चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 82 to 94
श्लोक ( Shlok ) 82 – 86
देशेऽङ्गेऽत्रैव चम्पायां श्रीषेणाख्यमहीपतेः । सुवर्णवर्मसोदयां धनश्रीः प्रेमदायिनी ॥ ८२ ॥सोमिलाभूतयोः पुत्री कनकादिलनाभिधा । महाबलकुमाराय दानव्येयमिति स्वयम् ॥ ८३ ॥जन्मन्येवाभ्युपेतैषा मात्रा पित्रा च सम्मदात् । वर्धमानः पुरे तस्मिन्नेव बालिकया समम् ॥ ८४ ॥अभ्यणें यौत्रने यावद्विवाहसमयो भवेत् । तावन्पृथग्वले दस्मादिति मानुलवाक्यतः ॥ ८५ ॥बहिः स्थितः कुमारोऽसौ कन्यायामतिसक्तवान् । तयोर्योगोऽभवन्कामावस्थामसहमानयोः ॥ ८६ ॥
इसी भरतक्षेत्रके अङ्ग देशकी चम्पा नगरी में राजा श्रीषेण राज्य करते थे। इनकी रानीका नाम धनश्री था, यह धनश्री कान्तपुर नगरके राजा सुवर्णवर्माकी बहिन थी। सोमिला उन दोनोंके कनकलता नामकी पुत्री हुई। जब यह उत्पन्न हुई थी तभी इसके माता-पिताने बड़े हर्षसे अपने आप यह निश्चय कर लिया था कि यह पुत्री महाबल कुमारके लिए देनी चाहिये और उसके माता-पिताने भी यह स्वीकृत कर लिया था। महाबलका लालन-पालन भी इसी चम्पा नगरी में मामा के घर बालिका कनकलता के साथ होता था । जय वह क्रमसे वृद्धिको प्राप्त हुआ और यौवनका समय निकट आ गया तब मामाने कहा कि जबतक तुम्हारे विवाहका समय आता है तबतक तुम यहाँ से पृथक् रहो। मामाके यह कहने से महाबल यद्यपि बाहर रहने लगा तो भी वह कन्या में सदा आसक्त रहता था। वे दोनों ही कामकी अवस्था को सह नहीं सके इसलिए उन दोनोंका समागम हो गया ।। ८२-८६ ।।
In Champanagari, a city in the Anga region of this very Bharatkshetra, King Shrishena ruled. The name of his queen was Dhanashri, who was the sister of King Suvarnavarma of Kantapur. Somila was reborn as their daughter, named Kanakalata. Right when she was born, her parents had joyfully decided on their own that this daughter should be given in marriage to Prince Mahabala, and his parents had also accepted this proposal. Thus, Mahabala was brought up in this very city of Champa at his maternal uncle’s house, alongside the young girl Kanakalata.
