आदिपुराण 32 पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 32 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 32 (श्लोक 1 से 199)
चक्रवर्ती भरत अपनी सेना के साथ विजयार्थ पर्वत की तमिस्त्रा गुफा से हिमवान् पर्वत की ओर बढ़े। गुफा की अंधेरी गहराई में सूर्य-चंद्र मंडलों के प्रकाश से सेना ने प्रवेश किया और उन्मग्नजला-निमग्नजला नदियों को सिलावट रत्न द्वारा निर्मित पुल से पार किया। गुफा से निकलकर सेना ने म्लेच्छ खंडों को जीता, जहाँ चिलात और आवर्त राजाओं ने नागमुख-मेघमुख देवों की सहायता ली, पर जयकुमार ने उन्हें परास्त कर मेधेश्वर नाम पाया। सिन्धु देवी ने सिन्धुप्रपात पर भरत का अभिषेक किया। हिमवान् पर्वत पर पहुँचकर भरत ने वजूकाण्ड धनुष से बाण छोड़ा, जिससे हिमवान् देव प्रभावित हुआ और उनकी सेवा की। हिमवान् की शोभा, गंगा, सिन्धु, और रोहितास्या नदियों से सुशोभित थी। वृषभाचल पर भरत ने असंख्य चक्रवर्तियों के नाम देखे, अपना अभिमान त्यागा, और अपनी प्रशस्ति लिखी, जिसमें वे स्वयं को वृषभदेव का पुत्र और छह खंडों का शासक बताया। गंगापात पर गंगा देवी ने उनका अभिषेक किया और सिंहासन भेंट किया। उत्तर भरत क्षेत्र जीतकर भरत विजयार्थ पर्वत लौटे, जहाँ विद्याधर राजा नमि और विनमि ने धन-सामग्री भेंट की। भरत ने नमि की बहन सुभद्रा से विवाह किया। सेनापति ने म्लेच्छ खंड जीता, और भरत ने काण्डकप्रपात गुफा पार कर दक्षिण की ओर प्रस्थान किया। नाट्यमाल देव ने उनकी अगवानी की। भरत ने हिमवान्, म्लेच्छ राजाओं, और गंगा-सिन्धु देवियों को जीतकर छह खंडों की पृथिवी को पुण्य और चक्ररत्न के बल पर वश किया। यह खंड उनके दिग्विजय, पुण्य, और जिनमत के महत्व को दर्शाता है।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 32
श्लोक 1 से 12 : चक्रवर्ती भरत का गुफा की ओर प्रस्थान
दूसरे दिन, तैयार सेनापति चक्रवर्ती भरत के प्रस्थान की प्रतीक्षा करने लगे। हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकों से विजयार्थ पर्वत के वन भर गए। भरत, विजयी हाथी पर सवार, इंद्र सा शोभित होकर निकले। सेना संकुचित मार्ग से गुफा की ओर बढ़ी, जो तमिस्त्रा नामक थी। यह गुफा आठ योजन ऊँची, बारह योजन चौड़ी, वज्र किवाड़ों और रत्न चौखट से सुशोभित थी। सिन्धु नदी का प्रवाह इसे और शोभित करता था। सेनापति द्वारा पहले शांत की गई यह गुफा अनादि, गंभीर और प्रसूति गृह सा प्रतीत होती थी।
श्लोक 13 से 21 : गुफा में प्रवेश और मार्ग संशय
गुफा के गाढ़ अंधकार से सेना भयभीत हुई। सेनापति ने पुरोहित के साथ अंधकार दूर करने के लिए दीवारों पर काकिणी और चूड़ामणि रत्नों से सूर्य-चंद्र मंडल बनवाए। इनके प्रकाश से सेना गुफा के मध्य में प्रवेश कर गई। चक्ररत्न दीपक सा मार्ग प्रशस्त करता था। सेना दो भागों में सिन्धु नदी के जल का उपयोग कर चलती थी, पर दिशा संशय के कारण भ्रमित थी। कई पड़ाव पार कर भरत ने गुफा की आधी भूमि तय की और उन्मग्नजला-निमग्नजला नदियों के संगम पर पहुँचे।
