आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31 धर्म और शुद्धि के लक्षण
वेद, पुराण, और धर्मशास्त्र वही हैं, जो हिंसा का निषेध करते हैं। हिंसा का उपदेश देने वाले ग्रंथ धूर्तों के रचित हैं। चारित्र पापकर्मों से विरक्ति है, जो देवपूजा आदि छह कर्मों में प्रकट होता है। गर्भाधान से निर्वाण तक की क्रियाएं ही शुद्ध हैं। मंत्र, देवता, लिंग, और आहार की शुद्धि अहिंसा और दया पर आधारित है। हिंसा करने वाले मंत्र, देवता, और मांसाहारी आहार दुष्ट हैं। कामशुद्धि जितेंद्रिय मुनियों या संतोषी गृहस्थों में होती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 39- Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
श्रुतं सुविहितं वेदो द्वादशाङ्गमकल्मषम् । हिंसोपदेशि यद्वाक्यं न वेदोऽसौ कृतान्तवाक् ॥२२॥
जिसके बारह अंग हैं, जो निर्दोष है और जिसमें श्रेष्ठ आचरणोंका विधान है ऐसा शास्त्र ही वेद कहलाता है, जो हिंसाका उपदेश देनेवाला वाक्य है वह वेद नहीं है उसे तो यमराजका वाक्य ही समझना चाहिये ।। २२ ।।
That scripture which comprises twelve limbs, is faultless, and enshrines the highest codes of conduct—such a text alone is rightly called the Veda.A verse that teaches violence is no Veda; it should rather be deemed the utterance of Yama, the lord of death.22
श्लोक ( Shlok ) 23
पुराणं धर्मशास्त्रं च ‘तत्स्याद् वधनिषेधि यत् । वधोपदेशि यत्तत्तु ज्ञेयं धूर्तप्रणेतृकम् ॥२३॥
पुराण और धर्मशास्त्र भी वही हो सकता है जो हिंसाका निषेध करनेवाला है। इसके विपरीत जो पुराण अथवा धर्मशास्त्र हिंसाका उपदेश देते हैं उन्हें धूर्तोंका बनाया हुआ समझना चाहिये ।।२३।।
Only that Purāṇa and Dharmaśāstra which forbids violence can be deemed authentic;those Purāṇas or Dharmaśāstras that preach violence ought to be regarded as fabrications of the deceitful.23
श्लोक ( Shlok ) 24
सावद्यविरतिर्वृत्तमार्यषट्कर्मलक्षणम् । “चातुराश्रम्यवृत्तं तु परोक्तमसदञ्जसा ॥२४॥
पापारम्भके कार्योंसे विरक्त होना चारित्र कहलाता है। वह चारित्र आर्य पुरुषोंके करने योग्य देवपूजा आदि छह कर्मरूप है। इसके सिवाय अन्य लोगोंने जो ब्रह्मचर्य आदि चार आश्रमों का चारित्र निरूपण किया है वह वास्तवमें बुरा है ।। २४।।
Detachment from sinful actions is known as cāritra—right conduct. This conduct, worthy of noble souls, takes the form of six sacred duties such as worship of the divine.Apart from this, the disciplines defined by others under the four āśramas, such as brahmacarya, are in truth misguided and impure.
श्लोक ( Shlok ) 25
क्रियागर्भादिका यास्ता निर्वाणान्ताः परोदिताः । आधानादिश्मशानान्ता न ताः सम्यक्क्रिया मताः ॥२५।।
क्रियाएं जो गर्भाधानसे लेकर निर्वाणपर्यन्त पहले कही जा चुकी हैं वे ही समझनी चाहिये, इनके सिवाय गर्भसे मरणपर्यन्त जो क्रियाएं अन्य लोगोंने कही हैं वे ठीक नहीं मानी जा सकतीं ।॥ २५॥
The rites previously spoken of—from conception to liberation—alone are to be understood as authentic.All other rites, prescribed by others from birth to death, are not to be regarded as valid or true. 25
श्लोक ( Shlok ) 26
मन्त्रास्त एव धर्म्याः स्युर्ये क्रियासु नियोजिताः । दुर्मन्त्रास्तेऽत्र विज्ञेया ये युक्ताः प्राणिमारणे ॥२६॥
जो गर्भाधानादि क्रियाओं में उपयुक्त होते हैं वे ही मन्त्र धार्मिक मन्त्र कहलाते हैं किन्तु जो प्राणियोंकी हिंसा करनेमें प्रयुक्त होते हैं उन्हें यहां दुर्मन्त्र अर्थात् खोटे मन्त्र समझना चाहिये ।। २६ ।।
Only those mantras which are employed in rites such as conception and the like are to be deemed dhārmika mantras—religious and righteous utterances.But those used to inflict harm upon living beings must here be regarded as durmantras—perverse and corrupt incantations.
