आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
श्लोक 112 से 121 देवब्राह्मण की शुद्धता
कोई मिथ्यादृष्टि यदि भव्य को उलाहना दे कि वह मनुष्य ही है, तो वह उत्तर देता है कि जिनेंद्र उसका पिता और ज्ञान उसका गर्भ है। सम्यग्दर्शन, ज्ञान, और चारित्र उसकी शक्तियां हैं। वह बिना योनि के उत्पन्न होकर देवब्राह्मण है। उसका यज्ञोपवीत और व्रत शास्त्रोक्त चिह्न हैं। मिथ्यादृष्टि केवल मलिन सूत्र धारण करते हैं। जीव का जन्म और मरण दो प्रकार का होता है: शरीरजन्म-मरण और संस्कारजन्म-मरण। भव्य को संस्कारजन्म से द्विजपना प्राप्त होता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 39- Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
दीक्षां जैनीं प्रपन्नस्य जातः कोऽतिशयस्तव । यतोऽद्यापि मनुष्यस्त्वं पादचारी महीं स्पृशन् ॥११२॥
जैनी दीक्षा धारण करनेसे तुझे कौनसा अतिशय प्राप्त हो गया है? क्योंकि तू अब भी मनुष्य ही है और पृथिवी को स्पर्श करता हुआ पैरोंसे ही चलता है ।।११२।।
What extraordinary power hast thou gained by embracing the Jain monastic vow?For thou art still but a mortal, treading the earth with feet that touch the dust.112
श्लोक ( Shlok ) 113
इत्युपारूढसंरम्भमुपालब्धः स केनचित् । ददात्युत्तरमित्यस्मै वचोभिर्युक्तिपेशलैः ॥११३॥
इस प्रकार क्रोध धारणकर यदि कोई उलाहना दे तो उसके लिये युक्तिसे भरे हुए वचनोंसे इस प्रकार उत्तर दे ।॥११३॥
Should one, in a fit of anger, cast reproach upon thee,
then respond with words imbued with reason, thus.113
श्लोक ( Shlok ) 114
श्रूयतां भो द्विजम्मन्य त्वयाऽस्मद्दिव्यसम्भवः । जिनो “जनयिताऽस्माकं ज्ञानं गर्भोऽतिनिर्मलः ॥११४।।
हे अपने आपको द्विज माननेवाले, तू मेरा दिव्य जन्म सुन, श्री जिनेन्द्रदेव ही मेरा पिता है और ज्ञान ही अत्यन्त निर्मल गर्भ है ॥११४।।
O thou who deemest thyself twice-born, hearken unto the tale of my divine birth:The venerable Lord Jina is my father, and purest knowledge is the immaculate womb whence I sprang.114
श्लोक ( Shlok ) 115
‘तत्रार्हतीं त्रिधा भिन्नां शक्ति त्रैगुण्यसंश्रिताम् । स्वसात्कृत्य समुद्भूता वयं संस्कारजन्मना ॥११५॥
उस गर्भमें उपलब्धि, उपयोग और संस्कार इन तीन गुणोंके आश्रित रहनेवाली जो अरहन्तदेवसम्बन्धिनी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र ये तीन भिन्न भिन्न शक्तियां हैं उन्हें अपने अधीन कर हम संस्काररूपी जन्मसे उत्पन्न हुए हैं ।।११५।।
Within that sacred womb dwell three divine powers,anchored in attainment, awareness, and refinement—the right faith, right knowledge, and right conduct, each distinct and sovereign,yet all made subject to our command.Thus are we born through the noble birth of inner refinement.115
श्लोक ( Shlok ) 116
अयोनिसम्भवास्तेन देवा एव न मानुषाः । वयं वयमिवान्येऽपि सन्ति चेद् ब्रूहि तद्विधान् ॥११६॥
हम लोग बिना योनिसे उत्पन्न हुए हैं इसलिये देव ही हैं मनुष्य नहीं हैं, हमारे समान जो और भी हैं उन्हें भी तू देवब्राह्मण कह ।। ११६।।
We are not born of the womb—thus are we divine, not mortal men.
And those who are as we are, regard them too as divine Brāhmaṇas.116
श्लोक ( Shlok ) 117
स्वायम्भुवान्मुखाज्जाताः ततो देवद्विजा वयम् । व्रतचिह्न च नः सूत्रं पवित्रं सूत्रदर्शितम् ॥११७॥
हम लोग स्वयंभू के मुखसे उत्पन्न हुए हैं इसलिये देवब्राह्मण हैं और हमारे व्रतोंका चिह्न शास्त्रोंमें कहा यह पवित्र सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत है ।।११७।।
We are born from the very mouth of the Self-born Creator; therefore, we are divine Brāhmaṇas. The sacred thread — this yajñopavīta — is declared in the scriptures as the emblem of our vows and disciplines.117
श्लोक ( Shlok ) 118
पापसूत्रानुगा यूथ न द्विजा सूत्रकण्ठकाः । सन्मार्गकण्टकास्तीक्ष्णाः केवलं मलदूषिताः ॥११८॥
आप लोग तो गलेमें सूत्र धारणकर समीचीन मार्गमें तीक्ष्ण कण्टक बनते हुए पापरूप सूत्रके अनुसार चलनेवाले हैं, केवल मलसे दूषित हैं, द्विज नहीं हैं ।।११८॥
Though you wear the sacred thread about your neck, you walk the path of unrighteousness, becoming sharp thorns upon the noble way. You follow the thread of sin, stained only with impurity — you are not Dvijas, not twice-born in truth.118
श्लोक ( Shlok ) 119
शरीरजन्म संस्कारजन्म चेति द्विधा मतम् । जन्माङ्गिनां मृतिश्चैवं द्विधाम्नाता जिनागमे ॥११९॥
जीवोंका जन्म दो प्रकारका है एक तो शरीरजन्म और दूसरा संस्कार-जन्म । इसी प्रकार जैनशास्त्रोंमें जीवोंका मरण भी दो प्रकारका माना गया है ।। ११९।।
The birth of living beings is of two kinds — one is the birth of the body, and the other, the birth through sacred rites. In like manner, the Jain scriptures declare that death, too, is of two kinds.119
श्लोक ( Shlok ) 120
देहान्तरपरिप्राप्तिः पूर्वदेह्यरिक्षयात् । शरीरजन्म विज्ञेयं देहभाजां भवान्तरे ॥१२०॥
पहले शरीरका क्षय हो जानेसे दूसरी पर्याय में जो दूसरे शरीरकी प्राप्ति होती है उसे जीवोंका शरीरजन्म जानना चाहिये । ॥१२०॥
When the body perishes and the soul passes into another embodiment in a subsequent state of existence — this, verily, should be understood as the bodily birth of living beings.120
श्लोक ( Shlok ) 121
तथालब्धात्मलाभस्य पुनः संस्कारयोगतः । द्विजन्मतापरिप्राप्तिर्जन्म संस्कारजं स्मृतम् ॥१२१॥
इसी प्रकार संस्कारयोगसे जिसे पुनः आत्मलाभ प्राप्त हुआ है ऐसे पुरुष-को जो द्विजपनेकी प्राप्ति होना है वह संस्कारज अर्थात् संस्कारसे उत्पन्न हुआ जन्म कहलाता है ॥१२१॥
Likewise, when through the discipline of sacred rites one attains renewed self-realization, such a person is said to be reborn as a Dvija — a twice-born — for this is the birth brought forth through saṁskāra, the sanctifying rites.121
श्लोक 122 से 131
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
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