आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 242 to 255
श्लोक ( Shlok ) 242 – 243
इति तद्वचनाच्छ्रे ष्ठी नृपश्चाभ्येत्य तं मुनिम् । वन्दित्वाधर्ममा पृच्छय काललब्ध्या महीपतिः ॥२४२॥गुणपालाय तद्राज्यं दत्वा संयममादधे । निकटे रतिषेणस्य विद्याधरमुनीशितुः ॥२४३॥
यह सुनकर सेठ और राजा दोनों ही उन मुनिराजके समीप गये और दोनोंने ही वन्दना कर धर्मका स्वरूप पूछा । काललब्धिका निमित्त पाकर राजा लोकपालने अपने पुत्र गुणपालके लिये राज्य दिया और उन्हीं विद्याधर मुनि रतिषेणके निकट संयम धारण कर लिया ।।२४२-२४३॥
Hearing these words, both the merchant and the king approached the noble sage and, offering their reverent salutations, inquired into the true nature of Dharma. Seizing the auspicious moment ordained by time, King Lokapala bestowed his kingdom upon his son Gunapala, and thereupon, together with the Vidyadhara sage Ratisheṇa, embraced the path of renunciation. ॥242–243॥
श्लोक ( Shlok ) 244
पञ्चमं स्वपदे सूनुं नियोज्यान्यैः सहात्मजैः । ययौ श्रेष्ठी च तत्रैव दीक्षां मोक्षाभिलाषुकः ॥२४४।।
मोक्षके अभिलाषी सेठने भी अपने पांचवें पुत्र-कुबेरप्रियको अपने पदपर नियुक्त कर अन्य सब पुत्रोंके साथ साथ वहीं दीक्षा धारण की ॥२४४।।
The merchant, too, yearning for liberation, appointed his fifth son, Kuberapriya, to his own position. Then, along with all his other sons, he embraced the vows of renunciation at that very place. ॥244॥
श्लोक ( Shlok ) 245 – 246
तथोक्त्वा कान्तवृत्तान्तं सा समुत्पश्नसंविदा । विरज्य गृहसंवासात् कुबेरादिश्रियं सतीम् ॥२४५॥गुणपालाय दत्वा स्वां सुतां गुणवतीं श्रिता । प्रभावत्युपदेशेन प्रियदत्ताऽप्यदीक्षत ॥२४६॥
इस प्रकार प्रियदत्ता अपने पतिका वृत्तान्त कहकर उत्पन्न हुए आत्मज्ञानके द्वारा गृहवाससे विरक्त हो गई थी, उस सतीने अपनी कुबेरश्री पुत्री राजा गुणपालको दी और स्वयं गुणवती आर्यिकाके समीप जाकर प्रभावतीके उपदेशसे दीक्षा धारण कर ली ॥ २४५-२४६॥
Thus did Priyadatta, recounting the tale of her husband, become disenchanted with worldly life through the awakening of self-knowledge. That virtuous lady bestowed her daughter, Kuberaśrī, upon King Gunapala, and then, approaching the venerable Aryika Gunavati, she received initiation into renunciation through the teachings of Prabhavati. ॥245–246॥
श्लोक ( Shlok ) 247 – 255
मुनि हिरण्यवर्माण कदाचित् प्रेतभूतले । दिनानि सप्त सङ्गीर्य प्रतिमायोगधारिणम् ॥२४७॥वन्दित्वा नागराः सर्वे तत्पूर्वभवसंकथा । कुर्वाणा पुरमागच्छन् विद्युच्चोरोऽप्युदीरितात् ॥२४८॥चेटक्याः प्रियदत्तायास्तन्मुनेः प्राक्तनं भवम् । विदित्वा तद्गतक्रोधात्तदोत्पन्न विभङ्गकः ॥२४९॥मुनि पृथक्प्रदेशस्यां प्रतिमायोगमास्थिताम् । प्रभावतीं च संयोज्य चितिकायां दुराशयः ॥२५०॥एकस्यामेव निक्षिप्याधाक्षी ‘दघजिघृक्षया । सोढ्वा तदुपसर्ग तौ विशुद्धपरिणामतः ॥२५१॥स्वर्ग समुदपद्येतां क्षमया कि न जायते । “सुवर्णवर्मा तज्ज्ञात्वा विद्युच्चोरस्य निग्रहम् ॥२५२॥करिष्यामीति कोपेन पापिनः सङगरं व्यधात्। विदित्वाऽवधिबोधेन तत्तौ स्वर्गनिवासिनौ ॥ २५३॥प्राप्य संयभरूपेण सुतां धर्मकथादिभिः । तत्त्वं श्रद्धाप्य तं कोपादपास्य कृपयाऽऽहितौ ॥२५४॥’दिव्यरूपं समादाय निगद्य निजवृत्तकम् । प्रदायाभरणं तस्मै पराद् र्ध्य स्वपदं गतौ ॥२५५॥
