आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
श्लोक 112 से 123 जिनेन्द्र का दर्शन
भरत ने गंधकुटी में भगवान वृषभदेव को मेरु शिखर जैसे सिंहासन पर देखा। वे छायारहित, तीन छत्रों से सुशोभित, और प्रभामण्डल से युक्त थे। अशोक वृक्ष चिह्न उनके शोक-निवारक स्वरूप को दर्शाता था। चामर, आकाशदुंदुभियाँ, और फूलों की वर्षा उनकी शोभा बढ़ाते थे। उनकी दिव्य ध्वनि अनेक भाषाओं में हृदय का अंधकार दूर करती थी। अनन्त वीर्य, सुगंध, और शुभ लक्षणों से युक्त भगवान को देखकर भरत आनंदित हुए और घुटनों पर नमस्कार किया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 33 – Shlok 112 to 123
श्लोक ( Shlok ) 112
मेखलायां तृतीयस्यामथैक्षिष्ट जगद्गुरुम् । वृषभं स कृती यस्यां श्रीमद्गन्धकुटीस्थिता ॥११२॥
तदनन्तर विद्वान् चक्रवर्ती ने, जिसपर शोभायुक्त गन्धकुटी स्थित थी ऐसी तीसरी कटनीपर जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव को देखा ।।११२।।
Thereafter, the wise Emperor beheld on the third kaṭanī the Supreme Preceptor of the world, Lord Ṛṣabhadeva, seated in resplendent majesty within a fragrant and radiant pavilion—his divine presence the very essence of serenity and enlightenment.112
श्लोक ( Shlok ) 113 -123
तद्गर्भे रत्नसन्दर्भरुचिरे हरिविष्टरे। मेरुशृङग इवोत्तुङ्गे सुनिविष्टं महातनुम् ॥११३॥ छत्रत्रयकृतच्छायमप्यच्छायमघच्छिदम् । स्वतेजोमण्डलाक्रान्तनृसुरासुरमण्डलम् ।।११४।॥ अशोकशाखिचिह्नेन व्यञ्जयन्तमिवाञ्जसा । स्वपादाश्रयिणां शोकनिरासे शक्तिमात्मनः ॥११५॥ चलत्प्रकीर्णकाकीर्णपर्यन्तं कान्तविग्रहम् । रुक्माद्रिमिव वप्रान्त पतन्निर्झरसङ्कुलम् ॥११६।।तेजसां चक्रवालेन स्फुरता परितो वृतम् । परिवेषवृतस्यार्कमण्डलस्यानुकारकम् ।।११७।। वियद् दुन्दुभिभिर्मन्द्र घोष रुद्धोषितोदयम् । सुमनोवर्षिभिर्दिव्यजी मूतैरुर्जितश्रियम् ॥११८॥ स्फुरद्गम्भीरनिर्घोषप्रीणितत्रिजगत्समम् । प्रावृषेण्यं पयोवाहमिव धर्माम्बुवर्षिणम् ॥११९॥ नानाभावात्मिकां दिव्यभाषामे कात्मिकामपि । प्रथयन्तमयत्नेन हृद्ध्वान्तं नुदतीं नृणाम् ॥१२०॥अमेयवीर्यमाहार्य विरहे ऽप्यति सुन्दरम् । सुवाग्विभवमुत्सर्पत्सौरभं शुभलक्षणम् ।।१२१॥ अस्वेदमलमच्छायम पक्ष्मस्पन्दबन्धुरम् । सुसंस्थान मभेद्यं च दधानं वपुरूर्जितम् ॥१२२॥ रत्यप्रतर्क्यं माहात्म्यं दूरादालोकयन् जिनम् । प्रह्वोऽभूत्स महीस्पृष्ट जानुरानन्दनिर्भरः ॥१२३॥
उस गन्धकुटीके भीतर जो रत्नोंकी बनावटसे बहुत ही सुन्दर और मेरु पर्वतकी शिखरके समान ऊंचे सिंहासनपर बैठे हुए थे, जिनका शरीर बड़ा-जिनपर तीन छत्र छाया कर रहे थे परन्तु जो स्वयं छायारहित थे, पापोंको नष्ट करनेवाले थे, जिन्होंने अपने प्रभामण्डलसे मनुष्य, देव और धरणेन्द्र सभीके समूहको व्याप्त कर लिया था जो अशोक वृक्षके चिह्नसे ऐसे जान पड़ते थे मानो अपने चरणोंका आश्रय लेनेवाले जीवोंका शोक दूर करनेके लिये अपनी शक्ति ही प्रकट कर रहे हों-जिनके समीपका भाग चारों ओरसे ढलते हुए चामरोंसे व्याप्त हो रहा था, जो सुन्दर शरीरके धारक थे और इसीलिये जो उस सुमेरु पर्वतके समान जान पड़ते थे जोकि शिखरोंके समीप भागसे पड़ते हुए झरनोंसे व्याप्त हो रहा है-जो चारों ओरसे फैलते हुए कान्तिमण्डलसे व्याप्त हो रहे थे और उससे ऐसे जान पड़ते थे मानो गोल परिधिसे घिरे हुए सूर्यमण्डलका अनुकरण ही कर रहे हों-गम्भीर शब्द करने-वाले आकाशदुन्दुभियोंके द्वारा जिनका माहात्म्य प्रकट हो रहा था तथा फूलोंकी वर्षा करने-वाले दिव्य मेघों के द्वारा जिनकी शोभा बढ़ रही थी जिन्होंने