सेनारम्याभिधानके ॥ ५१० ॥
दृढ़मित्र आदि सभी लोग कार्य सिद्ध हो जानेसे युद्ध बन्द कर नगरकी ओर चले गये परन्तु वनराज युद्धकी इच्छासे वापिस नहीं गया। यह देख, यक्षने उसे दुष्ट अभिप्रायवाला समझकर जबर्दस्ती पकड़ लिया और जीवन्धर कुमारको सौंप दिया । श्रीमान् जीवन्धर कुमार भी वनराजको कैदकर सेनाके साथ सेनारम्य नामके सरोवरके किनारे ठहरगये ॥५०८-५१०।।
“Since their objective had been accomplished, Dridhamitra and all the others stopped the war and headed back toward the city; however, Vanaraja, still wishing to fight, did not retreat. Seeing this and recognizing his wicked intentions, the Yaksha forcibly captured him and handed him over to Jivandhara Kumar. The illustrious Jivandhara Kumar, having imprisoned Vanaraja, then halted with his army on the banks of the lake named Senaramya. ।। 508-510 ।।”
श्लोक ( Shlok ) 511 – 512
तत्रैकं चारणं वीक्ष्य सहसा महसां निधिम् । भिक्षाहेतोर्यति प्राप्तमभ्युत्थाय यथोचितम् ॥ ५११ ॥कृताभिवन्दनो योग्यं भाक्तिकोऽदात्सुभोजनम् । तद्दानावर्जितायोऽयमयादाश्चर्यपञ्चकम् ॥ ५१२ ॥
वहीं उन्होंने तेजके निधि स्वरूप एक चारण मुनिराजके अकस्मात् दर्शन किये.। वे मुनिराज भिक्षाके लिए आ रहे थे इसलिए जीवन्धर कुमारने उठकर उन्हें योग्य रीतिसे नमस्कार किया और बड़ी भक्तिसे यथायोग्य उत्तम आहार दिया। इस दानके फलसे उन्हें भारी पुण्यबन्ध हुआ और उसीसे उन्होंने पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ।। ५११-५१२ ॥
“Right there, they unexpectedly beheld a Charana Muniraj, who was an embodiment of radiance. As the holy monk was arriving to seek alms, Jivandhara Kumar stood up, bowed to him with due propriety, and offered supreme food with deep devotion and according to the prescribed rites. As a result of this charity, he bound immense meritorious karma (punya), and through that very merit, he attained the five divine wonders (Panchashcharya). ।। 511-512 ।।”
श्लोक 513 से 524
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501
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