आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 81 स्वप्नों का फल (भाग 2)
(8) मध्य में सूखा तालाब: धर्म आर्यखंड से हटकर म्लेच्छ खंडों में रहेगा। (9) धूल से मलिन रत्न: पंचम काल में ऋद्धिधारी मुनि नहीं होंगे। (10) नैवेद्य खाता कुत्ता: व्रतरहित ब्राह्मण सत्कार पाएंगे। (11) तरुण बैल: लोग केवल तरुण अवस्था में मुनिपद ग्रहण करेंगे। (12) मंडल युक्त चंद्रमा: मुनियों में अवधि और मनःपर्यय ज्ञान नहीं होगा। (13) मिलते हुए बैल: मुनि एक साथ रहेंगे, अकेले विहार नहीं करेंगे। (14) मेघाच्छादित सूर्य: केवलज्ञान का उदय नहीं होगा। (15) सूखा वृक्ष: चारित्र भ्रष्ट होगा। (16) जीर्ण पत्ते: महाऔषधियों का रस नष्ट होगा। ये स्वप्न पंचम काल में धर्म के हास को दर्शाते हैं। भरत को विघ्न शांति के लिए धर्म में बुद्धि लगाने की सलाह दी गई।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 41- Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
शुष्कमध्यतडागस्य पर्यन्तेऽम्बुस्थितीक्षणात् । प्रच्युत्यार्यनिवासात् स्याद्धर्मः प्रत्यन्तवासिषु ॥७२॥
जिसका मध्यभाग सूखा हुआ है ऐसे तालाबके चारों ओर पानी भरा हुआ देखनेसे प्रकट होता है कि धर्म आर्यखण्डसे हटकर प्रत्यन्तवासी-म्लेच्छ खण्डोंमें ही रह जायगा ।॥७२॥
Beholding a pond encircled by water though its central bed lies parched and dry—this portends that Dharma shall recede from the noble land of Āryāvarta and dwell only in the distant, outlying regions inhabited by the mlecchas. ॥72॥
श्लोक ( Shlok ) 73
पांसु धूसररत्नौधनि ध्यानादृद्धिसत्तमाः । नैव प्रादुर्भविष्यन्ति मुनयः पञ्चमे युगे ॥७३॥
धूलिसे मलिन हुए रत्नोंकी राशिके देखनेसे यह जान पड़ता है कि पंचमकालमें ऋद्धिधारी उत्तम मुनि नहीं होंगे ।। ७३।।
The sight of heaps of jewels sullied by dust reveals that in the Fifth Era, there shall be no exalted ascetic possessed of miraculous powers. ॥73॥
श्लोक ( Shlok ) 74
शुनोऽर्चितस्य सत्कारैश्वरुभाजनदर्शनात् । गुणवत्पात्रसत्कारमाप्स्यन्त्यव्रतिनो द्विजाः ॥७४।।
आदर-सत्कारसे जिसकी पूजा कीगई है ऐसे कुत्तेको नैवेद्य खाते हुए देखनेसे मालूम होता है कि व्रतरहित ब्राह्मण गुणी पात्रोंके समान सत्कार पायेंगे ॥ ७४।।
Beholding a dog, who has been honoured and worshipped, partaking of consecrated offerings—this signifies that in times to come, Brahmins devoid of vows shall be revered like the truly virtuous and worthy. ॥74॥
श्लोक ( Shlok ) 75
तरुणस्य वृषस्योच्चैर्नर्दतो विहृतीक्षणात् । तारुण्य एव श्रामण्ये स्थास्यन्ति न दशान्तरे ॥७५॥
ऊंचे स्वरसे शब्द करते हुए तरुण बैलका विहार देखनेसे सूचित होता है कि लोग तरुण अवस्थामें ही मुनिपदमें ठहर सकेंगे, अन्य अवस्थामें नहीं ।॥७५॥
The sight of a young bull roaming about, bellowing in a loud voice, signifies that men shall attain the state of monkhood only in their youth, and not in any other stage of life. ॥75॥
