चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 404 to 412
श्लोक ( Shlok ) 404
लोकनानन्तरं नत्वा कृताञ्जलिपुटः पुनः । त्रिःपरीत्य स्तुतिं कर्तुं विधिनारब्धवांस्तदा ॥ ४०४ ॥
जिन-मन्दिरको देखते ही उन्होंने नमस्कार किया, हाथ जोड़े, तीन प्रदक्षिणाएँ दीं और उसी समय विधि-पूर्वक स्तुति करना शुरू कर दिया ।। ४०४ ॥
The moment Prince Jīvandhara beheld the Jina temple, he reverently bowed before it, joined his palms in devotion, and circumambulated it three times. Thereupon, in accordance with the prescribed rites, he began to offer a hymn of praise. ॥404॥
श्लोक ( Shlok ) 405
सहसैवात्मनो रागं व्यक्तं बहिरिवार्पयन् । चम्पकानोकहः प्रादुरासीदेको निजोद्गमैः ॥ ४०५ ॥
उसी समय अकस्मात् एक चम्पाका वृक्ष मानो अपना अनुराग बाहिर प्रकट करता हुआ अपने फूलोंसे युक्त हो गया ।। ४०५ ॥
At that very moment, a champaka tree suddenly burst into full bloom, as though revealing its inner affection through the profusion of its flowers. ॥405॥
श्लोक ( Shlok ) 406
कोकिलाश्च पुरा मूकीभूतास्तद्यानभेषजैः । चिकित्सिता इव श्राव्यमकूजन्मधुरस्वरम् ॥ ४०६॥
जो कोकिलाएँ पहले गूँगीके समान हो रही थीं वे उन कुमारके शुभागमन रूप औषधिसे चिकित्सा की हुईके समान ठीक होकर सुननेके योग्य मधुर शब्द करने लगीं ॥ ४०६ ॥
The cuckoos, who until then had remained silent as though mute, seemed to have been cured by the life-restoring medicine of the Prince’s auspicious arrival. Regaining their voices, they began to pour forth sweet and melodious notes, delightful to the ear. ॥406॥
श्लोक ( Shlok ) 407 – 408
तजैनभवनाभ्यर्णवर्तिन्यच्छाम्बुसम्भृते । स्फटिकद्रवपूर्णे वा व्यकसन् सरसि स्फुटम् ॥ ४०७ ॥ सर्वाणि जलपुष्पाणि सम्भ्रमद्भमरारवम् । तद्गोपुरकवाटानामुद्घाटनमभूत्स्वयम् ॥ ४०८॥
उस जैन-मन्दिरके समीप ही एक सरोवर था जो स्वच्छ जलसे भरा हुआ था और ऐसा जान पड़ता था मानो स्फटिक मणिके द्रवसे ही भरा हो । उस सरोवर में जो कमल थे वे सबके सब एक साथ फूल गये और उनपर भ्रमर मॅडराते हुए गुंजार करने लगे । इसके सिवाय उस मन्दिरके द्वारके किवाड़ भी अपने आप खुल गये ॥ ४०७-४०८ ।।
Near that Jina temple lay a lake filled with crystal-clear water, appearing as though it were brimming with the liquid essence of a flawless crystal gem. At that very moment, all the lotuses in the lake blossomed together, while bees hovered over them, humming melodiously. Moreover, the great doors at the entrance of the temple opened of their own accord. ॥407–408॥
श्लोक ( Shlok ) 409 – 412
तद्विलोक्य समुत्पन्नभक्तिः स्नानविशुद्धिभाक् । तत्सरोवरसम्भूतप्रसवैर्बहुभिाजनान् ॥ ४०९ ॥ अभ्यर्थ्याथ्यैर्मु दाव्यग्रमस्तोष्टेष्टैरभिष्टवैः । सुता तत्र सुभद्राख्यश्रेष्ठिनो निर्वृतेश्च सा ॥ ४१० ॥साक्षालक्ष्मीरिवाक्षुणाभूनाम्ना क्षेमसुन्दरी । तद्भावि भर्तृसान्निध्ये चम्पकप्रसवादिकम् ॥ ४११ ॥ समादिशत्पुरा गर्व मुनीन्द्रो विनयन्धरः । तत्रस्थास्तत्परीक्षार्थ नियुक्तपुरुषास्तदा ॥ ४१२ ॥
यह अतिशय देख, जीवन्धर कुमारकी भक्ति और भी बढ़ गई उन्होंने उसी सरोवर में स्नान कर विशुद्धता प्राप्त की और फिर उसी सरोवरमें उत्पन्न हुए बहुतसे फूल लेकर जिनेन्द्र भगवान्की पूजा की तथा अर्थोसे भरे हुए अनेक इष्ट स्तोत्रोंसे निराकुल होकर उनकी स्तुति की। उस नगर में सुभद्र सेठकी निवृति नामकी स्त्री से उत्पन्न हुई एक क्षेमसुन्दरी नामकी कन्या थी जो कि साक्षात् लक्ष्मीके समान सुशोभित थी। पहले किसी समय विनयन्धर नामके मुनिराजने कहा था कि क्षेमसुन्दरी के पतिके समीप आनेपर चंपाका वृक्ष फूल जायगा, आदि चिह्न बतलाये थे। उसी समय सेठने उसकी परीक्षा करनेके लिए वहाँ कुछ पुरुष नियुक्त कर दिये थे ।। ४०९-४१२ ॥
Witnessing these miraculous manifestations, Prince Jīvandhara’s devotion grew still deeper. He bathed in the same lake and purified himself. Then, gathering many flowers that had blossomed in its waters, he worshipped the Lord Jina. With a tranquil and untroubled mind, he offered hymns of praise—numerous sacred and cherished stotras rich in profound meaning.
In that city lived a maiden named Kṣemasundarī, the daughter of the merchant Subhadra and his wife Nivṛti. She shone in splendour like Lakṣmī herself. On a former occasion, the venerable monk Vinayandhara had foretold certain signs, declaring that when Kṣemasundarī’s future husband approached, the champaka tree would burst into bloom, along with other auspicious manifestations. From that time onward, the merchant had stationed several men there to observe these signs and test the prophecy. ॥409–412॥
श्लोक 413 से 423
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122| श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403
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