आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231
श्लोक 232 से 240 स्वराज्य, चक्रलाभ, और दिग्विजय क्रिया
स्वराज्य क्रिया में भगवान सम्राट बनते हैं और समुद्र पर्यंत पृथ्वी का शासन करते हैं। चक्रलाभ क्रिया में उन्हें निधियां और चक्ररत्न प्राप्त होता है, और प्रजा उनका अभिषेक सहित पूजन करती है। दिग्विजय क्रिया में भगवान चक्ररत्न को आगे रखकर समस्त पृथ्वी को जीतते हैं। यह क्रिया दिशाओं को जीतने के उनके प्रयास को दर्शाती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 232 to 240
श्लोक ( Shlok ) 232
स्वराज्यमधि राज्येऽभिषिक्तस्यास्य क्षितीश्वरैः । शासतः सार्णवामेनां क्षितिमप्रतिशासनाम् ॥२३२॥इति स्वराज्यम् ।
तत्पश्चात् समस्त राजाओंने राजाधिराज (सम्राट्) के पदपर जिनका अभिषेक किया है और जो दूसरे के शासनसे रहित इस समुद्र पर्यन्तकी पृथिवीका शासन करते हैं ऐसे उन भगवान्के स्वराज्यकी प्राप्ति होती है ॥ २३२।।यह तैतालीसवीं स्वराज्य क्रिया है।
Thereafter, he whom all the assembled kings anoint as Rājādhirāja—Emperor among monarchs—and who rules this earth bounded by the seas, unopposed by any other sovereign, verily attains to the divine sovereignty of that Supreme Lord.This is the forty-third act (kriyā) leading to sovereign attainment.232
श्लोक ( Shlok ) 233
चक्रलाभो भवेदस्य निधिरत्नसमुद्भवे । निजप्रकृतिभिः पूजा साभिषेकाऽधिराडिति ॥२३३॥इति चक्रलाभः ।
इसके बाद निधियों और रत्नोंकी प्राप्ति होनेपर उन्हें चक्रकी प्राप्ति होती है उस समय समस्त प्रजा उन्हें राजाधिराज मानकर उनकी अभिषेक सहित पूजा करती है ।॥ २३३॥ यह चक्रलाभ नामकी चवालीसवीं क्रिया है।
Thereafter, upon the attainment of treasures and precious gems, he obtains the divine Discus (Chakra). At that moment, the entire populace, recognizing him as the Rājādhirāja, worships him with full ceremonial anointment.
This is the forty-fourth act (kriyā), known as Chakralābha—the Gaining of the Discus. 233
श्लोक ( Shlok ) 234
दिशाञ्जयः स विज्ञेयो योऽस्य दिग्विजयोद्यमः । चक्ररत्नं पुरस्कृत्य जयतः सार्णवां महीम् ॥२३४।।इति दिशाञ्जयः ।
तदनन्तर चक्ररत्नको आगे कर समुद्रसहित समस्त पृथिवीको जीतने वाले उन भगवान्का जो दिशाओंको जीतने के लिये उद्योग करना है वह दिशांजय कहलाता है ॥ २३४।। यह दिशांजय नामकी पैंतालीसवीं क्रिया है।
Thereafter, advancing the divine Discus before him, he who sets forth to conquer the entire earth, even unto the oceans, performs the sacred endeavour to subdue all directions. This undertaking is known as Dishaṃjaya—the Victory over the Quarters.
This is the forty-fifth act (kriyā), called Dishaṃjaya.234
श्लोक ( Shlok ) 235
सिद्धदिग्विजयस्यास्य स्वपुरानुप्रवेशने । क्रिया चक्राभिषेकाह्वा साऽधुना सम्प्रकीर्त्यते ।।२३५।।
जब भगवान् दिग्विजय पूर्णकर अपने नगरमें प्रवेश करने लगते हैं तब उनके चक्रा-भिषेक नामकी क्रिया होती है। अब इस समय उसी क्रियाका वर्णन किया जाता है ॥२३५।।
When the Lord, having completed His conquest of the directions (Digvijaya), prepares to re-enter His city, the sacred rite known as the Chakrābhiṣeka—the Anointment of the Discus—is then performed.Now follows the description of that solemn rite.235
श्लोक ( Shlok ) 236
चक्ररत्नं पुरोधाय प्रविष्टः स्वं निकेतनम् । परार्ध्यविभवोपेतं स्वविमानापहासि यत् ॥२३६॥
वे भगवान् चक्र रत्नको आगे कर अपने उस राजभवन में प्रवेश करते, हैं जो कि बहुमूल्य वैभवसे सहित होता है और स्वर्गके विमानोंकी हँसी करता है ॥ २३६॥
The Lord, bearing the divine Discus before Him, enters His royal palace—resplendent with priceless riches and splendours, a marvel that mocks the very chariots of heaven.236
श्लोक ( Shlok ) 237
तत्र क्षणमिवासीने रम्ये प्रमदमण्डपं । चामरैर्वीज्यमानोऽयं सनिर्रझर इवाद्रिराट् ।।२३७॥
वहांपर वे मनोहर आनन्दमण्डपेमें क्षणभर विराजमान होते हैं उस समय उनपर चमर ढुलाये जाते हैं जिससे वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो निर्झरनों सहित सुमेरु पर्वत ही हो ।।२३७।।
There, within a delightful pavilion of joy, He rests for a moment in majesty. Attendants wave regal fans (chāmaras) over Him, so that He appears as the very Mount Sumeru itself—graced with flowing cascades.237
श्लोक ( Shlok ) 238
संपूज्य निधिरत्नानि ‘कृतचक्रमहोत्सवः । दत्वा किमिच्छकं दानं मान्यान् ‘सम्मान्य पार्थिवान् ॥२३८॥
उस समय वे निधियों और रत्नोंकी पूजाकर चक्र प्राप्त होनेका बड़ा भारी उत्सव करते हैं, किमिच्छक दान देते हैं और माननीय राजाओंका सन्मान करते हैं ।॥ २३८ ॥
At that time, He celebrates with great splendour the grand festival marking the attainment of the Discus, worshipping the Treasures and Jewels. He bestows abundant gifts upon all who seek them and honours the venerable kings with due reverence. 238
श्लोक ( Shlok ) 239
ततोऽभिषेकमाप्नोति पार्थिवैर्महितान्वयैः । नान्दीतूर्येषु गम्भीरं प्रध्वनत्सु सहस्रशः ॥२३९॥
तदनन्तर तुरही आदि हजारों मांगलिक बाजोंके गंभीर शब्द करते रहने पर वे उत्तम उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए राजाओंके द्वारा अभिषेकको प्राप्त होते हैं ।॥ २३९॥
Thereafter, amid the deep and auspicious sounds of thousands of trumpets and ceremonial instruments, He is anointed by kings born of noble and illustrious lineages.239
श्लोक ( Shlok ) 240
यथावदभिषिक्तस्य तिरीदारोपणं ततः । क्रियते पार्थिवैर्मुख्यैश्चतुर्भिः प्रथितान्वयैः ॥२४०॥
तदनन्तर-विधिपूर्वक जिनका अभिषेक किया गया है ऐसे उन भगवान्के मस्तकपर प्रसिद्ध प्रसिद्ध कुलमें उत्पन्न हुए मुख्य चार राजाओंके द्वारा मुकुट रक्खा जाता है ।। २४०।।
Thereafter, upon Him who has been duly anointed according to sacred rite, a crown is placed upon His head by four foremost kings—each born of renowned and noble lineages.240
श्लोक 241 से 251
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231
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