आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141
श्लोक 142 से 154 : भरत की प्रशस्ति
भरत ने एक चक्रवर्ती की प्रशस्ति मिटाकर वृषभाचल पर अपनी प्रशस्ति लिखी, जिसमें वे स्वयं को इक्ष्वाकु वंश का चंद्रमा, वृषभदेव का पुत्र, छह खंडों का शासक, और अठारह करोड़ घोड़ों व चौरासी लाख हाथियों का स्वामी बताया। उन्होंने अपनी कीर्ति को पर्वत पर स्थापित किया। देवों ने फूलों की वर्षा की, और नगाड़ों के शब्द गूँजे। उनकी प्रशस्ति में लेख, साक्षी (देव), और उपभोग क्षेत्र शामिल थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 32 – Shlok 142 to 154
श्लोक ( Shlok ) 142
असंख्य कल्पकोटीषु येऽतिक्रान्ता धराभुजः । तेषां नामभिराकीर्ण तं पश्यन् स सिसिष्मये ॥१४२॥
असंख्यात करोड़ कल्पोंमें जो चक्रवर्ती हुए थे उन सबके नामोंसे भरे हुए उस वृषभाचलको देखकर भरत को बहुत ही विस्मय हुआ ।। १४२ ।।
“Beholding Mount Vṛṣabha inscribed with the names of countless emperors who had reigned through innumerable crores of aeons, Bharata was seized with profound wonder.” ॥142॥
श्लोक ( Shlok ) 143
ततः किंचित् स्खलद् गर्वो विलक्षीभूय चक्रिराट् । अनन्यगासनामेनां न मेने भरतावनीम् ॥ १४३॥
तदनन्तर जिसका कुछ अभिमान दूर हुआ है ऐसे चक्रवर्ती ने आश्चर्यचकित होकर इस भरतक्षेत्रकी पृथिवीको अनन्यशासन अर्थात् जिसपर दूसरेका शासन न चलता हो ऐसा नहीं माना था । भावार्थ-वृषभाचलकी दीवालोंपर असंख्यात चक्रवर्तीयों के नाम लिखे हुए देखकर भरतका सब अभिमान नष्ट हो गया और उन्होंने स्वीकार किया कि इस भरतक्षेत्रकी पृथिवी पर मेरे समान अनेक शक्तिशाली राजा हो गये हैं ।।१४३।।
“Thereafter, the emperor—his pride now humbled—stood in astonishment and no longer deemed the land of Bhārata to be under his sole and unrivalled dominion. For upon seeing the countless names of emperors inscribed upon Mount Vṛṣabha, his arrogance dissolved, and he acknowledged: ‘Many mighty sovereigns, equal in glory to myself, have ruled this very earth of Bhārata-kṣetra.'” ॥143॥
श्लोक ( Shlok ) 144
स्वयं कस्यचिदेकस्य निरस्यन्नामशासनम् । स मेने निखिलं लोकं प्रायः स्वार्थपरायणम् ॥ १४४॥
चक्रवर्ती भरतने किसी एक चक्रवर्तीके नामकी प्रशस्तिको स्वयं-अपने हाथसे मिटाया और वैसा करते हुए उन्होंने प्रायः समस्त संसारको स्वार्थपरायण समझा ।।१४४।।
“Emperor Bharata, with his own hand, erased the eulogy of one among the countless sovereigns inscribed there—and in that very act, he came to regard nearly the entire world as driven by self-interest.” ॥144॥
श्लोक ( Shlok ) 145
अथ तत्र शिलापट्टे स्वहस्ततलनिस्तले । प्रशस्तिमित्युदात्तार्थ व्यलिखत् स यशोधनः ॥१४५॥
अथानन्तर-यश ही जिसका धन है ऐसे चक्रवर्तीने अपने हाथके तलभागके समान चिकने उस शिलापट्टगर नीचे लिखे अनुसार उत्कृष्ट अर्थसे भरी हुई प्रशस्ति लिखी ॥१४५॥
“Then the emperor—whose sole treasure was his renown—inscribed upon that smooth stone slab, polished like the palm of his own hand, a lofty eulogy rich with noble meaning, engraved by his own hand.” ॥145॥
श्लोक ( Shlok ) 146 –154
स्वस्तीक्ष्वाकु कुलव्योमतलप्रालेयदीधितिः । चातुरन्त महीभर्ता भरतः शातमातुरः ॥१४६॥श्रीमानानम्रनिःशेषखचरामरभूचरः । प्राजापत्यो मनुर्मान्यः शूरः शुचिरुदारधीः ॥ १४७॥ चरमाङ्गधरो धीरो धौरंयश्चक्रधारिणाम् । परिक्रान्तं धराचक्रं जिष्णुना येन दिग्जये ॥१४८॥यस्याष्टादशकोटयोऽश्वा जलस्थलविलङ्घिनः । लक्षाश्चतुरशीतिश्च मदेभा जयसाधने ॥१४९॥यस्य दिग्विजये विष्वग्बलरेणुभिरुत्थितैः । सदिङ्मुखं खमारुद्धं कपोतगलकर्बुरैः ॥१५०॥प्रसाधितदिशो यस्य यशः शशिकलामलम् । सुरैरसकृदुद्ङ्गीतं कुलक्षोणीध्रकुक्षिषु ॥ १५१॥ दिग्जये यस्य सैन्यानि विश्रान्तान्यधिदिक्तटम् । चक्रानुभ्रान्तितान्तानि क्रान्त्वा हैमवतीस्थलीः ॥१५२॥ नप्ता श्रीनाभिराजस्य पुत्रः श्रीवृषभेशिनः । षट् षण्डमण्डितामेनां यः स्म शास्त्यसिलां महीम् ॥ १५३॥मत्वाऽसौ गत्वरीं लक्ष्मीं जित्वरः सर्वभूभृताम् । जगद्विसृत्वरी’ कीर्त्तिमतिष्टिपदिहाचले ॥१५४॥
