आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
श्लोक 182 से 191 रात्रि में कामदेव का प्रभुत्व
रात्रि में स्त्रियां चंदन, मालाएं, और आभूषणों से सजी कल्पलताओं-सी महलों की छतों पर जाती हैं। चंद्रमा की किरणें कामदेव को प्रेरित करती हैं, जो विजयी शस्त्रों-सा स्त्रियों के मन में प्रवेश करता है। तरुणियां बिना मदिरा के काम से विह्वल हो जाती हैं। कुछ स्त्रियां पति की गोद में, कुछ सखी के वचनों से दुखी, और कुछ चकवी-सी तड़पती हैं। गीत और भ्रमरों की गुंजन कामदेव के पूर्वरंग-सी प्रतीत होती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 182 to 191
श्लोक ( Shlok ) 182
इति प्रदोषसमये जाते प्रस्पष्टतारके । सौधोत्सङ्गभुवो भेजुः पुरन्ध्रयः सह कामिभिः ॥१८२॥
इस प्रकार जिसमें तारागण स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं ऐसा सायंकालका समय होने-पर सब स्त्रियां अपने अपने पतियोंके साथ महलोंकी छतोंपर जा पहुँचीं ।॥१८२॥
Thus, as evening deepened and the stars shone clearly in the sky, all the women ascended to the terraces of their palaces, each in the company of her beloved.182
श्लोक ( Shlok ) 183
चन्दनद्रवसिक्ताङ्ग्यः स्रग्विण्यः सावतंसिकाः । लसदाभरणा रेजुस्तन्व्यः कल्पलता इव ॥१८३॥
जिनके समस्त शरीरपर घिसे हुए चन्दनका लेप लगा हुआ है, जो मालाएँ धारण किये हुई हैं, कानोंमें आभूषण पहने हैं और जिनके समस्त आभरण देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसी वे स्त्रियां कल्पलताओं के समान सुशोभित हो रही थीं ॥१८३॥
Adorned with sandal paste smeared over their graceful limbs, decked in garlands, their ears glistening with ornaments, and their jeweled adornments radiantly aglow—those women shone forth with beauty, like celestial kalpa-creepers in full bloom.183
श्लोक ( Shlok ) 184
इन्दुपादैः समुत्कर्षमगान्मकरकेतनः । तदोदन्वानिवोद्वेलो मनोवृत्तिषु कामिनाम् ॥१८४॥
उस समय चन्द्रमाकी किरणोंसे जिस प्रकार समुद्र लहराता हुआ वृद्धिको प्राप्त होने लगता है उसी प्रकार कामी मनुष्योंके मनमें काम उद्वेलित होता हुआ बढ़ रहा था ।। १८४।।
Just as the ocean begins to swell and surge under the influence of the moon’s rays, so too did the hearts of lovers stir and rise with longing, as desire swelled within them. 184
श्लोक ( Shlok ) 185
रमणा रमणीयाश्च चन्द्रपादाः सचन्दनाः । मदांश्च मदनारम्भमतन्वन् रमणीजने ॥१८५॥
सुन्दर पति, चन्द्रमाकी किरणें और चन्दन सहित मद ये सब मिलकर स्त्रियोंमें कामकी उत्पत्ति कर रहे थे ।। १८५।।
A handsome husband, the moon’s gentle rays, cool sandal-paste, and the sweetness of wine—all these together awakened desire in the hearts of women. 185
श्लोक ( Shlok ) 186
शशाङ्ककरजैत्रास्त्रै स्तर्जयन्निखिलं जगत् । नृपवल्लभिकावासान्मनोभूर भ्यषेणयन् ॥१८६॥
चन्द्रमाकी किरणेंरूपी विजयी शस्त्रों-के द्वारा समस्त जगत्को तिरस्कृत करता हुआ कामदेव राजाकी स्त्रियोंके निवासस्थानमें भी सेना सहित जा पहुँचा था ।॥ १८६॥
With the moon’s rays as his victorious weapons, King Kāma, scorning the entire world, had now marched—along with his army—into the very abodes of women.186
श्लोक ( Shlok ) 187
नास्वादि मदिरा स्वैरं नाजघ्रै न करेऽर्पिता । केवलं मदनावेशात्तरुण्यो भेजुरुत्कताम् ॥१८७।।
