राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 112 to 122
श्लोक ( Shlok ) 112
नित्योदयो बुधाधीशो विशुद्धाखण्डमण्डलः । पश्नाह्लादी प्रवृद्धोष्मा सुराजानं स जेष्यति ॥ ११२॥
अथवा वह सूर्य किसी उत्तम राजाको जीतनेवाला होगा क्योंकि जिसप्रकार उत्तम राजाका नित्योदय होता है अर्थात् उसका अभ्युदय निन्तर बढ़ता रहता है उसी प्रकारवह सूर्य भी नित्योदय होता है अर्थात् प्रतिदिन उसका उदय होता रहता है, जिस प्रकार उत्तम राजाबुधाधीश होता है अर्थात् विद्वानोंका स्वामी होता है उसी प्रकार वह सूर्य भी बुधाधीश था अर्थात बुधग्रहका स्वामी था, जिस प्रकार उत्तम राजाका मण्डल अर्थात् देश विशुद्ध-शत्रुरहित और अखण्डहोता है उसी प्रकार सूर्यका मण्डल भी अर्थात् बिम्ब भी विशुद्ध और अखण्ड था, जिस प्रकार उत्तमराजा पद्माह्लादी होता है अर्थात् लक्ष्मीसे प्रसन्न रहता है उसी प्रकार सूर्य भी पद्माह्लादी था अर्थात्कमलोंको विकसित करनेवाला था और जिस प्रकार उत्तम राजा प्रवृद्धोष्मा होता है अर्थात् बढ़तेहुए अहंकारको धारण करता है उसी प्रकार वह सूर्य भी प्रवृद्धोष्मा था अर्थात् उसकी गर्मी निरन्तर बढ़ती जाती थी ।। ११२ ॥
“Or, that sun was like a conqueror of a noble king. Because, just as a noble king experiences a continuous rise—meaning his prosperity and power grow incessantly—likewise, that sun also experiences a daily rise (setting and rising every day). Just as a noble king is a lord of the wise (Budhadhisha)—meaning the master of scholars—likewise, that sun was also a lord of Mercury (Budhadhisha), meaning the ruler of the planet Mercury. Just as a noble king’s realm (Mandala) is pure, free of enemies, and undivided, likewise, the sun’s disc (Mandala) was also pure and unbroken. Just as a noble king is a bringer of joy to wealth (Padmahlaadi)—meaning he remains pleased with prosperity—likewise, the sun was also a bringer of joy to lotuses (Padmahlaadi), meaning it caused the lotuses to bloom. And just as a noble king possesses increasing majesty or pride (Pravriddhoshma)—meaning he holds a growing sense of grandeur—likewise, that sun also possessed increasing heat (Pravriddhoshma), meaning its warmth kept growing continuously. || 112 ||”
श्लोक ( Shlok ) 113 – 114
शात्वा संसारवैमुख्यं कुमारस्यास्य बान्धवाः । तदा कुणिमहाराजः श्रेणयोऽष्टादशापि च ॥ ११३ ॥सहानावृतदेवेन परिनिष्क्रमणं प्रति । अभिषेकं करिष्यन्ति सङ्गता मङ्गलैर्जलैः ॥ ११४ ॥
जम्बूकुमार संसारसे विमुख – विरक्त हुआ है यह जान कर उसकेसब भाई-बन्धु, कुणिक राजा, उसकी अठारह प्रकारकी सेनाएं और अनावृत देव आयेंगे तथा सब लोग माङ्गलिक जलसे उसका दीक्षा-कल्याणकका अभिषेक करेंगे ।।११३-११४॥
“Knowing that Jambukumar has become detached and averse to the worldly life, all his kinsmen, King Kunika, his eighteen types of armies, and the Anavrita gods will arrive; and everyone will perform the anointment of his initiation auspiciousness (Diksha-Kalyanaka) with consecrated, auspicious water. || 113-114 ||”
श्लोक ( Shlok ) 115 – 116
तत्कालोचितबेषोऽसौ शिविकां देवनिर्मिताम् । आरुह्य भूतिभूत्योच्चैर्विपुलाचलमस्तके ॥ ११५ ॥मां निविष्टं समभ्येत्य महामुनिनिषेवितम् । भक्त्या प्रदक्षिणीकृत्य नमस्कृत्य यथाविधि ॥ ११६ ॥
वेषभूषा धारण कर वह कुमार देव निर्मित पालकी पर सवार होकर बड़े वैभवके साथ विपुलाचल की शिखर पर पहुँचेगा । वहाँ विराजमान देखकर वह मेरे ही पास आवेगा । उस समय बड़े-बड़े मुनि हमारी सेवा कर रहे होंगे। वह आकर बड़ी भक्तिसे प्रदक्षिणा देगा और विधिपूर्वक नमस्कार करेगा ।। ११५-११६ ।।
