आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11
श्लोक 12 से 21 चक्ररत्न के रुकने पर विचार-विमर्श
सेनापतियों द्वारा चक्ररत्न के रुकने की सूचना मिलने पर भरत आश्चर्यचकित होकर विचार करते हैं कि उनकी अजेय गति वाला चक्र आज क्यों रुका। वे पुरोहित को बुलाकर गंभीर वचनों में कारण जानने का आदेश देते हैं। भरत की वाणी विजयलक्ष्मी की दूती-सी प्रतीत होती है। वे प्रश्न करते हैं कि सभी दिशाओं को जीतने वाला चक्र उनके अपने नगर के द्वार पर क्यों रुका, और क्या कोई शत्रु या द्वेषी उनके घर में ही मौजूद है। वे यह भी विचार करते हैं कि दुष्ट हृदय वाले लोग प्रायः महान पुरुषों की उन्नति से ईर्ष्या करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
अथवाद्यापि जेतव्यः पक्षः कोऽप्यस्ति चक्रिणः । चक्रस्खलनतः कैश्चिदित्थं तज्ज्ञैर्वितर्कितम् ॥१२॥
अथवा अबभी कोई चक्रवर्तीके जेतव्य पक्षमें हैं-जीतने योग्य शत्रु विद्यमान है इस प्रकार चक्रके रुक जानेसे चक्रके स्वरूपको जाननेवाले कितने ही लोग विचार कर रहे थे ।।१२।।
“Or perhaps there still remains an adversary worthy of conquest—one who aligns with the emperor’s victorious side? Thus, many who understood the nature of the Discus pondered deeply upon its sudden stillness.”12
श्लोक ( Shlok ) 13
सेनानीप्रमुखास्तावत् प्रभवे तन्न्यवेदयन् । तद्वार्ताऽऽकर्णनाच्चक्री किमप्यासीत्लविस्मयः ॥१३॥
सेनापति आदि प्रमुख लोगोंने यह बात चक्रवर्तीसे कही और उसके सुनते ही वे कुछ आश्चर्य करने लगे ।।१३।।
“The commanders and other leaders, upon hearing this, spoke to the emperor; and at once, he too was filled with wonder and contemplation.”13
श्लोक ( Shlok ) 14
अचिन्तयच्च किं नाम चक्रमप्रतिशासने । मयि स्थितेस्खलत्यद्य क्वचिदप्यस्खलद्गति ॥१४॥
वे विचार करने लगे कि जिसकी आज्ञा कहीं भी नहीं रुकती ऐसे मेरे रहते हुए भी, जिसकी गति कहीं भी नहीं रुकी ऐसा यह चक्ररत्न आज क्यों रुक रहा है ? ।।१४।॥
“They began to ponder, ‘Why, even in my presence, does this Discus Jewel—whose command never falters, whose motion knows no halt—remain still today?'”
