आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 133 to 141
श्लोक ( Shlok )133
कुबेरदयितस्यापि पिता प्राच्यः स सत्यकः । पाता गत्यन्तरस्थाश्च पुण्यात् स्निह्यन्ति देहिनः ॥१३३॥
कुबेरदयितका पूर्व जन्मका पिता सत्यक भी देव होकर उसकी रक्षा करता है सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यके प्रभावसे दूसरी गतिमें रहनेवाले जीव भी स्नेह करने लग जाते हैं ॥ १३३॥
Satyaka, the father of Kubera-dayita in his previous birth, has also been reborn as a deity and now watches over him. This is only natural, for by the power of virtue, beings—even when reborn in different realms—are drawn by bonds of affection to one another.॥133॥
श्लोक ( Shlok )134
भवदेवेन निर्दग्धं द्विजावेतौ वधूवरम् । सार्थेशो धारिणी चेह पत्युस्ते पितराविमौ ॥१३४॥
भवदेवने पूर्वोक्त वधू-वर (रतिवेगा और सुकान्त) को जला दिया था इसलिये वे दोनों ही मरकर ये कबूतर-कबूतरी हुए हैं। सेठ मेरुकदत्त औरउनकी स्त्री धारिणी यहां तेरे पति कुबेरकान्तके माता पिता हुए हैं ।॥१३४।।
Bhavadeva, in his previous birth, had burned the aforementioned bride and groom—Rativegā and Sukānta—to death; thus, upon dying, the two of them were reborn as this pair of dove and dove-hen. And the merchant Merukadatta, together with his wife Dhāriṇī, have now been born here as the parents of your husband, Kubera-Kānta.॥134॥
श्लोक ( Shlok )135 – 138
इत्युक्त्वा ‘सेदमप्याह ‘खगाचलसमीपगे । वसन्तौ चारणावद्रौ मुनी मलयकाञ्चने ॥१३५॥पूर्व वननिवेशे तौ भिक्षार्थ समुपागतौ । तव पुत्रसमुत्पत्तिमुपदिश्य गतौ ततः १३६।।अन्येद्युर्वसुधारादिहेतुभूतौ कपोतकौ । दृष्ट्वा सकरुणौ भिक्षामनादाय वनं गतौ ॥१३७।।गुर्वोर्गुरुत्वं युवयोः रुपयातौ तयोरिदम् । उपदेशात् समाकर्ण्य सर्वमुक्तं यथाश्रुतम् ॥१३८॥
इतना कहकर अमितमति यह भी कहने लगी कि विजयार्ध पर्वतके समीप मलयकांचन नामके पर्वतपर दो मुनिराज रहते थे, जब पूर्वजन्ममें शक्तिषेण सर्पसरोवरके समीप डेरा डालकर वनमें ठहरा हुआ था तब वे भिक्षा के लिये तेरे यहां आये थे और तेरे अंगुलियोंके इशारेसे पांच पुत्र तथा एक पुत्री होगी ऐसा कहकर चले गये थे। तदनन्तर रत्नवृष्टि आदि पंचाश्चर्योंके कारण स्वरूप वे मुनिराज इस जन्ममें भी किसी समय तेरे घर आये थे परन्तु कबूतर-कबूतरीको देखकर दया-युक्त हो बिना भिक्षा लिये ही वनको लौट गये थे। वे ही तेरे पिता और तेरे पतिके गुरु हुए हैं। उन्हीं के उपदेशसे मैंने यह सब सुनकर अनुक्रमसे कहा है ॥ १३५-१३८॥
Having said this, Amitamatī continued: “Near Mount Vijayārddha, on the golden slopes of Mount Malayakāñcana, there dwelt two venerable monks. In your former birth, when Shaktisheṇa had set camp by the Serpent Lake in the forest, these monks came to your dwelling for alms. By the gesture of your fingers, they foretold that you would have five sons and one daughter, and then they departed.
Later, due to miraculous portents such as showers of jewels and other wondrous signs, those same monks, in this very life, once came again to your home. But upon seeing the pair of dove and dove-hen, they were moved with compassion and, without accepting any alms, quietly returned to the forest. These two monks were none other than your father’s and your husband’s spiritual teachers. It is by their instruction that I have learned all these matters, and I have narrated them to you in their proper sequence.”॥135–138॥
श्लोक ( Shlok )139
इति ते ऽमितमत्युक्तकथावगमतत्पराः । स्वरूपं संसृतेः सम्यक् मुहुर्मुहुरभावयन् ॥१३९।।
इस प्रकार जो पुरुष अमितमति आर्यिकाके द्वारा कही हुई कथाके सुननेमें तल्लीन हो रहे थे वे संसारके सच्चे स्वरूप का बार-बार चिन्तवन करने लगे ।।१३९।।
Thus, those who had become absorbed in listening to the tale recounted by the venerable ascetic Amitamatī began to reflect deeply and repeatedly upon the true nature of the world and the cycle of existence.॥139॥
श्लोक ( Shlok )140 – 141
एवं प्रयाति कालेऽसौ प्रियदत्ता प्रसङ्गतः । यशस्वतीगुणवत्यौ युवाभ्यां केन हेतुना ॥१४०॥इयं दीक्षा गृहीतेति पप्रच्छोत्पन्नकौतुका । ते च तत्कारणं स्पष्टं यथावृत्तमवोचताम् ॥१४१॥
इस प्रकार कुछ समय व्यतीत होनेपर किसी दिन प्रियदत्ताने प्रसङ्ग पाकर यशस्वती और गुणवतीसे पूछा कि आप लोगोंने यह दीक्षा किस कारण ग्रहण की है? मुझे यह जाननेका कौतुक हो रहा है। तब उन दोनोंने स्पष्ट रूपसे अपनी दीक्षा-का कारण बतला दिया ॥१४०-१४१॥
In the course of time, on a certain day, Priyadattā found an opportunity and asked Yaśasvatī and Guṇavatī, “For what reason did you both embrace the path of renunciation? I am most eager to know.”Then the two of them plainly revealed the cause for which they had undertaken their vows of asceticism.॥140–141॥
श्लोक 142 से 151
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132