Summary of Ādi purāṇa Parv 37 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 37 (श्लोक 1 से 205)
चक्रवर्ती भरत, दिग्विजय पूर्ण कर अयोध्या में वैभवपूर्ण प्रवेश करते हैं, जहां राजा, देव, और नगरवासी वृषभदेव की भांति उनका अभिषेक करते हैं। गंगा-सिन्धु देवियां तीर्थजल से अभिषेक करती हैं। भरत विनम्र रहते हैं, बाहुबली के संघर्ष से उनका तेज बढ़ता है। उनके साम्राज्य में 84 लाख हाथी, रथ, 18 करोड़ घोड़े, और 84 करोड़ सिपाही हैं। उनका वज्रवृषभनाराच शरीर 64 लक्षणों से युक्त है। 32 हजार मुकुटबद्ध राजा, देश, और 96 हजार रानियां उनके वैभव का हिस्सा हैं। नौ निधियां—काल, महाकाल, नैसर्ण्य, पाण्डुक, पद्म, माणव, पिङ्गल, शंख, और सर्वरत्न—शास्त्र, संगीत, वस्त्र, रत्न आदि उत्पन्न करती हैं। चौदह रत्न—चक्र, छत्र, सजीव-अजीव—उनकी रक्षा और भोग के साधन हैं। सुभद्रा, उनकी स्त्री-रत्न, कामदेव-सी शोभती है, जिसके साथ वे ऋतुओं में क्रीड़ा करते हैं। उनके नगर, बंदरगाह, गौशालाएं, और वन समृद्धि दर्शाते हैं। सूर्यप्रभ छत्र, वज्रकाण्ड धनुष, सुदर्शन चक्र, और अन्य शस्त्र उनकी अजेयता को दर्शाते हैं। चिन्तामणि, सेनापति, और पवनंजय घोड़ा उनके रत्न हैं। भेरियां, शंख, और अमृतगर्भ भोजन उनके पुण्य के फल हैं। भरत दस भोग-साधनों से संतृप्त होकर एकछत्र पृथ्वी का पालन करते हैं। उनकी समृद्धि पुण्य से उत्पन्न है, जो विजयलक्ष्मी और कीर्ति प्रदान करता है। वे छह खण्डों की भरतभूमि की रक्षा करते हैं। वृषभदेव, तीनों लोकों के गुरु, भव्यों को कल्याण देते हैं।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 37
श्लोक 1 से 11 भरत का अयोध्या में अभिषेक
चक्रवर्ती भरत, दिग्विजय पूर्ण कर अयोध्या में ध्वजाओं से सुशोभित वैभवपूर्ण प्रवेश करते हैं। राजाओं, अन्तःपुर, और नगरवासियों द्वारा उनका भव्य अभिषेक किया जाता है, जिसमें वृषभदेव के अभिषेक जैसी विधियां अपनाई जाती हैं। देव और राजा उन्हें आभूषण पहनाते हैं और जयघोष करते हैं। गंगा-सिन्धु देवियां तीर्थजल से अभिषेक करती हैं। अभिषिक्त भरत सिंहासन पर विराजते हैं, और गणबद्ध देव उनके मुकुट नवा-नवाकर सेवा करते हैं।
श्लोक 12 से 21 भरत की विनम्रता और वैभव
हिमवान, विजयार्ध, मागध, और विद्याधर भरत को नमस्कार करते हैं। अभिषेक के बावजूद भरत को अहंकार नहीं होता, क्योंकि वे भाइयों को विभूति न बांट पाने का पश्चाताप करते हैं। बाहुबली के संघर्ष से उनका तेज और बढ़ता है। निष्कंटक राज्य प्राप्त कर वे सूर्य-से देदीप्यमान होते हैं। उनकी प्रजा योग और क्षेम से सनाथ रहती है। भरत निधियों और रत्नों का यथायोग्य उपयोग करते हैं, जिससे उनका यश प्रथम चक्रवर्ती के रूप में फैलता है।
श्लोक 22 से 31 भरत की सेना और शारीरिक बल