श्लोक 22 से 31 : नदियों का पार करना
भरत ने निमग्नजला (नीचे ले जाने वाली) और उन्मग्नजला (ऊपर उछालने वाली) नदियों की विषमता देखी। स्थपति (सिलावट) रत्न ने इनके प्रवाह को वायु प्रभाव से समझा और पुल बाँधने का निर्णय लिया। उसने वनों से बड़े वृक्ष मँगवाए और मजबूत खंभों पर क्षणभर में पुल तैयार किया। सेना ने आनंद के साथ कोलाहल किया और नदियों को पार कर दूसरी ओर पहुँची।
श्लोक 32 से 41 : गुफा से बाहर निकलना
भरत ने हाथियों के साथ जलमय मार्ग से कठिन रास्ता तय किया और गुफा के उत्तर द्वार पर पहुँचे। हाथी सेना ने द्वार खोला, और भरत विजयार्थ पर्वत के वन में प्रवेश किए। गुफा से बाहर निकलते सैनिकों को दूसरा जन्म सा अनुभव हुआ। गुफा मानो सेना को उगल रही थी। वन की शाखाएँ और वायु सेना को आश्वासन दे रहे थे। सेनापति ने पश्चिम म्लेच्छ खंड जीता, और भरत मध्यम म्लेच्छ खंड की ओर बढ़े।
श्लोक 42 से 51 : म्लेच्छ खंड पर विजय का उद्यम
भरत की सेनाएँ व्यूह रचना के साथ शत्रु देशों को घेरती थीं, पर सूर्य की तरह लोगों को पीड़ित नहीं करती थीं। उन्होंने किलों और राजाओं को वश किया। चिलात और आवर्त नामक म्लेच्छ राजाओं ने अपनी सेना का पराभव सुना और युद्ध की तैयारी की। उनके मंत्रियों ने युद्ध से रोका, सुझाव दिया कि विजयार्थ पर्वत को पार करने वाला कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि देव या दिव्य प्रभाव वाला है।
श्लोक 52 से 61 : म्लेच्छ राजाओं की रणनीति
मंत्रियों ने किले का आश्रय लेने और नागमुख-मेघमुख देवों की सहायता लेने की सलाह दी। चिलात और आवर्त ने देवों का स्मरण किया। नागमुख देव ने बादल बनकर जलवृष्टि की, जो भरत की सेना को डुबाने लगी। पर छत्ररत्न और चर्मरत्न ने सेना को सुरक्षित रखा। चक्ररत्न के प्रकाश से तंबू में ठहरी सेना सात दिन तक पीड़ा रहित रही।
श्लोक 62 से 71 : जयकुमार का पराक्रम
सेना के तंबू में चार दरवाजे और रक्षा व्यवस्था थी। सिलावट रत्न ने तंबू, झोपड़ियाँ और रथ बनाए। कोलाहल सुन राजा क्रुद्ध हुए, पर चक्रवर्ती के आदेश पर गणबद्ध देवों और जयकुमार ने नागमुख-मेघमुख देवों को परास्त किया। जयकुमार बाण वर्षा करता बादल सा शोभित हुआ और मेधेश्वर नाम पाया।
श्लोक 72 से 81 : म्लेच्छ राजाओं का समर्पण
जयकुमार की गर्जना से मेघमुख देव परास्त हुए, और देवों ने उसका जयजयकार किया। भरत ने जयकुमार को मुख्य शूरवीर नियुक्त किया। नागमुख देवों के भागने से चिलात और आवर्त भयभीत होकर भरत के चरणों में प्रणाम कर दासता स्वीकार की। भरत ने सिन्धुप्रपात पर सिन्धु देवी से अभिषेक प्राप्त किया, जो सुवर्ण कलशों से जल अर्पित कर उनकी सेवा की।
