नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 342 to 351
श्लोक ( Shlok ) 342 – 343
सापि गर्भार्भकक्रौर्यान्महीभृहृदयामिषम् । अभूदभिलपन्त्यार्ता तज्ज्ञात्वा मन्त्रिणस्तदा ॥३४२॥प्रयोगविहितं भर्तुर्हन्मासमिति दौहृदम् । स्वबुद्धया पूरयंस्तस्याः किं न कुर्वन्ति धीधनाः ॥ ३४३॥
उस रानी पद्मावतीको भी गर्भ के बालककी क्रूरतावश राजाके हृदयका मांस खानेकी इच्छा हुई और उससे वह दुःखी होने लगी। यह जानकर मन्त्रियोंने अपनी बुद्धिसे कोई बनावटी चीज देकर कहा कि ‘यह तुम्हारे पतिके हृदयका मांस है’ इस प्रकार उसका दोहला पूरा किया सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धिमान् मनुष्य क्या नहीं करते हैं ? ॥ ३४२-३४३ ॥
“Due to the cruel nature of the child in her womb, Queen Padmavati developed a morbid craving to eat the flesh of her husband’s heart, which caused her immense distress. Upon learning of this, the clever ministers used their ingenuity to prepare a counterfeit substitute and presented it to her, saying, ‘This is the flesh of your husband’s heart.’ In this manner, her pregnancy craving (Dohala) was fulfilled. And rightly so, for what is impossible for wise and intelligent men?”342 – 343
श्लोक ( Shlok ) 344
निदौहृदा क्रमेणासावलब्ध सुतपातकम् । दष्टोष्ठं निष्ठुरालोकं कृतभ्रूभङ्गसङ्गमम् ॥ ३४४॥
जिसका दोहला पूरा हो गया है ऐसी रानी पद्मावतीने अनुक्रमसे वह पापी पुत्र प्राप्त किया, जिस समय वह उत्पन्न हुआ था उस समय अपने ओठ डस रहा था, उसकी दृष्टि क्रूर थी और भौंह टेढ़ी ।। ३४४ ॥
“In due course of time, Queen Padmavati, whose pregnancy cravings had been fulfilled, gave birth to that sinful son. At the very moment of his birth, he was biting his lips, his gaze was fierce and cruel, and his eyebrows were deeply knitted in a scowl.”344
श्लोक ( Shlok ) 345 – 346
दृष्ट्वा तं पितरौ तस्य नात्र विस्त्रभ्य पोषणे । योग्योऽयमिति संस्मृत्य विधिं तस्य विसर्जने ॥ ३४५॥ मन्जूषायां विनिक्षिप्य कंसमय्यां सपत्रकम् । तोकं कलिन्दकन्यायाः प्रवाहे मुञ्चतः स्म तौ ॥३४६॥
माता-पिताने उसे देखकर विचार किया कि इसका यहाँ पोषण करना योग्य नहीं है यही समझ कर उन्होंने उसे छोड़नेकी विधिका विचार किया और कांसोंकी एक सन्दूक बनवा कर उसमें उस पुत्रको पत्र सहित रख दिया तथा यमुना नदीके प्रवाहमें छोड़ दिया ।। ३४५-३४६ ।।
“Upon seeing him, the parents reflected and realized that it was not fitting to raise him here. With this understanding, they pondered over a way to abandon him. They had a casket made of bell-metal (Kansa), placed the infant inside along with an explanatory letter, and cast it away into the flowing currents of the Yamuna River.”345 – 346
श्लोक ( Shlok ) 347 – 348
अस्ति मण्डोदरी नाम कौशाम्ब्यां “शौण्डकारिणी । तया प्रवाहे मञ्जूषामध्यस्थोऽसौ व्यलोक्यत॥ ३४७ ॥अवीवृधद्गृहीत्वैनमिव सा स्वसुतं हिता । किं न कुर्वन्ति पुण्यानि हीनान्यपि तपस्विनाम् ॥३४८॥
कौशाम्बी नामकी नगरीमें एक मण्डोदरी नामकी कलारन रहती थी उसने प्रवाहमें बहती हुई सन्दूकके भीतर स्थित उस बालकको देखा। देखते ही वह उसे उठा लाई और हितैषिणी बन अपने पुत्रके समान उसका पालन करने लगी। सो ठीक ही है क्योंकि तपस्वियोंके हीन पुण्य भी क्या नहीं करते ? ॥ ३४७-३४८ ॥
“In the city named Kaushambi, there lived a woman named Mandodari, who belonged to the distillers’ community (Kalaran). She spotted the casket floating along in the river’s current. She immediately retrieved it and brought the baby home, raising him with maternal affection just like her own son. And rightly so, for what can even the diminished spiritual merits (Heen-Punya) of severe ascetics not accomplish?”347 – 348
श्लोक ( Shlok ) 349 – 350
अहोभिः कैश्चिदासाद्य ‘लभ्मनादिसहं वयः । आक्रीडमानान्निर्हेतु समं सकलबालकान् ॥ ३४९॥ चपेटमुष्टिदण्डादिप्रहारैर्बाधते सदा । तदुराचारनिविण्णाऽत्यजन्मण्डोदरी च तम् ॥३५०॥
कितने ही दिनोंमें वह सुदृढ़ अवस्था पाकर साथ खेलनेवाले समस्त बालकोंको चाँटा, मुट्ठी तथा डण्डा आदिसे पीड़ा पहुँचाने लगा। उसके इस दुराचारसे खिन्न होकर मण्डोदरीने उसे छोड़ दिया- घरसे निकाल दिया ॥ ३४९-३५० ॥
“In a matter of days, having grown strong and robust, he began to torment all his playmates with slaps, punches, and sticks. Deeply distressed and vexed by his wicked behavior, Mandodari abandoned him and threw him out of the house.”349 – 350
श्लोक ( Shlok ) 351
सोऽपि शौर्यपुरं गत्वा वसुदेवमहीपतेः । प्रतिपद्य पदातित्वं तत्सेवातत्परोऽभवत् ॥३५१॥
अब वह शौर्यपुरमें जाकर राजा वसुदेवका सेवक बन गया और सदा उनकी सेवामें तत्पर रहने लगा ।। ३५१ ।।
“Now, having arrived in the city of Shauripur, he became a servant to King Vasudeva and remained constantly devoted to his service.”351
श्लोक 352 से 363
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92
नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144 | श्लोक 145 से 153 | श्लोक 154 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 243 | श्लोक 244 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |