आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 42 से 51 : म्लेच्छ खंड पर विजय का उद्यम
भरत की सेनाएँ व्यूह रचना के साथ शत्रु देशों को घेरती थीं, पर सूर्य की तरह लोगों को पीड़ित नहीं करती थीं। उन्होंने किलों और राजाओं को वश किया। चिलात और आवर्त नामक म्लेच्छ राजाओं ने अपनी सेना का पराभव सुना और युद्ध की तैयारी की। उनके मंत्रियों ने युद्ध से रोका, सुझाव दिया कि विजयार्थ पर्वत को पार करने वाला कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि देव या दिव्य प्रभाव वाला है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 32 – Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
कृतव्यूहानि सैन्यानि संहतानि परस्परम्। नातिभूमि ययुर्जिप्णोर्न स्वैरं परिबभ्रमुः ॥४२॥
जिनमें अनेक व्यूहोंकी रचना की गई है और जो परस्परमें मिली हुई हैं ऐसी भरतकी सेनाएँ न तो उनसे बहुत दूर ही जाती थीं और न स्वच्छन्दतापूर्वकइधर उधर ही घूमती थीं ।॥४२।।
“The armies of Bharata, formed in intricate arrays and interlinked with one another, neither strayed far from them nor moved freely here and there of their own accord.” ॥42॥
श्लोक ( Shlok ) 43
प्रसाधितानि दुर्गाणि कृतं चाशक्यसाधनम् । परचक्रमवष्टब्धं चक्रिणो जयसाधनैः ॥४३॥
चक्रवर्तीकी विजयी सेनाओंने अनेक किले अपने वश किये, जिन्हें कोई वश नहीं कर सकता था, ऐसे राजाओंको वश किया और शत्रुओंके देश घेरे ॥४३॥
“The victorious armies of the Chakravartin subdued many fortresses deemed impregnable, brought mighty kings under their dominion whom none could subdue, and laid siege to the lands of their foes.” ॥43॥
श्लोक ( Shlok ) 44
बलवान्नाभियोक्तव्यो रक्षणीयाश्च संश्रिताः । यतितव्यं क्षितित्राणे जिगीषोर्वृत्तमीदृशम् ॥४४॥
बलवान्के साथ युद्ध नहीं करना, शरणमें आये हुएकी रक्षा करना, और अपनी पृथिवी की रक्षा करनेमें प्रयत्न करना यही विजयकी इच्छा करनेवाले राजाके योग्य आचरण हैं ।॥४४॥
“To refrain from warring with the mighty, to protect those who seek refuge, and to strive earnestly in the defense of one’s own realm—such is the righteous conduct befitting a king who aspires to victory.” ॥44॥
श्लोक ( Shlok ) 45
इत्यलङ्घ्यबलश्चक्री चक्ररत्नमनुव्रजन् । कियतीमपि तां भूमिमवाष्टम्भीत् स्वसाधनैः ॥४५।।
इस प्रकार जिनकी सेना अथवा पराक्रमको कोई उल्लंघन नहीं कर सकता ऐसे चक्रवर्ती भरत ने चक्ररत्न के पीछे पीछे जाते हुए अपनी सेना के द्वारा वहाँ की कितनी ही भूमि को अपने आधीन कर लिया ।।४५।।
“Thus did the Chakravartin Bharata—whose army and valor none could withstand—following the wondrous Disc-Jewel, bring vast stretches of land under his dominion through the might of his forces.” ॥45॥
श्लोक ( Shlok ) 46
तावच्च परचक्रेण स्वचक्रस्य पराभवम् । चिलातावर्तनामानौ प्रभू शुश्रुवतुः किल ॥४६॥
इतने में ही चिलात और आवर्त नाम के दो म्लेच्छ राजाओंने शत्रुओं की सेनाके द्वारा अपनी सेनाका पराभव होता सुना ॥४६॥
