नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 393 से 402 | श्लोक 403 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441 | श्लोक 442 से 455
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 456 to 471
श्लोक ( Shlok ) 456
तत्कृतं भानुनैवेति कैश्चित्कंसो निबोधितः । कैश्चिन्न भानुनान्येन कुमारेणेति रक्षकैः ॥४५६॥
‘यह कार्य भानुने ही किया है’ ऐसा कुछ पहरेदारोंने कंसको बतलाया और कुछने यह बतलाया कि यह कार्य भानुने नहीं किन्तु किसी दूसरे कुमारने किया है ।॥ ४५६ ॥
“Some guards informed Kansa, ‘This task has been accomplished by Bhanu alone,’ while others reported that this task was not done by Bhanu, but rather by some other young prince.” || 456 ||
श्लोक ( Shlok ) 457
तच्छ्रत्वान्विष्यतां सोऽन्यस्तस्मै कन्या प्रदीयते । स कस्य किं कुलं कस्मिन्निति राजाऽब्रवीदिदम्॥४५७॥
यह सुन कर राजा कंसने कहा कि यदि ऐसा है तो उस अन्य कुमारकी खोज की जावे, वह किसका लड़का है ? उसका क्या कुल है? और कहाँ रहता है ? उसके लिए कन्या दी जावेगी ॥ ४५७ ॥
“Hearing this, King Kansa said, ‘If that is the case, then let a search be made for that other young prince. Whose son is he? What is his lineage, and where does he live? The princess shall be given in marriage to him alone.'” || 457 ||
श्लोक ( Shlok ) 458
अवधार्य स्वपुत्रेण सम्यक्कर्मसमर्थितम् । गोमण्डलेन भीत्वामा नन्दगोपः पलायत ॥४५८॥
इधर नन्दगोप को जब अच्छी तरह निश्चय हो गया कि यह कार्य हमारे ही पुत्रके द्वारा हुआ है तब वह डर कर अपनी गायोंके साथ कहीं भाग गया ।। ४५८ ॥
“Meanwhile, when Nandagopa became absolutely certain that this deed had been accomplished by his own son, he grew terrified and fled somewhere along with his cows.” || 458 ||
श्लोक ( Shlok ) 459
शैलस्तम्भं समुद्धर्तु तत्र सर्वेऽन्यदा गताः । नाशक्नुवन् समेत्यैते कृष्णेनैव समुद्धतः ॥४५९॥
किसी एक दिन वहाँ पत्थरका खंभा उखाड़नेके लिए बहुत से लोग गये परन्तु सब मिल कर भी उस खंभाको नहीं उखाड़ सके और श्रीकृष्णने अकेले ही उखाड़ दिया ।। ४५९ ॥
“One day, many people went there to uproot a stone pillar, but even when working together, they could not pull it out. Shri Krishna, however, uprooted it completely on his own.” || 459 ||
श्लोक ( Shlok ) 460
प्रहृष्य साहसातस्माद्विस्मिता जनसंहतिः । परार्ध्यवस्त्रभूषादिदानेन तमपूजयत् ॥४६०॥
लोग इस कार्यसे बहुत प्रसन्न हुए और श्रीकृष्णके इस साहससे आश्चर्य में पड़ गये । अनन्तर सब लोगोंने श्रेष्ठ वस्त्र तथा आभूषण आदि देकर उनकी पूजा की ।॥ ४६० ॥
“The people were highly pleased with this deed and were struck with wonder by this act of courage by Shri Krishna. Subsequently, everyone honored him by offering excellent garments, ornaments, and other gifts.” || 460 ||
श्लोक ( Shlok ) 461
पितामुष्य प्रभावेण कुतश्चिदपि मे भयम् । नेति प्राक्तनमेवासौ स्थानं ब्रजमवापयत् ॥४६१॥
यह देख नन्दगोपने विचार किया कि मुझे इस पुत्रके प्रभावसे किसीसे भय नहीं हो सकता। ऐसा विचार कर वह अपने पहलेके ही स्थान पर ब्रजमें वापिस आ गया ॥ ४६१ ॥
“Seeing this, Nandagopa thought, ‘Due to the divine power (influence) of this son of mine, I need not fear anyone.’ Reflecting thus, he returned to his original place in Braj.” || 461 ||
श्लोक ( Shlok ) 462 – 464
नन्दगोपस्य पुत्रोऽसौ यस्तत्त्रितयकर्मकृत् । इत्यन्वेष्टुं गतैः सम्यक् ज्ञापितेनाप्यनिश्चितेः ॥४६२॥ सहस्त्रपत्रमम्भोजमन्यदाऽहीन्द्ररक्षितम् । प्रहीयतामिति प्रोक्तो राज्ञा जिज्ञासया रिपुम् ॥४६३॥ श्रुत्वा तद्गोपतिः शोकादाकुलः किल भूभुजः । प्रजानां रक्षितारस्ते कष्टमय हि मारकाः ॥ ४६४ ॥
खोज करनेके लिए गये हुए लोगोंने यद्यपि कंसको यह अच्छी तरह बतला दिया था कि जिसने उक्त तीन कार्य किये थे वह नन्दगोपका पुत्र है तथापि उसे निश्चय नहीं हो सका इसलिए उसने शत्रुकी जाँच करनेकी इच्छासे दूसरे दिन नन्दगोपके पास यह खबर भेजी थी कि नाग राजा जिसकी रक्षा करते हैं वह सहस्रदल कमल भेजो । राजाकी आज्ञा सुनकर नन्दगोप शोकसे आकुल होकर कहने लगा कि राजा लोग प्रजाकी रक्षा करनेवाले होते हैं परन्तु खेद है कि वे अब मारनेवाले हो गये ।। ४६२-४६४ ॥