श्लोक 82 से 91 : हिमवान् पर्वत की ओर प्रस्थान
सिन्धु देवी ने भरत को भद्रासन भेंट किया और विदा ली। भरत हिमवान् पर्वत के किनारों को जीतते हुए हिमवत् कूट पर पहुँचे। वहाँ उपवास, अस्त्र पूजा और डाभ शय्या पर शयन किया। भरत ने वजूकाण्ड धनुष पर वैशाख आसन लगाकर अमोघ बाण छोड़ा, जो हिमवत् कूट पर देव भवन को हिलाता हुआ पहुँचा। वहाँ का देव मस्तक झुकाकर भरत के समक्ष आया।
श्लोक 92 से 101 : हिमवान् देव का सत्कार
हिमवान् का देव भरत से बोला कि यह पर्वत साधारण पुरुषों से अजेय है, और उनका बाण ने देवों को कम्पित किया। उसने भरत के दिग्विजय की प्रशंसा की, उनका अभिषेक किया, गोशीर्ष चंदन भेंट किया, और अन्य देवों की ओर से नमस्कार अर्पित किया। देव ने भरत की प्रसन्नता और आज्ञा की याचना की, क्योंकि स्वामी की प्रसन्नता सेवकों की आजीविका है।
श्लोक 102 से 111 : हिमवान् देव का सत्कार और पर्वत की प्रशंसा
चक्रवर्ती भरत ने हिमवान् देव के वचनों की प्रशंसा कर सभी देवों का सत्कार किया और उन्हें विदा किया। किन्नर देव हिमवान् की विजय के मंगलगीत गा रहे थे। हिमवान् के वनों का शीतल वायु और स्थल कमलिनियों का रज भरत की सेवा कर रहा था। उनकी कीर्ति हिमवान् के लतागृहों में फैली। भरत ने पर्वत की ऊँचाई, विस्तार, और रत्नों की समानता को स्वयं से तुलनीय माना। पुरोहित ने हिमवान् की शोभा और भरत की उदारता की तुलना की, जिससे भरत संतुष्ट हुए।
श्लोक 112 से 121 : हिमवान् पर्वत की शोभा
हिमवान् की सुवर्णमयी श्रेणी रत्नों से सुशोभित थी, जो सौ योजन ऊँची थी। यह पर्वत लवण समुद्र में प्रवेश करता हुआ पृथिवी का दंड सा प्रतीत होता था। सिद्ध, विद्याधर, और नागकुमार इसके शिखरों पर निवास करते थे। लतागृहों में विद्याधर अपनी स्त्रियों के साथ टहलते थे। मणियों और देवांगनाओं के प्रतिबिंबों से किनारे चित्रमय थे। फूलों से हँसते वन देवों के बगीचों सा शोभित थे।
श्लोक 122 से 130 : हिमवान् की नदियाँ और दोष
हिमवान् पर्वत पद्म सरोवर से निकलने वाली गंगा, सिन्धु, और रोहितास्या नदियों को धारण करता था, जो उत्साह, मंत्र, और प्रभुत्व का प्रतीक थीं। इसके शिखर आकाश को कीलों से रोकते प्रतीत होते थे। देवों के आवास स्वर्ग सा शोभित थे। पर्वत का दोष यह था कि यह छोटे अगुरु वृक्षों को धारण करता था। यह भगवान् वृषभदेव की महिमा और विश्व-विस्तार से तुलनीय था। भरत ने इसकी प्रशंसा की और वृषभाचल देखने लौटे।
श्लोक 131 से 141 : वृषभाचल का दर्शन
वृषभाचल सौ योजन ऊँचा, स्फटिक मणियों से सुशोभित, और देवों-विद्याधरों का निवास था। भरत ने इसे अपने यश का प्रतिबिंब माना। वन का वायु उनका स्वागत करता था। उन्होंने विद्याधरों और किन्नरों के यश-गीत सुने। वृषभाचल की स्फटिक दीवारें विजयलक्ष्मी का दर्पण सी थीं। भरत ने वहाँ असंख्य चक्रवर्तियों के नाम देखे, जिससे उनका अभिमान नष्ट हुआ और संसार को स्वार्थपरायण समझा।