चारों ओर फैलती हुई अपनी गंभीर गर्जनासे तीनों लोकोंके जीवोंकी सभा को संतुष्ट कर दिया था और इसीलिये जो धर्मरूपी जलकी वर्षा करते हुए वर्षाऋतुके मेघके समान जान पड़ते थे, जो उत्पत्तिस्थानकी अपेक्षा एक रूप होकर भी अतिशयवश श्रोताओंके कर्णकुहरके समीप अनेक भाषाओंरूप परिणमन करनेवाली और जीवोंके हृदयका अन्धकार दूर करनेवाली दिव्य ध्वनिको बिना किसी प्रयत्न के प्रसारित कर रहे थे जो अनन्त वीर्यको धारण कर रहे थे, आभूषणरहित होनेपर भी अति-शय सुन्दर थे, वाणीरूपी उत्तम विभूतिके धारक थे, जिनके शरीरसे सुगन्धि निकल रही थी, जो शुभ लक्षणोंसे सहित थे, पसीना और मलसे रहित थे, जिनके शरीरकी छाया नहीं पड़ती थी, जो आंखोंके पलक न लगनेसे अतिशय सुन्दर थे, समचतुरस्त्र संस्थानके धारक थे, और जो छेदन भेदन रहित अतिशय बलवान् शरीरको धारण कर रहे थे-ऐसे अचिन्त्य माहात्म्यके धारक श्री जिनेन्द्र भगवान्को दूरसे ही देखते हुए भरत महाराज आनन्दसे भर गये तथा उन्होंने अपने दोनों घुटने जमीनपर टेककर श्री भगवान्को नमस्कार किया ।।११३-१२३॥
Within that celestial pavilion of fragrance, exquisitely fashioned from precious gems and towering like the summit of Mount Meru, sat Lord Ṛṣabhadeva upon a lofty, radiant throne. His form was vast and resplendent, shaded by three white canopies, though he himself remained untouched by shadow. He was the destroyer of sin, his aureole encompassing the hosts of men, gods, and even Dharaṇendra. Marked by the symbol of the Aśoka tree, he appeared as though manifesting his power solely to dispel the sorrows of those who sought refuge at his feet.
Around him fluttered fly-whisks, their motion like the cascading waters near the peaks of Sumeru, while his flawless form shone with divine brilliance. The radiance that surrounded him spread in all directions, resembling the orb of the sun encircled by its glowing corona. Celestial drums resounded in the skies, proclaiming his majesty, and divine clouds showered flowers upon him, enhancing his glory.
Their deep, thunderous tones, echoing across the three worlds, brought delight to all beings, and thus he appeared as the monsoon cloud, raining down the waters of Dharma. Though one in essence with his origin, the divine sound of his discourse—effortless and spontaneous—took shape near the ears of each listener in myriad tongues, dispelling the darkness from their hearts.
He bore infinite strength, and though adorned with no ornaments, he was the very embodiment of beauty. He was the possessor of the supreme ornament of speech, from whose body a celestial fragrance arose. He was endowed with auspicious marks, free from sweat or impurity, his form casting no shadow. His unblinking eyes radiated serenity, and his body—squarely proportioned and impenetrable—was of unthinkable power and perfection.
Beholding such an inconceivably glorious Lord from afar, King Bharata was overwhelmed with joy. With deep reverence, he knelt, placed both knees upon the earth, and bowed in heartfelt salutation to the Blessed Lord.113 -123
श्लोक 124 से 131
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
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