तरुण स्त्रियोंने न तो मदिराका स्वाद लिया, न इच्छा नुसार उसे सूंघा और न हाथमें ही लिया, केवल कामदेवके आवेशसे ही उत्कण्ठाको प्राप्त हो गई, अर्थात् कामसे विह्वल हो उठीं ।॥ १८७॥
The young women neither tasted the wine, nor inhaled its fragrance, nor even held it in their hands—yet, stirred by the mere presence of Love’s passion, they were seized with longing and overcome by desire.187
श्लोक ( Shlok ) 188
उत्सङ्गसङ्गिनी भर्तुः काचिन्मदविघूर्णिता । कामिनी मोहनास्त्रेण बतानङ्गेन तर्जिता ॥१८८॥
पतिकी गोदमें बैठी हुई और मदसे झुमटी हुई कोई स्त्री कामदेवके द्वारा मोहन अस्त्रसे ताड़ित की गई थी ।। १८८।।
Seated in her husband’s lap, swaying with the intoxication of wine, a woman was struck by Kāma’s mohana weapon—bewildered and overcome by the god of love.188
श्लोक ( Shlok ) 189
सखीवचनमुल्लङ्घय भङ्क्त्वा मानं निरर्गला । प्रयान्ती रमणावासं काप्यनङ्गेन धीरिता ॥१८९॥
कामदेवसे प्रेरित हुई कोई स्त्री सखीके वचन उल्लंघन कर तथा मान छोड़कर स्वतंत्र हो अपने पतिके निवासस्थान को जा रही थी ॥१८९।।
Stirred by the god of love, a woman cast aside her pride, defied her companion’s counsel, and, free of restraint, made her way to her husband’s chamber.189
श्लोक ( Shlok ) 190
शंफलीवचनैर्दूना काचित् पर्यश्रुलोचना । चक्रा ह्वेव भृशं तेपे नायाति प्राणवल्लभे ॥१९०।।
कोई स्त्री पतिके न आनेपर वापिस लौटी हुई दूतीके वचनोंसे दुखी होकर आंखोंसे आंसू छोड़ रही थी और चकवीके समान अत्यन्त विह्वल हो रही थी-तड़प रही थी ।।१९०।।
One woman, her husband yet to arrive, was weeping from the words of a returning messenger, her heart pierced with sorrow. Like a chakvī in torment, she writhed in anguish, overcome with yearning.190
श्लोक ( Shlok ) 191
शून्यगानस्वनैः स्त्रीणामलिज्याकलझङ्कृतैः । पूर्वरङ्गमिवानङ्गो रचयामास कामिनाम् ॥१९१॥
शून्य हृदयसे गाये हुए स्त्रियोंके सुन्दर गीतोंसे तथा भ्रमरपंक्तिके मनोहर भंकारोंसे कामदेव कामी पुरुषों के लिये पूर्वरङ्ग अर्थात् नाटकके प्रारम्भमें होनेवाला एक अंग विशेष ही मानो बना रहा था । भावार्थ-उस समय स्त्रियां पतियोंकी प्राप्तिके लिये बेसुध होकर गा रही थीं और उड़ते हुए भ्रमरोंकी गुंजार फैल रही थी जिससे ऐसा मालूम होता था मानो कामदेवरूपी नट कामक्रीड़ारूप नाटकके पहले होनेवाले संगीत विशेष ही दिखला रहा हो । नाटकके पहले जो मंगल-संगीत होता है उसे पूर्वरङ्ग कहते हैं ॥१९१॥
The melodious songs sung by women with hearts emptied of all else, along with the sweet hum of the bees in flight, seemed to compose a prelude—a special opening act—to the grand drama of Kāma, the god of love, for the eager men.
Meaning: At that moment, the women sang with rapt devotion, longing for their husbands’ return, while the buzzing bees filled the air with their enchanting chorus—together creating a divine overture, as if Kāma himself were presenting the auspicious prelude (pūrvaranga) to the play of love’s passionate enactment. 191
श्लोक 192 से 201
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
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