Summary of Uttar Puran Parv 60 by Acharya Gunabhadra
उत्तरपुराण पर्व 60 (श्लोक 1–85) : संक्षिप्त सारांश
धातकीखण्ड द्वीप के अरिष्ट नगर के राजा पद्मरथ ने जिनेन्द्र के उपदेश से संसार की अनित्यता का बोध प्राप्त किया। उन्होंने राज्य त्यागकर दीक्षा ग्रहण की, तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया और देह त्यागकर अच्युत स्वर्ग में इन्द्र पद प्राप्त किया। वहाँ से च्युत होकर वे अयोध्या के राजा सिंहसेन और रानी जयश्यामा के यहाँ जन्मे तथा आगे चलकर भगवान अनन्तनाथ तीर्थंकर बने।
अनन्तनाथ ने दीर्घकाल तक राज्य करने के पश्चात वैराग्य धारण किया, पुत्र को राज्य सौंपकर दीक्षा ली और कठोर तपस्या की। दो वर्ष की साधना के बाद उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने विशाल धर्मसंघ का नेतृत्व करते हुए असंख्य जीवों को सम्यग्दर्शन और मोक्षमार्ग का उपदेश दिया। अंत में सम्मेदशिखर पर शुक्लध्यान द्वारा मोक्ष प्राप्त किया।
इसी काल में सुप्रभ बलभद्र और पुरुषोत्तम नारायण के पूर्वभवों का वर्णन आता है। पोदनपुर के राजा वसुषेण की रानी नन्दा का चण्डशासन द्वारा हरण कर लिया गया, जिससे दुःखी होकर वसुषेण ने दीक्षा ग्रहण की और तप के प्रभाव से देवगति प्राप्त की। दूसरी ओर महाबल नामक धर्मात्मा राजा ने भी वैराग्य लेकर संयम धारण किया और स्वर्ग में उत्पन्न हुआ।
बाद में महाबल का जीव सुप्रभ बलभद्र और वसुषेण का जीव पुरुषोत्तम नारायण के रूप में जन्मे। दोनों ने महान वैभव और साम्राज्य का उपभोग किया। उधर चण्डशासन अनेक भवों के बाद वाराणसी का राजा मधुसूदन बना। अहंकारवश उसने सुप्रभ और पुरुषोत्तम से कर माँगा, जिसके परिणामस्वरूप युद्ध हुआ। युद्ध में पुरुषोत्तम ने मधुसूदन का वध कर दिया और दोनों भाइयों ने व्यापक राज्य का शासन किया।
आयु पूर्ण होने पर हिंसात्मक कर्मों के कारण पुरुषोत्तम नारायण नरकगति को प्राप्त हुआ, जबकि उसके वियोग से विरक्त हुए सुप्रभ ने दीक्षा ग्रहण कर साधना की और मोक्ष प्राप्त किया। इस प्रकार यह पर्व दर्शाता है कि समान वैभव और सामर्थ्य प्राप्त होने पर भी जीव की गति उसके कर्म, भाव और आचरण पर निर्भर करती है; शुभ प्रवृत्ति मोक्ष का कारण बनती है और अशुभ प्रवृत्ति अधोगति का।
श्लोक 1 से 11 : राजा पद्मरथ का वैराग्य और तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध
धातकीखण्ड द्वीप के अरिष्ट नगर में पद्मरथ नामक राजा राज्य करता था। वह अत्यन्त पुण्यशाली और सुख-संपन्न था। एक दिन स्वयंप्रभ जिनेन्द्र के उपदेश से उसे संसार की अनित्यता का बोध हुआ। उसने आत्मा, शरीर और इन्द्रिय-विषयों के क्षणभंगुर संबंध पर विचार किया और विषयासक्ति का त्याग करने का निश्चय किया। पुत्र घनरथ को राज्य सौंपकर उसने दीक्षा ग्रहण की, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया तथा तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया।
श्लोक 12 से 21 : अच्युत स्वर्ग से अनन्तनाथ के गर्भावतरण तक
सल्लेखना सहित देह त्यागकर पद्मरथ अच्युत स्वर्ग में इन्द्र पद को प्राप्त हुआ। वहाँ दीर्घकाल तक दिव्य सुख भोगने के पश्चात उसका जीव पुनः मनुष्यलोक में आया। भरत क्षेत्र की अयोध्या नगरी में राजा सिंहसेन और रानी जयश्यामा के यहाँ शुभ स्वप्नों एवं दिव्य संकेतों के साथ उसका गर्भावतरण हुआ। देवों ने गर्भकल्याणक मनाया और समय पूर्ण होने पर जयश्यामा ने एक पुण्यवान पुत्र को जन्म दिया।
श्लोक 22 से 32 : अनन्तनाथ का जन्म, राज्य और दीक्षा
