आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 |
श्लोक 132 से 141 विवाह और वर्णलाभ क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 17 से 18)
विवाह के बाद वर-वधू तीर्थ विहार कर घर में प्रवेश करते हैं और ऋतुकाल में संतान हेतु काम-सेवन करते हैं। वर्णलाभ क्रिया में विवाहित पुरुष को स्वतंत्र आजीविका के लिए पिता धन-धान्य और मकान देता है। सिद्ध प्रतिमा पूजन और श्रावकों की साक्षी में पिता पुत्र को धर्म और यश अर्जन की प्रेरणा देता है। पुत्र गृहस्थधर्म का पालन करता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
क्रान्त्वा स्वस्योचितां भूमि तीर्थभूमीर्विहृत्य च । स्वगृहं प्रविशेद् भूत्या परया तद्वधूवरम् ॥१३२॥
फिर अपने योग्य किसी देशमें भ्रमण कर अथवा तीर्थभूमिमें विहारकर वर और वधू बड़ी विभूतिके साथ अपने घरमें प्रवेश करें ।।१३२।।
Thereafter, the bride and groom—having sojourned in a fitting land or wandered through sacred pilgrim-places—should return and enter their home adorned with great honor and auspicious splendor. ॥132॥
श्लोक ( Shlok ) 133 – 134
विमुक्तकङ्कणं पश्चात् स्वगृहे शयनीयकम् । अधिशय्य यथाकालं भोगाङ्गैरुपलालिलम् ॥१३३॥सन्तानार्थमुतावेव कामसेवां मिथो भजेत् । शक्तिकालव्यपेक्षोऽयं क्रमोऽशक्तेष्वतोऽन्यथा ॥१३४।।इति विवाहक्रिया ।
तदनन्तर जिनका कंकण छोड़ दिया है, ऐसे वर और वधू अपने घरमें समया-नुसार भोगोपभोगके साधनोंसे सुशोभित शय्यापर शयन कर केवल संतान उत्पन्न करनेकी इच्छासे ऋतुकालमें ही परस्पर काम-सेवन करें। काम-सेवनका यह क्रम काल तथा शक्ति की अपेक्षा रखता है इसलिये शक्तिहीन पुरुषोंके लिये इससे विपरीत क्रम समझना चाहिये अर्थात् उन्हें ब्रह्मचर्यसे रहना चाहिये ।।१३३-१३४।। यह सत्रहवीं विवाह-क्रिया है।
Thereafter, the bride and groom, having cast off their kaṅkaṇa (sacred bracelets), should repose upon a well-adorned bed within their home, furnished suitably for enjoyment and comfort. They shall engage in conjugal union solely with the intention of begetting offspring, and only during the appropriate season (ṛtukāla). This act of union is governed by time and strength; therefore, those lacking vigor should adopt the contrary practice—that is, to observe Brahmacharya (celibacy).This is the seventeenth rite of marriage. ॥133–134॥
श्लोक ( Shlok ) 135
एवं कृविवाहस्य गार्हस्थ्यमनु तिष्ठतः । स्वधर्मानतिवृत्त्यर्थं वर्णलाभमथो ब्रुवे ॥१३५।।
इस प्रकार जिसका विवाह किया जा चुका है और जो गार्हस्थ्यधर्मका पालन कर रहा है ऐसा पुरुष अपने धर्मका उल्लंघन न करे इसलिये उसके अर्थ वर्णलाभ क्रियाको कहते हैं ॥१३५॥
Thus, one who has entered into wedlock and faithfully observes the duties of the householder (Gṛhastha Dharma)—such a man should not transgress his sacred obligations; this is called the Artha Varṇa-lābha rite. ॥135॥
श्लोक ( Shlok ) 136
‘ऊढभार्योऽप्ययं तावदस्वतन्त्रो गुरोगृहे। ततः स्वातन्त्र्यसिद्ध्यर्थ वर्णलाभोऽस्य वर्णितः ॥१३६॥
यद्यपि उसका विवाह हो चुका है तथापि वह जबतक पिताके घर रहता है तबतक अस्वतन्त्र ही है इसलिये उसको स्वतन्त्रता प्राप्त करनेके लिये यह वर्णलाभकी क्रिया कही गई है ।।१३६॥
hough he is married, so long as he dwells in his father’s house, he remains subject to another’s authority. Therefore, the rite of Varṇalābha is ordained to grant him independence and rightful autonomy. ॥136॥
श्लोक ( Shlok ) 137
गुरोरनुज्ञया लब्धधनधान्यादिसम्पदः । पृथवकृतालयस्यास्यै वृत्तिर्वर्णाप्तिरिष्यते ॥१३७॥
पिताकी आज्ञासे जिसे धनधान्य आदि सम्पदाएं प्राप्त हो चुकी हैं और मकान भी जिसे अलग मिल चुका है ऐसे पुरुषकी स्वतन्त्र आजीविका करने लगनेको वर्णलाभ कहते हैं ।॥ १३७।।
By the command of his father, when a man has acquired wealth, grains, and other possessions, and has been granted a separate dwelling, his commencement of an independent livelihood is called Varṇalābha. ॥137॥
श्लोक ( Shlok ) 138
तदापि पूर्ववत्सिद्धप्रतिमानर्चमग्रतः। कृत्वाऽस्योपासकान् मुख्यान् साक्षीकृत्यार्पयेद् धनम् ॥१३८॥धनमेतदुपादाय स्थित्वाऽस्मिन् स्वगृहे पृथक् । गृहिधर्मस्त्वया धार्यः कृत्स्नो दानादिलक्षणः ॥१३९॥यथाऽस्मत्पितुदत्तेन धनेनास्माभिरर्जितम् । यशो धर्मश्च तद्वत्त्वं यशोधर्मानुपार्जय ॥१४०॥इत्येवमनुशिष्यैनं वर्णलाभे नियोजयेत् । सदारः सोऽपि तं धर्म तथानुष्ठातुमर्हति ॥१४१॥ इति वर्णलाभक्रिया ।
इस क्रियाके समय भी पहले के समान सिद्ध प्रतिमाओंका पूजन कर पिता अन्य मुख्य श्रावकोंको साक्षी कर उनके सामने पुत्रको धन अर्पण करे तथा यह कहे कि यह धन लेकर तुम इस अपने घरमें पृथक रूपसे रहो। तुम्हें दान पूजा आदि समस्त गृहस्थधर्म पालन करते रहना चाहिये। जिस प्रकार हमारे पिताके द्वारा दिये हुए धनसे मैंने यश और धर्मका अर्जन किया है उसी प्रकार तुम भी यश और धर्मका अर्जन करो । इस प्रकार पुत्रको समझाकर पिता उसे वर्णलाभमें नियुक्त करे और सदाचारका पालन करता हुआ वह पुत्र भी पिताके धर्मका पालन करनेके लिये समर्थ होता है ।।१३८-१४१।। यह अठारहवीं वर्णलाभ क्रिया है।
At the time of this rite, as before, worship should be offered to the Siddha idols, and the father, calling upon the chief Śrāvakas as witnesses, shall present wealth to his son, saying:
“Take this wealth and live independently in your own household. You must observe all duties of the householder, including charity and worship. Just as I have gained fame and righteousness through the wealth bestowed by my father, so too must you acquire honor and dharma.”
Thus, by enlightening his son, the father appoints him in the rite of Varṇalābha. By practicing virtuous conduct, the son becomes capable of fulfilling the duties incumbent upon his father’s dharma.
This is the eighteenth rite, known as Varṇalābha. ॥138–141॥
श्लोक 142 से 151
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 |
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