“Adorning himself in the initiation attire, that prince will ascend a celestial palanquin created by the gods and, with great opulence, will reach the summit of Mount Vipulachal. Seeing me seated there, he will come straight to me. At that time, great sages will be attending to us. Upon arriving, he will circumambulate with deep devotion and bow down in accordance with the prescribed rituals. || 115-116 ||”
श्लोक ( Shlok ) 117 – 122
वर्णत्रयसमुद्भूतैर्विनेयैर्बहुभिः समम् । विद्युचोरेण तत्पञ्चशतभृत्यैश्च संयमम् ॥ ११७ ॥सुधर्मगणभृत्पाश्र्वे समचित्तो ग्रहीष्यति । कैवल्यं द्वादशाब्दान्ते मय्यन्त्यां गोतमाङ्गते ॥ ११८ ॥सुधर्मा केवली जम्बूनामा च श्रुतकेवली । भूत्वा पुनस्ततो द्वादशाब्दान्ते निर्वृतिङ्गते ॥ ११९ ॥सुधर्मण्यैन्तिमं ज्ञानं जम्बूनाम्नो भविष्यति । तस्य शिष्यो भवो नाम चत्वारिंशत्समा महान् ॥१२०॥इह धर्मोपदेशेन धरित्र्यां विहरिष्यति । इत्यवादीत्तदाकर्ण्य स्थितस्तस्मिन्ननावृतः ॥ १२१ ॥देवो मदीयवंशस्य माहात्म्यमिदमद्भुतम् । अन्यत्रादृष्टमित्युच्चैरकृतानन्दनाटकम् ॥ १२२ ॥
तदनन्तर शान्त चित्तको धारण करनेवाला वह जम्बूकुमार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीन वर्षोंमें उत्पन्न हुए अनेक लोगोंके साथ तथा विद्युच्चर चोर और उसके पाँच सौ भृत्योंके साथ सुधर्माचार्य गणधरके समीप संयम धारण करेगा। जब केवलज्ञानके बारह वर्ष बाद मुझे निर्वाण प्राप्त होगा तब सुधर्माचार्य केवली और जम्बूकुमार श्रुतकेवली होंगे। उसके बारह वर्ष बाद जब सुधर्माचार्य मोक्ष चले जावेंगे तब जम्बूकुमारको केवलज्ञान होगा । जम्बू. स्वामीका भव नामका एक शिष्य होगा, उसके साथ चालीसवर्ष तक धर्मोपदेश देते हुए जम्बू-स्वामी पृथिवीपर विहार करेंगे। इस प्रकार गौतम स्वामीने जम्बू स्वामीकी कथा कही। उसे सुनकर वर्दी पर बैठा हुआ अनावृत नामका यक्ष कहने लगा कि मेरे वंशका यह ऐसा अद्भुत माहात्म्य है कि कहीं दूसरी जगह देखनेमें भी नहीं आता। ऐसा कहकर उसने आनन्द नामका उत्कृष्ट नाटक किया ।। ११७-१२२ ।।
“Thereafter, bearing a peaceful mind, that Jambukumar—along with numerous people born of the three social orders (Varnas) of Brahmins, Kshatriyas, and Vaishyas, as well as the thief Vidyutchar and his five hundred followers—will embrace self-restraint (Sanyam) under Ganadhara Sudharmacharya. When I attain liberation (Nirvana) twelve years after achieving omniscience (Kevalajnana), Sudharmacharya will become an omniscient seer (Kevali) and Jambukumar will become a scriptural omniscient (Shrutakevali). Twelve years after that, when Sudharmacharya attains liberation (Moksha), Jambukumar will achieve omniscience (Kevalajnana). Jambukuamar Swami will have a disciple named Bhava, and walking the earth for forty years alongside him, Jambukumar Swami will discourse on the righteous path (Dharma). In this manner, Gautama Swami narrated the story of Jambukumar Swami. Hearing this, the Yaksha named Anavrita, seated on his vehicle, began to say, ‘Such is the wondrous glory of my lineage that it cannot be seen anywhere else.’ Having said this, he performed an exquisite dance called Ananda. || 117-122 ||”
श्लोक 123 से 133
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
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