चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 274 to 290
श्लोक ( Shlok ) 274 – 275
इति तापसवेषेण भाषितः स कुमारकः । शृणु पूज्य न वेत्सि त्वं रोदनेऽस्मिन्गुणानिमान् ॥ २७४ ॥ निर्याति संहसश्लेष्मा वैमल्यमपि नेत्रयोः । शीतीभवति चाहारः कथमेतन्निवार्यते ॥ २७५ ॥
तपस्वीके ऐसा कह चुकने पर जीवन्धरकुमारने कहा कि हे पूज्य ! आप जानते नहीं हैं। सुनिये, रोनेमें ये गुण हैं- पहला गुण तो यह है कि बहुत समयका संचित हुआ कफ निकल जाता है, दूसरा गुण यह है कि नेत्रोंमें निर्मलता आ जाती है और तीसरा गुण यह है कि भोजन ठण्डा हो जाता है। इतने गुण होनेपर भी आप मुझे रोनेसे क्यों रोकते हैं ? ॥ २७४-२७५ ।।
“When the ascetic had finished speaking, Prince Jivandhara said, ‘O revered one! You do not understand. Listen, these are the virtues of crying: the first virtue is that the phlegm accumulated over a long time is expelled; the second virtue is that a clarity comes to the eyes; and the third virtue is that the hot food becomes cool. When there are so many benefits, why do you restrain me from crying?’ || 274-275 ||”
श्लोक ( Shlok ) 276
इस्याख्यत्तत्समाकणी मातास्य मुदिता सती । यथाविधि सहायैस्तं सह सम्यगभोजयत् ॥ २७६ ॥
पुत्रकी बात सुनकर माता बहुत ही प्रसन्न हुई और उसने मित्रोंके साथ उसे विधिपूर्वक अच्छी तरह भोजन कराया ।। २७६ ।।
“Hearing the words of her son, the mother was immensely delighted, and she properly served a wholesome meal to him along with his friends in accordance with the customary manner. || 276 ||”
श्लोक ( Shlok ) 277 – 278
ततो गन्धोत्कटो भुक्त्वा सन्निविष्टो यथासुखम् । तेन तापसवेषोऽपि भुक्त्वामैवमभाषत ॥ २७७ ॥कुमारेऽस्मिन्मम स्नेहोऽभूदवेक्ष्यास्य योग्यताम् । मया शास्त्राब्धिसन्धौतमतिरेष करिष्यते ॥ २७८ ॥
तदनन्तर जब गन्धोत्कट भोजन कर सुखसे बैठा और तपस्वी भी उसीके साथ भोजन कर चुका तब तपस्वीने गन्धोत्कटसे कहा कि इस बालककी योग्यता देखकर इसपर मुझे स्नेह हो गया है अतः मैं इसकी बुद्धिको शास्त्र रूपी समुद्रमें अवगाहन कर निर्मल बनाऊँगा ॥२७७-२७८ ।।
“Thereafter, when Gandhotkata was sitting comfortably after partaking of his meal, and the ascetic too had finished dining with him, the ascetic said to Gandhotkata, ‘Observing the exceptional capability of this child, an affection for him has arisen within me. Therefore, I shall refine his intellect and make it pure by causing it to plunge deep into the ocean of the scriptures.’ || 277-278 ||”
श्लोक ( Shlok ) 279 – 280
इति तद्भाषितं श्रत्वा वरिष्ठः श्रावकेष्वहम् । नान्यलिङ्गिनमस्कारं कुर्वे केनापि हेतुना ॥ २७९ ॥स्थाद्वैमनस्यं तेऽवश्यं तदभावेऽतिमानिनः । इति श्रेष्ठयाह तच्छ्रुत्वा स्वसद्भावमथाब्रवीत् ॥ २८० ॥
तपस्वीकी बात सुनकर गन्धोत्कटने कहा कि मैं श्रावको में श्रेष्ठ हूँ – श्रावकके श्रेष्ठ व्रत पालन करता हूँ इसलिए अन्य लिङ्गिन्योंको किसी भी कारणसे नमस्कार नहीं करता हूँ और नमस्कारके अभावमें अतिशय अभिमानी आपके लिए अवश्य ही बुरा लगेगा। सेठकी बात सुनकर वह तापस इस प्रकार अपना परिचय देने लगा ।। २७९-२८० ॥
“Hearing the ascetic’s words, Gandhotkata replied, ‘I am foremost among the lay disciples (Shravakas) and observe the highest vows of a Shravaka; therefore, I do not bow down to ascetics of other sects for any reason whatsoever. In the absence of such a salutation, you, who are exceedingly proud, will surely feel offended.’ Hearing the merchant’s words, that ascetic began to reveal his identity in the following manner. || 279-280 ||”
श्लोक ( Shlok ) 281 – 284
राजा सिंहपुरस्याहमार्यवर्माभिधानकः । वीरनन्दिमुनेः श्रुत्वा धर्म संशुद्धदर्शनः ॥ २८१ ॥धृतिषेणाय मद्राज्यं प्रदायादाय संयमम् । तीब्रोदराग्निसम्भूतमहादाहासहिष्णुकः ॥ २८२ ॥सम्यग्दृष्टिगृहीतेहग्वेषस्ते धर्मबान्धवः । इति तद्वचनं संम्यक्परीक्ष्य वणिजों वरः ॥ २४३ ॥सुतं समर्पयामास तस्मै ‘तं सखिभिः समम् । क्षेत्रे बीजमिव स्थाने योग्ये किं नार्पयेत्सुधीः ॥ २८४ ॥
मैं सिंहपुरका राजा था, आर्यवर्मा मेरा नाम था, वीरनन्दी मुनिसे धर्मका स्वरूप सुनकर मैंने निर्मल सम्यग्दर्शन धारण किया था। तदनन्तर धृतिषेण नामक पुत्रके लिए राज्य देकर मैंने संयम धारण कर लिया था- मुनिव्रत अंगीकृत कर लिया था परन्तु जठराग्निकी तीव्र बाधासे उत्पन्नहुई महादाहको सहन नहीं कर सका इसलिए मैने यह ऐसा वेष धारण कर लिया है, मैं सम्यग्दृष्टि हूं, तुम्हारा धर्मबन्धु हूं। इस प्रकार तपस्वीके वचन सुनकर और अच्छी तरह परीक्षा कर सेठने उसके लिए मित्रों सहित जीवन्धरकुमारको सौंप दिया सो ठीक ही है क्योंकि उत्तम खेतमें बीजकी तरह योग्य स्थानमें बुद्धिमान् मनुष्य क्या नहीं अर्पित कर देता है ? अर्थात् सभी कुछ अर्पित कर देन, है ।। २८१-२८४ ॥
“‘I was the king of Singhapura, and my name was Aryavarma. Having heard the true nature of righteousness (Dharma) from the ascetic Veeranandi, I embraced pure right belief (Samyagdarshana). Thereafter, passing the kingdom on to my son named Dhritishena, I adopted self-restraint—accepting the vows of a monk. However, unable to bear the intense agony caused by the fierce fire of digestion (Jatharagni), I assumed this present ascetic garb. I am a right-believer, and your brother in faith.’
Hearing these words of the ascetic and verifying them thoroughly, the merchant handed Prince Jivandhara over to him along with his friends. This is indeed fitting, for what does a wise man not entrust to a worthy recipient, just like sowing a seed in excellent soil? That is to say, he entrusts everything. || 281-284 ||”
श्लोक ( Shlok ) 285
“स सदृष्टिस्तमादाय निसर्गमतिविस्तृतिम् । अचिरेणैव कालेन विश्वविद्यान्तमानयत् ॥ २८५ ॥
उस सम्यग्दृष्टि तपस्वीने, स्वभावसे ही जिसकी बुद्धिका बहुत बड़ा विस्तार था ऐसे जीवन्धर कुमारको लेकर थोड़े ही समयमें समस्त विद्याओंका पारगामी बना दिया ।। २८५ ।।
“Taking charge of Prince Jivandhara, whose intellect by its very nature possessed immense vastness, that right-believing ascetic made him a master of all sciences and arts within a very short period of time. || 285 ||”
श्लोक ( Shlok ) 286
कुमारोऽपि रविर्वाम्भोदान्ते विद्याभिरद्युतत् । प्राप्तैश्वर्यो द्विपो वानु सम्प्राप्तनवयौवनः ॥ २८६ ॥
जिस प्रकार शरद् ऋतुमें सूर्य देदीप्यमान होता है और ऐश्वर्य पाकर हाथी सुशोभित होता है उसी प्रकार नव यौवनको पाकर जीवन्धरकुमार भी विद्याओंसे देदीप्यमान होने लगे ।। २८६ ।।
“Just as the sun shines radiantly in the autumn season, and an elephant appears magnificent upon attaining its full grandeur, so too did Prince Jivandhara begin to shine brilliantly with his mastery of all sciences upon attaining his fresh youth. || 286 ||”
श्लोक ( Shlok ) 287 – 290
उपाध्यायोऽपि कालान्तरेणापत्संयतः शिवम् । तस्काले कालकूटाख्यो मुख्यो वननिवासिनाम् ॥ २८७ ॥मर्त्याकारं प्रपन्नो वा सूर्यरश्मिभयात्स्वयम् । अन्धकारः सकोदण्डशरहस्तं दुरीक्षकम् ॥ २८८ ॥केनाप्यसामापाते कटुकं वा महौषधम् । निर्वृणं बलमादाय विषाणोद्धोपभीषणम् ॥ २८९ ॥तमालारामनिर्भासि भूगोचरमुपागतः । गोप्न्नो विप्नं स साधूनां गोमण्डलजिघृक्षया ॥ २९० ॥
वह उपाध्याय भी समयानुसार संयम धारण कर मोक्षको प्राप्त हुआ। अथानन्तर – उस समय कालकूट नामका एक भीलोंका राजा था जो ऐसा काला था मानो सूर्यकी किरणोंसे डरकर स्वयं अन्धकारने ही मनुष्यका आकार धारण कर लिया था, वह पशुहिंसक था और साधुओंके विघ्न के समान जान पड़ता था। जो धनुष-बाण हाथमें लिया है, जिसे कोई देख नहीं सकता, युद्धमें जिसे कोई सहन नहीं कर सकता, जो महौषधिके समान कटुक है, दयारहित है और सींगोंके शब्दोंसे भयंकर है ऐसी सेना लेकर वह कालकूट गोमण्डलके हरण करनेकी इच्छासे तमाखुओंके वनसे सुशोभित नगरके बाह्य मैदानमें आ डटा ॥ २८७-२९० ॥
“In due course of time, that preceptor (Upadhyaya) also embraced self-restraint and attained liberation (Moksha).
Thereafter, at that time, there was a king of the Bhils named Kalakuta, who was so dark that it seemed as if darkness itself, fearing the rays of the sun, had assumed a human form. He was a slaughterer of animals and appeared like an embodiment of obstacles to the holy ascetics. Holding bow and arrow in hand, unseen by anyone, unbearable to anyone in battle, bitter as a potent poisonous herb, devoid of mercy, and terrifying with the sounds of horns—with such an army, Kalakuta arrived and stationed himself in the outer plain of the city, which was adorned with forests of Tamala trees, with the intent of plundering the herds of cows. || 287-290 ||”
श्लोक 291 से 300
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273
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