चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172 – 174
सहदेवोऽपि सम्भ्रम्य संसारे सुचिरं पुनः । कौशाम्ब्यां वैश्यतुग्भूत्वा मित्रवीराह्वयः सुधीः ॥ १७२ ॥भृत्यो वृषभसेनस्य चन्दनां स समर्पयत् । पिता श्रीनागदत्तस्य धनदेवो वणिग्वरः ॥ १७३ ॥स्वर्लोकं शान्तचित्तेन गत्वैत्य श्रेष्ठिताङ्गतः । श्रीमान्वृषभसेनाख्यः कौशाम्ब्यां कलितो गुणैः ॥ १७४ ॥
सहदेव भी संसारमें चिरकाल तक भ्रमणकर कौशाम्बी नगरीमें मित्रवीर नामका बुद्धिमान् वैश्यपुत्र हुआ है जो कि वृषभसेनका सेवक है और उसीने यह चन्दना वृषभसेन सेठके लिए समर्पित की थी। नागदत्तका पिता सेठ धनदेव शान्तचित्तसे मरकर स्वर्ग गया था और वहाँ से आकर कौशाम्बी नगरीमें अनेक गुणोंसे युक्त श्रीमान् वृषभसेन नामका सेठ हुआ है ॥ १७२-१७४ ॥
“Sahadeva also, after wandering in the world for a long time, was born in the city of Kaushambi as a wise son of a Vaishya named Mitraveera, who is a servant of Vrishabhasena; and it was he who had offered this Chandana to the merchant Vrishabhasena. The merchant Dhanadeva, the father of Nagadatta, passed away with a peaceful mind and went to heaven, and having returned from there, he was born in the city of Kaushambi as a wealthy merchant named Vrishabhasena, endowed with numerous virtues. || 172-174 ||”
श्लोक ( Shlok ) 175 – 176
सोमिलायां’ कृतद्वेषा चित्रसेना चतुर्गतिम् । परिश्रम्य चिरं शान्त्वा मनाक तत्रैव विट्सुता ॥ १७५ ॥भूत्वा वृषभसेनस्य पत्नी भद्राभिधाऽभवत् । निदानकृतवैरेण न्यगृद्धाश्चन्दनामसौ ॥ १७६ ॥
चित्रसेनाने सोमिलासे द्वेष किया था इसलिए वह चिरकालतक संसारमें भ्रमण करती रही। तदनन्तर कुछ शान्त हुई तो कौशाम्बी नगरी में वैश्यपुत्री हुई और भद्रा नामसे प्रसिद्ध होकर वृषभसेनकी पत्नी हुई है। निदानके समय जो उसने वैर किया था उसीसे उसने चन्दनाका निग्रह किया था उसे कष्ट दिया था ।। १७५-१७६ ।।
“Because Chitrasena harbored malice toward Somila, she wandered through the world for a long time. Thereafter, when her intense karma subsided a little, she was born in the city of Kaushambi as the daughter of a Vaishya, becoming famous by the name of Bhadra and the wife of Vrishabhasena. Because of the enmity she had bound through her vengeful resolve (nidana), she restrained Chandana and inflicted suffering upon her. || 175-176 ||”
श्लोक ( Shlok ) 177
चन्दनैषाच्युतात्कल्पात्प्रत्यागत्य शुभोदयात् । द्वितीयवेदं सम्प्राप्य पारमात्म्यमवाप्स्यति ॥ १७७ ॥
यह चन्दना अच्युत स्वर्ग जायगी और वहाँ से वापिस आकर शुभ कर्मके उदयसे पुंवेदको पाकरअवश्य ही परमात्मपद – मोक्षपद प्राप्त करेगी ॥ १७७ ॥
“This Chandana will go to the Achyuta heaven, and upon returning from there, by the rise of her meritorious karma, she will attain a male birth and will assuredly achieve the state of the supreme soul—the state of liberation (moksha). || 177 ||”
श्लोक ( Shlok ) 178- 179
एवं बन्धविधानोक्तमिध्याभावादिपञ्चकात् । सञ्चितैः कर्मभिः प्राप्य द्रव्यादिपरिवर्तनम् ॥ १७८ ॥संसारे पञ्चधा प्रोक्त दुःखान्मुग्राण्यनारतम् । प्राप्तवन्तः कृतान्तास्ये हन्त सीदन्ति जन्तवः ॥ १७९ ॥
इस प्रकार बन्धके साधनोंमें जो मिथ्या दर्शन आदि पाँच प्रकारके भाव कहे गये हैं उनके निमित्तसे संचित हुए कर्मों के द्वारा ये जीव द्रव्य क्षेत्र आदि परिवर्तनोंको प्राप्त होते रहते हैं। ये पाँच प्रकारके परिवर्तन ही संसारमें सबसे भयंकर दुःख हैं । खेदकी बात है. कि ये प्राणी निरन्तर इन्हीं पञ्च प्रकारके दुःखोंको पाते हुए यमराजके मुंहमें जा पड़ते हैं ।॥ १७८-१७९ ॥
“In this manner, by means of the fivefold dispositions beginning with false belief (mithyadarsana), which are said to be the causes of karmic bondage, living beings continuously undergo cyclic changes through time, space, and other spheres (dravya, kshetra, kala, bhava, and puda-parivartana). These five types of cyclic changes (pancha-parivartana) constitute the most terrifying miseries in the transmigratory world. It is a matter of profound grief that these living beings, while incessantly enduring these five kinds of suffering, fall into the jaws of the Lord of Death (Yamaraja). || 178-179 ||”
श्लोक ( Shlok ) 180 – 181
त एव’ लब्धकालादिसाधना मुक्तिसाधनम् । सम्यक्त्वज्ञानचारित्रतपोरूपमनुत्तरम् ॥ १८० ॥अभ्येत्य पुण्यकर्माणः परमस्थानसप्तके । सम्प्राप्तपरमैश्वर्या भवन्ति सुखभागिनः ॥ १८१ ॥
फिर ये ही जीव, काललब्धि आदिका निमित्त पाकर सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र और सम्यक्तप रूप मोक्षके उत्कृष्ट साधन पाकर पुण्य कर्म करते हुए सात परमस्थानोंमें परम ऐश्वर्यको प्राप्त होते हैं और यथा क्रमसे अनन्त सुखके भाजन होते हैं ।। १८०-१८१ ।।
“Then these very living beings, upon attaining the right timing (kalalabdhi) and other favorable conditions, acquire the supreme means of liberation—namely right faith, right knowledge, right conduct, and right austerities. By accumulating meritorious karma, they achieve supreme majesty across the seven exalted states (parama-sthana) and, in due order, become the recipients of infinite bliss. || 180-181 ||”
श्लोक 182 से 193
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171
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