“Just then, two Mleccha kings named Chilāta and Āvarta heard that their armies were being overpowered by the forces of the enemy.” ॥46॥
श्लोक ( Shlok ) 47
अभूतपूर्वमेतन्नौ परचक्रमुपस्थितम् । व्यसनं प्रतिकर्तव्यमित्यास्तां सङ्गतौ मिथः ॥४७।।
हमारे देशमें शत्रुओंकी सेना आकर उपस्थित होना यह हम दोनोंके लिये बिलकुल नई बात है, इस आये हुए संकटका हमें प्रतिकार करना चाहिये ऐसा विचार कर वे दोनों ही म्लेच्छ राजा परस्पर मिल गये ।।४७।।
“‘The arrival of enemy forces within our land is wholly unprecedented for us both; this sudden peril must be met with resistance’—thus reflecting, the two Mleccha kings joined forces in alliance.” ॥47॥
श्लोक ( Shlok ) 48
ततो धनुर्धरप्रायं सहाश्वीयं सहास्तिकम् । इतोऽमुतश्च संजग्मे तत्सैन्यं म्लेच्छराजयोः ॥४८॥
तदनन्तर जिसमें प्रायः करके धनुष धारण करनेवाले योद्धा हैं, तथा जो हाथियों और घोड़ोंके समूहसे सहित हैं ऐसी उन दोनों राजाओंकी सेना इधर उधरसे आकर इकट्टी मिल गई ॥४८॥
“Thereafter, the armies of those two kings—composed chiefly of bow-wielding warriors and accompanied by hosts of elephants and horses—gathered from all quarters and assembled together.” ॥48॥
श्लोक ( Shlok ) 49
कृतोच्चविग्रहारम्भौ संरम्भं प्रतिपद्य तौ । विक्रम्य चक्रिणः सैन्यैर्भेजतुर्विजिगीषुताम् ॥४९।।
जिन्होंने भारी युद्ध करनेका उद्योग किया है ऐसे वे दोनों ही राजा क्रोधित होकर तथा पराक्रम प्रकट कर चक्रवर्तीकी सेनाओं के साथ विजिगीषुपनको प्राप्त हुए अर्थात् उन्हें जीतनेकी इच्छासे उनके प्रतिद्वन्द्वी हो गये ॥४९॥
“Filled with wrath and resolved upon a mighty conflict, both kings, revealing their valor, rose in opposition to the Chakravartin’s forces, seeking conquest and setting themselves as rivals to his dominion.” ॥49॥
श्लोक ( Shlok ) 50
तावच्च सुधियो धीराः कृतकार्याश्च मन्त्रिणः । निषिध्य तौ रणारम्भाद् वचः पथ्यमिदं जगुः ॥५०॥
इसीके बीच, बुद्धिमान् धीरवीर तथा सफलतापूर्वक कार्य करनेवाले मंत्रियोंने उन दोनों राजाओंको युद्धके उद्योगसे रोककर नीचे लिखे अनुसार हितकारी वचन कहे ॥५०॥
“Meanwhile, wise, steadfast, and efficient ministers, skilled in the art of counsel, restrained the two kings from embarking upon war, and spoke words of prudent counsel as follows.” ॥50॥
श्लोक ( Shlok ) 51
न किञ्चिदप्यनालोच्य विधेयं सिद्धिकाम्यता ।अनालोचितकार्याणां दवीयस्यो ऽर्थसिद्धयः ॥५१॥
हे प्रभो, सिद्धिकी इच्छा करनेवालोंको बिना विचारे कुछ भी नहीं करना चाहिये क्योंकि जो बिना विचारे कार्य करते हैं उनके कार्योंकी सिद्धि बहुत दूर हो जाती है ।॥५१॥
“O Lord, those who aspire to success must act not in haste but with thoughtful deliberation; for actions undertaken without reflection lead success far from their grasp.” ॥51॥
श्लोक 52 से 61
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31
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