आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 45- Shlok 142 to 152
श्लोक ( Shlok ) 142 – 147
सुरदेवस्य” तद्वाक्यं कृत्वा प्राणावलम्बनम् । व्रजन् स सत्वरं मोहाद तीर्थेऽचोदयद् गजम् ॥१४२॥हेयोपेय विवेकः कः कामिनां मुग्धचेतसाम् । उत्पुष्करं स्फुरद्दन्तं “प्रोद्यत्तत्प्रतिमानकम् ॥१४३॥तरन्तं मकराकारं मध्ये ह्रदमिभाधिपम् । देवी कालीति पूर्वोक्ता सरय्वाः सङ्गमे ऽग्रहीत् ॥१४४॥ ‘नक्राकृत्या स्वदेशस्थः क्षुद्रोऽपि महतां बली । दृष्ट्वा गजं निमज्जन्तं प्रत्यागत्य तटे स्थिताः ॥१४५॥ससंभ्रमं सहापेतुः ह्रदं हेमाङ्गदादयः । सुलोचनाऽपि तान्वीक्ष्य कृतपञ्चनमस्कृतिः ॥१४६॥ मन्त्रमूर्तीन् समाधाय हृदये भक्तितोऽर्हतः । उपसर्गापसर्गान्तं त्यक्ताहारशरीरिका ॥१४७॥
उस पुरोहितके वचनोंको प्राणोंका सहारा मानकर वह जयकुमार शीघ्र ही आगे चला और भूलसे उसने अघाटमें ही हाथी चला दिया सो ठीक ही है, क्योंकि विचारहीन कामी पुरुषोंको हेय उपादेयका ज्ञान कहां होता है ? वह हाथी पानीमें चलने लगा, उस समय उसकी सूंड़का अग्रभाग ऊंचा उठा हुआ था, दांत चमक रहे थे, गंडस्थल पानी के ऊपर था और आकार मगरके समान जान पड़ता था, इस प्रकार तैरता हुआ हाथी एक गढ़ेके बीच जा पहुंचा । उसी समय दूसरे सर्पके साथ समागम करते समय जिस सर्पिणीको पहले जयकुमारके सेवकोंने मारा था और जो मरकर काली देवी हुई थी उसने मगरका रूप धरकर जहां सरयू गंगा नदीसे मिलती है उस हाथीको पकड़ लिया सो ठीक ही है क्योंकि अपने देशमें रहनेवाला क्षुद्र भी बड़ों बड़ोंसे बलवान् हो जाता है। हाथी को डूबता हुआ देखकर कितने ही लोग लौटकर किनारेपर खड़े हो गये परन्तु हेमाङ्गद आदि घबड़ाकर उसी गढेमें एक साथ घुसने लगे । सुलोचनाने भी उन सबको गढ़ेमें घुसते देख पंच नमस्कार मंत्रका स्मरण किया, उसने मन्त्रकी मूर्तिस्वरूप अर्हन्त भगवान्को बड़ी भक्तिसे अपने हृदयमें धारण किया और उपसर्गकी समाप्ति तक आहार तथा शरीरका त्याग कर दिया ॥१४२-१४७॥
Taking the priest’s words as a lifeline for his soul, Jayakumara hastened onward. In his distracted state, he inadvertently led his elephant straight into a deep pit—an error most fitting, for what knowledge of right and wrong can a man enslaved by passion possess? The elephant advanced into the water, its trunk lifted high, tusks gleaming, temples emerging above the surface, and its form resembling a mighty crocodile. Swimming thus, the elephant reached the center of a great pool.
At that very moment, the serpentess who, in her previous birth, had been slain by Jayakumara’s servants during her union with another serpent and had thereafter taken birth as the fierce goddess Kali, assumed the form of a crocodile. At the confluence of the Sarayu and Ganga rivers, she seized the elephant—aptly so, for even the lowliest creature in its own domain can overpower the mightiest.