गौतमस्वामी राजा श्रेणिक के प्रश्न पर भरत की विभूति का वर्णन करते हैं। उनके पास 84 लाख ऐरावत हाथी, 84 लाख रथ, 18 करोड़ घोड़े, और 84 करोड़ पैदल सिपाही हैं। भरत का शरीर वज्रवृषभनाराच संहनन से अभेद्य और समचतुरस्र संहनन से सुंदर है। उनकी कान्ति सुवर्ण-सी और शरीर 64 लक्षणों से युक्त है। उनका शारीरिक बल छह खंडों के राजाओं से अधिक है, और उनका चक्र-शासन सभी राजा स्वीकार करते हैं।
श्लोक 32 से 41 भरत का साम्राज्य और रानियां
भरत के 32 हजार मुकुटबद्ध राजा, 32 हजार देश, और 32 हजार उच्च कुल की देवियां हैं। इसके अतिरिक्त 32 हजार प्रियरानियां और 32 हजार कामोत्तेजक रानियां उनके अन्तःपुर में हैं। ये 96 हजार रानियां कल्पलता और कमलिनी-सी शोभती हैं। उनके शरीर कामदेव की शक्ति को बढ़ाते हैं। उनकी जंघाएं, कमर, और नाभि कामदेव के तरकस, कुटी, और कूपिका-सी प्रतीत होती हैं।
श्लोक 42 से 51 रानियों की शारीरिक शोभा
रानियों की रोमराजि, स्तन, और भुजाएं कामदेव की लकड़ी, पिटारा, और पाश-सी हैं। उनका कण्ठ, मुख, और नेत्र कामदेव के उच्छ्वास, सुख-भवन, और बाणों-से युक्त हैं। उनके ललाट, बाल, और केश-लताएं कामदेव के खेल-मैदान और जाल-सी प्रतीत होती हैं। ये रानियां अपनी शारीरिक चेष्टाओं से भरत का मन हरण करती हैं। उनके स्पर्श, अवलोकन, और मधुर शब्दों से भरत को संतोष मिलता है।
श्लोक 52 से 61 रानियों का कामदेव और साम्राज्य
रानियों की हंसी और आलिंगन से सुरत-वृक्ष फलता है। उनकी चेष्टाएं कामदेव को विभिन्न रसों से युक्त करती हैं, जो प्रेम, क्रोध, और संभोग में बदलता रहता है। भरत इन रानियों के साथ कामदेव-से क्रीड़ा करते हैं। उनके साम्राज्य में 32 हजार नाटक, 72 हजार नगर, और 96 करोड़ गांव हैं, जो स्वर्ग-से सुशोभित हैं।
श्लोक 62 से 71 साम्राज्य की समृद्धि
भरत के साम्राज्य में 99 हजार द्रोणामुख (बंदरगाह), 48 हजार पत्तन, 16 हजार खेट, 56 अन्तरद्वीप, और 14 हजार संवाह हैं। उनके पास 1 करोड़ हंडे, 1 लाख करोड़ हल, 3 करोड़ गौशालाएं, 700 कुक्षिवास, और 28 हजार सघन वन हैं। ये समृद्धियां उनके साम्राज्य को धन-धान्य और व्यवस्था से परिपूर्ण बनाती हैं।
श्लोक 72 से 81 भरत के म्लेच्छ राजा और नौ निधियां
महाराज भरत के अधीन 18,000 म्लेच्छ राजा हैं, जिनके क्षेत्रों में रत्न-खानें हैं। उनके पास काल, महाकाल, नैसर्ण्य, पाण्डुक, पद्म, माणव, पिङ्गल, शंख, और सर्वरत्न नामक नौ निधियां हैं, जो उनकी आजीविका को निश्चिंत रखती हैं। काल निधि से शास्त्र और संगीत उत्पन्न होते हैं। महाकाल निधि से छह कर्मों के साधन, नैसर्ण्य से शय्या-आसन, पाण्डुक से धान्य और रस, पद्म से वस्त्र, पिङ्गल से आभूषण, माणव से नीति-शस्त्र, शंख से सुवर्ण, और सर्वरत्न से विविध रत्न उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 82 से 92 चौदह रत्न और सुभद्रा का परिचय