श्लोक ( Shlok ) 27
विश्वेश्वरादयो ज्ञेया देवताः शान्तिहेतवः । क्रूरास्तु देवता हेया यासां स्याद् वृत्तिरामिषैः ॥२७॥
शान्तिको करनेवाले तीर्थ-कर आदि ही देवता हैं। इनके सिवाय जिनकी मांससे वृत्ति है वे दुष्ट देवता छोड़ने योग्य हैं।। २७।।
The true deities are the Tīrthaṅkaras and others who are the harbingers of peace.All other so-called deities, who subsist on flesh, are wicked and ought to be renounced.
श्लोक ( Shlok ) 28
निर्वाणसाधनं यत् स्यात्तल्लिङ्गं जिनदेशितम् । “एणाजिनादिचिह्न तु कुलिङ्ग तद्धि वैकृतम् ॥२८॥
जो साक्षात् मोक्षका कारण है ऐसा जिनेन्द्रदेवका कहा हुआ निर्ग्रन्थपना ही सच्चा लिङग है । इसके सिवाय मृगचर्म आदिको चिह्न बनाना यह कुलिङगियोंका बनाया हुआ कुलिङ्ग है ॥ २८॥
That which is the direct cause of liberation—the state of nirgranthatā (non-attachment) as proclaimed by the Jina—is the true liṅga (sacred symbol).All else—such as the use of deer-skins and other external emblems—are false symbols devised by impostors, the followers of corrupted paths.28
श्लोक ( Shlok ) 29
स्याश्निरामिषभोजित्वं शुद्धिराहारगोचरा । सर्वङ्कषास्तु ते ज्ञेया ये स्युरामिषभोजिनः ॥२९॥
मांसरहित भोजन करना आहार-विषयक शुद्धि कहलाती है। जो मांसभोजी हैं उन्हें सर्वघाती समझना चाहिये ।। २९।।
o partake of food free from flesh is known as purity in the matter of sustenance.Those who consume meat must be regarded as destroyers of all life.29
श्लोक ( Shlok ) 30
अहिंसाशुद्धिरेषां स्याद् ये निःसङ्गा दयालवः । रताः पशुवधे ये तु न ते शुद्धा दुराशयाः ॥३०॥
अहिंसा शुद्धि उनके होती है जो परिग्रहरहित हैं और दयालु हैं, परन्तु जो पशुओंकी हिंसा करनेमें तत्पर रहते हैं वे दुष्ट अभिप्रायवाले शुद्ध नहीं हैं ।।३०।।
Purity in non-violence belongs to those who are free from possessions and are filled with compassion.But those who remain eager to harm living beings are of wicked intent and cannot be deemed pure.30
श्लोक ( Shlok ) 31
कामशुद्धिर्मता तेषां विकामा ये जितेन्द्रियाः । सन्तुष्टाश्च स्वदारेषु शेषाः सर्वे विडम्बकाः ॥३१॥
जो कामरहित जितेन्द्रिय मुनि हैं उन्हींके कामशुद्धि मानी जाती है अथवा जो गृहस्थ अपनी स्त्रियोंमें संतोष रखते हैं उनके भी कामशुद्धि मानी जाती है परन्तु इनके सिवाय जो अन्य लोग हैं वे केवल विडम्बना करनेवाले हैं ।। ३१।।
rue purity in matters of desire (kāma-śuddhi) is found in the passionless, self-restrained ascetics.It is also found in householders who remain content with their own lawful spouses.
All others, beyond these, are but pretenders engaged in mere hypocrisy.31
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
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