आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok32 to 40
श्लोक ( Shlok ) 32
द्वितीय इव तस्यासीत् प्राणः सोऽनुचराग्रणीः । प्रियसेना ह्वयो बाल्यादा रभ्य कृतसङ्गतिः ॥३२॥
उस कुबेरकान्तका एक प्रियसेन नामका श्रेष्ठ मित्र था जो कि बाल्य अवस्थासे ही उसके साथ रहता था और उसके दूसरे प्राणोंके समान था ॥ ३२॥
“Kubera-kanta had a noble friend named Priyasena, who had been with him since childhood and was as dear to him as his very life.” ॥32॥
श्लोक ( Shlok ) 33 – 34
आजन्मनः कुमारस्य कामधेनुरनुत्तमा । मनोऽभिलषितं दुग्धे समस्तसुखसाधनम् ॥३३॥ क्षेत्रं निष्पादयत्येकं गन्धशालिमनारतम् । इक्षून मृतदेशीया नन्यत् स्थूलांस्तनुत्वचः ॥३४।।
एक अत्यन्त उत्तम कामधेनु कुमार कुबेरकान्त के जन्मसे ही लेकर उसकी इच्छाके अनुकूल सुखके सब साधनों को पूरा करती थी। वह कामधेनु प्रति दिन एक खेत तो सुगन्धित धान्यका उत्पन्न करती थी और एक खेत अमृतके समान मीठे, पतले छिलकेवाले बड़े बड़े ईखोंका उत्पन्न करती थी ॥३३-३४।॥
“From the very moment of Prince Kubera-kanta’s birth, there was an exceedingly marvelous cow of plenty, a veritable Kamadhenu, who fulfilled all means of happiness in accordance with his every desire. Each day, this wish-fulfilling cow would produce in one field fragrant grains, and in another field, large sugarcanes, sweet as nectar and sheathed in delicate, thin husks.” ॥33–34॥
श्लोक ( Shlok ) 35 – 36
स्वयं मनोहरं वीणा दन्ध्वनीति” निरन्तरम् । तत्स्नानसमये सर्वरोगस्वेदमलापहम् ॥ ३५।।सुगन्धिसलिलं गाङ्गं गम्भीरमधुर ध्वनन् । अम्भोधरो नभोभागादा सन्नादवमुञ्चति ॥३६॥
इसके सिवाय वही कामधेनु कुमारके सामने निरन्तर मनोहर वीणा बजाती थी, और उसी कामधेनुके प्रतापसे उसके स्नानके समय समीपवर्ती आकाशसे आकर मधुर तथा गम्भीर गर्जना करते हुए मेघ सब प्रकारके रोग, पसीना और मलको हरण करनेवाला गंगा नदीका सुगन्धित जल बरसाते थे ॥३५-३६॥
“Moreover, that very Kamadhenu would ceaselessly play a melodious veena before the prince. And by the power of her glory, at the time of his bath, clouds would descend from the nearby sky, resounding with sweet and deep thunder, and shower fragrant waters of the Ganga that cleansed all ailments, perspiration, and impurities.” ॥35–36॥
श्लोक ( Shlok ) 37
कल्पद्रुमद्वयं वस्त्रभूषणानि प्रयच्छति ।अन्नमानं ददात्यन्यद् द्वयं कल्पमहीरुहः ॥३७॥
उस कुमारके लिये एक कल्पवृक्ष वस्त्र देता था, एक आभूषण देता था, एक अन्न देता था और एक पेय पदार्थ देता था ।। ३७ ।।
“For that prince, a wish-fulfilling celestial tree provided him with garments, another bestowed ornaments, a third yielded nourishing grains, and yet another offered delightful beverages.” ॥37॥
श्लोक ( Shlok ) 38
एवमन्यच्च भोगाङ्गमशेषं देवनिर्मितम् । शश्वन्निर्विशतस्तस्य पूर्ण प्राथमिकं वयः ॥३८॥
इस प्रकार इनके सिवाय देवोंके दिये हुए और भी सब प्रकार-के भोगोंका निरन्तर उपभोग करते हुए उस कुमारकी पहली अवस्था पूर्ण हुई थी ॥३८॥
“In this manner, continually enjoying countless other pleasures granted by the gods, the prince’s early years passed to their completion.” ॥38॥
श्लोक ( Shlok ) 39 – 40
तद्वीक्ष्य ‘पितरावेष ‘किमेकामभिलाषुकः । किं बह्वीरिति चित्तेन सन्दिहानौ समाकुलौ ॥३९॥प्रियसेनं समाहूय तत्प्रश्नात्तन्मनोगतम् । अवादीधरतां मैत्री सैव या त्वेकचित्तता ॥४०॥
पहली अवस्थाको पूर्ण हुआ देखकर माता पिताको चिन्ता हुई कि यह एक कन्या चाहता है अथवा बहुत । उसी चिन्तासे वे कुछ संदेह कर रहे थे और कुछ व्याकुल भी हो रहे थे । उन्होंने कुबेरकान्तके मित्र प्रियसेनको बुलाकर उसके मनकी बात पूछी और उसके कहनेपर उन्होंने निश्चय कर लिया कि इसके ‘एक पत्नीव्रत है’- यह एक ही कन्या चाहता है, सो ठीक ही है क्योंकि दोनोंका एक चित्त हो जाना ही मित्रता कहाती है ॥ ३९-४०।।
“Seeing that their son’s early years had come to an end, his parents grew anxious, wondering whether he desired a single bride or many. Troubled by this uncertainty and overcome with concern, they summoned Kubera-kanta’s friend, Priyasena, and inquired into the prince’s heart. Upon hearing Priyasena’s reply, they became certain: ‘He is devoted to a single wife—he desires but one maiden.’ Truly, this is fitting, for the harmony of two hearts alone constitutes true friendship.” ॥39–40॥
श्लोक 41 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31