भरत के पास जीव और अजीव भेद से चौदह रत्न हैं। चक्र, छत्र, दण्ड, असि, मणि, चर्म, और काकिणी अजीव रत्न हैं, जबकि सेनापति, गृहपति, हाथी, घोड़ा, स्त्री, सिलावट, और पुरोहित सजीव रत्न हैं। ये रत्न अयोध्या और विजयार्ध शैल पर उत्पन्न हुए। ये निधियां और रत्न भरत के हृदय को बलिष्ठ बनाते हैं। सुभद्रा नामक उनकी स्त्री-रत्न, विद्याधर वंश की, शिरीष-फूल-सी कोमल, चम्पा-कली-सी कान्तिमान, और कामोत्तेजक है।
श्लोक 93 से 101 सुभद्रा की शारीरिक शोभा
सुभद्रा के चरण नूपुरों की ध्वनि से कामदेव के नगाड़ों-से बजते हैं। उनकी जंघाएं और नितम्ब कामदेव की नसैनी और गृह-से हैं। रोमावली से कामदेव-रूपी सर्प उनकी नाभि से स्तनों तक पहुंचता है। वह हार और चोली से सर्पिणी-सी शोभती है। उसकी भुजाएं कल्पवृक्ष के अंकुर, करतल विजय-रेखाओं से युक्त, और मुख कामदेव की आयुधशाला-सा है।
श्लोक 102 से 111 सुभद्रा की रूप-महिमा
सुभद्रा का मुख चन्द्र-कान्ति को जीतता है, और कान सोने के पत्रों से देवांगनाओं को पराजित करते हैं। उसके कपोल कामदेव के दर्पण, नाक सुगन्ध-सूंघने वाली, और नेत्र परस्पर स्पर्धा करते हैं। ललाट नीलकमल-माला-सा और केश कामदेव का पाश-से शोभते हैं। उसका रूप तीनों लोकों को जीतता है। भरत उसके रूप, स्पर्श, और संगीतमय शब्दों से सन्तुष्ट होकर क्रीड़ा करते हैं।
श्लोक 112 से 121 सुभद्रा और कामदेव की रूपकात्मकता
कवि सुभद्रा के रूप, स्पर्श, सुगन्ध, रस, और शब्द को कामदेव के पांच बाण मानते हैं। उसका कोमल शरीर कामदेव का धनुष है। उसकी हंसी, चितवन, और कपट कामदेव के अंग हैं। सुभद्रा के स्तन हेमन्त में भरत के रोमांच को शान्त करते हैं। वसन्त में वह चम्पा-चोटी और मधु-लाल नेत्रों से शोभती है। कोयल और भृंगों की ध्वनि कामदेव के आक्रमण-सी लगती है।
श्लोक 122 से 131 ऋतुओं में सुभद्रा के साथ क्रीड़ा
वसन्त का चैत्र मास सुगन्ध से भरा है, और मलय-वायु कामदेव की घोषणा-सी करता है। ग्रीष्म में सुभद्रा जल-स्नान और चन्दन-लेप से भरत को शान्त करती है। मालती-मालाएं पहनकर वह रातें प्रेममयी बनाती है। वर्षा में वह मेघ-गर्जना से भयभीत होकर भरत से आलिंगन करती है। नदियों, मयूरों, और बक-फूलों की सुगन्ध कामी लोगों को सन्तुष्ट करती है।
श्लोक 132 से 141 वर्षा और शरद में सुभद्रा का सौन्दर्य
वर्षा में मेघमाला और जल-धाराएं पथिकों को बांधती हैं, और सुभद्रा सुगन्धित मुख से भरत के साथ रात्रि व्यतीत करती है। शरद में भरत सप्तच्छद वनों में सुभद्रा के साथ विहार करते हैं। चांदनी रातों में वे उसकी हार-युक्त स्तनों को प्रेम करते हैं। सुभद्रा की माला और कमल भरत के वक्ष पर लटकते हैं, जिन्हें वह प्रेम से सूंघती है, और दोनों मिलकर ऋतुओं का सुख भोगते हैं।
श्लोक 142 से 151 भरत के भोग और वैभव