श्लोक 142 से 154 : भरत की प्रशस्ति
भरत ने एक चक्रवर्ती की प्रशस्ति मिटाकर वृषभाचल पर अपनी प्रशस्ति लिखी, जिसमें वे स्वयं को इक्ष्वाकु वंश का चंद्रमा, वृषभदेव का पुत्र, छह खंडों का शासक, और अठारह करोड़ घोड़ों व चौरासी लाख हाथियों का स्वामी बताया। उन्होंने अपनी कीर्ति को पर्वत पर स्थापित किया। देवों ने फूलों की वर्षा की, और नगाड़ों के शब्द गूँजे। उनकी प्रशस्ति में लेख, साक्षी (देव), और उपभोग क्षेत्र शामिल थे।
श्लोक 155 से 171 : गंगापात पर अभिषेक
भरत की प्रशस्ति चंद्रमा के चिह्नों सा मानी गई। देव और विद्याधर उनकी स्तुति और आशीर्वाद दे रहे थे। भरत गंगापात पहुँचे, जहाँ गंगा का जल हाथियों के मद से मिलकर फाग सा प्रतीत हुआ। गंगा देवी ने अर्घ देकर उनका सत्कार किया, सिंहासन पर बिठाकर गंगा जल से अभिषेक किया, और वस्त्राभूषण भेंट किए। उन्होंने रत्नमय सिंहासन देकर आशीर्वाद दिया और तिरोहित हो गई। भरत ने गंगा किनारे सेवा प्राप्त की।
श्लोक 172 से 181 : विजयार्थ पर्वत की ओर वापसी
गंगा किनारे के वनों का वायु, भीलों की स्त्रियों के केश, और मयूरों की पूँछ हिलाता हुआ भरत को सुख दे रहा था। पराजित देशों के राजा उनकी आराधना करते थे। भरत उत्तर भरत क्षेत्र को वश कर विजयार्थ पर्वत की तराई लौटे। उन्होंने सेनापति को पूर्व खंड जीतने की आज्ञा दी। छह माह तक वे वहाँ रहे। विद्याधर राजा नमि और विनमि धन-सामग्री लेकर दर्शन हेतु आए।
श्लोक 182 से 191 : सुभद्रा से विवाह और म्लेच्छ खंड की विजय
नमि और विनमि की भेंट से भरत की इच्छाएँ पूर्ण हुईं। उन्होंने नमि की बहन सुभद्रा से मंगलाचारपूर्वक विवाह किया, जिससे उनका जन्म सफल हुआ। सेनापति ने म्लेच्छ राजाओं को जीतकर जयलक्ष्मी के साथ दर्शन किए। भरत ने उनका सत्कार किया, म्लेच्छ राजाओं को विदा किया, और दक्षिण पृथिवी की ओर प्रस्थान किया। सेना ने काण्डकप्रपात गुफा पार की, और नाट्यमाल देव ने मंगलद्रव्यों से उनकी अगवानी की।
श्लोक 192 से 199 : दिग्विजय की पूर्णता
भरत ने नाट्यमाल देव का सत्कार कर विदा किया। विद्याधर आकाशमार्ग से उनकी परिचर्या करते थे। विजयार्थ पर्वत की गुफा से निकलकर भरत सूर्य सा उदित हुए। वायु उनकी सेवा करता था। सेनापति ने म्लेच्छ खंड जीता। भरत ने चिलात, आवर्त, हिमवान् देव, और गंगा-सिन्धु देवियों को जीता, दो भद्रासन प्राप्त किए, और छह खंडों की पृथिवी को पुण्य से वश किया।
पर्व 33
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द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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