इन्द्रों ने नवजात बालक का मेरु पर्वत पर अभिषेक कर उसका नाम अनन्तजित रखा। वे आगे चलकर अनन्तनाथ तीर्थंकर कहलाए। दीर्घकाल तक राज्य करने के बाद एक दिन उल्कापात देखकर उन्हें संसार और कर्मबंधन की नश्वरता का बोध हुआ। उन्होंने कर्मरूपी लता को नष्ट करने का संकल्प किया। पुत्र अनन्तविजय को राज्य देकर वे सहेतुक वन में एक हजार राजाओं सहित दीक्षित हो गए।
श्लोक 33 से 42 : तप, केवलज्ञान और विशाल धर्मसंघ
दीक्षा के दूसरे दिन राजा विशाख ने उन्हें आहारदान देकर पंचाश्चर्यों की प्राप्ति की। दो वर्ष की कठोर साधना के बाद सहेतुक वन में अश्वत्थ वृक्ष के नीचे अनन्तनाथ को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। देवों ने चतुर्थ कल्याणक मनाया। उनके धर्मसंघ में हजारों मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ सम्मिलित थे तथा उनकी दिव्यध्वनि से असंख्य जीवों का कल्याण हुआ।
श्लोक 43 से 51 : मोक्ष और सुप्रभ–पुरुषोत्तम कथा का आरम्भ
भगवान अनन्तनाथ ने अनेक प्रदेशों में विहार कर जीवों को सम्यक् मार्ग का उपदेश दिया। अंत में सम्मेदशिखर पर प्रतिमायोग धारण कर चतुर्थ शुक्लध्यान से मोक्ष प्राप्त किया। इसके पश्चात ग्रंथकार सुप्रभ बलभद्र और पुरुषोत्तम नारायण के पूर्वभवों का वर्णन प्रारम्भ करते हैं। पोदनपुर के राजा वसुषेण और उनकी प्रिय रानी नन्दा का परिचय दिया जाता है।
श्लोक 52 से 61 : वसुषेण और महाबल के वैराग्यपूर्ण पूर्वभव
मलयदेश का राजा चण्डशासन नन्दा पर मोहित होकर उसका हरण कर ले गया। इस अपमान से दुःखी वसुषेण ने वैराग्य ग्रहण किया, दीक्षा लेकर कठोर तप किया और भविष्य में महान सामर्थ्य प्राप्त करने का निदान बाँधा। मृत्यु के बाद वह सहस्रार स्वर्ग में देव हुआ। दूसरी ओर पूर्वविदेह क्षेत्र के महाबल राजा ने भी संसार से विरक्त होकर संयम धारण किया और तपश्चर्या के फलस्वरूप वही सहस्रार स्वर्ग में देव रूप से उत्पन्न हुआ।
श्लोक 62 से 71 : सुप्रभ बलभद्र और पुरुषोत्तम नारायण का जन्म
सहस्रार स्वर्ग से च्युत होकर महाबल का जीव द्वारवती के राजा सोमप्रभ के यहाँ सुप्रभ नामक पुत्र रूप में जन्मा। वसुषेण का जीव उसी राजा की दूसरी रानी के यहाँ पुरुषोत्तम नामक पुत्र बना। दोनों अत्यन्त तेजस्वी, गुणवान और लोकप्रसिद्ध हुए। वे क्रमशः बलभद्र और नारायण के रूप में विख्यात हुए तथा दीर्घकाल तक राज्य और वैभव का उपभोग करते रहे। इसी समय पूर्वजन्म का चण्डशासन अनेक भवों के बाद वाराणसी का राजा मधुसूदन बना।
श्लोक 72 से 81 : मधुसूदन का वध और सुप्रभ का मोक्ष
मधुसूदन ने अहंकारवश सुप्रभ और पुरुषोत्तम से कर माँगा। दोनों भाइयों ने उसका प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। परिणामस्वरूप भीषण युद्ध हुआ। युद्ध में पुरुषोत्तम ने उसी चक्र से मधुसूदन का वध कर दिया जिसे मधुसूदन ने उसके विरुद्ध चलाया था। बाद में पुरुषोत्तम अपने हिंसक कर्मों के कारण नरक गया, जबकि उसके वियोग से दुःखी सुप्रभ ने दीक्षा लेकर साधना की और क्षपक श्रेणी प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त हुआ।
श्लोक 82 से 85: तीनों पात्रों के भव और कर्मफल का निष्कर्ष
पुरुषोत्तम के जीव ने वसुषेण राजा, देव और नारायण के रूप में जन्म लेकर अंततः नरकगति प्राप्त की। चण्डशासन अनेक भवों के बाद मधुसूदन बना और अधोगति को प्राप्त हुआ। इसके विपरीत महाबल राजा, देव और सुप्रभ बलभद्र के रूप में जन्म लेकर अंततः मोक्ष को प्राप्त हुआ। इस प्रकार एक ही प्रकार के सांसारिक सुख भोगने वाले दो व्यक्तियों में से एक मोक्ष और दूसरा नरक गया, जिससे स्पष्ट होता है कि जीव की गति उसके आचरण और प्रवृत्ति पर निर्भर करती है।
पर्व 61
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