मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 163 to 173
श्लोक ( Shlok ) 163 –164
अनुष्ठाय तथा सोऽपि प्राविशत्पापिनां क्षितिम् । निर्मूलं कुलमप्यस्य नष्टं दुर्मार्गवर्तनात् ॥ १६३ ॥श्रुत्वा तत्सात्मजो रामपितास्माकं क्रमागतम् । साकेतपुरमित्येत्य तदध्यास्यान्वपालयत् ॥ १६४ ॥
वह राजा भी उसके कहे अनुसार यज्ञ करके पापियोंकी भूमि अर्थात् नरकमें प्रविष्ट हुआ। इस प्रकार कुमार्गमें प्रवृत्ति करनेसे इस राजाका सबका सब कुल नष्ट हो गया। इधर राजा दशरथने जब यह समाचार सुना तब उन्होंने सोचा कि अयोध्यानगर तो हमारी वंशपरम्परा से चला आया है। ऐसा विचारकर वे अपने पुत्रोंके साथ अयोध्या नगरमें गये और वहीं रह कर उसका पालन करने लगे ।। १६३-१६४ ॥
“Following his advice, that king as well performed the sacrifice (Yajna) and consequently entered the land of the sinful—that is, hell. By treading upon such an evil path, this king’s entire lineage was completely destroyed. Meanwhile, when King Dasharatha heard this news, he reflected, ‘The city of Ayodhya has belonged to us through our ancestral lineage.’ Reflecting thus, he proceeded to the city of Ayodhya along with his sons and, residing right there, began to govern and protect it.”163 –164
श्लोक ( Shlok ) 165 – 168
तत्रास्य देव्यां कस्याञ्चिदभवद्भरताह्वयः । शत्रुघ्नश्चान्यदप्येकं दशाननवधाद्यशः ॥ १६५ ॥कारणं प्रकृतं भावि रामलक्ष्मणयोरिदम् । मिथिलानगराधीशो जनकस्तस्य वलभा ॥ १६६ ॥सुरूपा वसुधादेवी विनयादिविभूषिता । सुता सीतेत्यभूतस्याः सम्प्राप्तनवयौवना ॥ १६७ ॥तां वरीतुं समायातनृपदूतान् महीपतिः । ददामि तस्मै दैवानुकूल्यं यस्येति सोऽमुचत् ॥ १६८ ॥
वहीं इनकी किसी अन्य रानीसे भरत तथा शत्रुघ्न्न नामके दो पुत्र और हुए थे। रावणको मारनेसे राम और लक्ष्मणका जो यश होने वाला था उसका एक कारण था- वह यह कि उसी समय मिथिलानगरीमें राजा जनक राज्य करते थे । उनकी अत्यन्त रूपवती तथा विनय आदि गुणोंसे विभूषित वसुधा नामकी रानी थी। राजा जनक की वसुधा नामकी रानीसे सीता नामकी पुत्री उत्पन्न हुई थी। जब वह नवयौवनको प्राप्त हुई तब उसे वरने के लिए अनेक राजाओंने अपने-अपने दूत भेजे। परन्तु राजाने यह कह कर कि मैं यह पुत्री उसीके लिए दूंगा जिसका कि दैव अनुकूल होगा, उन आये हुए दूतोंको विदा कर दिया ॥१६५-१६८।।
“Right there, from another of his queens, two more sons named Bharata and Shatrughna were born to him. There was a specific reason behind the immense glory that Rama and Lakshmana were destined to attain by slaying Ravana—and that was as follows: At that very time, King Janaka was ruling in the city of Mithila. He had a queen named Vasudha, who was extraordinarily beautiful and adorned with virtues such as humility. From King Janaka’s queen, Vasudha, a daughter named Sita was born. When she attained her youth, many kings dispatched their respective messengers to seek her hand in marriage. However, the King dismissed those arrived messengers by declaring, ‘I shall bestow this daughter only upon him whom destiny favors.'”165 – 168
श्लोक ( Shlok ) 169 – 173
नृपः कदाचिदास्थानीं विद्वजनविराजिनीम् । आास्थाय कार्यकुशलं कुशलादिमतिं हितम् ॥ १६९ ॥सेनापतिं समग्राक्षीत् प्राक्प्रवृत्तं कथान्तरम् । पुरा किलात्र सगरः सुलसा चाहुतीकृता ॥ १७० ॥परे चाश्वादयः प्रापन् सशरीराः सुरालयम् । इतीदं श्रयतेऽद्यापि यागेन यदि गम्यते ॥ १७१ ॥ स्वर्लोकः क्रियतेऽस्माभिरपि याज्ञो यथोचितम् । इति तद्वचनं श्रुत्वा स सेनापतिरब्रवीत् ॥ १७२ ॥ नागासुरैः सदा क्रदैर्मात्सर्येण परस्परम् । अन्योन्यारब्धकार्याणां प्रतिघातो विधीयते ॥ १७३ ॥
अथानन्तर- किसी एक समय राजा जनक विद्वज्जनोंसे सुशोभित सभामें बैठे हुए थे। वहीं पर कार्य करनेमें कुशल तथा हित करनेवाला कुशलमति नामका सेनापति बैठा था। राजा जनकने उससे एक प्राचीन कथा पूछी। वह कहने लगा कि ‘पहले राजा सगर रानी सुलसा तथा घोड़ा आदि अन्य कितने ही जीव यज्ञमें होमे गये थे। वे सब शरीर सहित स्वर्ग गये थे’ यह बात सुनी जाती है। यदि आज कल भी यज्ञ करनेसे स्वर्ग प्राप्त होता हो तो हमलोग भी यथा योग्य रीतिसे यज्ञ करें’ । राजाके इस प्रकार वचन सुनकर सेनापति कहने लगा कि सदा क्रोधित हुए नागकुमार और असुरकुमार परस्परकी मत्सरतासे एक दूसरेके प्रारम्भ किये हुए कार्यों में विघ्न करते हैं ।॥१६९-१७३।।
“Thereafter, at one time, King Janaka was seated in his assembly hall, which was beautifully adorned with wise and learned men. Seated right there was his commander-in-chief named Kushalamati, who was highly skilled in executing his duties and always acted in the king’s best interest. King Janaka questioned him regarding an ancient legend. He began to speak, ‘It is heard that in the past, King Sagara, Queen Sulasa, and many other living beings, including horses, were immolated as offerings in a sacrifice (Yajna), and all of them ascended to heaven along with their physical bodies. If even nowadays one can attain heaven by performing a sacrifice, then we too ought to perform a sacrifice in a fitting and proper manner.’ Hearing these words of the King, the commander-in-chief replied, ‘The continuously enraged Nagakumaras and Asurakumaras (classes of lower mansion-dwelling deities), out of mutual jealousy and malice, constantly create obstacles in the undertakings initiated by one another.'”169 – 173
श्लोक 174 से 181
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162
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