श्लोक ( Shlok ) 76
परिवेषोपरक्तस्य श्वेतभानोर्निशामनात् । नोत्पत्स्यते” तपोभृत्सु समनःपर्ययोऽवधिः ॥७६॥
परि-मण्डलसे घिरे हुए चन्द्रमाके देखनेसे यह जान पड़ता है कि पंचमकालके मुनियोंमें अवधिज्ञान और मनःपर्यय ज्ञान नहीं होगा ।। ७६।।
The vision of the moon encircled by a halo reveals that in the Fifth Era, the monks shall be bereft of avadhi-jñāna (clairvoyance) and manaḥparyāya-jñāna (telepathy). ॥76॥
श्लोक ( Shlok ) 77
अन्योन्यं सह सम्भूय वृषयोर्गमनेक्षणात् । वर्त्यन्ति मुनयः साहचर्यान्नेकविहारिणः ॥७७॥
परस्पर मिलकर जाते हुए दो बैलोंके देखनेसे यह सूचित होता है कि पंचमकालमें मुनिजन साथ साथ रहेंगे, अकेले विहार करनेवाले नहीं होंगे ॥७७॥
The sight of two bulls walking together signifies that in the Fifth Era, monks shall dwell in companionship, and solitary wanderers shall no longer be found. ॥77॥
श्लोक ( Shlok ) 78
घनावरणरुद्धस्य दर्शनादंशुमालिनः । केवलार्कोदयः प्रायों न भवेत् पञ्चमे युगे ॥७८॥
मेवोंके आवरणसे रुके हुए सूर्यके देखनेसे यह मालूम होता है कि पंचमकालमें प्रायः केवल-ज्ञानरूपी सूर्यका उदय नहीं होगा ।। ७८ ।।
Beholding the sun obscured by clouds or haze reveals that in the Fifth Era, the radiant sun of kevala-jñāna—perfect knowledge—shall scarcely arise. ॥78॥
श्लोक ( Shlok ) 79
पुंसां स्त्रीणां च चारित्रच्युतिः शुष्कद्रुमेक्षणात् । महौषधिरसोच्छेदो जीर्णपर्णावलोकनात् ॥७९॥
सूखा वृक्ष देखनेसे सूचित होता है कि स्त्री-पुरुषों-का चारित्र भ्रष्ट हो जायगा और जीर्ण पत्तोंके देखनेसे मालूम होता है कि महाऔषधियोंका रस नष्ट हो जायगा ॥७९॥
The sight of a withered tree foretells the moral decay of both men and women; and the vision of shrivelled leaves reveals that the vital essence of great medicinal herbs shall be lost. ॥79॥
श्लोक ( Shlok ) 80
स्वप्नाने वंफलानेतान् विद्धि दूरविपाकिनः । नाद्य दोषस्ततः कोऽपि फलमेषां युगान्तरे ॥८०
ऐसा फल देनेवाले इन स्वप्नोंको तू दूरविपाकी अर्थात् बहुत समय बाद फल देनेवाले समझ इसलिये इनसे इस समय कोई दोष नहीं होगा, इनका फल पञ्चम-कालमें होगा ॥८०॥
Know these dreams, though bearing such ominous fruit, to be dūra-vipāki—ripening only after a long time; thus, they bring no present harm, for their fruition shall come to pass in the Fifth Era alone. ॥80॥
श्लोक ( Shlok ) 81
इति स्वप्नफलान्यस्माद् बुध्वा वत्स यथा तथा। धर्मे मति दृढं धत्स्व विश्वविघ्नोपशान्तये ॥८१॥
हे वत्स, इस प्रकार मुझसे इन स्वप्नोंका यथार्थ फल जानकर तू समस्त विघ्नोंकी शान्तिके लिये धर्ममें अपनी बुद्धि कर ॥८१॥
O dear child, having thus heard from me the true import of these dreams, direct thy mind steadfastly toward Dharma, that all obstacles may be pacified. ॥81॥
श्लोक 82 से 91
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
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