किसी समय मुनिराज हिरण्यवर्माने सात दिनका नियम लेकर श्मशानभूमिमें प्रतिमा योग धारण किया, नगरके सब लोग उनकी वन्दना करनेके लिये गये थे। वन्दना कर उनके पूर्वभवकी कथाएं कहते हुए जब सब लोग नगरको वापिस लौट आये तब एक विद्युच्चोरने भी प्रियदत्ताकी चेटीसे उन मुनिराजका वृत्तान्त सुना, सुनकर उसे उनके प्रति कुछ क्रोध उत्पन्न हुआ और उसी क्रोध के कारण उसे विभंगावधि भी प्रकट हो गया, उस विभंगावधिसे उसने मुनिराजके पूर्वभवके सब समाचार जान लिये । यद्यपि मुनिराज प्रतिमायोग धारण कर अलग ही विराजमान थे और प्रभावती भी अलग विद्यमान थी तो भी उस दुष्टने पापसंचय करनेकी इच्छासे उन दोनोंको मिलाकर और एक ही चितापर रखकर जला दिया वे दोनों विशुद्ध परिणामोंसे उपसर्ग सहनकर स्वर्गमें उत्पन्न हुए सो ठीक ही है क्योंकि क्षमासे क्या क्या नहीं होता ? जब सुवर्ण-वर्माको इस बातका पता चला तब उसने प्रतिज्ञा की कि मैं विद्युच्चोरका निग्रह अवश्य ही करूँगा-उसे अवश्य ही मारूँगा। यह प्रतिज्ञा स्वर्गमें रहनेवाले हिरण्यवर्मा और प्रभावती के जीव देव-देवियोंने अवधिज्ञानसे जान ली, वे शीघ्र ही संयमीका रूप बनाकर पुत्रके पास पहुँचे, दयाधारण करनेवाले उन देवदेवियोंने धर्मकथाओं आदिके द्वारा तत्त्वश्रद्धान कराकर उसका क्रोध दूर किया और अन्तमें अपना दिव्यरूप प्रकटकर अपना सब हाल कहा तथा उसे बहुमूल्य आभूषण देकर दोनों ही अपने स्थानपर चले गये ॥ २४७-२५५॥
At one time, the sage Hiranyavarma undertook a vow of seven days and entered the practice of pratima yoga in a cremation ground. All the townspeople went there to offer their salutations. Having paid their respects and recounted tales of his past lives, they returned to the city. Meanwhile, a lightning-swift thief (vidyut-chora) heard of the sage’s story from Priyadatta’s maidservant. Hearing this, a surge of anger arose within him, and from that anger, his vibhangavadhi knowledge was awakened, by which he came to know all the details of the sage’s former births.Though the sage sat apart in deep meditation and Prabhavati was also elsewhere, that wicked man, driven by the desire to accumulate evil karma, brought both together, placed them on a single funeral pyre, and set them ablaze. Enduring the ordeal with pure equanimity, they both attained rebirth in the heavenly realms—rightly so, for what cannot be achieved through the power of forbearance?When Suvarnavarma learned of this dreadful event, he vowed, “I shall surely subdue that lightning-thief—I shall indeed slay him.” This very resolve was perceived through avadhijnana by the celestial beings who were the souls of Hiranyavarma and Prabhavati, now dwelling in heaven. They swiftly descended in the guise of ascetics and appeared before their son. Filled with compassion, these divine beings inspired him with true faith through discourses on Dharma, thus dispelling his wrath. Finally, they revealed their celestial forms, disclosed the entirety of their past, bestowed upon him priceless ornaments, and then returned to their heavenly abode. ॥247–255॥
श्लोक 256 से 271
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241