As he gradually grew up and the age of youth approached, his maternal uncle said, “Until the time for your marriage arrives, you must live separately from here.” Although Mahabala began living outside upon his uncle’s instructions, he remained perpetually infatuated with the maiden. Neither of them could endure the intense state of passion, and consequently, they united with each other secretly. [82-86]
श्लोक ( Shlok ) 87 – 94
ततः कान्तपुरं लज्जाप्रेरितौ तौ गतौ तदा । ३ दृष्ट्वा तत्र कुमारस्य मात्रा पित्रा च शोकतः ॥ ८७ ॥तयोविरुद्ध चारित्वादप्रियावावयोरपि । यातं देशान्तरं नात्र स्थातव्यमिति जल्पितौ ॥ ८८ ॥तदैवाकुरुतां तौ च प्रत्यन्तनगरे स्थितिम् । विहरन्तावथान्येयुरुद्याने मुनिपुङ्गवम् ॥ ८९ ॥मुनिगुप्ताभिधं वीक्ष्य भक्तया भिक्षागवेषिणम् । प्रत्युत्थाय परीत्याभिवन्द्याभ्यर्च्य यथाविधि ॥ ९० ॥स्वोपयोगनिमित्तानि तानि खाद्यानि मोदतः । स्वादूनि लड्डुकादीनि दत्वा तस्मै तपोभृते ॥ ९१ ॥नवभेदं जिनोद्दिष्टमदृष्टं स्वेष्टमापतुः । वनेऽन्यदा कुमारोऽसौ मधुमासे विषाहिना ॥ ९२ ॥दृष्टो नष्टासुको जातो दृष्ट्वा तं देहमात्रकम् । तस्यासिधेनुना सापि विधाय स्वां गतासुकाम् ॥ ९३ ॥अगात्तदनुमार्गेण तमन्वेष्टुमिव प्रिया । परां काष्ठामवाप्तस्य भवेद्धि गतिरीदृशी ॥ ९४॥
इस कार्यसे वे दोनों स्वयंही लज्जित हुए और कान्तपुर नगरको चले गये । उन्हें देख, महाबलके माता-पिताने बड़े शोकसे कहा कि चूंकि तुम दोनों विरुद्ध आचरण करने वाले हो अतः हम लोगों को अच्छे नहीं लगते। अब तुम किसी दूसरे देशमें चले जाओ यहाँ मत रहो । माता-पिताके ऐसा कहनेपर वे उसी समय वहाँ से चले गये और प्रत्यन्तनगर में जाकर रहने लगे। किसी एक दिन वे दोनों उद्यानमें विहार कर रहे थे कि उनकी दृष्टि मुनिगुप्त नामक मुनिराजपर पड़ी। वे मुनिराज भिक्षाकी तलाशमें थे । महाबल और कनकलताने भक्तिपूर्वक उनके दर्शन किये, उठकर प्रदक्षिणा दी, नमस्कार किया और विधिपूर्वक पूजा की। तदनन्तर उन दोनोंने अपने उपयोगके लिए तैयार किये हुए लड्डू आदि मिष्ट खाद्य पदार्थ, हर्ष पूर्वक उन मुनिराजके लिए दिये जिससे उन्होंने जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहा हुआ इच्छित नव प्रकारका पुण्य संचित किया। किसी एक दिन महाबल कुमार मधुमास-चैत्रमासमें वनमें घूम रहा था वहाँ एक विषैले साँपने उसे काट खाया जिससे वह शीघ्र ही मर गया। पतिको शरीर मात्र (मृत) देखकर उसकी स्त्री कनकलताने उसीकी तलवारसे आत्मघात कर लिया मानो उसे खोजनेके लिए उसीकी पीछे ही चल पड़ी हो। आचार्य कहते हैं कि जो स्नेह अन्तिम सीमाको प्राप्त हो जाता है उसकी ऐसी ही दशा होती है ।। ८७-९४ ॥
Embarrassed by their own actions, the two of them left on their own accord and went to the city of Kantapur. Upon seeing them, Mahabala’s parents said with great sorrow, “Since you both act contrary to proper conduct, you are no longer dear to us. Go away to some other country now, do not remain here.” Hearing these words from the parents, they left that place immediately and went to live in a border town (Pratyantanagara).
One day, while the two of them were strolling in a garden, their gaze fell upon a monk named Munigupta. The monk was out in search of alms. Mahabala and Kanakalata devoutly beheld him, stood up to circumambulate him, bowed down, and formally worshipped him. Thereafter, they joyfully offered the sweet food items like laddoos, which they had prepared for their own consumption, to the monk. Through this act, they accumulated the desired ninefold merit (nava-dha punya) as proclaimed by Lord Jinendra.
On another day, while Prince Mahabala was wandering in the forest during the month of Chaitra (the spring season), a venomous snake bit him, causing his swift death. Seeing her husband reduced to a mere corpse, his wife Kanakalata committed suicide using his own sword, as if she were following right behind him to search for him. The Acharya remarks that such is the fate of affection when it reaches its absolute extremity. [87-94]
श्लोक 95 से 101
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81
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