“Although the people who went to search had clearly informed Kansa that the person who accomplished those three tasks was the son of Nandagopa, the king still could not be completely certain. Therefore, desiring to verify the identity of his enemy, he sent a message to Nandagopa the following day demanding: ‘Send the thousand-petaled lotus that is guarded by the Naga king.’ Upon hearing the King’s command, Nandagopa became overwhelmed with grief and said, ‘Kings are meant to protect their subjects, but it is a pity that they have now become their destroyers.'” || 462-464 ||
श्लोक ( Shlok ) 465- 466
इति निर्विद्य याद्यङ्ग राजादिष्टिर्ममेदृशी । त्वयैवाम्बुरुहाण्युग्रसर्परक्ष्याणि भूभुजः ॥ ४६५ ॥ नेयानीत्यब्रवीत्कृष्णं सोऽपि किं वान दुष्करम् । नेष्यामीति महानागसरः क्षिप्रतरं ययौ ॥ ४६६ ॥
इस तरह खिन्न होकर उसने कृष्णसे कहा कि हे प्रिय पुत्र ! मेरे लिए राजाकी ऐसी आज्ञा है अतः जा, भयंकर सर्प जिनकी रक्षा करते हैं ऐसे कमल राजाके लिए तू ही ला सकता है। पिता की बात सुनकर कृष्णने कहा कि ‘इसमें कठिन क्या है? मैं ले आऊँगा’ ऐसा कह कर वह शीघ्र ही महासर्पोंसे युक्त सरोवरकी ओर चल पड़ा ।। ४६५-६६६ ।।
“Distressed in this manner, he said to Krishna, ‘O dear son! Such is the King’s command to me; therefore go, for only you can fetch those lotuses for the King, which are guarded by fierce serpents.’ Hearing his father’s words, Krishna replied, ‘What is so difficult about this? I shall bring it.’ Saying this, he swiftly set out toward the lake inhabited by the massive serpents.” || 465-466 ||
श्लोक ( Shlok ) 467 – 471
अविशच्चापि निःशङ्गं तद्ज्ञात्वा कोपदीपितः । स्वनिःश्वाससमुद्भूतज्वलज्ज्वालाकणान् किरन् ॥४६७ ॥चूडामणिप्रभाभासिस्फुटाटोपभयङ्करः । चलज्जिह्वाद्वयः स्फूर्जद्वीक्षणात्युग्रवीक्षणः ॥ ४६८ ॥ प्रत्युत्थाय यमाकारो निर्गलीतुं तमुद्यतः । सोऽपि मद्वसनस्यैषा “स्फटा शुद्धशिलास्त्विति ॥ ४६९ ॥पीताम्बरं समुद्धृत्य जलार्द्र मधुसूदनः । “स्फटामास्फालयामास पक्षकेनैव पक्षिराट् ॥ ४७० ॥ वज्रपातायितात्तस्माद्वस्त्रापाताद्विभीतवान् । पूर्वपुण्योदयाच्चास्य फणीन्द्रोऽदृश्यतामगात् ॥ ४७१ ॥
और बिना किसी शङ्काके उस सरोवरमें घुस गया। यह जान कर यमराजके समान आकारवाला नागराज उठ कर उसे निगलनेके लिए तैयार हो गया। उस समय वह नागराज क्रोधसे दीपित हो रहा था, अपनी श्वासोंसे उत्पन्न हुई देदीप्यमान अग्निकी ज्वालाओंके कण विखेर रहा था, चूड़ामणिकी प्रभासे देदीप्यमान फणाके आटोपसे भयङ्कर था, उसकी दोनों जिह्वाएँ लप-लप कर रही थीं और चमकीले नेत्रोंसे उसका देखना बड़ा भयंकर जान पड़ता था, श्रीकृष्णने भी विचार किया कि इसकी यह फणा हमारा वस्त्र धोनेके लिए शुद्ध शिला रूप हो। ऐसा विचार कर वे जलसे भीगा हुआ अपना पीताम्बर उसकी फणा पर इस प्रकार पछाड़ने लगे कि जिस प्रकार गरुड़ पक्षी अपना पंखा पछाड़ता है। वज्रपातके समान भारी दुःख देनेवाली उनके वस्त्रकी पछाड़से वह नाग-राज भयभीत हो गया और उनके पूर्व पुण्यके उदयसे अदृश्य हो गया ॥ ४६७-४७१ ॥
“And without any hesitation, he plunged into that lake. Sensing this, the Naga King—whose form was as terrifying as Yama, the God of Death—rose up, ready to swallow him. At that moment, the Naga King was blazing with fury, scattering sparks of brilliant fire generated by his hissing breath, and looking fearsome with the expanse of his hood, which shone with the radiance of his crest-jewel. His twin tongues flickered rapidly, and his glare from those glittering eyes appeared intensely frightening.
Shri Krishna, however, thought to himself, ‘Let this hood of his serve as a clean stone slab for washing my clothes.’ With this thought, he began striking his water-soaked yellow garment (pitambara) against the serpent’s hood, just as the Garuda bird flaps its mighty wings. Terrified by the striking of the garment, which inflicted agony as heavy as a thunderbolt, and due to the awakening of Krishna’s immense past merits, the Naga King vanished from sight.” || 467-471 ||
श्लोक 472 से 481
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