आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 34 – Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
स्वत्प्रणामानुरक्तानां त्वत्प्रसादाभिकाङक्षिणाम्। त्वद्वचः किङ्कराणां नो यद्वा तद्वाऽस्तु नापरम् ॥१०२॥
आपको प्रणाम करने में तत्पर, आपके प्रसन्नता को चाहनेवाले और आपके वचनों के किंकर हम लोगों का चाहे जो हो परन्तु हम लोग और किसी की उपासना नहीं करना चाहते हैं ।॥१०२॥
Ever eager to bow before You, ever yearning for Your favor, ever obedient to Your command—we, whatever may befall us, seek not the worship of any other. Our hearts know no refuge but You alone.Verse 102
श्लोक ( Shlok ) 103
इति स्थिते प्रणामार्थ भरतोऽस्माञ्जुहूषति” । तन्नात्र कारणं विद्मः किं मदः किन्नु मत्सरः ॥१०३॥
ऐसा होनेपर भी भरत हम लोगोंको प्रणाम करने के लिये बुलाता है सो इस विषयमें उसका मद कारण है अथवा मात्सर्य यह हम लोग कुछ नहीं जानते ।। १०३॥
Even so, Bharata summons us to offer obeisance unto him. Whether this springs from pride or from envy—we know not. The cause of his demand lies hidden from our understanding.Verse 103
श्लोक ( Shlok ) 104
युष्मत्प्रणमनाभ्यासरसदुर्ललितं शिरः । नान्यप्रणमने देव धृतिं बध्नाति जातु नः ॥१०४॥
हे देव, जो आपको प्रणाम करनेके अभ्यास के रस से मस्त हो रहा है ऐसा यह हमारा शिर किसी अन्यको प्रणाम करनेमें संतोष प्राप्त नहीं कर रहा है ।।१०४।।
O Lord, this head of ours—immersed in the rapture born of the practice of bowing to You—finds no joy, no contentment, in bowing before another.Verse 104
श्लोक ( Shlok ) 105
किमम्भोजरजःपुञ्जपिञ्जरं वारि मानसे । निषेव्य राजहंसोऽयं रमतेऽन्यसरोजले ॥१०५॥
क्या यह राजहंस मानसरोवर में कमलोंकी पराग की समूह से पीले हुए जलकी सेवा कर किसी अन्य तालाब के जल की सेवा करता है? अर्थात् नहीं करता है ? ॥१०५।।
Does the royal swan, its plumage tinged golden by the pollen of lotuses in the sacred lake of Mānasa, stoop to serve the waters of any other mere pond? Surely not.Verse 105
श्लोक ( Shlok ) 106
किमप्सरः शिरोजान्त सुमनोगन्ध लालितः । तुम्बीवनान्त मभ्येति प्राणान्तेऽपि मधुव्रतः ॥१०६॥
क्या अप्सराओं के केशोंमें लगे हुए फूलोंकी सुगन्धसे संतुष्ट हुआ भ्रमर प्राण जानेपर भी तूंबीके वनमें जाता है अर्थात् नहीं जाता है ।॥ १०६ ॥
Does the bee, intoxicated by the fragrance of blossoms adorning the tresses of celestial nymphs, ever wander to the wild gourds of the wasteland—even at the cost of its life? Surely not.Verse 106
श्लोक ( Shlok ) 107
मुक्ताफलाच्छमापाय गगनाम्बुनवाम्बुदात् । शुष्यत्सरोऽम्बु किं वाञ्छेदुदन्यन्नपि चातकः ॥१०७॥
अथवा जो चातक नवीन मेघ से गिरते हुए मोती के समान स्वच्छ आकाशगत जल को पी चुका है क्या वह प्यासा होकर भी सूखते हुए सरोवर के जलको पीना चाहेगा ? अर्थात् नहीं ॥ १०७॥
r shall the chātaka bird, having once tasted the crystal-pure water that falls like pearls from newly-formed rainclouds in the open sky, ever turn—though parched—to drink from the drying waters of a pond? Surely not.Verse 107
श्लोक ( Shlok ) 108
इति युष्मत्पदाब्जन्म “रजोरञ्जितमस्तकाः । प्रणन्तुमसदाप्तानामिहामुत्र च नेश्महे ॥१०८॥
इस प्रकार आपके चरणकमलोंकी परागसे जिनके मस्तक रंग रहे हैं ऐसे हम लोग इस लोक तथा परलोक-दोनों ही लोकोंमें आप्तभिन्न देव और मनुष्यों को प्रणाम करने के लिये समर्थ नहीं हैं ।॥ १०८॥
Thus, our foreheads, already anointed with the pollen of Your lotus feet, are incapable—whether in this world or the next—of bowing before gods or men who are estranged from You.Verse 108
श्लोक ( Shlok ) 109
परप्रणामविमुखीं भयसङ्गविर्वाजताम् । वीरदीक्षां वयं धर्तु भवत्पाश्र्वमुपागताः ॥१०९॥
जिसमें किसी अन्यको प्रणाम नहीं करना पड़ता, और जो भयके सम्बन्धसे रहित है ऐसी वीरदीक्षाको धारण करनेके लिये हम लोग आपके समीप आये हुए हैं ।॥ १०९ ॥
We have come unto You to receive that heroic initiation which demands obeisance to none other, and which stands untouched by all fear.Verse 109
श्लोक ( Shlok ) 110
तद्देव कथयास्माकं हितं पथ्यं च वर्त्म यत्। येनेहामुत्र च स्याम त्वद्भक्तिदृढ़वासनाः ॥११०॥
इसलिये हे देव, जो मार्ग हित करनेवाला और सुख पहुंचाने वाला हो वह हम लोगोंको कहिये जिससे इस लोक तथा परलोक दोनों ही लोकोंमें हम लोगों की वासना आपकी भक्तिमें दृढ हो जावे ।। ११०॥
Therefore, O Lord, reveal unto us the path that leads to true welfare and lasting bliss—so that in this world and the next, our hearts may be firmly bound in unwavering devotion unto You.Verse 110
श्लोक ( Shlok ) 111
परप्रणामसञ्जातमानभङ्गभयातिगाम् । पदवीं तावकीं देव भवेमहि भवे भवे ॥१११॥
हे देव, जो दूसरोंको प्रणाम करनेसे उत्पन्न हुए मानभङ्गके भयसे दूर रहती है ऐसी आपकी पदवीको हम लोग भवभवमें प्राप्त होते रहें ।॥१११॥
O Lord, may we, in every birth, attain that exalted station of Yours—untouched by the fear of dishonor that arises from bowing to another.Verse 111
श्लोक 112 से 121
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
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