चक्रवर्ती भरत सुभद्रा के साथ प्रेम और रति-सुख में लीन होकर दस भोग-साधनों—निधियां, रानियां, नगर, शय्या, आसन, सेना, नाट्यशाला, वर्तन, भोजन, और सवारी—का उपभोग करते हैं। वे इन साधनों से संतृप्त होकर एकछत्र पृथ्वी का पालन करते हैं। उनके 16,000 गणबद्ध देव निधियों, रत्नों, और उनकी रक्षा में तत्पर रहते हैं। क्षितिसार कोट, सर्वतोभद्र गोपुर, नन्द्यावर्त छावनी, वैजयन्त महल, और दिकस्वस्तिका सभाभूमि उनके वैभव को दर्शाते हैं।
श्लोक 152 से 161 भरत के महल और आयुध
भरत के पास सुविधि लकड़ी, गिरिकूटक राजमहल, वर्धमानक नृत्यशाला, धारागृह, गृहकूटक, पुष्करावर्त महल, और कुबेरकान्त भण्डारगृह हैं। वसुधारक कोठार और जीमूत स्नानगृह उनकी समृद्धि को बढ़ाते हैं। अवतंसिका रत्नमाला, देवरम्या चांदनी, सिंहवाहिनी शय्या, और अनुत्तर सिंहासन उनकी शोभा हैं। सूर्यप्रभ छत्र, विद्युत्प्रभ कुण्डल, विषमोचिका खड़ाऊं, अभेद्य कवच, और अजितंजय रथ उनके युद्ध-सामर्थ्य को दर्शाते हैं।
श्लोक 162 से 171 भरत के शस्त्र
भरत के पास वज्रकाण्ड धनुष, अमोघ बाण, वज्रतुण्डा शक्ति, सिंहाटक भाला, लोहवाहिनी छुरी, मनोवेग कणप, और सौनन्दक तलवार हैं, जो युद्ध में अजेय हैं। भूतमुख खेट और सुदर्शन चक्र शत्रुओं को परास्त करते हैं। चण्डवेग दण्ड और वज्र-चर्म उनकी सेना को जल-उपद्रव से बचाते हैं। ये शस्त्र उनकी विजयलक्ष्मी को सुदृढ़ करते हैं।
श्लोक 172 से 181 भरत के रत्न
भरत के चूड़ामणि चिन्तामणि और चिन्ताजननी काकिणी रत्न उनकी शोभा बढ़ाते हैं। अयोध्य सेनापति, बुद्धिसागर पुरोहित, कामवृष्टि गृहपति, और भद्रमुख शिलावट उनके सजीव रत्न हैं। विजयपर्वत हाथी, पवनंजय घोड़ा, और सुभद्रा स्त्री-रत्न उनके वैभव का हिस्सा हैं। ये दिव्य रत्न देवों द्वारा संरक्षित और शत्रुओं से अजेय हैं।
श्लोक 182 से 190 भरत की भोग-सामग्री
भरत की आनन्दिनी भेरियां और गम्भीरावर्त शंख 12 योजन तक बजते हैं। वीरांगद कड़े, 48 करोड़ पताकाएं, और महाकल्याण भोजन उनकी समृद्धि दर्शाते हैं। अमृतगर्भ मोदक, अमृतकल्प स्वाद्य, और अमृत पानक उनके भक्ष्य-पेय हैं। ये भोग-साधन उनके पुण्य के फल हैं, जो अद्वितीय और केवल उनके लिए हैं।
श्लोक 191 से 201 पुण्य की महिमा और भरत का वैभव
भरत की समृद्धि—रूप, शरीर, निधियां, रत्न, अन्तःपुर, और भोग—पुण्य के उदय से प्राप्त है। पुण्य बिना विजयलक्ष्मी, प्रताप, और कीर्ति असंभव है। पण्डितों को पुण्य-संचय का उपदेश दिया जाता है। भरत का समय भोगों में क्षण-भर-सा बीतता है। वे साम्राज्यलक्ष्मी का एकछत्र पालन करते हैं, बिना व्याकुल हुए।
श्लोक 202 से 205 भरत और वृषभदेव की महिमा
भरत ने छह खण्डों की पृथ्वी को भरतभूमि बनाया, शत्रुओं का नाश कर उसका पालन किया। उनकी लक्ष्मी निधियों और रत्नों से युक्त है। वे प्रथम चक्रवर्ती हैं। वृषभदेव, तीनों लोकों के गुरु, स्तुति और ध्यान के योग्य हैं, जो भव्यों को कल्याण देते हैं। वे संसार-भय से रक्षा करते हैं।
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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