स्वस्ति श्री इक्ष्वाकु वशरूपी आकाशका चन्द्रमा और चारो दिशाओ की पृथिवी का स्वामी मै भरत हूँ, मैं अपनी माताके सौ पुत्रोमे-से एक बडा पुत्र हूँ, श्रीमान् हूँ, मैने समस्त विद्याधर देव और भूमिगोचरी राजाओको नम्रीभूत किया है, प्रजापति भगवान् वृषभदेव का पुत्र हूँ, मनु हूँ, मान्य हूँ, शूरवीर हूँ, पवित्र हूँ, उत्कृष्ट बुद्धिका धारक हूँ, चरमशरीरी हूँ, धीर वीर हूँ, चक्रवर्तीयो मे प्रथम हूँ और इसके सिवाय जिस विजयी ने दिग्विजय के समय समस्त पृथिवीमण्डल-की परिक्रमा दी है अर्थात् समस्त पृथिवीमण्डलपर आक्रमण किया है, जिसके जल और स्थल-मे चलनेवाले अठारह करोड़ घोड़े है, जिसकी विजयी सेनामे चौरासी लाख मदोन्मत्त हाथी सेनाकी धूलिसे समस्त दिशाओके साथ-साथ आकाश भर जाता है, समस्त दिशाओ को वश करनेवाले जिसका चन्द्रमाकी कलाओके समान निर्मल यश कुलपर्वतोके मध्यभागमे देव लोग बार-बार गाते हैं, दिग्विजयके समय चक्रके पीछे-पीछे चलनेसे थकी हुई जिसकी सेनाओने हिमवान् पर्वतकी तराईको उल्लंघन कर दिशाओके अन्तभागमे विश्राम लिया है, जो थी नाभिरायका पोत्र है, श्री वृषभदेवका पुत्र है, जिसने छह खण्डोसे सुशोभित इस समस्त पृथिवीका पालन किया है और जो समस्त राजाओंको जीतनेवाला है ऐसे मुझ भरत ने लक्ष्मीको नश्वर समझकर जगत में फैलनेवाली अपनी कीर्ति को इस पर्वतपर स्थापित किया है ।। १४६ – १५४ll
“Hail! I am Bharata—lord of the four quarters of the earth, moon of the celestial sky formed by the line of Ikṣvāku. I am the eldest among the hundred sons of my illustrious mother. Endowed with majesty, I have subdued all Vidyādharas, celestial beings, and earthly kings alike. I am the son of the divine progenitor, Lord Ṛṣabhadeva—Manu, revered, valiant, pure, and steadfast; the bearer of supreme intellect, yet clothed in this mortal frame. Among emperors I am the foremost.
Beyond this, I am the victorious one who, in the course of universal conquest, encircled the entire earth. My dominion is supported by eighteen crore horses that stride across land and sea, and by a resplendent army of eighty-four lakh elephants, whose maddened fury sends dust soaring to fill the skies and the horizons. My fame, radiant like the waxing moon, is sung by the celestials in the hallowed mountain ranges of my lineage.
My troops, weary from marching behind the divine discus in the conquest of all directions, reached the very fringes of the world, resting in the shadow of the Himalayan foothills. I am the grandson of the great Nābhirāya, the son of the illustrious Ṛṣabhadeva, the guardian of the entire earth adorned with her six continents, the vanquisher of all kings.
And I—Bharata—recognizing even the goddess Lakṣmī as transient, have chosen to enshrine upon this mountain not fleeting wealth, but the enduring glory of my name that shall resound across the world.” ॥146–154॥
श्लोक 155 से 171
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141
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