श्लोक ( Shlok ) 15
सम्प्रधार्यमिदं तावदित्याहूय पुरोधसम् । धीरो धीरतरां वाचमित्युच्चैराजगो मनुः ॥१५।।
इस बातका विचार करना चाहिये यही सोचकर धीर वीर मनु ने पुरोहितको बुलाया और उससे नीचे लिखे हुए बहुत ही गम्भीर वचन कहे ।।१५।।
“Considering that this matter required deep reflection, the wise and valiant Manu summoned the priest and, with great gravity, uttered the profound words that follow.”15
श्लोक ( Shlok ) 16
वदनोऽस्य मुखाम्भोजाद् व्यक्ताकूता सरस्वती । निर्ययौ सदलङ्कारा शम्फलीव जयश्रियः ॥१६॥
कहते हुए भरत महाराजके मुखकमलसे स्पष्ट अभिप्रायवाली और उत्तम उत्तम अलंकारोंसे सजी हुई जो वाणी निकल रही थी वह ऐसी जान पड़ती थी मानो विजयलक्ष्मीकी दूती ही हो ।।१६।॥
“As he spoke, the words that flowed from the lotus-like mouth of King Bharata were imbued with clear intent and adorned with the finest of ornaments, seeming as though they were the very messenger of Goddess Victory herself.”16
श्लोक ( Shlok ) 17
चक्रमाक्रान्तदिक्चक्रम् अरिचक्रभयङ्करम् । कस्मान्नास्मत्पुरद्वारि क्रमते न्यक्कृतार्करुक् ।।१७।।
जिसने समस्त दिशाओंके समूहपर आक्रमण किया है जो शत्रुओंके समूहके लिये भयंकर है और जिसने सूर्यकी किरणोंका भी तिरस्कार कर दिया है ऐसा यह चक्र मेरे ही नगरके द्वारमें क्यों नहीं आगे बढ़ रहा है-प्रवेश कर रहा है ? ॥१७॥
This Discus, which has assailed all directions, which is terrifying to the very hosts of enemies, and which has even disregarded the rays of the sun—why does it not advance, why does it not enter the gates of my city?”17
श्लोक ( Shlok ) 18 –19
विश्वदिग्विजय पूर्वदक्षिणापरवार्द्धिषु । यदासीदस्खलवृत्ति रूप्याद्रेश्च गुहाद्वये ॥१८॥ चक्रं तदधुना कस्मात् स्खलत्यस्मद्गृहाङ्गणे । प्रायोऽस्माभिर्विरुद्धेन भवितव्यं जिगीषुणा ॥१९॥
जो समस्त दिशाओंको विजय करनेमें पूर्व-दक्षिण और पश्चिम समुद्रमें कहीं नहीं रुका, तथा जो विजयार्ध की दोनों गुफाओंमें नहीं रुका वही चक्र आज मेरे घरके आंगनमें क्यों रुक रहा है ? प्रायः मेरे साथ विरोध रखनेवाला कोई विजिगीषु (जीतकी इच्छा करनेवाला) ही होना चाहिये ।। १८-१९।।
“This Discus, which halted for none in its conquest of all directions, which ceased not even in the vast oceans of the East, South, and West, and which found no rest within the caves of the victorious half—why does it now come to a standstill in the courtyard of my own home? Surely, there must be some challenger, some ambitious conqueror, opposing me now.”18 –19
श्लोक ( Shlok ) 20
किमसाध्यो द्विषत्कश्चिदस्त्यस्मद्भक्तिगोचरे। सनाभिः कोऽपि कि वाऽस्मान् द्वेष्टि दुष्टान्तराशयः ॥२०ll
क्या मेरे उपभोगके योग्य क्षेत्र (राज्य) में ही कोई असाध्य शत्रु मौजूद है अथवा दुष्ट हृदयवाला मेरे गोत्र का ही कोई पुरुष मुझसे द्वेष करता है ।।२०।।
“Is there an insurmountable foe within the realm meant for my enjoyment, or is there some wicked-hearted man of my own lineage who harbors enmity toward me?”20
श्लोक ( Shlok ) 21
यः कोऽप्यकारणद्वेषी खलोऽस्मान्नाभिनन्दति । प्रायः स्खलन्ति चेतांसि महत्स्वपि दुरात्मनाम् ॥२१॥
अथवा बिना कारण ही द्वेष करनेवाला कोई दुष्ट पुरुष मेरा अभिनन्दन नहीं कर रहा है-मेरी वृद्धि नहीं सह रहा है सो ठीक ही है क्योंकि दुष्ट पुरुषोंके हृदय प्रायः कर बड़े आदमियोंपर भी बिगड़ जाते हैं ।॥२१॥
“Or perhaps there is some wicked man, devoid of reason, who refuses to honor me, who cannot bear my prosperity? It is to be expected, for the hearts of the wicked often turn sour even against the greatest of men.”21
श्लोक 22 से 31
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11
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