Seeing the elephant begin to sink, many companions turned back and stood helpless on the riverbank; but Hemangada and others, terrified yet resolute, plunged together into the pool. Witnessing them leap into the water, Sulochana too remembered the sacred Panch Namaskara Mantra, enshrined the image of the venerable Lord Arhant in her devoted heart, and, remaining steadfast until the calamity’s end, renounced both sustenance and her mortal frame.142 – 147
श्लोक ( Shlok ) 148 – 149
प्राविशद् बहुभिः सार्थ गङ्गां गङ्गेव देवता । ‘गङ्गापातप्रतिष्ठानगङ्गा कूटाधिदेवता ॥१४८॥विबुध्यासनकम्पेन कृतज्ञाऽऽगत्य सत्वरम् । “तदानयत्तटं सर्वान् सन्तर्ज्य खलकालिकाम् ॥१४९।।
सुलोचना भी अनेक सखियोंके साथ गंगामें घुस रही थी और उस समय ऐसी जान पड़ती थी मानो गङ्गादेवी ही अनेक सखियोंके साथ गंगा नदीमें प्रवेश कर रही हो। इतने में ही गंगाप्रपात कुण्डके गंगाकूटपर रहनेवाली गंगादेवीने आसन कंपायमान होनेसे सब समाचार जान लिया और किये हुए उपकारको माननेवाली वह देवी बहुत शीघ्र आकर दुष्ट कालिका देत्रीको डाँटकर उन सबको किनारेपर ले आई ॥१४८-१४९।।
Sulochana, accompanied by many of her companions, was entering the waters of the Ganga; at that moment, she appeared as if the very goddess Ganga herself, along with her retinue, were descending into the sacred river. Just then, the goddess of the Ganga, dwelling upon the lofty banks of the river’s grand cascade, perceived the entire affair as her seat quivered with agitation. Recognizing the noble deeds once rendered unto her, the grateful goddess swiftly descended, sternly rebuked the wicked Kalika in her crocodile form, and led Sulochana and her companions safely back to the riverbank.148 – 149
श्लोक ( Shlok ) 150 –152
स्वयमागत्य केनात्र रक्षन्ति कृतपुण्यकान् । गङ्गातटे विकृत्याशु भवनं सर्वसम्पदा ॥१५०।।मणिपीठे समास्थाप्य पूजयित्वा सुलोचनाम् । तव दत्तनमस्काराज्जज्ञे ” गङ्गाधिदेवता ॥१५१॥त्वत्प्रसादादिदं सर्वमवरुद्धामरेशिनः । तयेत्युक्ते जयोऽप्येतत् किमित्याह सुलोचनाम् ॥१५२॥
सो ठीक ही है क्योंकि इस संसारमें ऐसे कौन हैं जो पुण्य करनेवालोंकी स्वयं आकर रक्षा न करें । तदनन्तर उस देवीने गंगा नदी के किनारेपर बहुत शीघ्र अपनी विक्रिया द्वारा सब सम्पदाओंसे सुशोभित एक भवन बनाया, उसमें मणिमय सिंहासनपर सुलोचनाको बैठाकर उसकी पूजा की और कहा कि तुम्हारे दिये हुए नमस्कार मंत्रसे ही में गंगाकी अधिष्ठात्री देवी हुई हूं, और सौधर्मेन्द्रकी नियोगिनी भी हूं, यह सब तेरे ही प्रसादसे हुआ है। गंगादेवी के इतना कह चुकनेपर जयकुमारने भी सुलोचनासे पूछा कि यह क्या बात है ? ॥१५०-१५२॥
And rightly so—for in this world, who is there that would not themselves come to the aid of those who perform righteous deeds? Thereafter, the goddess swiftly conjured, by her divine power, a splendid palace adorned with every kind of wealth upon the banks of the Ganga. Seating Sulochana upon a jeweled throne within that resplendent abode, she worshipped her with deep reverence and declared: “It is by the power of the Namaskara Mantra you bestowed upon me that I have become the presiding goddess of the Ganga and the appointed envoy of Saudharma Indra. All this has come to pass through your grace alone.”
When the goddess had spoken thus, Jayakumara turned to Sulochana and asked her, “What is the meaning of this wondrous revelation?”150 –152
श्लोक 153 से 160
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361 | श्लोक 362 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141