राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 222 to 231
श्लोक ( Shlok ) 222 – 226
सोऽप्येवमब्रवीत्प्राप्तसम्यग्दर्शनलोचनाः । दानपूजाश्रतोपोषितादिभिः प्राप्तपुण्यकाः ॥ २२२ ॥प्रामुवन्ति सुखं स्वर्गे चापवर्गे च संयमात् । मिथ्याश्शश्च दानादिपुण्येन स्वर्गर्ज सुखम् ॥२२३ ॥सम्प्रामुवन्ति तत्रैते शममाहात्म्यतः पुनः । कालादिलब्धिमाश्रित्य स्वतो वा परतोऽपि वा ॥ २२४ ॥सद्धमेलाभयोग्याश्च भवन्त्यभ्यर्णमोचनाः । अन्ये तु भोगसंसक्ता गाढमिथ्यात्वशल्यकाः ॥ २२५ ॥हिंसा नृतान्यरैरामारत्यारम्भपरिग्रहैः । पापं सञ्चित्य संसारदुष्कूपे निपतन्ति ते ॥ २२६ ॥
उत्तरमें मुनिराज इस प्रकार कहने लगे कि जिन्होंने सम्यग्दर्शन-रूपी नेत्र प्राप्त कर लिये हैंऐसे पुरुष दान, पूजा, व्रत, उपवास आदिके द्वारा पुण्यबन्ध कर स्वर्गके सुख पाते हैं और संयम धारण कर मोक्षके सुख पाते हैं। यदि मिथ्या-दृष्टि जीव दानादि पुण्य करते हैं तो स्वर्ग-सम्बन्धी सुख प्राप्त करते हैं। वहाँ कितने ही मिथ्यादृष्टि जीवअपने शान्त परिणामोंके प्रभावसे कालादि लब्धियाँ पाकर स्वयमेव अथवा दूसरेके निमित्तसे समीचीन धर्मको प्राप्त होनेके योग्य हो जाते हैं। यह बात निकट कालमें मोक्ष प्राप्त करनेवाले मिध्यादृष्टि जीवोंकी है परन्तु जो तीव्र मिध्यादृष्टि निरन्तर भोगोंमें आसक्त रहकर हिंसा, झूठ, पर-धनहरण, पर-नारी-रमण, आरम्भ और परिग्रहके द्वारा पापका संचय करते हैं वे संसार-रूपी दुःखदायी कुएँ में गिरते हैं ।। २२२-२२६ ॥
“Those souls who have attained the vision of right faith (Samyagdarshana) accumulate merit (punya) through charity, worship, vows, and fasting, thereby enjoying the bliss of heaven. Furthermore, by practicing self-restraint (Samyama), they attain the ultimate bliss of liberation (Moksha). Even if souls with wrong faith (Mithya-drishti) perform meritorious deeds like charity, they do obtain the pleasures associated with heaven.
Among them, many wrong-believing souls—by the influence of their peaceful inclinations and upon attaining the ripe time and other spiritual capacities (Kaladi Labdhi)—become capable of achieving the true religion (Samyak Dharma), either spontaneously or through the guidance of another. This applies to those wrong-believing souls who are destined to attain liberation in the near future.
However, those intensely wrong-believing souls who remain perpetually attached to sensual pleasures and accumulate sin through violence, falsehood, stealing others’ wealth, adultery, worldly occupations (Arambha), and possessiveness (Parigraha), fall deep into the agonizing well of worldly existence (Samsara).” [222-226]
श्लोक ( Shlok ) 227 – 231
इति तद्वचनं श्रुत्वा बहवो धर्ममाचरन् । अथ सागरदत्ताख्यश्रेष्ठिना स्वायुषोऽवधौ ॥२२७ ॥परिपृष्टे मुनिश्वाह दिवसानिशदित्यसौ । तच्छूत्वा नगरं श्रेष्ठी प्रविश्याष्टाक्षिकीं मुदा ॥ २२८ ॥पूजां विधाय दत्वात्मपदं ज्येष्ठाय सूनवे । आपृछ्य बान्धवान् सर्वान् द्वाविंशतिदिनानि सः ॥ २२९ ॥सन्न्यस्य विधिवलोकमवापदमृताशिनाम् । अन्येधुर्नागदतोऽसौ छोभेनाद्येन चोदितः ॥ २३०॥ कुबेरदशमाहूय तव सारधनं पिता । किमदर्शयदित्येवं पृष्टवान् दुष्टचेतसा ॥ २३१ ॥
इस प्रकार मुनिराजके बचन सुनकर बहुत लोगोंने धर्म धारण कर लिया। इसके पश्चात् सेठ सागरदत ने अपनी, आयुकी अवधि पूछी सो मुनिराजने उसकी आयु तीस दिनकी बतलाई। यह सुनकर सेठने नगरमें प्रवेश किया और बड़े हर्षसे आष्टाह्निक पूजाकर अपना पद अपने बड़े पुत्रके लिए सौंप दिया । तदनन्तर समस्त भाई-बन्धुओंसे पूछकर उसने विधिपूर्वक बाईस दिनका संन्यास धारण किया और अन्त समयमें देव पद प्राप्त किया। किसी दूसरे दिन अनन्तानुबन्धी लोभसे प्रेरित हुए नागदत्तने कुबेरदत्तको बुलाकर दुर्भावनासे पूछा कि क्या पिताजी तुम्हें सारभूत-श्रेष्ठ धन दिखला गये हैं ? ।। २२७-२३१ ।।
Upon hearing these words of the great sage, many people embraced the path of righteousness (Dharma). After this, the merchant Sagardatta asked about the remaining duration of his life, to which the sage replied that his lifespan was only thirty days.Hearing this, the merchant returned to the city and, with great joy, performed the Ashtahnika worship (the eight-day grand worship). He then handed over his position and responsibilities to his eldest son. Thereafter, having taken permission from all his brothers and relatives, he ritually embraced the vow of Sannyasa (the ultimate vow of peaceful renunciation before death) for twenty-two days, and upon breathing his last, attained the status of a celestial being (Deva).On another day, driven by intense and deep-rooted greed (Anantanubandhi Lobha), Nagadatta called Kuberdatta and asked him with malicious intent, “Did father show you the best of his hidden, essential wealth before he passed away?” [227-231]
श्लोक 232 से 241
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221
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